गुरुवार, 19 जनवरी 2017

"कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन..."

आधुनिकता व सम्पन्नता कई बार बहुत अच्छी चीजों को नष्ट कर देते हैं। आपने कुछ वर्षों पूर्व तक सर्दियों के इस मौसम में गली-मुहल्लों में घर के बाहर एक साथ बैठी हाथों में सलाईयाँ व गोद में ऊन का गोला लिए महिलाओं को आपस में बातें करते हुए अपने किसी खास के लिए स्वेटर बुनते अवश्य देखा होगा। उन दिनों सर्दियों के मौसम में इस तरह का दृश्य हर शहर; हर मुहल्ले में आम होता था किन्तु वर्तमान आधुनिकता के इस दौर में यह दृश्य अचानक से विलुप्त सा हो गया है। हाथों से बनी ऊनी स्वेटर या पुलोवर का स्थान अब मशीनों से बनी स्वेटर ने ले लिया है। आज की महिलाओं को स्वेटर बनाने जैसे कार्यों के लिए वक्त भी कहाँ मिल पाता है। घर के कई काम होते हैं फ़िर उनसे गर फ़ुरसत मिले तो वाट्स अप - फ़ेसबुक पर स्टेट्स अपडेट करना भी तो किसी आवश्यक कार्य से कम नहीं है। ऐसे में कहाँ वक्त मिलता है कि किसी के लिए स्वेटर बुना जाए। मेरे देखे स्वेटर बुनना एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है, कैसे हम किसी के लिए अपना विशुद्ध प्रेम बुनते हैं। उल्टे-सीधे फन्दों की कारीगरी मानो हमें रिश्तों का मर्म समझाती है कि कैसे किसी रिश्ते का स्वेटर के उल्टे-सीधे फन्दों के मानिन्द उतार-चढ़ाव से परिपूर्ण हो अंतत: गुंथा रहना आवश्यक होता है। जब प्यार से गुंथे इस स्वेटर का शरीर से स्पर्श होता है तो प्रेम से रोम-रोम पुलकित हो उठता है। प्रेम किसी भी रिश्ते का केन्द्रीय तत्व होता है, रिश्ता कोई भी हो। मैंने कई व्यक्तियों को इसी प्रकार की प्रेम की निशानियाँ अपनी अन्तिम साँस तक सम्भाल कर रखे हुए देखा है। कहने को यह स्वेटर केवल सर्दी से बचाने का एक साधन मात्र होते हैं किन्तु इनके बनाने की प्रक्रिया में जो प्रेम अभिव्यक्त होता था उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। उसे तो बस "अन्तर्जानी जानिए, अन्तर्तम का भाव" के रुप में ही समझा जा सकता है। हमारा अविकसित भारत ऐसे ही कितने प्रेम-पगे कार्यों का केन्द्र था किन्तु अब हम विकसित होते जा रहे हैं। विकास की प्रक्रिया में तो ऐसी कितनी ही बातों को छोड़ना पड़ता है और जब हम विकसित हो जाते हैं तब पाते हैं कि हमने विकास के मोहजाल में मूल तत्व ही खो दिया, जिसके बिना सारा विकास खोखला है, वह तत्व है "प्रेम"। हमें सब कुछ गवाँ कर इस बात का अहसास होता है कि हम अविकसित ही अच्छे थे किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है क्योंकि हम पूर्ण विकसित हो चुके होते हैं। अन्त में बस यही भाव हमारे पास रह जाता है-"कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन...।"

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

कोई टिप्पणी नहीं: