मंगलवार, 20 जून 2017

जीएसटी


हमारे देश में कोई कार्य सादगी से हो ही नहीं सकता। ख़ामोशी से तो केवल इस देश में भ्रष्टाचार हो सकता है। आप सही समझ रहे हैं मैं जीएसटी की ही बात कर रहा हूं। सरकार के द्वारा इसे इतना महिमामण्डित किया जा रहा है जैसे यह कोई अद्भुत कर सुधार हो। पहले तो आपने अपनी कर प्रणाली ही इतनी अव्यावहारिक बनाई फ़िर उसे थोड़ा-बहुत ठीक-ठाक करने के नाम पर इतना हो-हल्ला अनुचित है। जीएसटी के पीछे जो सबसे सशक्त दलील दी जा रही है वह यह कि इससे मंहगाई कम होगी। टैक्स स्लैब देखकर मुझे तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता, इसके विपरीत 15 प्रतिशत सर्विस टैक्स का दायर बढ़कर 18 प्रतिशत होने से जनसामान्य पर बोझ अवश्य बढ़ेगा। मेरे देखे विकास आंकड़ों में नहीं ज़मीनी स्तर पर महसूस होना चाहिए ठीक इसी प्रकार यदि वाकई जीएसटी कोई अद्भुत कर सुधार है तो यह भी इस देश की जनता को महसूस होना चाहिए केवल वित्त मन्त्री के कह देने मात्र से यह कोई ऐतिहासिक कर सुधार नहीं हो जाएगा। अत: आने वाले समय की प्रतीक्षा करें जिसकी कसौटी पर जीएसटी को परखना जाना अभी शेष है।

-संपादक

शनिवार, 10 जून 2017

ज़हर परोसने वाले काहे के "अन्नदाता"

हाल ही में प्रदेश एक उग्र किसान आन्दोलन से दहल उठा। इस आन्दोलन ने मेरे मन में कई सवाल खड़े कर दिए। आन्दोलन के पीछे जो मुख्य वजह बताई गई वह यह थी कि किसानों को उनकी पैदावार का उचित मूल्य नहीं किया जा रहा है। फ़सलों के दाम गिरे हुए हैं ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस वर्ष पैदावार बहुत अधिक मात्रा में हुई। महद्आश्चर्य है कि पैदावार अधिक होने के उपरान्त आम जनता को सस्ते दामों पर वस्तुएँ उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। जहाँ तक मेरी अल्प बुद्धि की समझ है कि किसी भी वस्तु के दाम अर्थशास्त्र के माँग-पूर्ती के सिद्धान्त पर आधारित होते हैं। इसके लिए भला सरकार कैसे ज़िम्मेवार हो सकती है? यदि पैदावार ना हो तो सरकार की ज़िम्मेवारी और यदि अधिक पैदावार हो तो भी सरकार की ज़िम्मेवारी ये गणित मेरी समझ से परे है। जहाँ तक मैं समझता हूँ सरकार की ज़िम्मेवारी फ़सलों के क्रय-विक्रय और भण्डारण की उचित व्यवस्था करने तक की है जिसके लिए मण्डियाँ व वेयर हाऊस इत्यादि की व्यवस्था होती है। अब यदि मण्डियों में फ़सल के दाम गिरे हुए हैं तो यह माँग-पूर्ती के सिद्धान्त के कारण हैं। अब थोड़ी बात करें किसान की, मेरे देखे आज वास्तविक किसान तो बहुत गिने-चुने शेष रह गए हैं। ये जो अपने आप को किसान कहते हैं ये तो किसान के भेष में शुद्ध व्यापारी हैं। मेरे देखे इनकी यह निम्नतम समर्थन मूल्य बढ़ाने और फ़सलों को क्रय करने गारण्टी वाली माँग सर्वथा अनुचित है। मैं जानता हूँ मेरे इस दृष्टिकोण की बहुत आलोचना होगी। कई बुद्धिजीवी स्वयं को किसान हितैषी बताने की होड़ में मुझे किसान विरोधी भी ठहराएँगे। बहरहाल, मैं ऐसे सभी किसान हितैषियों से यह पूछना चाहूँगा कि यदि इस प्रकार माँग कोई व्यापारी करे तब भी क्या वे उस व्यापारी का समर्थन करेंगे? कोई माल तो उनकी फ़ैक्ट्रियों में भी तैयार होता है। अब मैं इन तथाकथित अन्नदाताओं से यह पूछना चाहता हूँ जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ के लिए अन्न को सड़कों पर फ़ेंक कर विरोध जताया वास्तविक अन्नदाता अन्न का ऐसा अपमान नहीं करता; कि आपमें से ऐसे कितने किसान हैं जिन्होंने जैविक खेती करके इतनी अधिक पैदावार की है? शायद एक भी नहीं। ये सारे व्यापारी जो आज किसान का भेष धारण किए हुए हैं निजी आर्थिक लाभ के चलते रासायनिक खेती व विषयुक्त कीटनाशकों के दम पर अपनी पैदावार में वृद्धि किए हुए हैं और इसका ठीकरा वे सरकार के सिर पर फ़ोड़ना चाहते हैं, ये सर्वथा अनुचित है। ये व्यापारी अपने निजी स्वार्थ के कारण जनता के स्वास्थ्य व ज़िंदगी के साथ कितना बड़ा अत्याचार कर रहे हैं ये शायद इस देश की भोली-भाली जनता समझ भी नहीं पा रही क्योंकि उसने तो किसानों को अपना अन्नदाता मानकर उसे सदैव आदर व सम्मान ही प्रदान किया है। ये सारे व्यापारी ऐसे-ऐसे कीटनाशक व रासायनिक खाद का प्रयोग अपने खेतों में पैदावार बढ़ाने के लिए करते हैं जिनसे कैंसर जैसी गम्भीर बीमारियों के होने का खतरा रहता है। चाहे वह सब्ज़ियाँ हो, फ़ल हों या अन्य कोई खाद्यान्न, अन्न के नाम पर भोली-भाली जनता को शुद्ध ज़हर परोसने वाले ये काहे के अन्नदाता और काहे के किसान! ये तो व्यापारी हैं और व्यापार में हानि-लाभ तो स्वयं के व्यापारिक चातुर्य पर निर्भर होता है सरकार या कोई अन्य इसके लिए उत्तरदायी नहीं। विपन्न बुद्धियों का लोकतन्त्र हानिकारक होता है। इसके गम्भीर परिणाम पीढ़ियों भुगतने पढ़ते हैं। आज सरकार से अपनी अनुचित माँगे मनवाकर ये अपना अहँकार तुष्ट भले ही कर लें लेकिन ये नहीं जानते कि अन्ततोगत्वा ये पैसा जनता से ही वसूल किया जाता है। हमारे देश में अल्पसँख्यक, दलित, किसान जैसे कुछ नामों को हमने बेहद संवेदनशील बना दिया है जिसके चलते हमें कई बार बड़े हानिकारक परिणाम भुगतने पड़ते हैं। ऐसे नामों की आड़ में यदा-कदा ही चाहे राजनैतिक दल हों चाहे असामाजिक तत्व व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करते नज़र आते हैं। आज आवश्यकता है इन नामों के नकाब के पीछे छिपे असली चेहरों को पहचानने की। वर्तमान समय में वास्तविक हितग्राही की पहचान सर्वाधिक दुष्कर कार्य है। यदि इन हितग्राहियों के नाम पर बहरूपिए अपनी अनुचित नीतियाँ लागू करवाने में समर्थ होते जाएँगे तो यह देश व समाज के लिए हानिकारक सिद्ध होगा और इसके गम्भीर परिणाम हमारी आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेंगे।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 4 जून 2017

ये कैसा विरोध...!


आज समाचार पत्र में प्रकाशित एक तस्वीर देखकर मन आहत व क्षुब्ध हो गया। कुछ प्रदर्शनकारी किसान दूध व सब्ज़ियों को सड़कों पर फ़ेंक कर नष्ट कर रहे थे। भला ये कैसे अन्नदाता...! ये किस प्रकार विरोध....? लोकतन्त्र में विरोध करने का अधिकार सभी को है लेकिन उसके तरीके उचित होने चाहिए। अभी कुछ दिनों पूर्व केरल में पशु बिक्री पर प्रतिबन्ध का विरोध भी कुछ ऐसे ही निन्दित व घृणित तरीके से किया गया था। आज सड़कों पर दूध व सब्ज़ियाँ नष्ट करते इन तथाकथित अन्नदाताओं को इतना भी होशोहवास नहीं रहा कि इससे कितने लोगों की क्षुधा तृप्त हो सकती थी। सड़कों पर बहते इस दूध से कितने मासूमों की जठराग्नि शान्त हो सकती थी। इस प्रकार भोज्य पदार्थों को अपने स्वार्थ के चलते सड़कों पर निरादर से नष्ट करके इन्होंने माँ अन्नपूर्णा का तो अपमान किया ही है साथ ही साथ अपने अन्नदाता होने के दर्जे को भी लज्जित किया है। मैं इस कृत्य की घोर निन्दा करता हूँ।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 3 जून 2017

क्या भूत-प्रेत होते हैं?

भूत-प्रेत का नाम सुनते ही मन में भय व दहशत व्याप्त हो जाती है। तार्किक लोग भूत-प्रेत के अस्तित्व को सिरे से नकारते हैं वहीं कुछ अन्धविश्वासी सामान्य मनोरोगों को भी भूत-प्रेत से जोड़कर देखते हैं। लेकिन क्या सचमुच भूत-प्रेत होते हैं इस प्रश्न का उत्तर शायद ही किसी को संतुष्ट कर पाता हो। आज हम इसी रहस्य को समझने का प्रयास करेंगे। प्रारम्भिक दौर में विज्ञान भूत-प्रेत के अस्तित्व को खारिज करता आया है लेकिन वर्तमान दौर में वह इन्हें एक दिव्य उर्जा के रूप में स्वीकार करने लगा है। हमारे मतानुसार इस रहस्य को विज्ञान कभी भी नहीं जान पाएगा ऐसा इसलिए क्योंकि विज्ञान मशीनी उपकरणों के माध्यम से चेतना को जानने का प्रयास करता है जबकि यह चेतनाएँ जिस एकमात्र उपकरण के माध्यम से जानी जा सकती हैं वह उपकरण है मनुष्य शरीर। हमारा भौतिक शरीर जिसे स्थूल शरीर भी कहा जाता है, कई शरीरों का संग्रहीत रूप है। हमारे स्थूल शरीर के भीतर अन्य शरीरों की पर्तें होती हैं। इन शरीरों को सूक्ष्म शरीर, आकाश शरीर, मनस शरीर, आत्मिक शरीर, ब्रह्म शरीर व निर्वाण शरीर कहा जाता है। जिसे सामान्य भाषा में भूत-प्रेत कहा या समझा जाता है वह वास्तविक रूप में मनुष्य का सूक्ष्म शरीर होता है। इस सूक्ष्म शरीर में मनुष्य की सारी भावनाएँ, मन, स्मृतियाँ व अन्य शरीर संग्रहीत रहते हैं। सामान्य मृत्यु में व्यक्ति का केवल भौतिक या स्थूल शरीर ही नष्ट होता है। सूक्ष्म शरीर आगे की यात्रा के लिए बचा रह जाता है। इसी सूक्ष्म शरीर के कारण मनुष्य को अगला जन्म प्राप्त होता है। यह सूक्ष्म शरीर आवागमन का आधार है। सूक्ष्म शरीर जब तक भौतिक शरीर धारण नहीं कर लेता है तब तक उसकी संसार में स्थिति व उपस्थिति को ही भूत-प्रेत के नाम से जाना जाता है। सरल शब्दों में भूत-प्रेत वास्तव में मनुष्य का सूक्ष्म शरीर ही है। सामान्यत: साधारण जीवात्माएँ मृत्यु के उपरान्त बहुत शीघ्र ही नया जन्म ले लेती हैं लेकिन कुछ असाधारण जीवात्माएँ; जिनमें बहुत श्रेष्ठ जिन्हें हम देवताओं की श्रेणी में रखते हैं और बहुत निकृष्ट जिन्हें हम भूत-प्रेत की श्रेणी में रखते हैं,अपने स्वभावगत कारणों व वासनाओं के कारण नया जन्म लेने में विलम्ब करती हैं। इस काल में ये जीवात्माएँ सूक्ष्म शरीर के रूप में संसार में विद्यमान रहती हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में ये जीवात्माएँ साँसारिक मनुष्यों के सम्पर्क में आकर अपनी उपस्थिति का अहसास भी कराती हैं लेकिन ये बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में होता है। जिसे प्रचलित भाषा में बाबा,देव,माता,भूत-प्रेत इत्यादि नामों से जाना जाता है। अक्सर समाज में भूत-प्रेत का भय दिखाकर जनमानस का शोषण किया जाता है। यह सर्वथा अनुचित है। सूक्ष्म शरीर का साँसारिक क्रियाकलापों में हस्तक्षेप बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में होता है। अत: ना तो इन सूक्ष्म शरीरों से अत्यधिक भयभीत होने की आवश्यकता है और ना इनके अस्तित्व को सिरे से नकारना ही उचित है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 22 मई 2017

महाभारत का महागणित


महाभारत का नाम सुनते ही जो सबसे पहली बात ध्यान में आती है वह यह कि इस युद्ध में लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहूति दी थी। कुछ विद्वानों के अनुसार तो महाभारत के युद्ध में करोड़ों सैनिक मारे गए थे। हालांकि उस काल में इस देश की जनसंख्या के अनुपात में यह बात अतिश्योक्ति ही लगती है लेकिन एक बात निश्चित है कि महाभारत के युद्ध में मारे गए सैनिकों की कोई प्रामाणिक संख्या आज तक बताई नहीं जा सकी लेकिन सामरिक ग्रन्थों में अक्षौहिणी सेना का जो वर्णन है उस आधार पर आज मैं आपको महाभारत युद्ध में मारे गए सैनिकों की प्रामाणिक संख्या बताने जा रहा हूँ। यह संख्या मैंने गणना के आधार प्राप्त की है। आप स्वयं भी इसकी गणना कर सकते हैं।

जैसा कि आपको विदित है महाभारत के युद्ध में पाण्डवों के पास 7 अक्षौहिणी सेना व कौरवों के पास 11 अक्षौहिणी सेना थी। आईए जानते हैं कि 1 अक्षौहिणी सेना में क्या-क्या होता है।
1 अक्षौहिणी सेना-
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महाभारत काल में सेना की सबसे छोटी ईकाई को "पती" कहते थे।
1 पती के अन्तर्गत होता था-
1 रथ, 1 हाथी, 3 घोड़े एवं 5 पैदल सैनिक।
3 पति को 1 सेनामुख कहा जाता था अर्थात्...
3 पति = 1 सेनामुख
3 सेनामुख = 1 गुल्म
3 गुल्म = 1 गण
3 गण = 1 वाहिनी
1 वाहिनी = 1 पृतना
3 पृतना = 1 चमू
3 चमू = 1 अनीकिनी
10 अनीकिनी = 1 अक्षौहिणी सेना
अत: उपर्युक्त गणना के आधार पर 1 अक्षौहिणी सेना में होते हैं-
रथ संख्या-  21,870
हाथी-  21,870
घोड़े-  65,610
पैदल सैनिक- 1,09,350
अत: इस आधार पर महाभारत के युद्ध में प्रयुक्त हुई कुल 18 अक्षौहिणी सेना में थे-
कुल रथ- 3,93,660
कुल हाथी- 3,93,660
कुल घोड़े- 11,80,980
पैदल सैनिक- 19,68,300
अब यदि पैदल सैनिक+रथी+घुड़सवार+गजसवार इन सभी को सम्मिलित किया जाए तो 18 अक्षौहिणी सेना के कुल सैनिकों व योद्धाओं की संख्या बनती है-

47 लाख 43 हज़ार 920 योद्धा....ये सभी महाभारत के युद्ध में मारे गए थे।



निवेदन- उपर्युक्त संख्या अक्षौहिणी सेना की व्यवस्था के आधार पर प्राप्त हुई है जो पूर्णत: सत्य तो नहीं किन्तु किसी भी अतिश्योक्तिपूर्ण संख्या को परखने की कसौटी अवश्य है।



-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र (म.प्र.)

रविवार, 21 मई 2017

भारत का नामकरण


जैसा कि आप सभी को विदित है हमारे देश का नाम "भारत" चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरत के नाम पर पड़ा है किन्तु क्या आप यह जानते हैं कि ये भरत कौन थे? निश्चय ही आपका उत्तर होगा "दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र", लेकिन यह असत्य है। ये बात सही है कि दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र का नाम भी भरत था किन्तु इन भरत के नाम पर इस देश का नाम भरत नहीं रखा गया। इस देश का नाम भारत जिन चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरत के नाम पर रखा गया वे ऋषभदेव-जयन्ती के पुत्र थे। ये वही ऋषभदेव हैं जिन्होंने जैन धर्म की नींव रखी। ऋषभदेव महाराज नाभि व मेरूदेवी के पुत्र थे। महाराज नाभि और मेरूदेवी की कोई सन्तान नहीं थी। महाराज नाभि ने पुत्र की कामना से एक यज्ञ किया जिसके फ़लस्वरूप उन्हें ऋषभदेव पुत्र रूप में प्राप्त हुए। ऋषभदेव का विवाह देवराज इन्द्र की कन्या जयन्ती से हुआ। ऋषभदेव व जयन्ती के सौ पुत्र हुए जिनमें सबसे बड़े पुत्र का नाम "भरत" था। भरत चक्रवर्ती सम्राट हुए। इन्हीं चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारत" पड़ा। इससे पूर्व इस देश का नाम "अजनाभवर्ष" या "अजनाभखण्ड" था क्योंकि महाराज नाभि का एक नाम "अजनाभ" भी था। अजनाभ वर्ष जम्बूद्वीप में स्थित था, जिसके स्वामी महाराज आग्नीध्र थे। आग्नीध्र स्वायम्भुव मनु के पुत्र प्रियव्रत के ज्येष्ठ पुत्र थे। प्रियवत समस्त भू-लोक के स्वामी थे। उनका विवाह विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मती से हुआ था। महाराज प्रियव्रत के दस पुत्र व एक कन्या थी। महाराज प्रियव्रत ने अपने सात पुत्रों को सप्त द्वीपों का स्वामी बनाया था, शेष तीन पुत्र बाल-ब्रह्मचारी हो गए थे। इनमें आग्नीध्र को जम्बूद्वीप का स्वामी बनाया गया था। श्रीमदभागवत (५/७/३) में कहा है कि-
"अजनाभं नामैतदवर्षभारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति।"
इस बात के पर्याप्त प्रमाण हमें शिलालेख एवं अन्य धर्मंग्रन्थों में भी मिलते हैं। अग्निपुराण में स्पष्ट लिखा है-
"ऋषभो मरूदेव्यां च ऋषभाद् भरतोऽभवत्।
ऋषभोऽदात् श्री पुत्रे शाल्यग्रामे हरिंगत:,
भरताद् भारतं वर्ष भरतात् सुमतिस्त्वभूत॥"
वहीं स्कन्द पुराण के अनुसार-
"नाभे: पुत्रश्च ऋषभ ऋषभाद भरतोऽभवत्।
तस्य नाम्ना त्विदं वर्षं भारतं चेति कीर्त्यते॥"
(माहेश्वर खण्ड)
इसका उल्लेख मार्कण्डेय पुराण व भक्तमाल आदि ग्रन्थों में भी मिलता है। अत: दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारत" होना केवल एक जनश्रुति है सत्य नहीं।

-ज्योतिर्विद पं हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 20 मई 2017

सरायख़ाना

यहाँ किसका कब हुआ ठिकाना है
ये दुनिया बस इक सरायख़ाना है।

कौन आएगा और जाएगा यहाँ से
रूह को तो आना ना कहीं जाना है।

वो मिला ही है तूने खोया कहाँ है
पाने का तो अच्छा इक बहाना है

मेरी सारी कोशिश यही है दानां
बूँद को समन्दर से अब मिलाना है

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 18 मई 2017

स्मृति शेष ...

स्व. श्री अनिल माधव दवे जी का अन्तिम इच्छा-पत्र





स्व. श्री अनिल जी को भावभीनी श्रद्धांजली....

"मैं भारत की नदियों को  निर्मल व स्वच्छ बनाना चाहता हूं"

- स्व. अनिल माधव दवे

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स्व. श्री अनिल माधव दवे जी से मेरी आखिरी मुलाकात पिछले अंतर्राष्ट्रीय नदी महोत्सव में हुई थी। अत्यंत सहज व सरलता से वे सभी से  मिलते थे। चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि वे "भारत की नदियों को विदेश की नदियों की तरह निर्मल व स्वच्छ करना चाहते हैं।" अनिल जी को सरल-चेतना परिवार की ओर से भावभीनी श्रद्धांजली....

मंगलवार, 16 मई 2017

दैनिक राशिफ़ल एक मिथ्या धारणा है

आपने समाचार पत्रों या टेलीविज़न चैनलों में ज्योतिष कार्यक्रमों के तहत "दैनिक राशिफ़ल" पढ़ा या देखा होगा। जिसमें सभी १२ राशियों दैनिक फ़लित बताया जाता है। कई लोग इसके आधार अपनी दैनिक योजनाएं भी बनाते हैं। मैं आपको इस तथ्य से अवगत करवाना चाहता हूं कि दैनिक राशिफ़ल एक मिथ्या धारणा है। जानिए क्यों?

क्योंकि इसका आधार गोचर ग्रहाचार होता है-
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दैनिक राशिफ़ल का आधार गोचर ग्रहाचार होता है किन्तु नौ ग्रहों के ग्रहाचार की अपनी विलग-विलग अवधि है जैसे सूर्य, बुध और शुक्र एक राशि में लगभग १ माह रहते हैं मंगल ५७ दिन, गुरु १ वर्ष, राहु-केतु डेढ़ वर्ष और शनि सबसे अधिक ढ़ाई वर्ष रहता है किन्तु चन्द्र ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जो एक राशि में सवा दो दिन रहते हैं जिसके आधार पर दैनिक राशिफ़ल बताने की परम्परा चल निकली है। अत: दैनिक राशिफ़ल का मुख्य आधार चन्द्र का गोचर होता है। अब चन्द्र जब सवा दो दिन एक राशि में रहता है तब इसका फ़लित दैनिक आधार पर कैसे हो सकता है आप स्वयं विचार कीजिए। अत: सवा दो दिनों के बाद भी यदि समस्त राशियों का फ़लित बताया जाए तब तो उचित है किन्तु दैनिक फ़लादेश अनुचित है। हां कोई श्रद्धालु यदि कोई कार्य विशेष के लिए जानना चाहते हैं तब चन्द्र की स्थिति से उसका शुभ-अशुभ बताया जा सकता है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 12 मई 2017

"ज्योतिष का भ्रामक विज्ञापन ना करें"

आज ज्योतिष से जुड़ी एक ख़बर का विश्लेषण कर रहा था तो बड़े रोचक तथ्य सामने आए। एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में एक तथाकथित ज्योतिषी की विज्ञापननुमा ख़बर प्रकाशित हुई जिसमें उन्होंने यह बताया कि बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर जो ग्रहयोग बने हैं वे 297 वर्ष बाद बने हैं और भविष्य में ये अद्भुत योग कब बनेंगे इसके बारे गणना नहीं की जा सकती। मैं स्तब्ध था कि आख़िर ऐसे कौन से अद्भुत योग बन रहे हैं सो मैंने भी उन योगों के बारे में कुछ जाँच-पड़ताल की जिनके बारे में इन महानुभाव ज्योतिषी ने बताया था। विश्लेषण के पश्चात मैंने पाया कि ऐसे तो कोई बहुत अद्भुत योग नहीं बन रहे हैं जिनके बारे में इस प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने ऐसा मीडिया कवरेज दिया। "बुधादित्य योग", "शनि-मंगल" का षडाष्टक योग, सूर्य का उच्चराशिस्थ होना ये सब कोई अद्भुत योग तो नहीं हैं। बहरहाल, जब मैंने उनकी बताए अनुसार 297 वर्ष पूर्व में बन रहे इन योगों की दिनांक जो उनके अनुसार 22 अप्रैल 1720 थी को आधार बनाकर अपना पंचांग परीक्षण किया तो पाया कि उस दिन पूर्णिमा अवश्य थी लेकिन उस दिन इस प्रकार के योग विशेषकर "बुधादित्य योग" जिसे आधार बनाकर यह पूरा विज्ञापन प्रकाशित किया गया था वह बन ही नहीं रहा था और ना ही "शनि-मंगल" का षडष्टक था। मैं आश्चर्यचकित था, मैंने प्रति-परीक्षण के लिए कम्प्यूटर की सहायता ली लेकिन परिणाम वही आया। मेरे देखे किसी भी ज्योतिषी को ज्योतिष का भ्रामक विज्ञापन नहीं करना चाहिए। यदि हम ज्योतिष की प्रतिष्ठा में वृद्धि नहीं कर सकते तो हमें ज्योतिष की प्रतिष्ठा धूमिल करने का कोई अधिकार नहीं है। आज के तकनीकी युग में किसी को बेवकूफ़ बनाना इतना आसान नहीं है। मेरे ऐसे तमाम तथाकथित ज्योतिषियों से आग्रह है कि अपनी थोड़ी सी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ती के लिए व्यर्थ व तथ्यहीन बातें बताकर ज्योतिष शास्त्र की प्रतिष्ठा को धूमिल ना करें। आप सब मित्रों की संतुष्टि के लिए मैं अपनी गणना के चित्र भी प्रस्तुत कर रहा हूं आप स्वयं मेरी बातों की प्रामाणिकता देख सकते हैं। जो मित्र कम्प्यूटर इत्यादि का ज्ञान रखते हैं वे स्वयं 22 अप्रैल 1720 कुण्डली साफ़्टवेयर में दर्ज़ कर जन्मपत्रिका बनाकर इन ग्रहयोगों की सच्चाई देख सकते हैं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सोमवार, 1 मई 2017

वोट सरकार के, जोखिम जनता का-

ख़बर है प्रदेश के नौ जिला सहकारी बैंको के लायसेंस रद्द होने की कगार पर हैं। इन बैंको का सीआरएआर (कैपिटल टू रिस्क एसेट्स रेशो) गिरकर ९ प्रतिशत से नीचे आ गया है। जिसके चलते आरबीआई और नाबार्ड ने इनके बैंकिग लायसेंस रद्द करने की चेतावनी दी है। बैंक से जुड़े सूत्रों से जब इस मुद्दे पर  चर्चा हुई तो उन्होंने इसका सारा दोष राजनीति पर मढ़ते हुए इसके पीछे का सारा रहस्य समझाया। उनके अनुसार सरकार की शून्य प्रतिशत पर ब्याज़ बाँटने एवं किसानों से ऋण वसूलने में सख़्ती ना करने व ब्याज माफ़ करने की नीति ही इसके लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है। सहकारी बैंको का संचालन एक प्रतिनिधि मण्डल के माध्यम से होता है जिसमें अधिकांश राजनीतिक क्षेत्र के व्यक्ति होते हैं इसके चलते भ्रष्टाचार भी इन बैंको के खराब प्रदर्शन के लिए उतना ही ज़िम्मेवार है जितना कि सरकार की लोकलुभावन व अव्यवहारिक नीतियाँ। प्रदेश में सहकारी बैंको की हालत ख़स्ता है इससे पूर्व भी सरकार कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक को बन्द कर उसके विलय को मन्जूरी दे चुकी है। ये बात और भी आश्चर्यजनक है कि इस बैंक के अधिकांश अधिकारी व कर्मचारियों का सहकारी बैंक में संविलियन प्रस्तावित है जिनके ऊपर खुद लायसेंस रद्द होने की तलवार लटक रही है। ऐसे में मेरा सवाल यह है कि आख़िर सरकार की वोट आकर्षित करने की लोकलुभावन अव्यवहारिक नीतियों का ख़ामियाज़ा जनता क्यों भुगते? वोट राजनीतिक दलों के और जोखिम जनता का! क्या यही आपके विकास का गणित है? एक ध्यान देने योग्य अतिमहत्तवपूर्ण तथ्य यह भी है इन बैंकों के अधिकांश खातेदार किसान हैं। यदि इन बैंको का लायसेंस रद्द होता है तो इन बैंको में सावधि जमा (एफ़डी) के रूप में जमा इन किसानों धनराशि के भुगतान को ज़िम्मेवार कौन होगा? यह बात किसी साधारण से व्यक्ति के भी समझ में आ सकती है कि जब बैंक शून्य प्रतिशत पर ब्याज़ देंगे और उसकी वसूली नहीं करेंगे तो बैंके पाव धनराशि आएगी कहां से। इस पर तुर्रा ये कि नाबार्ड और प्रदेश सरकार भी कोई अतिरिक्त सहायता इन बैंको को नहीं देगी, भ्रष्टाचार तो व्याप्त है ही तो ऐसे में यह बैंक आख़िर कब तक चल पाएंगे! एक ना एक दिन इनका डूबना सुनिश्चित है। ऐसे में इन बैंको के खातेदारों की राशि विवादों में फ़ंसने का ज़िम्मा क्या प्रदेश सरकार लेगी? इससे पूर्व भी एक महिला बैंक इसी प्रकार राजनीति व भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है जिसके खातेदारों को एड़ियाँ रगड़-रगड़कर कई वर्षों बाद अपनी जमा पूँजी वापस मिली। इन सबके चलते जो सबसे बड़ी हानि हो रही है वह बैंको के प्रति आम जनता में विश्वास की निरन्तर कमी, कुछ माह पूर्व के नोटबन्दी के निर्णय ने इस विश्वास को बेहद कमज़ोर किया जब लोगों को अपनी ही जमा पूँजी निकालने के घण्टों बैंकों की लाईनों में लगना पड़ा और जमा पूँजी भी राशन की तरह एक निश्चित मात्रा में ही प्राप्त हुई। मेरा प्रदेश के मुखिया से आग्रह है कि केवल "विश्वास" को सहकारिता मन्त्री बना देने मात्र से इन बैंको के प्रति जनता में विश्वास नहीं बढ़ेगा, उसके लिए आवश्यक है ज़मीनी स्तर पर कुछ ठोस प्रयास कर प्रदेश की इन ख़स्ताहाल सहकारी बैंको स्थिति सुधारी जाए एवं अपनी लोकलुभावन अव्यवहारिक नीतियाँ त्वरित बन्द की जाएं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 30 अप्रैल 2017

अर्ज़ किया है...


(१) "मैं परेशां हूं हमने आधा कश्मीर हारा क्यों
    लोग परेशां है कटप्पा ने बाहुबली मारा क्यों"

(२) "ये कोई सियासी भूल सा लगता है
    वो संग फ़ेके तो फ़ूल सा लगता है"

(३) "मन्दिर-मस्ज़िद पे सियासत उन्हें चमकानी है
    हमें तो साहब अपने चूल्हे की आग जलानी है"

(४) "शाह-औ-मुफ़लिस का फ़र्क कैसे मिटता
    ए कज़ा तूने सब बराबर कर दिया"

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

"ध्यान" है आध्यात्मिक सेल्फ़ी

वर्तमान समय में स्वदर्शन अर्थात "सेल्फ़ी" लेने का बड़ा फ़ैशन है। युवाओं से लेकर बुज़ुर्गों व महिलाओं तक पर इसका नशा सर चढ़कर बोल रहा है। मुझे इस प्रकार के "सेल्फ़ी" चलन से लगा कि "सेल्फ़ी" का प्रचलन तो हमारे देश में; हमारी आध्यात्मिक परम्परा में सदियों से है किन्तु इस रूप में नहीं, मेरे देखे आध्यात्मिक जगत की "सेल्फ़ी" "ध्यान" है। जिसमें आप वास्तविक व प्रामाणिक रूप में अपना "आत्मदर्शन" करते हैं। उसमें आपका शरीर ही आपका उपकरण अर्थात डिवाइस होता है और जब वह "सेल्फ़ी" ली जाती है तो उसे किसी भी मंच पर साझा नहीं करना पड़ता वह तो स्वयमेव प्रत्येक व्यक्ति को दिखाई देने लगती है किन्तु उस प्रकार की "सेल्फ़ी" आज की "सेल्फ़ी" की तरह कुछ पलों में नहीं ली जा सकती उसके लिए तो धैर्य व शान्ति के साथ निर्विचार होकर अपने शरीर रूपी मोबाईल को अनुकूलित अर्थात "कस्टमाईज़" करना पड़ता है। आज की "सेल्फ़ी" तो बस शरीर का ही प्रतिबिम्ब हैं किन्तु "ध्यान" रूपी सेल्फ़ी में वह दिखाई देता है, जो है, जिसे शास्त्रों में कहा गया है "एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति" या फ़िर "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" अर्थात "चैतन्य"। आईए प्रयास करें कि हम कभी आध्यात्मिक जगत की "सेल्फ़ी" लेने में सक्षम हो सकें क्योंकि आध्यात्मिक जगत की "सेल्फ़ी" कभी नष्ट नहीं होती शेष सारी "सेल्फ़ी" शरीर रूपी मोबाईल के फ़ार्मेट होते ही "डीलिट" हो जाती हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

वीवीआईपी मानसिकता भी ख़त्म हो

अभी-अभी मोदी सरकार ने वीआईपी कल्चर को ख़त्म करने का आगाज़ करते हुए सभी वीवीआईपी वाहनों से लाल बत्ती हटाने का फ़ैसला लिया। यह एक स्वागत योग्य कदम है लेकिन इतने भर से काम चलने वाला नहीं हमें वीवीआईपी मानसिकता भी ख़त्म करनी होगी। इस देश में जहां अदना सा सरपंच या मण्डल अध्यक्ष अपना पद छोड़ने के बाद भी पूर्व सरपंच या पूर्व मण्डल अध्यक्ष लिखता  है वहां केवल वाहनों पर से लाल बत्ती हटाने से काम नहीं चलेगा। इस देश में वीवीआईपी मानसिकता को ख़त्म करने की पहल होनी चाहिए। यह पहल केवल सरकार नहीं कर सकती सरकार ने तो जो कदम उठाना था वह उठा ही लिया है लेकिन इसमें आम जनता को भी सहयोग करना होगा। आख़िर कौन वे लोग हैं जो इन आम से नेताओं को ख़ास बना देते हैं? ये हम और आप ही हैं जो नेताओं को अपने ख़ास होने का अहसास व आभास कराते हैं। आपने देखा होगा कोई राजनेता या अभिनेता कहीं दिख जाए उसके चरण-चुम्बन व सेल्फ़ी लेने की होड़ सी लग जाती है। उसके आस-पास कई लोग स्वयं ही उसके सुरक्षाकर्मियों की भूमिका अदा करने लग जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? ऐसा दो कारणों से होता है पहला तो इसलिए होता है कि हम उस प्रतिष्ठित व्यक्ति को आधार बनाकर अपना अहंकार तुष्ट करना चाहते हैं, दूसरा हम उस नेता की नज़र में उसके ख़ास बनना चाहते हैं जिससे हमारे दैनिक जीवन के समस्त नैतिक-अनैतिक कार्यों में बाधा ना पड़े। वाहनों पर लगी लाल बत्ती को त्वरित हटाना सम्भव था, जो कर दिया गया है लेकिन हमारे समाज में व्याप्त इस "अति-महत्त्वपूर्ण व्यक्ति संस्कृति" (वीवीआईपी कल्चर) को हटाना शायद इतना आसान ना होगा। समाज में फ़ैली इस कुव्यवस्था को तभी हटाया जा सकता है जब आम नागरिक अपने स्वार्थ पर अंकुश लगा कर राष्ट्रहित के बारे सोचें। इस दिशा में हुई एक सकारात्मक पहल का हमें स्वागत करना चाहिए।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

सन्त राबिया ने की थी कुरान में तरमीम

इन दिनों देश में "तीन तलाक" के मुद्दे को लेकर काफ़ी गहमागहमी है। न्यूज़ चैनल पर आए दिन इस मुद्दे को लेकर बहस-मुबाहिसे होते रहते हैं। ऐसी एक बहस देखकर बड़ी हैरानी हुई कि कुछ लोग धर्म को लेकर किस हद तक कट्टर हो जाते हैं और मानवता रूपी अपने सबसे बड़े धर्म से विमुख हो जाते हैं। तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम धर्मगुरू व मुस्लिम समाज दो भागों में बँटा नज़र आ रहा है। तीन तलाक के नाम पर महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों से देश की अधिकांश जनता जो कि मुस्लिम नहीं भी है, पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के साथ खड़ी दिखाई दे रही है। मेरे देखे शास्त्र यदि ठीक से ना समझा जाए तो वह शस्त्र से भी अधिक ख़तरनाक व हानिकारक सिद्ध हो सकता है यह इसका ज्वलंत उदाहरण है, इसीलिए हमारे सनातन धर्म में तो एक समय तक शास्त्रों के अध्ययन का अधिकार भी हर किसी को प्राप्त नहीं था, इस निषेध के पीछे एकमात्र उद्देश्य यही था कि शास्त्र का अध्ययन केवल वही व्यक्ति करे जो उसे भलीभाँति समझ सकता हो। जहाँ तक बात है कुरान की तो कई इस्लाम के जानकारों के अनुसार कुरान में तीन तलाक के इस रूप का कोई ज़िक्र नहीं है। यहाँ मैं मुस्लिम सन्त राबिया का ज़िक्र करना चाहूँगा जिन्होंने कुरान में भी तरमीम करने का साहस दिखाया था। राबिया अपने ज़माने की एक बहुत ऊँचे दर्जे की मुस्लिम सन्त हुई हैं। एक बार एक मुस्लिम फ़कीर हसन उनके यहाँ मेहमान था उसने जब इबादत के वक्त कुरान को पढ़ा तो उसमें एक वाक्य कटा हुआ पाया उसने सोचा कि कुरान में तो तरमीम (संशोधन) हो ही नहीं सकती, यह तो गुनाहे-अज़ीम (सबसे बड़ा अपराध) है। जब उसने राबिया से इस बारे में पूछा तो राबिया ने कहा कि यह तरमीम उसने खुद की है। हसन ने पूछा कि राबिया कुरान में आख़िर ऐसा क्या लिखा है जो तेरे जैसी सन्त को इसमें तरमीम करना पड़ी? इस पर राबिया ने उत्तर देते हुए कहा कि "कुरान का वचन है शैतान को घृणा करो और हसन जबसे मुझे इलहाम (ईश्वरानुभूति) हुआ है तबसे मुझे किसी में भी शैतान नज़र नहीं आता बस खुदा ही खुदा नज़र आता है तो मैं घृणा किससे करूं इसलिए मैंने कुरान के इस वाक्य को काट दिया।" कितनी खूबसूरत व श्रेष्ठ बात सन्त राबिया ने कही अगर यही बात आज के मौलाना समझ लें तो सारा मसला ही हल हो जाए। मैं सदैव कहता हूँ कि धर्म एक व्यवस्था मात्र है जो समाज को सुव्यवस्थित करने के लिए बनाई गई है। अत: जो नियम, जो रीति-रिवाज़, जो बात समाज को अव्यवस्थित करे वो धर्म से सम्बन्धित नहीं हो सकती, चाहे वह किसी पंथ की हो, चाहे किसी ग्रंथ की हो। तीन तलाक जैसे नियमों को जितनी जल्दी हो सके विदा दे दी जानी चाहिए।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र (म.प्र.)

रविवार, 9 अप्रैल 2017

सुरक्षाकर्मियों का अपमान करना निन्दनीय

अभी कुछ दिन पहले न्यूज़ चैनल पर एक ख़बर देखी फ़िर उसका वीडियो भी "वायरल" हो गया। इस वीडियो में म.प्र. के मुखिया अपने सुरक्षाकर्मियों को डांटते हुए "गेट-आउट" कहते नज़र आ रहे हैं। उन सुरक्षाकर्मियों का अपराध केवल इतना था कि उन्होंने एक बीजेपी कार्यकर्ता को सीएम के पास जाने रोका था जिस पर इस छुटभैये नेता ने वबाल मचा दिया और घटना का राजनीतिकरण करते हुए अपने आपको एक जाति विशेष का होने के कारण इस प्रकार का दुर्व्यवहार होने की बात कहकर हंगामा कर दिया जिस पर मुख्यमंत्री जी ने अपने ही सुरक्षाकर्मियों को डांटते हुए बाहर निकल जाने का निर्देश दे डाला। यह पूरी घटना मुझे आहत कर गई। आखिर ये राजनेता अपने वोट बैंक के लिए संवेदनाओं को किस प्रकार ताक पर रख दिया करते हैं यह इस बात का जीवन्त उदाहरण है। मेरे देखे किसी भी वीआईपी या वीवीआईपी की सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों का कार्य ही उन महत्त्वपूर्ण व अति-महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा करना होता है। अपने इस कर्त्तव्य को निभाते हुए कभी-कभार किसी व्यक्ति के साथ थोड़ी धक्का-मुक्की हो जाती है लेकिन यह तभी होता है जब वह व्यक्ति अनाधिकार चेष्टा कर रहा होता है। सुरक्षाकर्मियों का कार्य एक बेहद दुष्कर कार्य है। ये सुरक्षाकर्मी अपनी घंटों की थका देने वाली ड्यूटी में शायद ही आपको कभी शान्ति से बैठे नज़र आते हों। सदैव तत्परता के साथ खड़े रहना; हमेशा चौकस रहना; स्वयं जनसमूह के धक्के खाकर अपने नेता को आरामदायक व सुरक्षित स्थिति-परिस्थिति प्रदान करते ये सुरक्षाकर्मी धन्यवाद के पात्र होते हैं इस प्रकार अपमान के नहीं, खासकर वह भी तब; जब वे अपना कर्त्तव्य पूरी मुस्तैदी से निभा रहे हों। यदि ये सुरक्षाकर्मी किसी गरीब व असहाय व्यक्ति को जो अपनी समस्या से सीएम को अवगत कराना चाहता हो, धकेल कर दूर करते और सीएम साहब इन पर भड़कते तो शायद हमें इतना दु:ख ना भी होता किन्तु केवल अपनी पार्टी एक कार्यकर्ता को दूर करने पर सीएम का इस प्रकार अपने सुरक्षाकर्मियों का सार्वजनिक रूप से अपमान करना बेहद निन्दनीय है। यदि इस प्रकार ये सुरक्षाकर्मी पार्टी कार्यकर्ताओं व भीड़ की सुविधा के अनुसार कार्य करने लगें और कोई दुर्घटना हो जाए तब भी सारा दोष इन्हीं सुरक्षाकर्मियों को दिया जाएगा, शायद इन्हें तत्काल प्रभाव से निलम्बित या बर्खास्त भी कर दिया जाए। यहां मुझे पूर्व राष्ट्रपति स्व. श्री ए पी जे अब्दुल कलाम साहब का स्मरण आ रहा है जिन्होंने अपनी सुरक्षा में लगे एक सुरक्षाकर्मी को देर तक खड़े देखकर अपने निज सहायक को कहा था कि "वह कब तक खड़ा रहेगा उसे बैठने को कहो" और जब वह सुरक्षाकर्मी नहीं माना तब गंतव्य पर पहुंचकर सबसे पहले कलाम साहब ने अपने उस सुरक्षाकर्मी को अपने कमरे में बुलाकर उसे "धन्यवाद" कहा और पूछ-"मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं।" क्या कलाम साहब के अतिरिक्त कभी आपने ऐसा वाकया सुना है; क्या कभी किसी भी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति ने अपनी सुरक्षा में लगे इन सुरक्षाकर्मियों की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की है, या उन्हें धन्यवाद कहा है? हां वोट बैंक के लिए सार्वजनिक रूप उनके अपमान कि किस्से अवश्य सुनाई दे जाते हैं। जिस कार्यकर्ता के तथाकथित दुर्व्यवहार को लेकर सीएम अपने सुरक्षाकर्मियों पर इतने नाराज़ हो गए क्या उस कार्यकर्ता को अपने नेता की सुरक्षा का अन्दाज़ा नहीं था, क्या उसे उनकी सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों का कार्य पता नहीं था? फ़िर क्यों उस कार्यकर्ता ने अनाधिकार चेष्टा की क्योंकि यदि वह सीएम साहब का इतना खा़स होता तो वे स्वयं उसे देखते ही अपने पास बुला लेते! किन्तु इस प्रकार सीएम या मन्त्री के पास जाकर सेल्फ़ी लेना और फ़ोटो खिंचाना इन छुटभैए नेताओं की आदत में शुमार होता है फ़िर इसी के आधार पर वे स्थानीय अधिकारियों पर यदा-कदा धौंस जमाते नज़र आते है। हमारे सुरक्षाप्राप्त नेताओं को ये सदैव स्मरण होना चाहिए कि सुरक्षाकर्मियों का कार्य ही आपकी सब प्रकार से सुरक्षा करना होता है जिसमें भीड़ से सुरक्षा भी शामिल है। यदि इन नेताओं को जनता से मेल-मिलाप इतना प्रीतिकर है तो फ़िर सुरक्षा लेते ही क्यों है? वहां तो स्टेटस सिम्बल व प्रतिष्ठा आड़े आ जाती है। ज़रा किसी नेता की सुरक्षा की समीक्षा या उनकी सुरक्षा में कटौती की बात क्या होती है, उस नेता के द्वारा हंगामा बरपा दिया जाता है। इस प्रकार  "हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और" वाली कहावत चरितार्थ कर आप जनता को अधिक देर तक मूर्ख़ नहीं बना सकते क्योंकि वास्तविकता कभी न कभी सामने आ ही जाती है। मैं म.प्र. के मुख्यमन्त्री के द्वारा अपने सुरक्षाकर्मियों के सार्वजनिक रूप से अपमान की इस घटना की कड़ी निन्दा व भर्त्सना करता हूं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

रघुवीर यादव: एक संजीदा कलाकार

फ़िल्म अभिनेता रघुवीर यादव

आज "मुंगेरीलाल के हसीन सपने", "मेसी साब", "लगान", "चाचा चौधरी" और "पीपली लाइव" जैसी फ़िल्मों व सीरीयल के सुप्रसिद्ध कलाकार श्री रघुवीर यादव जी भेंट करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। एक बेहद संजीदा व सरल व्यक्तित्व के धनी श्री रघुवीर यादव अपनी असल ज़िंदगी में भी उतने सरल व संजीदा हैं जितने वे अपनी फ़िल्मों में अक्सर दिखाई देते हैं। बिना किसी बहुत बड़े ताम-झाम और "बाऊंसरों" से विहीन एक बेहद सरल इंसान के रूप में वे आज मुझसे मिले। आज दिन में तीन बार उनसे मिलने और बात करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और हर बार वे अपनी शूटिंग के व्यस्त कार्यक्रम से थके होने बावजूद अत्यंत विनम्र व उत्साहपूर्वक मुझसे मिले। मैंने अपनी पत्रिका "सरल-चेतना" उन्हें भेंट कर पत्रिका के बारे में उन्हें जानकारी दी जिससे वे अत्यंत प्रभावित हुए। मैंने सदैव कहा है; आज पुन: इसी बात को दोहराता हूं कि ईश्वर जिसी ह्रदय से अपना आशीर्वाद प्रदान करता है वह उसे सादगी व सरलता प्रदान करता है जैसे उसने श्री रघुवीर यादव को सरलता व सादगी प्रदान की। ऐसे महान व संजीदा कलाकार का नगर में आगमन व उनसे मिलना निश्चय ही मेरे लिए किसी सौभाग्य से कम नहीं है।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
"संपादक: सरल-चेतना"

खूबसूरती


सूखे पेड़ की भी अपनी खूबसूरती होती है। आज दोपहर जैसे ही एक सूखे पेड़ पर निगाह पड़ी तो पाया कि सूखा पेड़ भी कितना सुन्दर हो सकता है। खूबसूरती फ़ूलों की मोहताज नहीं, ये आज समझ आया। ऐसे नए-नए सबक सिखाने के लिए ज़िंन्दगी तेरा शुक्रिया।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

"सन्देह" श्रद्धा की पहली सीढ़ी है-

मेरे देखे अज्ञान मनुष्य को उतना नहीं भटकाता जितना उधार ज्ञान भटका देता है। आजकल सोशल मीडिया पर एक वीडियो बहुत वायरल हो रहा है जिसमें एक युवती एक तथाकथित कथावाचक से कुछ सार्थक प्रश्न करती नज़र आ रही है और वे तथाकथित कथावाचक उसके प्रश्नों के सटीक उत्तर देने के स्थान पर "लकीर के फ़कीर" वाली कहावत चरितार्थ करते प्रतीत हो रहे हैं। इस वीडियो को यह कहकर प्रचारित किया जा रहा है कि यह कान्वेंट में अपने बच्चों को पढ़ाने का परिणाम है। हम इस वीडियो को इस ढंग से प्रचारित करने से कतई सहमत नहीं हैं। आज एक युवती के सार्थक प्रश्न पर एक तथाकथित कथावाचक की पोल खुल गई। इस युवती के प्रश्न का सही उत्तर देने के स्थान पर प्राचीन रुढ़ियों की आड़ लेकर अपने अज्ञान का प्रदर्शन कर इस कथावाचक ने समाज को जिस प्रकार दिग्भ्रमित किया वह घोर निन्दनीय है। ये तथाकथित कथावाचक भागवत कथा करने के लिए लाखों रु. दक्षिणा के रुप में लेते हैं और रुकने के लिए इन्हें "एसी कमरा" आवश्यक होता है। ये शुभ है कि आज इस युवती ने एक स्वस्थ परम्परा की शुरुआत की। मेरी समझ नहीं आता हम प्रश्नों से इतना भागते क्यों हैं? प्रश्नों का तो समाधान होना चाहिए, सन्देह श्रद्धा की पहली सीढ़ी है चाहे वह जगज्जननी पार्वती का हो या युगपुरुष विवेकानन्द का। लेकिन हमारे ये उधार ज्ञान के धनी पोंगा पण्डितजन सिर्फ़ एकालाप जानते हैं, संवाद नहीं इसलिए आज का समाव व युवा धर्म से विमुख हैं क्योंकि उसके सन्देहों का उचित समाधान नहीं होता अपितु उसे सन्देह के स्थान पर धर्म के नाम पर मौन रहना सिखाया जाता है। मेरे देखे इन कथावाचकों की भी क्या गलती? इन्हें खुद ही प्रश्नों के उत्तर नहीं पता तो ये समाज व जनमानस को क्या उत्तर देंगे। ये तो तोतारंटत जानते हैं, श्रद्दालुओं को नचाना जानते हैं। यदि इन्हें प्रश्नों के उत्तर पता होते तो आज इस समाज का स्वरूप कुछ और ही होता। शुभ है कि परम्परा की शुरुआत तो हुई। मैं चाहता हूं जनता ऐसे पोंगा पण्डितों से खूब प्रश्न करे ताकि इनकी वास्तविकता समाज के सामने आ सके। जो खरे स्वर्ण की भांति हैं वे और उजले होकर निखर जाएंगे और जो खार हैं वे  जल कर नष्ट हो जाएंगे, मेरे देखे खार का जल जाना श्रेयस्कर ही है।
राधे-राधे!!

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र (म.प्र.)

बुधवार, 22 मार्च 2017

"दीप" के दोहे

कहाँ प्रीत की माधुरी, कहाँ नेह की गँध।
मुँह देखे की बतकही सुविधा के सम्बन्ध॥

आ हिलमिलकर बाँट लें आज मिलें जो फ़ूल।
मौसम का विश्वास क्या फ़िर कब हो अनुकूल॥

मित्र दु:खों की पोटली इधर-उधर मत खोल।
भूल गये हैं लोग अब हमदर्दी के बोल॥

जो तू हमसे रुठता कर लेते मनुहार।
तू खुद से नाराज़ है कौन मनाये यार॥

जीवन पथ पर मिल गया इक दिन दुष्ट यथार्थ।
सपनों की सब थैलियाँ सौंपी उसके हाथ॥

अतिथि सरीखे के आ गए दुर्दिन के अक्रूर।
सुख के श्याम चले गए सखे बहुत ही दूर॥

सबको इक सी चाँदनी सबको इक सी धूप।
देना मेरे रामजी भिक्षुक हो या भूप॥

सपने आकर कह गए तुम जाने क्या बात।
सुधियों की बारादरी महकी सारी रात॥

महकी-महकी नींद में बहके-बहके ख़्वाब।
तकिये के नीचे रखे किसने खिले गुलाब॥

बस्ती-बस्ती वेदना, डगर-डगर थी पीर।
सागर जैसी प्यास थी, चुल्लू भर था नीर॥

भाभी मिसरी की डली भैया खुली किताब।
आँगन में नित नेह के खिलते रहे गुलाब॥

कवि-प्रदीप दुबे "दुबे"


शुक्रवार, 10 मार्च 2017

होली के दोहे



इन्द्र-जाल चहुँ फाग का, रंगों की रस-धार।
हुई राधिका साँवरी, और कृष्ण रतनार।।

फागुन ने तहजीब पर, तानी जब संगीन।
बरजोरी कर सादगी, हुई स्वयँ रंगीन।।

क्या धरती? आकाश तक, है होली के संग।
चहरे-चहरे पर टँके, इंद्र-धनुष के रंग।।
-अखिलेश तिवारी

