रविवार, 8 जनवरी 2017

संगठनों के माध्यम से अहं तुष्टि का प्रयास निन्दनीय

मित्रों, अक्सर आपने कई संगठनों के बारें सुना होगा, कितने संगठनों में आपमें से कई मित्र रहे भी होंगे। संगठन के नाम पर जो सबसे प्रचलित संगठन है वह है राजनीतिक संगठन। इस संगठन का कार्य यूं तो समाजसेवा बताया जाता है कि किन्तु इसमें विशुद्ध रूप राजनीति और सत्ता का खेल चलता है। अत: इस संगठन के सम्बन्ध में शुचिता व नैतिकता की बात करना व्यर्थ है। किन्तु आजकल कई सामाजिक संगठन भी इसी तर्ज़ पर गठित होने लगे हैं। "सर्वब्राह्मण समाज" एक ऐसा ही नाम है जिसका आधार लेकर ना जाने कितने संगठन कितनी बार गठित हुए और अन्त में विघटित भी हुए कारण सिर्फ़ एक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा व राजनीति। इन दिनों भी ऐसा एक संगठन सक्रिय है जो एक बड़ा सम्मेलन करने भी जा रहा है। अब इसके आयोजकों की बुद्धिमत्ता देखिए वे चले तो हैं सर्वब्राह्मण के नाम पर अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने और दिखावा कर रहे हैं ब्राह्मण समाज के हित व एकजुटता का। वास्तविक रूप में उन्हें वार्ड के ब्राह्मण परिवारों की संख्या तक ज्ञात नहीं है। केवल आयोजनों के नाम पर चन्दा ग्रहण के उद्देश्य से इन्हें ब्राह्मण समाज के हित याद आते हैं शेष समय नहीं। हकीकत यह है कि इस प्रकार के संगठन के नाम पर कुछ अति-महत्वाकांक्षी लोग अपने अहम की क्षुधा पूर्ती करने एवं अपने प्रतिस्पर्धियों को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। एक सफल संगठन का निर्माण उसी प्रकार होता है जिस प्रकार एक वृक्ष का, जिसमें बीज स्वयं को मिटाकर; अंधरों में खोकर वृक्ष, फूल व फल का निर्माण करता है। जब हम एक सुन्दर फूल देखतें है या स्वादिष्ट फल खाते हैं तो उसी की प्रशंसा करते हैं उस बीज को विस्मृत कर देते है; भूल जाते हैं जिसने अपने अस्तित्व को नष्ट कर इनके निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। यदि बीज अपने अस्तित्व को बचाकर अपने अहंकार को तुष्ट करने का प्रयास करता को आज एक भी वृक्ष हमें दिखाई नहीं देता। यही बात सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होती है जब तक उनके संस्थापकगण अपने अहंकार को तुष्ट करने एवं अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ती के लिए संगठनों का निर्माण करते रहेंगे तब तक समाज में संगठनों प्रामाणिकता शून्य रहेगी और वे अल्पकाल के उपरान्त ही विखण्डित होकर समय की धारा से विलोपित हो जाएंगे। मैं इस प्रकार संगठनों के माध्यम से व्यक्तिगत अहं तुष्टि के प्रयासों की घोर निन्दा व भर्त्सना करता हूं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

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