रविवार, 4 जून 2017

ये कैसा विरोध...!


आज समाचार पत्र में प्रकाशित एक तस्वीर देखकर मन आहत व क्षुब्ध हो गया। कुछ प्रदर्शनकारी किसान दूध व सब्ज़ियों को सड़कों पर फ़ेंक कर नष्ट कर रहे थे। भला ये कैसे अन्नदाता...! ये किस प्रकार विरोध....? लोकतन्त्र में विरोध करने का अधिकार सभी को है लेकिन उसके तरीके उचित होने चाहिए। अभी कुछ दिनों पूर्व केरल में पशु बिक्री पर प्रतिबन्ध का विरोध भी कुछ ऐसे ही निन्दित व घृणित तरीके से किया गया था। आज सड़कों पर दूध व सब्ज़ियाँ नष्ट करते इन तथाकथित अन्नदाताओं को इतना भी होशोहवास नहीं रहा कि इससे कितने लोगों की क्षुधा तृप्त हो सकती थी। सड़कों पर बहते इस दूध से कितने मासूमों की जठराग्नि शान्त हो सकती थी। इस प्रकार भोज्य पदार्थों को अपने स्वार्थ के चलते सड़कों पर निरादर से नष्ट करके इन्होंने माँ अन्नपूर्णा का तो अपमान किया ही है साथ ही साथ अपने अन्नदाता होने के दर्जे को भी लज्जित किया है। मैं इस कृत्य की घोर निन्दा करता हूँ।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

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