मंगलवार, 15 अगस्त 2017

मैकाले इस देश की आजादी का पिता है- ओशो

- स्वतन्त्रता दिवस पर विशेष प्रस्तुति-

इस देश में में क्रांति न होती अगर मैकाले न हुआ होता। लोग कहते हैं कि मैकाले ने इस देश को गुलाम बनाया और मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि मैकाले ही इस देश की आजादी का पिता है। अगर अंग्रेजों ने कोशिश न की होती शिक्षा देने की इस देश के लोगों को,यहां कभी क्रांति न होती । क्योंकि क्रांति आई शिक्षित लोगों से, अशिक्षित लोगों से नहीं, पंडित-पुरोहितों से नहीं, वेद के, उपनिषदों के ज्ञाताओं से नहीं–जो लोग पश्चिम से शिक्षा लेकर लौटे, जो वहां का थोड़ा रस लेकर लौटे। सुभाष ने लिखा है कि जब मैं पहली दफा यूरोप पहुंचा और एक अंग्रेज चमार ने मेरे जूतों पर पालिश किया तो मेरे आनंद का ठिकाना न रहा। अब जिसने अपने जूतों पर अंग्रेज को पालिश करते देखा हो, वह वापिस आकर इस देश में अंग्रेज के जूतों पर पालिश करे, यह संभव नहीं। अब मुश्किल खड़ी हुई। मैकाले इस देश की आजादी का पिता है। उसी ने उपद्रव खड़ा करवाया। अगर मैकाले इस देश के लोगों को अंग्रेजी शिक्षा न देता,पढ़ने देता उन्हें संस्कृत मजे से और पाठशालाओं में रटने देता उनको गायत्री,कोई हर्जा होने वाला नहीं था। वे अपना जनेऊ लटकाये, अपनी घंटियां बजाते हुए शांति से अपने भजन-कीर्तन में लगे रहते। उसने लोगों को पश्चिम में जो स्वतंत्रता फली है उसका स्वाद दिलवा दिया। एक दफा स्वाद मिल गया, फिर अड़चन हो गई। अभी तुम देखते हो, ईरान में क्या हो रहा है? ईरान के सम्राट को जो परेशानी झेलनी पड़ रही है वह उसके खुद ही के कारण। ईरान अकेला मुसलमान देश है जहां शिक्षा का ठीक से व्यापक विस्तार हुआ है और ईरान के शहंशाह ने शिक्षा पर बड़ा जोर दिया। ईरान समृद्ध है, शिक्षित है–सारे मुसलमान देशों में! और यही नुकसान की बात हो गई। अब वे ही शिक्षित लोग और समृद्ध लोग अब चुप नहीं रहना चाहते; अब वे कहते हैं, हमें हक भी दो, अब हमें प्रजातंत्र चाहिए; अब हम राज्य करें, इसका भी हमें मौका दो। और कोई मुसलमान देश में उपद्रव नहीं हो रहा है, क्योंकि लोग इतने गरीब हैं, इतने अशिक्षित हैं, मान ही नहीं सकते, सोच ही नहीं सकते कि हमें और राज्य की सत्ता मिल सकेगी, असंभव! असंभव को कौन चाहता है? जब संभव दिखाई पड़ने लगती है कोई बात, जब हाथ के करीब दिखाई पड़ने लगती है कि थोड़ी मेहनत करूं तो मिल सकती है, तब उपद्रव शुरू होता है। इस देश में शूद्र हजारों साल से परेशान हैं, कोई बगावत नहीं उठी। उठ नहीं सकती थी। अंबेदकर जैसे व्यक्ति में बगावत उठी, क्योंकि शिक्षा का मौका अंग्रेजों से मिला।

- आचार्य रजनीश "ओशो"

कोई टिप्पणी नहीं: