मंगलवार, 24 जनवरी 2017

अध्यात्म के बिना आनन्द की प्राप्ति नहीं

अभी-अभी फेसबुक के मंच पर एक न्यूज़ चैनल की खबर से पता चला कि राजधानी भोपाल में एक ऐसा एप एवं बेवसाईट प्रारम्भ होने जा रही है जिसमें अविवाहित युवक-युवती साथ-साथ समय व्यतीत करने के लिए होटल का कमरा बुक कर सकेंगे। मेरे देखे मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति आनन्द को प्राप्त करने की होती है किन्तु सही मार्ग ना मिलने पर वह क्षणभंगुर सुख को आनन्द समानान्तर मानते हुए अक्सर भटकाव की ओर अग्रसर हो जाता है। चाहे यह सुख उसे नशे के माध्यम से प्राप्त हो, चाहे शारीरिक सम्बन्ध के माध्यम से या किसी और माध्यम से। साधन महत्त्वपूर्ण नहीं है, साध्य का ही महत्त्व है। आनन्द और सुख समानार्थी नहीं है अभी यह बात को बहुत कम व्यक्तियों को ज्ञात है। जो अभी है और अभी नहीं वह सुख, जो अहर्निश रहे वह आनन्द। तत्व साक्षात्कार के बिना या यूं कहें कि अध्यात्म के बिना आनन्द की प्राप्ति असंभव है। अध्यात्म से विमुख आज की युवा पीढ़ी यदि क्षणभंगुर सुख की खोज में इस प्रकार के अनूठे तरीके अपनाती है तो आश्चर्य कैसा! आज नहीं तो कल जब साध्य की प्राप्ति नहीं होगी तो साधन अपने आप परिवर्तित हो ही जाएगा। रही बात समय की; तो जीवात्मा की यात्रा में काल अर्थात समय कोई मायने नहीं रखता।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

कथाओं को अहंकार का साधन ना बनाएँ-

वर्तमान समय में कथाओं का बहुत प्रचलन हैं। समाचार पत्रों में आए दिन किसी ना किसी स्थान पर कथा की जानकरी व टीवी चैनलों पर प्रतिदिन कथाओं का प्रसारण हो रहा है। अधिकांश श्रद्धालुओं को अपनी सुनी गई कथाओं की संख्या का बड़ा अभिमान होता है, वहीं कई कथावाचकों को भी अपने द्वारा की गई कथाओं की संख्या पर बड़ा गर्व होता है। एक ओर जहां कथावाचक यह बताने में गर्व अनुभव करते हैं कि हमने कितनी संख्या में और किन-किन प्रतिष्ठित यजमानों के यहां कथाएँ की वहीं श्रोतागण इस बात का अभिमान करते हैं कि हमने किन बड़े कथावाचकों की कथाएँ सुनी हैं। मेरे देखे कथाओं को माध्यम बनाकर अपना अहंकार पोषित करना सर्वथा अनुचित है। कथा का उद्देश्य ही होता है अहंकार और "मैं" भाव से मुक्ति और हम उस माध्यम को ही अपने अहंकार का साधन बना लेते हैं। इस प्रकार कथा कहने व सुनने से भला क्या परिवर्तन होगा! यह तो ठीक वैसे ही हुआ जैसे "कोल्हू का बैल" जो चलता तो बहुत है लेकिन पहुँचता कहीं भी नहीं। ये कथाएँ व शास्त्र तो संकेत मात्र हैं। हमें उस तत्व-साक्षात्कार का मुमुक्षु होना चाहिए जिसकी ओर ये सब संकेत कर रहे हैं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

"कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन..."