*****

गोरे गोरे अंग पै, चटख चढि गये रंग।
रंगीले आँचर उडैं, जैसें नवल पतंग ।।

लाल हरे पीले रँगे, रँगे अंग-प्रत्यंग।
कज़्ज़ल-गिरि सी कामिनी, चढौ न कोऊ रंग।।

भरि पिचकारी सखी पर, वे रँग-बान चलायँ।
लौटें नैनन बान भय, स्वयं सखा रँगि जायँ।।

भ्रकुटि तानि बरजै सुमुखि, मन ही मन ललचाय।
पिचकारी ते श्याम की, तन मन सब रँगि जाय।।

भक्ति ग्यान औ प्रेम की, मन में उठै तरंग।
कर्म भरी पिचकारि ते, रस भीजै अंग-अंग।।

ऐसी होली खेलिये, जरै त्रिविधि संताप।
परमानन्द प्रतीति हो, ह्रदय बसें प्रभु आप ।।
-डा. श्याम गुप्त

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होली पर साजन दिखे, छूटा मन का धीर।
गोरी के मन-आँगने, उड़ने लगा अबीर ।।

होली अब के बार की, ऐसी कर दे राम।
गलबहिंया डाले मिलें, ग़ालिब अरु घनश्याम ।।


मनसा-वाचा-कर्मणा, भूल गए सब रीत।
होली के संतूर से, गूँजे ऐसे गीत ।।

इक तो वो मादक बदन, दूजे ये बौछार।
क्यों ना चलता साल भर, होली का त्यौहार ।।

थोड़ी-थोड़ी मस्तियाँ, थोड़ा मान-गुमान।
होली पर 'साहिल' मियाँ, रखना मन का ध्यान ।।
-लोकेश ‘साहिल

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होली में जलता जिया, बालम हैं परदेश।
मोबाइल स्विच-ऑफ है, कैसे दूँ संदेश।।


भोर हुई कब की, मगर, बोल रहा ना काग।
बिन सजना इस बार भी, 'फाग' लगेगा 'नाग'।।


कभी कभी हत्थे चढ़ें, माधव कृष्ण मुरारि।
फिर काहे को छोड़ दें, उन को ब्रज की नारि।।
-वंदना गुप्ता

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किस से होली खेलिए, मलिए किसे गुलाल।
चेहरे थे कुछ चाँद से डूब गए इस साल ।।

नेताओं ने पी रखी, जाने कैसी भंग।
मुश्किल है पहचानना, सब चेहरे बदरंग ।।

योगी तो भोगी हुए, संसारी सब संत।
जिनकी कुटियों में रहे, पूरे बरस बसंत ।।

कैसी थीं वो होलियाँ, कैसे थे अहसास।
ज़ख़्मी है अब आस्था, टूट गए विशवास।।
-(साभार)

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नाच उठा आकाश भी, ऐसा उड़ा अबीर।
ताज नशे में झूमता,यमुना जी के तीर।।
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बरसाने की लाठियाँ, खाते हैं बड़भाग।
जो पावैं सौगात ये, तन मन बागो बाग़।।
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तन मन पे यूँ छा गई, होली की तासीर।
राँझे को रँगने चली, ले पिचकारी हीर।।
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होली के हुडदंग में, योगी राज उवाच।
पटिआले की भांग ने,फेल करी इस्काच।।

रंग लगावें सालियाँ, बापू भयो जवान।
हुड़ हुड़ हुड़ करता फिरे, बन दबंग सलमान।।
-योगराज प्रभाकर

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निरखत बासंती छटा, फागुन हुआ निहाल।
इतराता सा वह चला, लेकर रंग गुलाल।।

कलियों के संकोच से, फागुन हुआ अधीर।
वन-उपवन के भाल पर, मलता गया अबीर।।

टेसू पर उसने किया, बंकिम दृष्टि निपात।
लाल लाज से हो गया, वसन हीन था गात।।

अमराई की छाँव में, फागुन छेड़े गीत।
बेचारे बौरा गए, गात हो गए पीत।।

फागुन और बसंत मिल, करें हास-परिहास।
उनको हंसता देखकर, पतझर हुआ उदास।।
-महेन्द्र वर्मा

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सब चेहरे हैं एक से हुई पृथकता दंग।
लोकतंत्र में घुल गया साम्यवाद का रंग।।

रंग - भंग - हुड़दंग का, समवेती आहंग।
वातायन ढोलक हुआ, मन बन गया मृदंग।।

आज अबीर-गुलाल में, हुई मनोरम जंग।
इन्द्रधनुष सा हो गया, युद्धक्षेत्र का रंग।।
-मयंक अवस्थी

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फागुन में नीके लगें, छींटे औ' बौछार।
सुन्दर, सुखद-ललाम है, होली का त्यौहार।।

शीत विदा होने लगा, चली बसन्त बयार।
प्यार बाँटने आ गया, होली का त्यौहार।।

पाना चाहो मान तो, करो मधुर व्यवहार।
सीख सिखाता है यही, होली का त्यौहार।।

रंगों के इस पर्व का, यह ही है उपहार।
भेद-भाव को मेंटता, होली का त्यौहार।।

तन-मन को निर्मल करे, रंग-बिरंगी धार।
लाया नव-उल्लास को, होली का त्यौहार।।

भंग न डालो रंग में, वृथा न ठानो रार।
देता है सन्देश यह, होली का त्यौहार।।

छोटी-मोटी बात पर, मत करना तकरार।
हँसी-ठिठोली से भरा, होली का त्यौहार।।

सरस्वती माँ की रहे, सब पर कृपा अपार।
हास्य-व्यंग्य अनुरक्त हो, होली का त्यौहार।।
-रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

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फगुनाहट की थाप पर,बजा फाग का राग।
पिचकारी की धार पर, मच गइ भागम भाग।।

कुंज गली में जा छुपे, नटखट मदन गुपाल।
ब्रजबाला बच के चली, फिर भी हो गइ लाल।।

मने प्रीत का पर्व ये, सद्‌भावों के साथ।
दो ऐसा सन्देश अब, तने गर्व से माथ।।
-ऋता शेखर ‘मधु’

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रंगों के सँग घोलकर, कुछ, टूटे-संवाद।
ऐसी होली खेलिए, बरसों आए याद।।

जाकर यूँ सब से मिलो, जैसे मिलते रंग।
केवल प्रियजन ही नहीं, दुश्मन भी हों दंग।।

तुमरे टच से, गाल ये, लाल हुये, सरताज।
बोलो तो रँग दूँ तुम्हें, इसी रंग से आज।।

सूखे रंगों से करो, सतरंगी संसार।
पानी की हर बूँद को, रखो सुरक्षित यार।।
-धर्मेन्द्र कुमार ‘सज्जन’

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लगा गयी हर डाल पर, रुत बसंत की आग।
उड़ा धूल की आंधियां, हवा खेलती फाग।।

टल पाया ना इस बरस, सलहज का इसरार।
कुगत कराने को स्वयँ, पहुँचे सासू द्वार।।

जम कर होली खेलिए, बिछा रंग की सेज।
जात धरम ना रंग का, फिर किसलिए गुरेज।।

पल भर हजरत भूल कर, दुःख,पीड़ा,संताप।
जरा नोश फरमाइए, नशा ख़ुशी का आप।।
-सौरभ शेखर

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अबके कुछ ऐसा करो, होली पर भगवान।
हर भूखे के थाल में, भर दो सब पकवान।।

हिरण्यकश्यप मार कर, करी धर्म की जीत।
हे नरसिँह कब आउगे, जनता है भयभीत।।

खुशियों का त्यौहार है, खुल कर खेलो फाग।
बैर, दुश्मनी, द्वेष का, दिल से कर दो त्याग।।
-साधना वैद

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गहरे रंगों से रँगी, भीगा सारा अंग।
एक रंग ऐसा लगा, छोड़ न पाई संग।।

विजया सर चढ़ बोलती, तन मन हुआ अनंग।
चंग संग थिरके क़दम, उठने लगी तरंग।।
-आशा सक्सेना

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बच्चे, बूढ़े, नौजवाँ, गाएं मिलकर फाग।
एक ताल, सुर एक हो, एकहि सबका राग।।

सेन्दुर, टिकुली, आलता, कब से हुए अधीर।
प्रिय आयें तो फाग में, फिर से उड़े अबीर।।

महँगाई ने सोख ली, पिचकारी की धार।
गुझिया मुँह बिचका रही, फीका है त्यौहार।।

अबके होली में बने, कुछ ऐसी सरकार।
छोटा जिसका पेट हो, छोटी रहे डकार।।

मिली नहीं छुट्टी अगर, मत हो यार उदास।
यारों सँग होली मना, यार बड़े हैं खास।।
-राणा प्रताप सिंह

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फाग बड़ा चंचल करे, काया रचती रूप।
भाव-भावना-भेद को, फागुन-फागुन धूप।।

फगुनाई ऐसी चढ़ी, टेसू धारें आग।
दोहे तक तउआ रहे, छेड़ें मन में फाग।।

भइ! फागुन में उम्र भी, करती जोरमजोर।
फाग विदेही कर रहा, बासंती बरजोर।।

जबसे सिंचित हो गये, बूँद-बूँद ले नेह ।
मन में फागुन झूमता, चैताती है देह।।

बोल हुए मनुहार से, जड़वत मन तस्वीर।
मुग्धा होली खेलती, गुद-गुद हुआ अबीर।।

धूप खिली, छत, खेलती, अल्हड़ खोले केश।
इस फागुन फिर रह गये, बचपन के अवशेष।।

करता नंग अनंग है, खुल्लमखुल्ले भाव।
होश रहे तो नागरी,  जोशीले को ताव ।।

हम तो भाई देस के,  जिसके माने गाँव ।
गलियाँ घर-घर जी रहीं - फगुआ, कुश्ती-दाँव।।

नये रंग, सुषमा नई, सरसे फाग बहाव ।
लाँघन आतुर, देहरी, उत्सुक के मृदु-भाव।।
-सौरभ पाण्डेय

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इंतज़ार  के  रंग  में, गई  बावरी   डूब।
होली पर इस बार भी, आये ना महबूब।।

सरहद से  आया नहीं,  होली  पे  क्यूँ  लाल।
भीगी  आँखें  रंग से,  करती  रहीं सवाल।।

मौक़ा था पर यार ने, डाला नहीं गुलाल।
मुरझाये से  ही  रहे,  मेरे  दोनों  गाल।।

कौन बजावे फाग पे,  ढोल, नगाड़े, चंग।
कहाँ किसी को चाव है, गायब हुई उमंग।।

गीली - गीली आँख से, करे शिकायत गाल।
बैरी ख़ुद आया नहीं, भिजवा दिया गुलाल।।
-विजेंद्र शर्मा

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’हो ली’, ’हो ली’ सब करें, मरम न जाने कोय।
क्या हो ली क्या ना हुई, मैं समझाऊँ तोय।।

