रविवार, 9 अप्रैल 2017

सुरक्षाकर्मियों का अपमान करना निन्दनीय

अभी कुछ दिन पहले न्यूज़ चैनल पर एक ख़बर देखी फ़िर उसका वीडियो भी "वायरल" हो गया। इस वीडियो में म.प्र. के मुखिया अपने सुरक्षाकर्मियों को डांटते हुए "गेट-आउट" कहते नज़र आ रहे हैं। उन सुरक्षाकर्मियों का अपराध केवल इतना था कि उन्होंने एक बीजेपी कार्यकर्ता को सीएम के पास जाने रोका था जिस पर इस छुटभैये नेता ने वबाल मचा दिया और घटना का राजनीतिकरण करते हुए अपने आपको एक जाति विशेष का होने के कारण इस प्रकार का दुर्व्यवहार होने की बात कहकर हंगामा कर दिया जिस पर मुख्यमंत्री जी ने अपने ही सुरक्षाकर्मियों को डांटते हुए बाहर निकल जाने का निर्देश दे डाला। यह पूरी घटना मुझे आहत कर गई। आखिर ये राजनेता अपने वोट बैंक के लिए संवेदनाओं को किस प्रकार ताक पर रख दिया करते हैं यह इस बात का जीवन्त उदाहरण है। मेरे देखे किसी भी वीआईपी या वीवीआईपी की सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों का कार्य ही उन महत्त्वपूर्ण व अति-महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा करना होता है। अपने इस कर्त्तव्य को निभाते हुए कभी-कभार किसी व्यक्ति के साथ थोड़ी धक्का-मुक्की हो जाती है लेकिन यह तभी होता है जब वह व्यक्ति अनाधिकार चेष्टा कर रहा होता है। सुरक्षाकर्मियों का कार्य एक बेहद दुष्कर कार्य है। ये सुरक्षाकर्मी अपनी घंटों की थका देने वाली ड्यूटी में शायद ही आपको कभी शान्ति से बैठे नज़र आते हों। सदैव तत्परता के साथ खड़े रहना; हमेशा चौकस रहना; स्वयं जनसमूह के धक्के खाकर अपने नेता को आरामदायक व सुरक्षित स्थिति-परिस्थिति प्रदान करते ये सुरक्षाकर्मी धन्यवाद के पात्र होते हैं इस प्रकार अपमान के नहीं, खासकर वह भी तब; जब वे अपना कर्त्तव्य पूरी मुस्तैदी से निभा रहे हों। यदि ये सुरक्षाकर्मी किसी गरीब व असहाय व्यक्ति को जो अपनी समस्या से सीएम को अवगत कराना चाहता हो, धकेल कर दूर करते और सीएम साहब इन पर भड़कते तो शायद हमें इतना दु:ख ना भी होता किन्तु केवल अपनी पार्टी एक कार्यकर्ता को दूर करने पर सीएम का इस प्रकार अपने सुरक्षाकर्मियों का सार्वजनिक रूप से अपमान करना बेहद निन्दनीय है। यदि इस प्रकार ये सुरक्षाकर्मी पार्टी कार्यकर्ताओं व भीड़ की सुविधा के अनुसार कार्य करने लगें और कोई दुर्घटना हो जाए तब भी सारा दोष इन्हीं सुरक्षाकर्मियों को दिया जाएगा, शायद इन्हें तत्काल प्रभाव से निलम्बित या बर्खास्त भी कर दिया जाए। यहां मुझे पूर्व राष्ट्रपति स्व. श्री ए पी जे अब्दुल कलाम साहब का स्मरण आ रहा है जिन्होंने अपनी सुरक्षा में लगे एक सुरक्षाकर्मी को देर तक खड़े देखकर अपने निज सहायक को कहा था कि "वह कब तक खड़ा रहेगा उसे बैठने को कहो" और जब वह सुरक्षाकर्मी नहीं माना तब गंतव्य पर पहुंचकर सबसे पहले कलाम साहब ने अपने उस सुरक्षाकर्मी को अपने कमरे में बुलाकर उसे "धन्यवाद" कहा और पूछ-"मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं।" क्या कलाम साहब के अतिरिक्त कभी आपने ऐसा वाकया सुना है; क्या कभी किसी भी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति ने अपनी सुरक्षा में लगे इन सुरक्षाकर्मियों की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की है, या उन्हें धन्यवाद कहा है? हां वोट बैंक के लिए सार्वजनिक रूप उनके अपमान कि किस्से अवश्य सुनाई दे जाते हैं। जिस कार्यकर्ता के तथाकथित दुर्व्यवहार को लेकर सीएम अपने सुरक्षाकर्मियों पर इतने नाराज़ हो गए क्या उस कार्यकर्ता को अपने नेता की सुरक्षा का अन्दाज़ा नहीं था, क्या उसे उनकी सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों का कार्य पता नहीं था? फ़िर क्यों उस कार्यकर्ता ने अनाधिकार चेष्टा की क्योंकि यदि वह सीएम साहब का इतना खा़स होता तो वे स्वयं उसे देखते ही अपने पास बुला लेते! किन्तु इस प्रकार सीएम या मन्त्री के पास जाकर सेल्फ़ी लेना और फ़ोटो खिंचाना इन छुटभैए नेताओं की आदत में शुमार होता है फ़िर इसी के आधार पर वे स्थानीय अधिकारियों पर यदा-कदा धौंस जमाते नज़र आते है। हमारे सुरक्षाप्राप्त नेताओं को ये सदैव स्मरण होना चाहिए कि सुरक्षाकर्मियों का कार्य ही आपकी सब प्रकार से सुरक्षा करना होता है जिसमें भीड़ से सुरक्षा भी शामिल है। यदि इन नेताओं को जनता से मेल-मिलाप इतना प्रीतिकर है तो फ़िर सुरक्षा लेते ही क्यों है? वहां तो स्टेटस सिम्बल व प्रतिष्ठा आड़े आ जाती है। ज़रा किसी नेता की सुरक्षा की समीक्षा या उनकी सुरक्षा में कटौती की बात क्या होती है, उस नेता के द्वारा हंगामा बरपा दिया जाता है। इस प्रकार  "हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और" वाली कहावत चरितार्थ कर आप जनता को अधिक देर तक मूर्ख़ नहीं बना सकते क्योंकि वास्तविकता कभी न कभी सामने आ ही जाती है। मैं म.प्र. के मुख्यमन्त्री के द्वारा अपने सुरक्षाकर्मियों के सार्वजनिक रूप से अपमान की इस घटना की कड़ी निन्दा व भर्त्सना करता हूं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

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