आधुनिकता व सम्पन्नता कई बार बहुत अच्छी चीजों को नष्ट कर देते हैं। आपने कुछ वर्षों पूर्व तक सर्दियों के इस मौसम में गली-मुहल्लों में घर के बाहर एक साथ बैठी हाथों में सलाईयाँ व गोद में ऊन का गोला लिए महिलाओं को आपस में बातें करते हुए अपने किसी खास के लिए स्वेटर बुनते अवश्य देखा होगा। उन दिनों सर्दियों के मौसम में इस तरह का दृश्य हर शहर; हर मुहल्ले में आम होता था किन्तु वर्तमान आधुनिकता के इस दौर में यह दृश्य अचानक से विलुप्त सा हो गया है। हाथों से बनी ऊनी स्वेटर या पुलोवर का स्थान अब मशीनों से बनी स्वेटर ने ले लिया है। आज की महिलाओं को स्वेटर बनाने जैसे कार्यों के लिए वक्त भी कहाँ मिल पाता है। घर के कई काम होते हैं फ़िर उनसे गर फ़ुरसत मिले तो वाट्स अप - फ़ेसबुक पर स्टेट्स अपडेट करना भी तो किसी आवश्यक कार्य से कम नहीं है। ऐसे में कहाँ वक्त मिलता है कि किसी के लिए स्वेटर बुना जाए। मेरे देखे स्वेटर बुनना एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है, कैसे हम किसी के लिए अपना विशुद्ध प्रेम बुनते हैं। उल्टे-सीधे फन्दों की कारीगरी मानो हमें रिश्तों का मर्म समझाती है कि कैसे किसी रिश्ते का स्वेटर के उल्टे-सीधे फन्दों के मानिन्द उतार-चढ़ाव से परिपूर्ण हो अंतत: गुंथा रहना आवश्यक होता है। जब प्यार से गुंथे इस स्वेटर का शरीर से स्पर्श होता है तो प्रेम से रोम-रोम पुलकित हो उठता है। प्रेम किसी भी रिश्ते का केन्द्रीय तत्व होता है, रिश्ता कोई भी हो। मैंने कई व्यक्तियों को इसी प्रकार की प्रेम की निशानियाँ अपनी अन्तिम साँस तक सम्भाल कर रखे हुए देखा है। कहने को यह स्वेटर केवल सर्दी से बचाने का एक साधन मात्र होते हैं किन्तु इनके बनाने की प्रक्रिया में जो प्रेम अभिव्यक्त होता था उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। उसे तो बस "अन्तर्जानी जानिए, अन्तर्तम का भाव" के रुप में ही समझा जा सकता है। हमारा अविकसित भारत ऐसे ही कितने प्रेम-पगे कार्यों का केन्द्र था किन्तु अब हम विकसित होते जा रहे हैं। विकास की प्रक्रिया में तो ऐसी कितनी ही बातों को छोड़ना पड़ता है और जब हम विकसित हो जाते हैं तब पाते हैं कि हमने विकास के मोहजाल में मूल तत्व ही खो दिया, जिसके बिना सारा विकास खोखला है, वह तत्व है "प्रेम"। हमें सब कुछ गवाँ कर इस बात का अहसास होता है कि हम अविकसित ही अच्छे थे किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है क्योंकि हम पूर्ण विकसित हो चुके होते हैं। अन्त में बस यही भाव हमारे पास रह जाता है-"कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन...।"

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 15 जनवरी 2017

अच्छा स्वयंसेवक कौन..?

"एक अच्छा स्वयंसेवक वह नहीं है, जिनके बिना संघकार्य चल नहीं सकता। एक अच्छा स्वयंसेवक तो वह है जो अपने जैसे अन्य अच्छे स्वयंसेवकों का निर्माण करता है। जिनसे उसके अभाव में भी संघकार्य चलाया जा सकता है। अच्छा स्वयंसेवक वह नहीं है, जिसने स्वयं को ही मुख्य बिन्दु बना लिया है, अपितु वह है जो इस केन्द्र-बिन्दु को विकीर्ण कर सकता है।"
-प.पू. स्व. डा. हेडगेवार
(संस्थापक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ)

रविवार, 8 जनवरी 2017

"ब्राह्मण समाज" में घुसपैठ

अभी-अभी समाचार पत्र देखा। उसमें दो समाचारों पर दृष्टि ठिठक सी गई। एक ओर सर्वब्राह्मण समाज के सम्मेलन की खबर है वहीं दूसरी ओर "गौड़ मालवीय ब्राह्मण समाज" के संगठन की ख़बर है। शनै: शनै: ये सारे विजातीय "ब्राह्मण समाज" में घुसपैठ कर लेंगे और हमारे तथाकथित ब्राह्मण समाज के हितैषीगण बड़े-बड़े फ्लैक्स में अपनी तस्वीर छपवाते रह जाएंगे। मैं हमेशा से इस बात को पुरज़ोर से उठाता रहा हूं कि अभी भी समय है जब इस प्रकार के कुप्रयास का विरोध होना चाहिए एवं इस पर रोक लगनी चाहिए। जिन श्री मदनमोहन मालवीय का नाम लेकर ये विजातीय अपने आप को ब्राह्मण साबित करने में लगे हैं उनके इतिहास के बारे में ये लोग स्वयं ही नहीं जानते कि वे कोई लकड़ी इत्यादि का कार्य करने वाले सुतार या बढ़ई नहीं थे, अपितु ब्राह्मण थे। उनका पूरा नाम पं. मदनमोहन चतुर्वेदी था। उनके पिता पं.  बृजनाथ चतुर्वेदी सुप्रसिद्ध कथावाचक थे। उज्जैन (मालवा प्रान्त) के होने के कारण वे अपने नाम के साथ "मालवीय" जोड़ने लगे थे। मेरा आशय किसी समाज को निम्नतर साबित करना नहीं है मुझे तो आश्चर्य यह है कि ये समाज स्वयं को ब्राह्मणों से निम्न क्यों समझ रहा है जो इस प्रकार के हास्यास्पद कार्य कर रहा है। मेरे देखे सभी समाज समान है एवं सभी का सम्मान है। मात्र सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि से यह विभाजन है शेष सभी समान है। बहरहाल, यदि इन लोगों में इतनी बुद्धिमत्ता होती तो यह जन्म से ब्राह्मण समाज का अंग ना होते। मेरी चिन्ता इन तथाकथित ब्राह्मण हितैषियों से हैं जो ब्राह्मण संगठनों के नाम पर अपना नाम चमकाने में लगे रहते हैं और ब्राह्मण समाज की मुख्य समस्याओं की ओर पीठ करे रहते हैं। कल जब यह विजातीय ब्राह्मण समाज में स्थापित हो जाएंगे तब ये तथाकथित हितैषीगण ठीक वैसे ही शोर मचाएंगे और हाथ-पैर पटकेंगे जैसे कुछ समय पूर्व साईं बाबा की पूजा को लेकर शंकराचार्य ने छाती पीटी थी। ये घोर आश्चर्यजनक है कि किसी गलत परम्परा का विरोध उसके प्रारम्भ में ही क्यों नहीं किया जाता उसके स्थापित होने की राह क्यों देखी जाती है। यदि महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ती का साधन मात्र समझे जाने वाले हमारे संगठन एवं अति-महत्त्वाकांक्षी संगठनकर्ता रहेंगे तो समाज में इन विकृतियों का आना तो स्वाभाविक व अवश्यंभावी है। समाज का भविष्य आप स्वयं सोच सकते हैं।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

