गुरुवार, 19 जनवरी 2017

कथाओं को अहंकार का साधन ना बनाएँ-

वर्तमान समय में कथाओं का बहुत प्रचलन हैं। समाचार पत्रों में आए दिन किसी ना किसी स्थान पर कथा की जानकरी व टीवी चैनलों पर प्रतिदिन कथाओं का प्रसारण हो रहा है। अधिकांश श्रद्धालुओं को अपनी सुनी गई कथाओं की संख्या का बड़ा अभिमान होता है, वहीं कई कथावाचकों को भी अपने द्वारा की गई कथाओं की संख्या पर बड़ा गर्व होता है। एक ओर जहां कथावाचक यह बताने में गर्व अनुभव करते हैं कि हमने कितनी संख्या में और किन-किन प्रतिष्ठित यजमानों के यहां कथाएँ की वहीं श्रोतागण इस बात का अभिमान करते हैं कि हमने किन बड़े कथावाचकों की कथाएँ सुनी हैं। मेरे देखे कथाओं को माध्यम बनाकर अपना अहंकार पोषित करना सर्वथा अनुचित है। कथा का उद्देश्य ही होता है अहंकार और "मैं" भाव से मुक्ति और हम उस माध्यम को ही अपने अहंकार का साधन बना लेते हैं। इस प्रकार कथा कहने व सुनने से भला क्या परिवर्तन होगा! यह तो ठीक वैसे ही हुआ जैसे "कोल्हू का बैल" जो चलता तो बहुत है लेकिन पहुँचता कहीं भी नहीं। ये कथाएँ व शास्त्र तो संकेत मात्र हैं। हमें उस तत्व-साक्षात्कार का मुमुक्षु होना चाहिए जिसकी ओर ये सब संकेत कर रहे हैं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

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