बुधवार, 5 जुलाई 2017

"गुरू वही जो राम मिलावे"


शास्त्र का कथन है-
"गुरू वही जो विपिन बसावे, गुरू वही जो सन्त सिवावे।
 गुरू वही जो राम मिलावे, इन करनी बिन गुरू ना कहावे॥"
इन वचनों का सार है कि गुरू वही है जो "राम" अर्थात् उस परम तत्व से साक्षात्कार कराने में सक्षम हो, गुरू अर्थात् जागा हुआ व्यक्तित्व। इसी प्रकार शिष्य वह है जो जागरण में उत्सुक हो। गुरू ईश्वर और जीव के बीच ठीक मध्य की कड़ी है, इसलिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मनुष्य के जीवन में गुरू की उपस्थिति बड़ी आवश्यक है। गुरू ही वह द्वार है जहाँ से जीव परमात्मा में प्रवेश करता है। गुरू निन्द्रा व जागरण दोनों अवस्थाओं का साक्षी होता है। सिद्ध सन्त सहजो कहती हैं कि "राम तजूँ पर गुरू ना बिसारूँ" अर्थात् मैं उस परम तत्व का भी विस्मरण करने को तैयार हूँ लेकिन गुरू का नहीं क्योंकि यदि गुरू का स्मरण है; गुरू समीप है तो उस परम तत्व से साक्षात्कार पुन: सम्भव है। मेरे देखे गुरू व्यक्ति नहीं अपितु एक अवस्था का नाम है ऐसी अवस्था जब कोई रहस्य जानने को शेष नहीं रहा किन्तु फ़िर भी करूणावश वह इस जगत् में है, जो जाना गया है उसे बाँटने के लिए है। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश को सीधे देखना आँखों के लिए हानिकारक है, उसके लिए एक होना माध्यम आवश्यक है। ठीक उसी प्रकार ईश्वर का साक्षात्कार भी जीव सीधे करने में सक्षम नहीं उसके लिए भी गुरू रूपी माध्यम आवश्यक है क्योंकि ध्यान-समाधि में जब वह घटना घटेगी और परमात्मा अपने सारे अवगुँठन हटा तत्क्षण प्रकट होगा तो उस घटना को समझाएगा कौन! क्योंकि जीव इस प्रकार के साक्षात्कार का अभ्यस्त नहीं वह तो बहुत भयभीत हो जाएगा जैसे अर्जुन भयभीत हुआ था भगवान कृष्ण का विराट रूप देखकर, इसलिए गुरू का समीप होना आवश्यक है। गुरू के माध्यम से ही परमात्मा की थोड़ी-थोड़ी झलक मिलनी शुरू होती है। परमात्मा के आने की ख़बर का नाम ही गुरू है। जब गुरू जीवन में आ जाएँ तो समझिए कि अब देर-सवेर परमात्मा आने ही वाला है। एक शब्द हमारी सामाजिक परम्परा में है "गुरू बनाना", यह बिल्कुल असत्य व भ्रामक बात है क्योंकि यदि जीव इतना योग्य हो जाए कि अपना गुरू स्वयं चुन सके तो फ़िर गुरू की आवश्यकता ही नहीं रही। सत्य यही है कि गुरू ही चुनता है जब शिष्य तैयार होता है शिष्य होने के लिए। गुरू की ही तरह शिष्य होना भी कोई साधारण बात नहीं है, शिष्य अर्थात् जो जागरण में उत्सुक हो। वर्तमान समय में गुरू व शिष्य दोनों की परिभाषाएँ बदल गई हैं। आज अधिकांश केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए गुरू-शिष्य परम्परा चल रही है। वर्तमान समय में गुरू यह देखता है कि सामाजिक जीवन में उसके शिष्य का कद कितना बड़ा और शिष्य यह देखता है कि उसका गुरू कितना प्रतिष्ठित है। जागरण की बात विस्मृत कर दी जाती है, गुरू इस बात की फ़िक्र ही नहीं करता कि वह जिसे शिष्य के रूप में स्वीकार कर रहा है व जागरण में उत्सुक भी है या नहीं। वास्तविकता यह है कि जब शिष्य की ईश्वरानुभूति की प्यास प्रगाढ़ हो जाती है तब गुरू उसे परमात्मा रूपी अमृत पिलाने स्वयं ही उसके जीवन में उपस्थित हो जाते हैं। हमारे सनातन धर्म ने भी ईश्वर को रस रूप कहा है "रसौ वै स:"। गुरू व शिष्य दोनों ही इस जगत् की बड़ी असाधारण घटनाएँ है क्योंकि यह एकमात्र सम्बन्ध है जो विशुद्ध प्रेम पर आधारित है और जिसकी अन्तिम परिणति परमात्मा है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

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