संगठनों के माध्यम से अहं तुष्टि का प्रयास निन्दनीय

मित्रों, अक्सर आपने कई संगठनों के बारें सुना होगा, कितने संगठनों में आपमें से कई मित्र रहे भी होंगे। संगठन के नाम पर जो सबसे प्रचलित संगठन है वह है राजनीतिक संगठन। इस संगठन का कार्य यूं तो समाजसेवा बताया जाता है कि किन्तु इसमें विशुद्ध रूप राजनीति और सत्ता का खेल चलता है। अत: इस संगठन के सम्बन्ध में शुचिता व नैतिकता की बात करना व्यर्थ है। किन्तु आजकल कई सामाजिक संगठन भी इसी तर्ज़ पर गठित होने लगे हैं। "सर्वब्राह्मण समाज" एक ऐसा ही नाम है जिसका आधार लेकर ना जाने कितने संगठन कितनी बार गठित हुए और अन्त में विघटित भी हुए कारण सिर्फ़ एक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा व राजनीति। इन दिनों भी ऐसा एक संगठन सक्रिय है जो एक बड़ा सम्मेलन करने भी जा रहा है। अब इसके आयोजकों की बुद्धिमत्ता देखिए वे चले तो हैं सर्वब्राह्मण के नाम पर अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने और दिखावा कर रहे हैं ब्राह्मण समाज के हित व एकजुटता का। वास्तविक रूप में उन्हें वार्ड के ब्राह्मण परिवारों की संख्या तक ज्ञात नहीं है। केवल आयोजनों के नाम पर चन्दा ग्रहण के उद्देश्य से इन्हें ब्राह्मण समाज के हित याद आते हैं शेष समय नहीं। हकीकत यह है कि इस प्रकार के संगठन के नाम पर कुछ अति-महत्वाकांक्षी लोग अपने अहम की क्षुधा पूर्ती करने एवं अपने प्रतिस्पर्धियों को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। एक सफल संगठन का निर्माण उसी प्रकार होता है जिस प्रकार एक वृक्ष का, जिसमें बीज स्वयं को मिटाकर; अंधरों में खोकर वृक्ष, फूल व फल का निर्माण करता है। जब हम एक सुन्दर फूल देखतें है या स्वादिष्ट फल खाते हैं तो उसी की प्रशंसा करते हैं उस बीज को विस्मृत कर देते है; भूल जाते हैं जिसने अपने अस्तित्व को नष्ट कर इनके निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। यदि बीज अपने अस्तित्व को बचाकर अपने अहंकार को तुष्ट करने का प्रयास करता को आज एक भी वृक्ष हमें दिखाई नहीं देता। यही बात सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होती है जब तक उनके संस्थापकगण अपने अहंकार को तुष्ट करने एवं अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ती के लिए संगठनों का निर्माण करते रहेंगे तब तक समाज में संगठनों प्रामाणिकता शून्य रहेगी और वे अल्पकाल के उपरान्त ही विखण्डित होकर समय की धारा से विलोपित हो जाएंगे। मैं इस प्रकार संगठनों के माध्यम से व्यक्तिगत अहं तुष्टि के प्रयासों की घोर निन्दा व भर्त्सना करता हूं।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया