सोमवार, 1 मई 2017

वोट सरकार के, जोखिम जनता का-

ख़बर है प्रदेश के नौ जिला सहकारी बैंको के लायसेंस रद्द होने की कगार पर हैं। इन बैंको का सीआरएआर (कैपिटल टू रिस्क एसेट्स रेशो) गिरकर ९ प्रतिशत से नीचे आ गया है। जिसके चलते आरबीआई और नाबार्ड ने इनके बैंकिग लायसेंस रद्द करने की चेतावनी दी है। बैंक से जुड़े सूत्रों से जब इस मुद्दे पर  चर्चा हुई तो उन्होंने इसका सारा दोष राजनीति पर मढ़ते हुए इसके पीछे का सारा रहस्य समझाया। उनके अनुसार सरकार की शून्य प्रतिशत पर ब्याज़ बाँटने एवं किसानों से ऋण वसूलने में सख़्ती ना करने व ब्याज माफ़ करने की नीति ही इसके लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है। सहकारी बैंको का संचालन एक प्रतिनिधि मण्डल के माध्यम से होता है जिसमें अधिकांश राजनीतिक क्षेत्र के व्यक्ति होते हैं इसके चलते भ्रष्टाचार भी इन बैंको के खराब प्रदर्शन के लिए उतना ही ज़िम्मेवार है जितना कि सरकार की लोकलुभावन व अव्यवहारिक नीतियाँ। प्रदेश में सहकारी बैंको की हालत ख़स्ता है इससे पूर्व भी सरकार कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक को बन्द कर उसके विलय को मन्जूरी दे चुकी है। ये बात और भी आश्चर्यजनक है कि इस बैंक के अधिकांश अधिकारी व कर्मचारियों का सहकारी बैंक में संविलियन प्रस्तावित है जिनके ऊपर खुद लायसेंस रद्द होने की तलवार लटक रही है। ऐसे में मेरा सवाल यह है कि आख़िर सरकार की वोट आकर्षित करने की लोकलुभावन अव्यवहारिक नीतियों का ख़ामियाज़ा जनता क्यों भुगते? वोट राजनीतिक दलों के और जोखिम जनता का! क्या यही आपके विकास का गणित है? एक ध्यान देने योग्य अतिमहत्तवपूर्ण तथ्य यह भी है इन बैंकों के अधिकांश खातेदार किसान हैं। यदि इन बैंको का लायसेंस रद्द होता है तो इन बैंको में सावधि जमा (एफ़डी) के रूप में जमा इन किसानों धनराशि के भुगतान को ज़िम्मेवार कौन होगा? यह बात किसी साधारण से व्यक्ति के भी समझ में आ सकती है कि जब बैंक शून्य प्रतिशत पर ब्याज़ देंगे और उसकी वसूली नहीं करेंगे तो बैंके पाव धनराशि आएगी कहां से। इस पर तुर्रा ये कि नाबार्ड और प्रदेश सरकार भी कोई अतिरिक्त सहायता इन बैंको को नहीं देगी, भ्रष्टाचार तो व्याप्त है ही तो ऐसे में यह बैंक आख़िर कब तक चल पाएंगे! एक ना एक दिन इनका डूबना सुनिश्चित है। ऐसे में इन बैंको के खातेदारों की राशि विवादों में फ़ंसने का ज़िम्मा क्या प्रदेश सरकार लेगी? इससे पूर्व भी एक महिला बैंक इसी प्रकार राजनीति व भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है जिसके खातेदारों को एड़ियाँ रगड़-रगड़कर कई वर्षों बाद अपनी जमा पूँजी वापस मिली। इन सबके चलते जो सबसे बड़ी हानि हो रही है वह बैंको के प्रति आम जनता में विश्वास की निरन्तर कमी, कुछ माह पूर्व के नोटबन्दी के निर्णय ने इस विश्वास को बेहद कमज़ोर किया जब लोगों को अपनी ही जमा पूँजी निकालने के घण्टों बैंकों की लाईनों में लगना पड़ा और जमा पूँजी भी राशन की तरह एक निश्चित मात्रा में ही प्राप्त हुई। मेरा प्रदेश के मुखिया से आग्रह है कि केवल "विश्वास" को सहकारिता मन्त्री बना देने मात्र से इन बैंको के प्रति जनता में विश्वास नहीं बढ़ेगा, उसके लिए आवश्यक है ज़मीनी स्तर पर कुछ ठोस प्रयास कर प्रदेश की इन ख़स्ताहाल सहकारी बैंको स्थिति सुधारी जाए एवं अपनी लोकलुभावन अव्यवहारिक नीतियाँ त्वरित बन्द की जाएं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

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