शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

"ध्यान" है आध्यात्मिक सेल्फ़ी

वर्तमान समय में स्वदर्शन अर्थात "सेल्फ़ी" लेने का बड़ा फ़ैशन है। युवाओं से लेकर बुज़ुर्गों व महिलाओं तक पर इसका नशा सर चढ़कर बोल रहा है। मुझे इस प्रकार के "सेल्फ़ी" चलन से लगा कि "सेल्फ़ी" का प्रचलन तो हमारे देश में; हमारी आध्यात्मिक परम्परा में सदियों से है किन्तु इस रूप में नहीं, मेरे देखे आध्यात्मिक जगत की "सेल्फ़ी" "ध्यान" है। जिसमें आप वास्तविक व प्रामाणिक रूप में अपना "आत्मदर्शन" करते हैं। उसमें आपका शरीर ही आपका उपकरण अर्थात डिवाइस होता है और जब वह "सेल्फ़ी" ली जाती है तो उसे किसी भी मंच पर साझा नहीं करना पड़ता वह तो स्वयमेव प्रत्येक व्यक्ति को दिखाई देने लगती है किन्तु उस प्रकार की "सेल्फ़ी" आज की "सेल्फ़ी" की तरह कुछ पलों में नहीं ली जा सकती उसके लिए तो धैर्य व शान्ति के साथ निर्विचार होकर अपने शरीर रूपी मोबाईल को अनुकूलित अर्थात "कस्टमाईज़" करना पड़ता है। आज की "सेल्फ़ी" तो बस शरीर का ही प्रतिबिम्ब हैं किन्तु "ध्यान" रूपी सेल्फ़ी में वह दिखाई देता है, जो है, जिसे शास्त्रों में कहा गया है "एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति" या फ़िर "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" अर्थात "चैतन्य"। आईए प्रयास करें कि हम कभी आध्यात्मिक जगत की "सेल्फ़ी" लेने में सक्षम हो सकें क्योंकि आध्यात्मिक जगत की "सेल्फ़ी" कभी नष्ट नहीं होती शेष सारी "सेल्फ़ी" शरीर रूपी मोबाईल के फ़ार्मेट होते ही "डीलिट" हो जाती हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

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