शनिवार, 8 अप्रैल 2017

"सन्देह" श्रद्धा की पहली सीढ़ी है-

मेरे देखे अज्ञान मनुष्य को उतना नहीं भटकाता जितना उधार ज्ञान भटका देता है। आजकल सोशल मीडिया पर एक वीडियो बहुत वायरल हो रहा है जिसमें एक युवती एक तथाकथित कथावाचक से कुछ सार्थक प्रश्न करती नज़र आ रही है और वे तथाकथित कथावाचक उसके प्रश्नों के सटीक उत्तर देने के स्थान पर "लकीर के फ़कीर" वाली कहावत चरितार्थ करते प्रतीत हो रहे हैं। इस वीडियो को यह कहकर प्रचारित किया जा रहा है कि यह कान्वेंट में अपने बच्चों को पढ़ाने का परिणाम है। हम इस वीडियो को इस ढंग से प्रचारित करने से कतई सहमत नहीं हैं। आज एक युवती के सार्थक प्रश्न पर एक तथाकथित कथावाचक की पोल खुल गई। इस युवती के प्रश्न का सही उत्तर देने के स्थान पर प्राचीन रुढ़ियों की आड़ लेकर अपने अज्ञान का प्रदर्शन कर इस कथावाचक ने समाज को जिस प्रकार दिग्भ्रमित किया वह घोर निन्दनीय है। ये तथाकथित कथावाचक भागवत कथा करने के लिए लाखों रु. दक्षिणा के रुप में लेते हैं और रुकने के लिए इन्हें "एसी कमरा" आवश्यक होता है। ये शुभ है कि आज इस युवती ने एक स्वस्थ परम्परा की शुरुआत की। मेरी समझ नहीं आता हम प्रश्नों से इतना भागते क्यों हैं? प्रश्नों का तो समाधान होना चाहिए, सन्देह श्रद्धा की पहली सीढ़ी है चाहे वह जगज्जननी पार्वती का हो या युगपुरुष विवेकानन्द का। लेकिन हमारे ये उधार ज्ञान के धनी पोंगा पण्डितजन सिर्फ़ एकालाप जानते हैं, संवाद नहीं इसलिए आज का समाव व युवा धर्म से विमुख हैं क्योंकि उसके सन्देहों का उचित समाधान नहीं होता अपितु उसे सन्देह के स्थान पर धर्म के नाम पर मौन रहना सिखाया जाता है। मेरे देखे इन कथावाचकों की भी क्या गलती? इन्हें खुद ही प्रश्नों के उत्तर नहीं पता तो ये समाज व जनमानस को क्या उत्तर देंगे। ये तो तोतारंटत जानते हैं, श्रद्दालुओं को नचाना जानते हैं। यदि इन्हें प्रश्नों के उत्तर पता होते तो आज इस समाज का स्वरूप कुछ और ही होता। शुभ है कि परम्परा की शुरुआत तो हुई। मैं चाहता हूं जनता ऐसे पोंगा पण्डितों से खूब प्रश्न करे ताकि इनकी वास्तविकता समाज के सामने आ सके। जो खरे स्वर्ण की भांति हैं वे और उजले होकर निखर जाएंगे और जो खार हैं वे  जल कर नष्ट हो जाएंगे, मेरे देखे खार का जल जाना श्रेयस्कर ही है।
राधे-राधे!!

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र (म.प्र.)

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