हो ली पूजा हस्ति की, माया जी के राज।
हाथी पे परदे पड़े, बिगड़ गए सब काज।।

हो ली लूट-खसूट बहु, राजा के दरबार।
पहुँचे जेल तिहाड़ में, जुगत भई बेकार।।

हो ली बहु बिध भर्त्सना, हे चिद्दू म्हाराज।
नहीं नकारो सत्य को, अब तो आओ बाज।।

हो ली अन्ना की 'ख़लिश', जग में जय जयकार।
शायद उनको हो रही, अब गलती स्वीकार।।
-महेश चंद्र गुप्ता ‘ख़लिश’

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होली होली हो रही, होगी बारम्बार।
होली हो अबकी बरस, जीवन का श्रृंगार।।

होली में हुरिया रहे, खीसें रहे निपोर।
गौरी-गौरा एक रंग, थामे जीवन डोर।।

होली अवध किशोर की, बिना सिया है सून।
जन प्रतिनिधि की चूक से, आशाओं का खून।।

होली में बृजराज को, राधा आयीं याद।
कहें रुक्मिणी से -'नहीं, अब गुझियों में स्वाद'।।

होली में कैसे डले, गुप्त चित्र पर रंग।
चित्रगुप्त की चातुरी, देख रहे सबरंग।।

होली पर हर रंग का, 'उतर गया है रंग'।
जामवंत पर पड़ हुए, सभी रंग बदरंग।।

होली में हनुमान को, कहें रँगेगा कौन।
लाल-लाल मुँह देखकर, सभी रह गए मौन।।

होली में गणपति हुए, भाँग चढ़ाकर मस्त।
डाल रहे रँग सूंढ से, रिद्धि-सिद्धि हैं त्रस्त।।

होली में श्री हरि धरे, दिव्य मोहिनी रूप।
कलशा ले ठंडाइ का, भागे दूर अनूप।।

होली में निर्द्वंद हैं, काली जी सब दूर।
जिससे होली मिलें, हो, वह चेहरा बेनूर।।

होली मिलने चल पड़े, जब नरसिंह भगवान्।
ठाले बैठे  मुसीबत, गले पड़े श्रीमान।।
-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

रविवार, 5 मार्च 2017

"कही जाए सो व्यथा, बही जाए सो कथा"

आज जब भी समाचार पत्र देखते हैं उसमें कहीं ना कहीं भागवत कथा या रामकथा का समाचार अवश्य होता है। उसी ख़बर के आसपास कुछ ऐसी घटनाओं के समाचार भी होते हैं जिनसे यह प्रतीत होता है कि हमारा समाज शीघ्रता से अनैतिकता की ओर अग्रसर हो रहा है। समाज में अनैतिकता को यदि रोग की संज्ञा दी जाए और इन कथाओं व उपदेशों को औषधि की तो निष्कर्ष यह निकलता है कि औषधि यदि कारगर है तो रोग नष्ट होना चाहिए। यदि रोग नष्ट होने के स्थान पर बढ़ रहा है तो औषधि ठीक नहीं है। मेरे देखे आज के अधिकांश कथावाचक अभिनेता हैं; साधक नहीं। अभिनेता होना एक बात है, साधक होना बिल्कुल दूसरी बात। कथा समय के ३ घण्टे अभिनय को कथा के अनुरूप साधा जा सकता है किन्तु सम्पूर्ण जीवन को कथाओं के बताए अनुसार परिवर्तित कर लेना बड़ी साधना है। आजकल के अधिकतर सदगुरू लोगों को जगाते कम; सुलाते अधिक हैं। इसके पीछे दो मुख्य कारण है पहले तो वे खुद ही सोए हुए हैं क्योंकि जो स्वयं ही सोया है वह किसी और क्या जगाएगा और दूसरा जिस दिन उन्होंने लोगों को जगाना प्रारम्भ कर दिया उसी दिन से उनका विरोध होना शुरू हो जाएगा क्योंकि शारीरिक नींद ही इतनी मीठी और गहरी होती है तो चित्त की निद्रा की तो बात ही क्या, जब उसे तोड़ा जाता है तो बहुत कष्ट होता है इसीलिए उस निद्रा को तोड़ने वाले का विरोध होना स्वाभाविक है। विरले ही इस प्रकार की साधना में प्रवृत्त हो पाते हैं। जिस प्रकार यदि हम किसी पात्र को किसी वस्तु से भरते जाएं और जब वह पात्र पूर्णरूपेण भर जाए तब क्या होगा! वह वस्तु उस पात्र के ऊपर से बहने या झलकने लगेगी। ठीक उसी प्रकार जब हम अपने अन्त:करण को परमात्मतत्व रूपी गुण से भरते जाते हैं और हमारा यह अन्तर्घट जब पूर्ण हो जाता है तब जो झलकने लगता है वही सच्चा उपदेश व सही कथा है। मेरे देखे जो सप्रयास कही जाए वह व्यथा, जो अनायास बही जाए वह कथा है। जब साधक की वाणी निमित्त मात्र बनकर उपकरण का कार्य करती है तब मुख से जो निकलता है वह दिव्य होता है क्योंकि वह अलौकिक होता है। तब वह किसी और तल का; किसी और जगत का होता है, साधक तो केवल एक निमित्त और उपकरण मात्र होता है। जिस दिन इस प्रकार कथाएं व उपदेश कहे जाएंगे उसी दिन से समाज परिवर्तित होना प्रारम्भ हो जाएगा। !! राधे...राधे....!!

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

बुधवार, 1 मार्च 2017

"प्रधानमन्त्री" या "स्टार प्रचारक"...!

आज कोई भी न्यूज़ चैनल देखिए आपको किसी ना किसी चैनल पर हमारे प्रधानमन्त्री जनसभा को सम्बोधित करते हुए मिल जाएंगे। मेरे देखे प्रधानमन्त्री को वाचाल नहीं होना चाहिए। प्रधानमन्त्री पद की एक गरिमा होती है। यदि देश का प्रधानमन्त्री इस प्रकार पार्टी का स्टार प्रचारक मात्र बनकर रह जाएगा तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा। प्रधानमन्त्री देश का होता है पार्टी का नहीं, उसे उस पद की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए। यह कोई आम चुनाव नहीं हैं, यह राज्यों के चुनाव हैं इनमें यदि प्रधानमन्त्री इस प्रकार प्रचार कर रहें हैं तो यह चिन्ता का विषय है। क्या राज्य में बीजेपी का कोई बड़ा नेता या प्रदेश संगठन का कोई ऐसा नेता नहीं है जो इन चुनावों की कमान संभाल सके? प्रधानमन्त्री की जनसभाएं बड़ी सीमित और गरिमामय होनी चाहिए क्योंकि जब इस प्रकार अत्यधिक सभाएं व भाषण होते हैं तो वाणी का स्तर स्वयमेव ही गिर जाता है। हमारे प्रधानमन्त्री ने राज्यों में इस प्रकार अत्यधिक प्रचार करके वहां के मुख्यमन्त्री पद के उम्मीदवारों का कद अनजाने में ही बड़ा कर दिया। आप महसूस कर रहे होंगे कि इन दिनों बीजेपी मोदीमय हो चुकी है। एक पुरानी कहावत के परिप्रेक्ष्य में कहें तो "ना ख़ाता ना बही, जो मोदी कहें वही सही"। बीजेपी में मोदी ने अपना कद इतना बढ़ा लिया है कि कोई दूसरा नेता जन्मने ही नहीं पा रहा। शायद मोदी स्वयं इस बात से अनजान हैं कि उनका यह कार्य संघ की विचारधारा के विपरीत है। आज नहीं तो कल बीजेपी को उनके इस बढ़े कद का खामियाज़ा भुगतना ही पड़ेगा।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

अध्यात्म के बिना आनन्द की प्राप्ति नहीं

अभी-अभी फेसबुक के मंच पर एक न्यूज़ चैनल की खबर से पता चला कि राजधानी भोपाल में एक ऐसा एप एवं बेवसाईट प्रारम्भ होने जा रही है जिसमें अविवाहित युवक-युवती साथ-साथ समय व्यतीत करने के लिए होटल का कमरा बुक कर सकेंगे। मेरे देखे मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति आनन्द को प्राप्त करने की होती है किन्तु सही मार्ग ना मिलने पर वह क्षणभंगुर सुख को आनन्द समानान्तर मानते हुए अक्सर भटकाव की ओर अग्रसर हो जाता है। चाहे यह सुख उसे नशे के माध्यम से प्राप्त हो, चाहे शारीरिक सम्बन्ध के माध्यम से या किसी और माध्यम से। साधन महत्त्वपूर्ण नहीं है, साध्य का ही महत्त्व है। आनन्द और सुख समानार्थी नहीं है अभी यह बात को बहुत कम व्यक्तियों को ज्ञात है। जो अभी है और अभी नहीं वह सुख, जो अहर्निश रहे वह आनन्द। तत्व साक्षात्कार के बिना या यूं कहें कि अध्यात्म के बिना आनन्द की प्राप्ति असंभव है। अध्यात्म से विमुख आज की युवा पीढ़ी यदि क्षणभंगुर सुख की खोज में इस प्रकार के अनूठे तरीके अपनाती है तो आश्चर्य कैसा! आज नहीं तो कल जब साध्य की प्राप्ति नहीं होगी तो साधन अपने आप परिवर्तित हो ही जाएगा। रही बात समय की; तो जीवात्मा की यात्रा में काल अर्थात समय कोई मायने नहीं रखता।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

कथाओं को अहंकार का साधन ना बनाएँ-

वर्तमान समय में कथाओं का बहुत प्रचलन हैं। समाचार पत्रों में आए दिन किसी ना किसी स्थान पर कथा की जानकरी व टीवी चैनलों पर प्रतिदिन कथाओं का प्रसारण हो रहा है। अधिकांश श्रद्धालुओं को अपनी सुनी गई कथाओं की संख्या का बड़ा अभिमान होता है, वहीं कई कथावाचकों को भी अपने द्वारा की गई कथाओं की संख्या पर बड़ा गर्व होता है। एक ओर जहां कथावाचक यह बताने में गर्व अनुभव करते हैं कि हमने कितनी संख्या में और किन-किन प्रतिष्ठित यजमानों के यहां कथाएँ की वहीं श्रोतागण इस बात का अभिमान करते हैं कि हमने किन बड़े कथावाचकों की कथाएँ सुनी हैं। मेरे देखे कथाओं को माध्यम बनाकर अपना अहंकार पोषित करना सर्वथा अनुचित है। कथा का उद्देश्य ही होता है अहंकार और "मैं" भाव से मुक्ति और हम उस माध्यम को ही अपने अहंकार का साधन बना लेते हैं। इस प्रकार कथा कहने व सुनने से भला क्या परिवर्तन होगा! यह तो ठीक वैसे ही हुआ जैसे "कोल्हू का बैल" जो चलता तो बहुत है लेकिन पहुँचता कहीं भी नहीं। ये कथाएँ व शास्त्र तो संकेत मात्र हैं। हमें उस तत्व-साक्षात्कार का मुमुक्षु होना चाहिए जिसकी ओर ये सब संकेत कर रहे हैं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

"कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन..."

