बुधवार, 22 मार्च 2017

"दीप" के दोहे

कहाँ प्रीत की माधुरी, कहाँ नेह की गँध।
मुँह देखे की बतकही सुविधा के सम्बन्ध॥

आ हिलमिलकर बाँट लें आज मिलें जो फ़ूल।
मौसम का विश्वास क्या फ़िर कब हो अनुकूल॥

मित्र दु:खों की पोटली इधर-उधर मत खोल।
भूल गये हैं लोग अब हमदर्दी के बोल॥

जो तू हमसे रुठता कर लेते मनुहार।
तू खुद से नाराज़ है कौन मनाये यार॥

जीवन पथ पर मिल गया इक दिन दुष्ट यथार्थ।
सपनों की सब थैलियाँ सौंपी उसके हाथ॥

अतिथि सरीखे के आ गए दुर्दिन के अक्रूर।
सुख के श्याम चले गए सखे बहुत ही दूर॥

सबको इक सी चाँदनी सबको इक सी धूप।
देना मेरे रामजी भिक्षुक हो या भूप॥

सपने आकर कह गए तुम जाने क्या बात।
सुधियों की बारादरी महकी सारी रात॥

महकी-महकी नींद में बहके-बहके ख़्वाब।
तकिये के नीचे रखे किसने खिले गुलाब॥

बस्ती-बस्ती वेदना, डगर-डगर थी पीर।
सागर जैसी प्यास थी, चुल्लू भर था नीर॥

भाभी मिसरी की डली भैया खुली किताब।
आँगन में नित नेह के खिलते रहे गुलाब॥

कवि-प्रदीप दुबे "दुबे"


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