आधुनिकता व सम्पन्नता कई बार बहुत अच्छी चीजों को नष्ट कर देते हैं। आपने कुछ वर्षों पूर्व तक सर्दियों के इस मौसम में गली-मुहल्लों में घर के बाहर एक साथ बैठी हाथों में सलाईयाँ व गोद में ऊन का गोला लिए महिलाओं को आपस में बातें करते हुए अपने किसी खास के लिए स्वेटर बुनते अवश्य देखा होगा। उन दिनों सर्दियों के मौसम में इस तरह का दृश्य हर शहर; हर मुहल्ले में आम होता था किन्तु वर्तमान आधुनिकता के इस दौर में यह दृश्य अचानक से विलुप्त सा हो गया है। हाथों से बनी ऊनी स्वेटर या पुलोवर का स्थान अब मशीनों से बनी स्वेटर ने ले लिया है। आज की महिलाओं को स्वेटर बनाने जैसे कार्यों के लिए वक्त भी कहाँ मिल पाता है। घर के कई काम होते हैं फ़िर उनसे गर फ़ुरसत मिले तो वाट्स अप - फ़ेसबुक पर स्टेट्स अपडेट करना भी तो किसी आवश्यक कार्य से कम नहीं है। ऐसे में कहाँ वक्त मिलता है कि किसी के लिए स्वेटर बुना जाए। मेरे देखे स्वेटर बुनना एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है, कैसे हम किसी के लिए अपना विशुद्ध प्रेम बुनते हैं। उल्टे-सीधे फन्दों की कारीगरी मानो हमें रिश्तों का मर्म समझाती है कि कैसे किसी रिश्ते का स्वेटर के उल्टे-सीधे फन्दों के मानिन्द उतार-चढ़ाव से परिपूर्ण हो अंतत: गुंथा रहना आवश्यक होता है। जब प्यार से गुंथे इस स्वेटर का शरीर से स्पर्श होता है तो प्रेम से रोम-रोम पुलकित हो उठता है। प्रेम किसी भी रिश्ते का केन्द्रीय तत्व होता है, रिश्ता कोई भी हो। मैंने कई व्यक्तियों को इसी प्रकार की प्रेम की निशानियाँ अपनी अन्तिम साँस तक सम्भाल कर रखे हुए देखा है। कहने को यह स्वेटर केवल सर्दी से बचाने का एक साधन मात्र होते हैं किन्तु इनके बनाने की प्रक्रिया में जो प्रेम अभिव्यक्त होता था उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। उसे तो बस "अन्तर्जानी जानिए, अन्तर्तम का भाव" के रुप में ही समझा जा सकता है। हमारा अविकसित भारत ऐसे ही कितने प्रेम-पगे कार्यों का केन्द्र था किन्तु अब हम विकसित होते जा रहे हैं। विकास की प्रक्रिया में तो ऐसी कितनी ही बातों को छोड़ना पड़ता है और जब हम विकसित हो जाते हैं तब पाते हैं कि हमने विकास के मोहजाल में मूल तत्व ही खो दिया, जिसके बिना सारा विकास खोखला है, वह तत्व है "प्रेम"। हमें सब कुछ गवाँ कर इस बात का अहसास होता है कि हम अविकसित ही अच्छे थे किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है क्योंकि हम पूर्ण विकसित हो चुके होते हैं। अन्त में बस यही भाव हमारे पास रह जाता है-"कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन...।"

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 15 जनवरी 2017

अच्छा स्वयंसेवक कौन..?

"एक अच्छा स्वयंसेवक वह नहीं है, जिनके बिना संघकार्य चल नहीं सकता। एक अच्छा स्वयंसेवक तो वह है जो अपने जैसे अन्य अच्छे स्वयंसेवकों का निर्माण करता है। जिनसे उसके अभाव में भी संघकार्य चलाया जा सकता है। अच्छा स्वयंसेवक वह नहीं है, जिसने स्वयं को ही मुख्य बिन्दु बना लिया है, अपितु वह है जो इस केन्द्र-बिन्दु को विकीर्ण कर सकता है।"
-प.पू. स्व. डा. हेडगेवार
(संस्थापक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ)

रविवार, 8 जनवरी 2017

"ब्राह्मण समाज" में घुसपैठ

अभी-अभी समाचार पत्र देखा। उसमें दो समाचारों पर दृष्टि ठिठक सी गई। एक ओर सर्वब्राह्मण समाज के सम्मेलन की खबर है वहीं दूसरी ओर "गौड़ मालवीय ब्राह्मण समाज" के संगठन की ख़बर है। शनै: शनै: ये सारे विजातीय "ब्राह्मण समाज" में घुसपैठ कर लेंगे और हमारे तथाकथित ब्राह्मण समाज के हितैषीगण बड़े-बड़े फ्लैक्स में अपनी तस्वीर छपवाते रह जाएंगे। मैं हमेशा से इस बात को पुरज़ोर से उठाता रहा हूं कि अभी भी समय है जब इस प्रकार के कुप्रयास का विरोध होना चाहिए एवं इस पर रोक लगनी चाहिए। जिन श्री मदनमोहन मालवीय का नाम लेकर ये विजातीय अपने आप को ब्राह्मण साबित करने में लगे हैं उनके इतिहास के बारे में ये लोग स्वयं ही नहीं जानते कि वे कोई लकड़ी इत्यादि का कार्य करने वाले सुतार या बढ़ई नहीं थे, अपितु ब्राह्मण थे। उनका पूरा नाम पं. मदनमोहन चतुर्वेदी था। उनके पिता पं.  बृजनाथ चतुर्वेदी सुप्रसिद्ध कथावाचक थे। उज्जैन (मालवा प्रान्त) के होने के कारण वे अपने नाम के साथ "मालवीय" जोड़ने लगे थे। मेरा आशय किसी समाज को निम्नतर साबित करना नहीं है मुझे तो आश्चर्य यह है कि ये समाज स्वयं को ब्राह्मणों से निम्न क्यों समझ रहा है जो इस प्रकार के हास्यास्पद कार्य कर रहा है। मेरे देखे सभी समाज समान है एवं सभी का सम्मान है। मात्र सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि से यह विभाजन है शेष सभी समान है। बहरहाल, यदि इन लोगों में इतनी बुद्धिमत्ता होती तो यह जन्म से ब्राह्मण समाज का अंग ना होते। मेरी चिन्ता इन तथाकथित ब्राह्मण हितैषियों से हैं जो ब्राह्मण संगठनों के नाम पर अपना नाम चमकाने में लगे रहते हैं और ब्राह्मण समाज की मुख्य समस्याओं की ओर पीठ करे रहते हैं। कल जब यह विजातीय ब्राह्मण समाज में स्थापित हो जाएंगे तब ये तथाकथित हितैषीगण ठीक वैसे ही शोर मचाएंगे और हाथ-पैर पटकेंगे जैसे कुछ समय पूर्व साईं बाबा की पूजा को लेकर शंकराचार्य ने छाती पीटी थी। ये घोर आश्चर्यजनक है कि किसी गलत परम्परा का विरोध उसके प्रारम्भ में ही क्यों नहीं किया जाता उसके स्थापित होने की राह क्यों देखी जाती है। यदि महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ती का साधन मात्र समझे जाने वाले हमारे संगठन एवं अति-महत्त्वाकांक्षी संगठनकर्ता रहेंगे तो समाज में इन विकृतियों का आना तो स्वाभाविक व अवश्यंभावी है। समाज का भविष्य आप स्वयं सोच सकते हैं।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

संगठनों के माध्यम से अहं तुष्टि का प्रयास निन्दनीय

मित्रों, अक्सर आपने कई संगठनों के बारें सुना होगा, कितने संगठनों में आपमें से कई मित्र रहे भी होंगे। संगठन के नाम पर जो सबसे प्रचलित संगठन है वह है राजनीतिक संगठन। इस संगठन का कार्य यूं तो समाजसेवा बताया जाता है कि किन्तु इसमें विशुद्ध रूप राजनीति और सत्ता का खेल चलता है। अत: इस संगठन के सम्बन्ध में शुचिता व नैतिकता की बात करना व्यर्थ है। किन्तु आजकल कई सामाजिक संगठन भी इसी तर्ज़ पर गठित होने लगे हैं। "सर्वब्राह्मण समाज" एक ऐसा ही नाम है जिसका आधार लेकर ना जाने कितने संगठन कितनी बार गठित हुए और अन्त में विघटित भी हुए कारण सिर्फ़ एक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा व राजनीति। इन दिनों भी ऐसा एक संगठन सक्रिय है जो एक बड़ा सम्मेलन करने भी जा रहा है। अब इसके आयोजकों की बुद्धिमत्ता देखिए वे चले तो हैं सर्वब्राह्मण के नाम पर अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने और दिखावा कर रहे हैं ब्राह्मण समाज के हित व एकजुटता का। वास्तविक रूप में उन्हें वार्ड के ब्राह्मण परिवारों की संख्या तक ज्ञात नहीं है। केवल आयोजनों के नाम पर चन्दा ग्रहण के उद्देश्य से इन्हें ब्राह्मण समाज के हित याद आते हैं शेष समय नहीं। हकीकत यह है कि इस प्रकार के संगठन के नाम पर कुछ अति-महत्वाकांक्षी लोग अपने अहम की क्षुधा पूर्ती करने एवं अपने प्रतिस्पर्धियों को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। एक सफल संगठन का निर्माण उसी प्रकार होता है जिस प्रकार एक वृक्ष का, जिसमें बीज स्वयं को मिटाकर; अंधरों में खोकर वृक्ष, फूल व फल का निर्माण करता है। जब हम एक सुन्दर फूल देखतें है या स्वादिष्ट फल खाते हैं तो उसी की प्रशंसा करते हैं उस बीज को विस्मृत कर देते है; भूल जाते हैं जिसने अपने अस्तित्व को नष्ट कर इनके निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। यदि बीज अपने अस्तित्व को बचाकर अपने अहंकार को तुष्ट करने का प्रयास करता को आज एक भी वृक्ष हमें दिखाई नहीं देता। यही बात सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होती है जब तक उनके संस्थापकगण अपने अहंकार को तुष्ट करने एवं अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ती के लिए संगठनों का निर्माण करते रहेंगे तब तक समाज में संगठनों प्रामाणिकता शून्य रहेगी और वे अल्पकाल के उपरान्त ही विखण्डित होकर समय की धारा से विलोपित हो जाएंगे। मैं इस प्रकार संगठनों के माध्यम से व्यक्तिगत अहं तुष्टि के प्रयासों की घोर निन्दा व भर्त्सना करता हूं।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया