सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए...


जलाओ दीये पर ध्यान रहे इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नई ज्योति के धर नए पँख झिलमिल,
उड़े मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए; निशा आ न पाए,
जलाओ दीये.......

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं तब तक पूर्ण बनेगी,
कि जब तक लहू के लिये भूमि प्यासी,
चलेगा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज़ आए,
जलाओ दीये.....

मगर दीप की दीप्ति से जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधेरे घिरे अब,
स्वयँ धर मनुज दीप का रूप आए,
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना,
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

- गोपालदास "नीरज"

तुमको दीप जलाना होगा

चहुँओर अँधियारा है
दिनकर भी थक हारा है
लेकिन मेरी देहरी पर
उजियारे को लाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा...

तन्हाई का डेरा है
दु:ख ने किया बसेरा है
इस भीषण दावानल में
अपना हाथ बढ़ाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा...

बहुत दूर किनारा है
प्रतिकूल नदी की धारा है
भँवर में फँसी नैया की
अब पतवार चलाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा....

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया




हमारा सौरमण्डल


चन्द्रमा -
1. चन्द्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है। चन्द्रमा हमारे सौरमण्डल का पाँचवा सबसे बड़ा उपग्रह है।
2. चन्द्रमा की अपनी कोई रोशनी नहीं है बल्कि यह सूर्य से पड़ने वाली रोशनी के कारण चमकता है।
3. चन्द्रमा पृथ्वी से 4 गुना छोटा है।
4. चन्द्रमा का गुरूत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में काफ़ी कम है।
5. खगोलशास्त्रियों के अनुसार चन्द्रमा पृथ्वी का ही एक हिस्सा है जो करोड़ों वर्षों पर पूर्व एक
    उल्का पिण्ड के पृथ्वी  से टकराने के कारण टूट कर अलग हो गया था।
6. पृथ्वी पर जिस वस्तु का वज़न 10 किग्रा है चन्द्रमा पर उसका वज़न मात्र 1.5 किग्रा होगा।
7. पृथ्वी से चन्द्रमा का केवल एक हिस्सा ही दिखाई देता है। दूसरा हिस्सा पृथ्वी से कभी नहीं दिखेगा।
8. पृथ्वी से चन्द्रमा का केवल 59 फ़ीसदी हिस्सा ही दिखाई देता है। चन्द्रमा का 41 फ़ीसदी हिस्सा केवल अंतरिक्ष में जाकर ही देखा जा सकता है।
9. चन्द्रमा पृथ्वी का एक चक्कर लगाने में 27 दिन 7 घण्टे का समय लगाता है एवं ठीक इतने ही समय में वह अपनी धुरी पर एक बार घूम जाता है।

मंगल ग्रह-
1. यह आकार में पृथ्वी से 10 गुना छोटा है।
2. सूर्य से इसकी दूरी 22 करोड़ 79 लाख किमी है।
3. मंगल ग्रह पर एक साल 687 दिन का होता है।
4. यह ठोस ग्रह है।
5. इसके दो चन्द्रमा हैं।
6. मंगल ग्रह का सबसे बड़ा पर्वत ओलम्पस माउण्ट हमारे एवरेस्ट पर्वत से 3 गुना बड़ा है।
7. यदि आपका वज़न 100 किलो है तो मंगल पर आपका वज़न सिर्फ़ 37 किलो होगा क्योंकि मंगल पर गुरुत्वाकर्षण बल बेहद कम है।

बुध ग्रह-
1. इसकी सूर्य से दूरी 5.5 करोड़ किमी है।
2. यह सूर्य की परिक्रमा 1.5 दिन में पूरी कर लेता है।
3. यह सौरमण्डल का सबसे छोटा ग्रह है।

गुरू ग्रह-
1. हमारी पृथ्वी से 1300 गुना बड़ा है।
2. सूर्य से इसकी दूरी 78 करोड़ किलोमीटर है।
3. यह अपनी धुरी पर घूमने वाला सबसे तेज ग्रह है। यह 9 घण्टे 55 मिनिट में अपनी धुरी का 1 चक्कर लगा लेता है।
4. यह गैसीय ग्रह है।
5. इस ग्रह का एक चन्द्रमा है।

शुक्र ग्रह-
1. यह आकार में पृथ्वी से आँशिक छोटा है।
2. सूर्य से इसकी दूरी 11 करोड़ किलोमीटर है।
3. यह सौरमण्डल के नर्क के समान है क्योंकि यहाँ  सल्फ़्यूरिक एसिड के बादल हैं जिनसे तेजाब की बारिश होती रहती है।
4. यह सबसे गर्म ग्रह है। इसका अधिकतम तापमान 400 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है।
5. इस ग्रह का कोई चन्द्रमा नहीं है।
6. यह सौरमण्डल का एकमात्र ऐसा ग्रह है जहाँ सूर्य पश्चिम से निकलकर पूर्व में अस्त होता है।
7. शुक्र ग्रह का एक साल 224 दिनों का होता है।
8. जब यह पृथ्वी के सर्वाधिक निकट होता है तब पृथ्वी से इसकी दूरी 26करोड़ किमी होती है और जब यह पृथ्वी से सर्वाधिक दूर होता है तब पृथ्वी से इसकी दूरी 160 करोड़ किमी होती है।

शनि ग्रह-
1. हमारी पृथ्वी से 700 गुना बड़ा है।
2. सूर्य से इसकी 142 करोड़ किलोमीटर है।
3. शनि ग्रह पर 1800 किमी. प्रतिघण्टे की रफ़्तार से हवाएँ चलती हैं।
4. शनि ग्रह के 62 उपग्रह हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

अन्धभक्ति नहीं होनी चाहिए


इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो और तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें विजयादशमी की पूजा वाले दिन हमारे प्रधानसेवक मोदी जी को टिश्यू पेपर को अपने जेब में रखते हुए दिखाया जा रहा है। मोदी भक्त इसे उनकी महानता का प्रतीक बताकर सोशल मीडिया पर खूब साझा कर रहे हैं। सही भी है करना भी चाहिए; महानता भी है जो स्वच्छता का इतना ख्याल रखा गया लेकिन इसी कार्यक्रम इन्हीं प्रधानसेवक ने जूते पहनकर जब राम-लक्ष्मण व हनुमान बने पात्रों की पूजा व आरती की उसे क्या कहिएगा? केवल प्रधानसेवक मोदी ने ही नहीं अपितु राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सहित सभी अतिथियों ने जूते पहनकर ही राम-लक्ष्मण व हनुमान बने पात्रों की पूजा अर्चना की थी। मेरा इस बात को इस मंच पर रखने का आशय बस इतना ही है भक्ति अपनी जगह ठीक है लेकिन अन्धभक्ति नहीं होनी चाहिए, जो इन दिनों कुछ लोग प्रधानसेवक की करने में लगे हुए हैं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 30 सितंबर 2017

विसर्जन का महत्त्व



आज देवी-विसर्जन के साथ ही नौ दिनों से चले आ रहे शारदीय नवरात्र समाप्त जाएँगे। हमारी सनातन परम्परा में विसर्जन का विशेष महत्त्व है। विसर्जन अर्थात् पूर्णता, फ़िर चाहे वह जीवन की हो, साधना की हो या प्रकृति की। जिस दिन कोई वस्तु पूर्ण हो जाती है उसका विसर्जन अवश्यंभावी हो जाता है। आध्यात्मिक जगत् में विसर्जन समाप्ति की निशानी नहीं अपितु पूर्णता का सँकेत है। देवी-विसर्जन के पीछे भी यही गूढ़ उद्देश्य निहित है। हम शारदीय नवरात्र के प्रारम्भ होते ही देवी की प्रतिमा बनाते हैं, उसे वस्त्र-अलँकारों से सजाते हैं। नौ दिन तक उसी प्रतिमा की पूर्ण श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना करते हैं और फ़िर एक दिन उसी प्रतिमा को जल में विसर्जित कर देते हैं। विसर्जन का यह साहस केवल हमारे सनातन धर्म में ही दिखाई देता है क्योंकि सनातन धर्म इस तथ्य से परिचित है कि आकार तो केवल प्रारम्भ है और पूर्णता सदैव निराकार होती है। यहाँ निराकार से आशय आकारविहीन होना नहीं अपितु सम्रगरूपेण आकार का होना है। निराकार अर्थात् जगत के सारे आकार उसी परामात्मा के हैं। मेरे देखे निराकार से आशय है किसी एक आकार पर अटके बिना समग्ररूपेण आकारों की प्रतीती। जब साधना की पूर्णता होती है तब साधक आकार-कर्मकाण्ड इत्यादि से परे हो जाता है। तभी तो बुद्धपुरूषों ने कहा है "छाप तिलक सब छीनी तोसे नैना मिलाय के...।" नवरात्र के यह नौ दिन इसी बात की ओर सँकेत हैं कि हमें अपनी साधना में किसी एक आकार पर रूकना या अटकना नहीं है अपितु साधना की पूर्णता करते हुए हमारे आराध्य आकार को भी विसर्जित कर निराकार की उपलब्धि करना है। जब इस प्रकार निराकार की प्राप्ति साधक कर लेता है तब उसे सृष्टि के प्रत्येक आकार में उसी एक के दर्शन होते हैं जिसे आप चाहे तो परमात्मा कहें या फ़िर कोई और नाम दें, नामों से उसके होने में कोई फ़र्क नहीं पड़ता। साधना की ऐसी स्थिति में उपनिषद् का यह सूत्र अनुभूत होने लगता है-"सर्व खल्विदं ब्रह्म" और यही परमात्मा का एकमात्र सत्य है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

मन रूपी रावण का दहन हो


आज विजयादशमी है। असत्य पर सत्य की; बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व। विजयादशमी के ही दिन मर्यादा पुरूषोत्तम् भगवान राम ने रावण का वध किया था। इसी दिन को स्मरण करने लिए प्रतिवर्ष हम विजयादशमी का उत्सव मनाते हैं जिसमें रावण के पुतले का दहन किया जाता है। रावण के पुतले के दहन के साथ हम यह कल्पना करते हैं कि आज सत्य की असत्य पर जीत हो गई और अच्छाई ने बुराई को समाप्त कर दिया। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो पाता है! सनातन धर्म की यह परम्पराएँ केवल आँख मूँद कर इनकी पुनुरुक्ति करने के लिए नहीं हैं। बल्कि यह परम्पराएँ तो हमें इनके पीछे छिपे गूढ़ उद्देश्यों को स्मरण रखने एवं उनका अनुपालन करने के लिए बनाई गई हैं। आज हम ऐसी अनेक सनातनधर्मी परम्पराओं का पालन तो करते हैं किन्तु उनके पीछे छिपी देशना एवं शिक्षा को विस्मृत कर देते हैं। हमारे द्वारा इन सनातनी परम्पराओं का अनुपालन बिल्कुल यन्त्रवत् होता है। विजयादशमी भी ऐसी एक परम्परा है। जिसमें रावण का पुतला दहन किया जाता है। रावण प्रतीक है अहँकार का; रावण प्रतीक है अनैतिकता का; रावण प्रतीक है सामर्थ्य के दुरुपयोग का एवं इन सबसे कहीं अधिक रावण प्रतीक है- ईश्वर से विमुख होने का।  रावण के दस सिर प्रतीक हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि अवगुणों के। रावण इन सारे अवगुणों के मिश्रित स्वरूप का नाम है। रावण के बारे में कहा जाता है कि वह प्रकाण्ड विद्वान था। किन्तु उसकी यह विद्वत्ता भी उसके स्वयं के अन्दर स्थित अवगुण रूपी रावण का वध नहीं कर पाई। तब वह ईश्वर अर्थात् प्रभु श्रीराम के सम्मुख आया। मानसकार ने ईश्वर के बारे में कहा है-"सन्मुख होय जीव मोहि जबहिं। जनम कोटि अघ नासहिं तबहिं॥ इसका आशय है जब जीव मेरे अर्थात् ईश्वर के सम्मुख हो जाता है तब मैं उसके जन्मों-जन्मों के पापों का नाश कर देता हूँ। हम मनुष्यों में और रावण में बहुत अधिक समानता है। यह बात स्वीकारने में असहज लगती है, किन्तु है यह पूर्ण सत्य। हमारी इस पञ्चमहाभूतों से निर्मित देह में मन रूपी रावण विराजमान है। इस मन रूपी रावण के काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, वासना,भ्रष्टाचार, अनैतिकता इत्यादि दस सिर हैं। यह मन रूपी रावण भी ईश्वर से विमुख है। जब इस मन रूपी रावण का एक सिर कटता है तो तत्काल उसके स्थान पर दूसरा सिर निर्मित हो जाता है। ठीक इसी प्रकार हमारी भी एक वासना समाप्त होते ही तत्क्षण दूसरी वासना तैयार हो जाती है। हमारे मन रूपी रावण के वध हेतु हमें भी राम अर्थात् ईश्वर की शरण में जाना ही होगा। जब हम ईश्वर के सम्मुख होंगे तभी हमारे इस मनरूपी रूपी रावण का वध होगा। विजयादशमी हमें इसी सँकल्प के स्मरण कराने का दिन है। आईए हम प्रार्थना करें कि प्रभु श्रीराम हमारे मन स्थित रावण का वध कर हमें अपने श्रीचरणों में स्थान दें। जिस दिन यह होगा उसी दिन हमारे लिए विजयादशमी का पर्व सार्थक होगा।
 
-ज्योतिर्विदपं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

दुर्गा महोत्सव 2017-


बुधवार, 27 सितंबर 2017

सुरक्षा श्रेणी



1.    SPG :  Special Protection Group Gaurds.


2.      Z+ :  Security cover of 55 Personal.
                 Including [10+ Commando]
                 +[ Police  Personnel ]

3.     Z   :  Security cover of 22 Personal.
                Including [4 or 5 NSG Commando]
                +[ Police  Personnel ]

4.    Y :   Security cover of 11 Personal.
               Including [1 or 2 Commando]
              +[ Police  Personnel ]


5.    X  :  Security cover of 5 or 2 Personal.
              [ NO Commando ]
              [Only Armed Police Personnel ]    


(source: wikipedia)   

रविवार, 24 सितंबर 2017

काम उर्जा का उर्ध्वगमन हो, दमन नहीं


विगत कुछ वर्षों से जितने भी फ़र्जी बाबा सलाखों के पीछे गए हैं उनमें से अधिकाँश पर यौन शोषण के आरोप हैं। धर्म-जगत् से जुड़े व्यक्तियों पर यौन शोषण व बलात्कार जैसे आरोप यह सिद्ध करते हैं कि हमने ब्रह्मचर्य की गलत परिभाषा गढ़ रखी है। हमारे सनातन धर्म में ब्रह्मचर्य से आशय काम-शक्ति के उर्ध्वगमन से है, ना कि काम-शक्ति के दमन से। ब्रह्मचर्य की व्याख्या करते समय अधिकाँश तथाकथित धर्मोपदेशक काम उर्जा के दमन की सीख देते नज़र आते हैं। हमें यह समझना होगा कि काम एक उर्जा है जिसका किसी भी परिस्थिति में दमन नहीं किया जा सकता। इस उर्जा के सदुपयोग का एकमात्र उपाय इसका सम्यक् रूपान्तरण ही है। काम उर्जा का केवल उर्ध्वगमन ही किया जा सकता है अन्यथा उसका बहिर्गमन सुनिश्चित है, जो स्वाभाविक है। किन्तु जब हम इस उर्जा के स्वाभाविक बहिर्गमन को रोक कर इसका दमन करते हैं तब यह उर्जा विकृत होती है और एक दिन इस दमित उर्जा का विस्फ़ोट हो जाता है। काम उर्जा का यह विस्फ़ोट सामाजिक अराजकता का मुख्य कारण है। वर्तमान समय में यौन अपराधों में वृद्धि हुई है। इसके पीछे वैसे तो कई कारण है लेकिन सबसे अहम् कारण यौन शिक्षा का अभाव एवं काम उर्जा का दमन है। इसका यह आशय कतई नहीं है कि हम अमर्यादित काम उर्जा के निर्गमन को मान्यता दें, नहीं; कदापि नहीं। वर्तमान समय में तो काम उर्जा के रूपान्तरण एवं उर्ध्वगमन की महती आवश्यकता है क्योंकि आज आध्यात्मिक जगत् भी इस दमित काम उर्जा के विस्फोट के दुष्प्रभावों से अछूता नहीं रहा है। इसका प्रत्यक्ष असर हमारे सनातन धर्म पर पड़ रहा है। आज कुछ अपराधियों के कारण समूचे सन्त समाज व साधकों को सन्देह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। धर्म-जगत् से सम्बन्धित कुछ व्यक्तियों के आपराधिक प्रवृत्तियों में लिप्त होने के कारण आज धार्मिक परम्पराओं व मान्यताओं में श्रद्धा एवं विश्वास कम हो रहा है। यदि समय रहते धर्म-जगत् का यह प्रदूषण समाप्त नहीं किया गया तो भविष्य में इसके दुष्प्रभावों को रोकना असम्भव हो जाएगा। आज आवश्यकता है ऐसे सन्तों की जो एक देशना की भान्ति समाज के सामने स्वयं को प्रस्तुत कर सकें। जिनका समूचा जीवन ही एक उपदेश हो। जो ध्यान-धारणा-समाधि से सुपरिचित हों और अपने अनुयायियों व साधकों को भी इन साधनाओं में अग्रसर करने में सक्षम हों। वर्तमान समय में जब सूचना-क्रान्ति के चलते मोबाईल एवं इंटरनेट जैसे साधनों से सभी प्रकार की बातें सहज सुलभ हैं, ध्यान एवं भक्ति ही वे दो मार्ग हैं जिनसे अमर्यादित कामोपभोग जैसी दुष्प्रवृत्तियों से बचा जा सकता है। ध्यान और भक्ति के आधार पर ही हम इस प्रकृति-प्रदत्त काम उर्जा का सम्यक् उपयोग करने में सफल हो सकते हैं। अत: काम उर्जा का दमन नहीं वरन् उर्ध्वगमन करने का प्रयास करें।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
 
"किल्पर टाइम्स" रायपुर (छग) में प्रकाशित हमारा लेख


शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

अप्प दीपो भव:




लोग खुश हैं कि एक फ़र्जी बाबा सलाखों के पीछे पहुँच गया। लेकिन जब तक हम धर्म के नाम पर रुढ़ और अन्धभक्त बने रहेंगे तब ऐसे बाबा पैदा होते रहेंगे। दरअसल, हम धर्म और शास्त्रों के नाम पर इतने भीरू होते हैं कि हमें इनका नाम लेकर कोई भी बरगला सकता है। शास्त्र कभी धार्मिक व्यक्ति की कसौटी नहीं हो सकते। धार्मिक व्यक्ति की कसौटी उसकी ध्यानस्थ अवस्था में हुई अनुभूति एवं उसका विवेक होता है। शास्त्र जब तक इन कसौटियों पर खरा उतरता है; ठीक है, अन्यथा वास्तविक धार्मिक व्यक्ति शास्त्र को इनकार करने का भी सामर्थ्य रखता है। अतीत में ऐसे अनेक बुद्धपुरूष हुए हैं जिन्होंने उस समय के शास्त्रों को इनकार कर दिया जैसे बुद्ध, कबीर, सहजो, दादूदयाल, मीरा, रज्जब, पलटूदास, रैदास आदि। इस बात को सदैव स्मरण रखें कि आपके और परमात्मा के बीच किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं है। फ़िर आप कहेंगे कि गुरू का क्या महत्त्व? मेरे देखे गुरू का महत्त्व बस इतना ही है कि वह आपको यह समझा दे कि आपके और आपके परमात्मा के बीच किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं, स्वयं उसकी भी नहीं। वास्तविक गुरू अपने शिष्य को हर अटकाव; हर बाधा से मुक्त करता है जो उसे परमात्मा तक पहुँचने में आती है। इसीलिए बुद्ध कहते हैं- "अप्प दीपो भव:।" जब ऐसे गुरू जीवन में होंगे तभी बुद्धत्व घटित होगा अन्यथा बुद्धू तो लोग बन ही रहे हैं, धर्म के नाम पर।

-ज्योतिर्विदपं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 17 सितंबर 2017

एम्बुलेंस दादा : करीमुल-हक

राष्ट्रपति से पद्म श्री प्राप्त करते हुए करीमुल-हक
एम्बुलेंस दादा..! जी हाँ यही पहचान उत्तर-भारत के चाय बागान में काम करने वाले करीमुल-हक की। जिन्हें स्थानीय क्षेत्र के लोग एम्बुलेंस दादा के रूप में पहचानते हैं। करीमुल-हक अपनी मोटरसाईकिल रूपी एम्बुलेंस से बीमार लोगों को अस्पताल पहुँचाते हैं। वर्ष 1993 में अपनी बीमार माँ को अस्पताल पहुँचाने के लिए उन्हें एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं हुई और समय पर चिकित्सा सुविधा ना मिलने के कारण उनकी माँ ने घर पर ही दम तोड़ दिया। इस हादसे ने करीमुल-हक तो बेहद दु:खी किया। वे अन्दर ही अन्दर घुटन महसूस करने लगे। तभी एक दिन उनके साथ चाय बागान में काम करने वाले उनके सहयोगी को चोट लगी और उन्हें अस्पताल ले जानी की आवश्यकता महसूस हुई लेकिन एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं हुई। तभी करीमुल-हक ने अपने सहयोगी को उठाकर मोटरसाईकिल पर बिठाया और उसे अपनी पीठ से बाँधकर अस्पताल पहुँचा दिया। उसी दिन से करीमुल-हक ने यह ठान लिया कि वे मोटरसाईकिल को ही एम्बुलेंस के तौर पर इस्तेमाल करेंगे। इसके लिए उन्होंने कर्ज़ लेकर एक मोटरसाईकिल खरीदी। करीमुल-हक आसपास के लगभग बीस गाँवों में अपनी नि:शुल्क बाईक-एम्बुलेंस सुविधा प्रदान करते हैं। करीमुल-हक जहाँ रहते हैं उस जगह से निकटतम अस्पताल लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित है। करीमुल-हक अब तक लगभग 5000 से अधिक ज़रूरतमन्द लोगों को अपनी बाईक-एम्बुलेंस से अस्पताल पहुँचा चुके हैं। उनकी इस समाजसेवा के लिए उन्हें कई सम्मान व पुरूस्कारों के साथ-साथ भारत सरकार द्वारा "पद्म श्री" से भी सम्मानित किया जा चुका है।
एम्बुलेंस दादा की बाईक-एम्बुलेंस




बुधवार, 6 सितंबर 2017

पहाड़-पुरूष

         "माउण्टेनमेन" दशरथ माँझी
 हौंसला यदि बुलन्द हो तो पहाड़ भी आपका रास्ता नहीं रोक सकता। इस बात को चरितार्थ करने वाले पहाड़-पुरूष अर्थात् "माउण्टेनमेन" का नाम है- दशरथ माँझी। दशरथ माँझी का जन्म सन 1934 में हुआ। बचपन में ही वे घर से भाग कर धनबाद की कोयला खदानों में काम करने लगे। शादीयोग्य आयु हो जाने पर उनका विवाह फगुनी देवी से हुआ। एक दिन पहाड़ से फ़िसलने के कारण उनकी उनकी पत्नी गँभीर रूप से घायल हो गईं। इलाज के लिए शहर जाना अपेक्षित था किन्तु पहाड़ के कारण शहर का मार्ग अत्यधिक लम्बा था। इसी के चलते समय पर चिकित्सा ना मिल पाने के कारण दशरथ माँझी की पत्नी फगुनी का निधन हो गया। अपनी पत्नी की इस प्रकार हुई मृत्यु ने दशरथ माँझी को विचलित कर दिया। उन्होंने अपने गाँव और शहर के मध्य खड़े विशालकाय पहाड़ को काटकर रास्ता बनाने की ठान ली जिससे गाँव के लोगों को किसी भी आपात स्थिति में शहर पहुँचने में देर ना हो। उन्होंने अकेले ही छैनी-हथौड़े से पहाड़ को काटना शुरू कर दिया। प्रारम्भ में गाँववालों ने उनके इस दुष्कर कार्य का मज़ाक उड़ाया लेकिन माँझी के दृढ़ सँकल्प के आगे वे मौन हो गए। अन्तत: 22 (1960-1983) वर्षों की अनवरत कठोर साधना के पश्चात दशरथ माँझी ने गहलौर गाँव के समीप स्थित पहाड़ को काटकर 110 मीटर लम्बे और लगभग 9 मीटर चौड़े मार्ग का निर्माण कर दिया। उनके इस प्रयास से गया जिले के अतरी और वजीरगंज क्षेत्रों के बीच की दूरी लगभग 40 कि.मी तक कम हो गई। उनकी इस उपलब्धि के उन्हें आज "माउण्टेनमेन" के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2006 में बिहार से सरकार ने उनका नाम पद्मश्री पुरुस्कार के लिए प्रस्तावित किया। 26 दिसम्बर 2016  को "बिहार की हस्तियाँ नामक श्रृँखला में इंडिया पोस्ट द्वारा उनके नाम पर एक डाक टिकट जारी किया गया। कैंसर की बीमारी के कारण 17 अगस्त 2007 को 73 वर्ष की आयु में "माउण्टेनमेन" श्री दशरथ माँझी का निधन हो गया।

दशरथ माँझी द्वारा निर्मित मार्ग

                                



शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

एक सेनानी का संघर्ष

श्री गौर हरिदास जी अपनी धर्मपत्नि के साथ
न्याय व सम्मान यदि उचित समय पर ना मिलें तो वे अपना मूल्य खो देते हैं। आज हमारे देश में ऐसे हज़ारों उदाहरण मौजूद हैं जिनमें देरी से मिले न्याय व सम्मान ने अपना मूल्य खो दिया। अपनी गौरवपूर्ण पहचान व सम्मान को प्राप्त करने के लिए किए ऐसे ही एक सँघर्ष का नाम है- स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी श्री गौर हरिदास। जिन्हें स्वयं को स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी साबित करने में तीस वर्ष से भी अधिक का समय लगा। श्री गौर हरिदास जी ने स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण पत्र के लिए सन् 1976 में आवेदन दिया था जो उन्हें हमारे आजाद देश की लचर व्यवस्थाओं के चलते 33 वर्षों बाद सन् 2009 में प्राप्त हुआ। 85 वर्षीय श्री गौर हरिदास पाँच वर्षों तक स्वतन्त्रता आन्दोलन का हिस्सा रहे थे। वानर सेना के सदस्य के रूप में वे छिपकर स्वतन्त्रता सँग्राम से सम्बन्धित साहित्य और सन्देशों को लोगों तक पहुँचाने का काम करते थे। सन् 1945 में उन्होंने अंग्रेज़ों के आदेश के ख़िलाफ़ भारत का झण्डा लहराया था जिसके लिए उन्हें दो महीने जेल में बिताने पड़े थे। ओडिशा में पैदा हुए श्री गौर हरिदास तेरह भाई-बहनों में दूसरी सन्तान थे। उनके पिता गाँधीवादी थे और अपने पिता से ही उन्हें स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल होने की प्रेरणा मिली। श्री गौर हरिदास जी ने 'ख़ादी ग्रामोद्योग आयोग' में लम्बे समय तक कार्य किया। श्री गौर हरिदास जी का सँघर्ष तब शुरू हुआ जब उन्हें अपने पुत्र को एक सँस्थान में प्रवेश दिलाने के लिए स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता महसूस हुई। स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण-पत्र के लिए श्री गौर हरिदास जी ने आवेदन दिया जो उन्हें विभिन्न सरकारी कार्यालयों व मन्त्रालय के चक्कर लगाने के उपरान्त 33 वर्षों बाद प्राप्त हुआ। उनके बेटे को तो अपनी प्रतिभा के आधार पर उस सँस्थान में प्रवेश मिल गया लेकिन श्री गौर हरिदास जी का जीवन अपनी गौरवपूर्ण पहचान पाने के लिए एक लम्बे सँघर्ष में बदल गया। एक ऐसा सँघर्ष जिसमें ना कोई धरना-प्रदर्शन था; ना ही कोई नारा था; यदि था, तो बस श्री गौर हरिदास जी के हाथों में अपनी फ़ाईलों का एक बण्डल जिसे लेकर वह अत्यन्त शान्तिपूर्ण ढँग से एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक वर्षानुवर्ष भटकते रहे। सम्मान से कहीं अधिक यह स्वयं की पहचान की लड़ाई थी। वर्ष 2009 में स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी का प्रमाण-पत्र प्राप्त होने के साथ श्री गौर हरिदास जी के सँघर्ष को तो विराम लग गया लेकिन इस सँघर्ष ने उनसे उनके जीवन के कई अनमोल पल छीन लिए जो उन्हें अब कभी प्राप्त नहीं होंगे।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
  सम्पादक

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है"


सदियों की ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।


जनता? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही
जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली
जब अंग-अंग में लगे साँप हो चूस रहे
तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहनेवाली


जनता? हाँ, लम्बी-बड़ी जीभ की वही कसम
जनता सचमुच ही बड़ी वेदना सहती है
सो ठीक, मगर आख़िर इस पर जनमत क्या है?
है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?


मानो जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं
जब चाहो तभी लो उतार सजा लो दोनों में
अथवा कोई दुधमुँही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में


लेकिन होता भूडोल, बवँडर उठते हैं
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है


हुँकारों से महलों की नींव उखड़ जाती है
साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है
जनता की रोके राह समय में ताव कहाँ?
वह जिधर चाहती काल उधर ही मुड़ता है।


अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अन्धकार
बीता; गवाक्ष अम्बर के दहके जाते हैं
यह और नहीं कोई, जनता के स्वप्न अजेय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं


सबसे विराट जनतन्त्र जगत का आ पहुँचा
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तैयार करो
अभिषेक आज राजा का नहीं, प्रजा का है
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो


आरती के लिए तू किसे ढूँढता है मूरख
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे
देवता मिलेंगे खेतों में खलिहानों में


फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं
धूसरता सोने से शृँगार सजाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

- राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर

 

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर"

 

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

पत्रकारिता या बाज़ार !

आज तीन तलाक पर आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की ख़बर देखने के लिए जब टी.वी. चालू किया तो मन अत्यन्त विषाद से भर गया। ये मीडिया समूह जो देश की हर घटना पर न्यायाधीश की तरह व्यवहार करते और यदा-कदा अपने चैनलों पर नैतिकता की बातें करते हैं क्या सारी नैतिकता अन्य व्यक्तियों के लिए हैं स्वयं उनके लिए नैतिकता का कोई मापदण्ड नहीं है? ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि क्योंकि आज तीन तलाक से जुड़ी खबरें दिखाते वक्त लगभग हर न्यूज़ चैनल केवल एक लाईन बोलकर ब्रेक ले रहा था। क्या यही नैतिकता तकाज़ा है कि जब देशवासी इतनी अहम ख़बर को देखने के लिए अपना बहुमूल्य समय निकालकर न्यूज़ चैनल देख रहे हैं आप सिर्फ़ और सिर्फ़ एक लाईन बोलकर उन्हें लम्बे-लम्बे विज्ञापन दिखाए चले जा रहे हैं। मीडिया समूहों की आर्थिक विवशता मैं समझ सकता हूँ लेकिन उसके लिए पूरा दिन पड़ा है, कभी-कभी तो देशभक्ति व राष्ट्रवाद का पाठ दूसरों को पढ़ाने के स्थान पर स्वयं भी पढ़ लिया करें। आज के दौर में दूरदर्शन को छोड़कर एक भी ऐसा न्यूज़ चैनल नहीं है जो ज़रा करीने से ख़बरें प्रसारित करता हो। पत्रकारिता का तमाशा बनाकर रख दिया है, और कैमरे के सामने तेवर देखिए; माईक आडी हाथ में लेते ही बन बैठे निर्णायक, ना प्रश्न पूछने का सलीका, ना बहस-मुबाहिसे की तमीज़। आम आदमी करे भी तो क्या करे वह भी तो इसी मीडिया से आकर्षित है, लेकिन कभी-कभी बड़ी कोफ़्त होती है इस प्रकार की पत्रकारिता से। यदि कुछ पत्रकारों व चैनलों को छोड़ दिया जाए तो यह पत्रकारिता के पतन का दौर है। मैं इस प्रकार की पत्रकारिता की निन्दा व भर्त्सना करता हूँ। यही कर सकता हूँ  और क्या....टी.वी. बन्द कर सकता था सो कर दिया और बैठ गया सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

मैकाले इस देश की आजादी का पिता है- ओशो

- स्वतन्त्रता दिवस पर विशेष प्रस्तुति-

इस देश में में क्रांति न होती अगर मैकाले न हुआ होता। लोग कहते हैं कि मैकाले ने इस देश को गुलाम बनाया और मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि मैकाले ही इस देश की आजादी का पिता है। अगर अंग्रेजों ने कोशिश न की होती शिक्षा देने की इस देश के लोगों को,यहां कभी क्रांति न होती । क्योंकि क्रांति आई शिक्षित लोगों से, अशिक्षित लोगों से नहीं, पंडित-पुरोहितों से नहीं, वेद के, उपनिषदों के ज्ञाताओं से नहीं–जो लोग पश्चिम से शिक्षा लेकर लौटे, जो वहां का थोड़ा रस लेकर लौटे। सुभाष ने लिखा है कि जब मैं पहली दफा यूरोप पहुंचा और एक अंग्रेज चमार ने मेरे जूतों पर पालिश किया तो मेरे आनंद का ठिकाना न रहा। अब जिसने अपने जूतों पर अंग्रेज को पालिश करते देखा हो, वह वापिस आकर इस देश में अंग्रेज के जूतों पर पालिश करे, यह संभव नहीं। अब मुश्किल खड़ी हुई। मैकाले इस देश की आजादी का पिता है। उसी ने उपद्रव खड़ा करवाया। अगर मैकाले इस देश के लोगों को अंग्रेजी शिक्षा न देता,पढ़ने देता उन्हें संस्कृत मजे से और पाठशालाओं में रटने देता उनको गायत्री,कोई हर्जा होने वाला नहीं था। वे अपना जनेऊ लटकाये, अपनी घंटियां बजाते हुए शांति से अपने भजन-कीर्तन में लगे रहते। उसने लोगों को पश्चिम में जो स्वतंत्रता फली है उसका स्वाद दिलवा दिया। एक दफा स्वाद मिल गया, फिर अड़चन हो गई। अभी तुम देखते हो, ईरान में क्या हो रहा है? ईरान के सम्राट को जो परेशानी झेलनी पड़ रही है वह उसके खुद ही के कारण। ईरान अकेला मुसलमान देश है जहां शिक्षा का ठीक से व्यापक विस्तार हुआ है और ईरान के शहंशाह ने शिक्षा पर बड़ा जोर दिया। ईरान समृद्ध है, शिक्षित है–सारे मुसलमान देशों में! और यही नुकसान की बात हो गई। अब वे ही शिक्षित लोग और समृद्ध लोग अब चुप नहीं रहना चाहते; अब वे कहते हैं, हमें हक भी दो, अब हमें प्रजातंत्र चाहिए; अब हम राज्य करें, इसका भी हमें मौका दो। और कोई मुसलमान देश में उपद्रव नहीं हो रहा है, क्योंकि लोग इतने गरीब हैं, इतने अशिक्षित हैं, मान ही नहीं सकते, सोच ही नहीं सकते कि हमें और राज्य की सत्ता मिल सकेगी, असंभव! असंभव को कौन चाहता है? जब संभव दिखाई पड़ने लगती है कोई बात, जब हाथ के करीब दिखाई पड़ने लगती है कि थोड़ी मेहनत करूं तो मिल सकती है, तब उपद्रव शुरू होता है। इस देश में शूद्र हजारों साल से परेशान हैं, कोई बगावत नहीं उठी। उठ नहीं सकती थी। अंबेदकर जैसे व्यक्ति में बगावत उठी, क्योंकि शिक्षा का मौका अंग्रेजों से मिला।

- आचार्य रजनीश "ओशो"

सोमवार, 14 अगस्त 2017

आजादी की ख़बर



व्रत या अनशन

जन्माष्टमी कब मनाई जाए इसे लेकर पण्डितों में शीत युद्ध जारी है। विद्वत्तजन धर्मग्रन्थों को खँगाल-खँगालकर अपने-अपने मतों के समर्थन में प्रमाण जुटा रहे हैं। सभी व्रतों के नियम और तिथियों के निर्धारण में ग्रन्थों के माध्यम से प्रमाण स्वरूप अत्यंत क्लिष्ट सँस्कृत के श्लोक इत्यादि प्रस्तुत कर रहे हैं। ठीक भी है, अधिकांश कर्मकाण्डी विद्वानों से और कोई आशा की भी नहीं जा सकती क्योंकि रट्टू तोते की तरह धर्मग्रन्थों को रटना और रटते-रटते बिना समझे अर्थ का अनर्थ करना उनकी आदत है। शास्त्र कभी धार्मिक व्यक्ति की कसौटी नहीं हो सकते। धार्मिक व्यक्ति की कसौटी उसकी ध्यानस्थ अवस्था में हुई अनुभूति एवं उसका विवेक होता है। शास्त्र जब तक इन कसौटियों पर खरा उतरता है; ठीक है, अन्यथा वास्तविक धार्मिक व्यक्ति शास्त्र को इनकार करने का भी सामर्थ्य रखता है। अतीत में ऐसे अनेक बुद्धपुरूष हुए हैं जिन्होंने उस समय के शास्त्रों को इनकार कर दिया जैसे बुद्ध, कबीर, सहजो, दादूदयाल, मीरा, रज्जब, पलटूदास, रैदास आदि। जन्माष्टमी व्रत के सम्बन्ध में ये तथाकथित विद्वान बार-बार व्रत के नियम इत्यादि बता रहे हैं लेकिन क्या यह जानते भी हैं कि व्रत कहते किसे हैं? मेरा इन सभी महानुभावों से कहना है कि केवल भूखे रहने और अन्न ना खाने को व्रत नहीं कहते, यह तो अनशन हुआ। व्रत तो उसे कहते हैं कि जब आप परमात्मा के प्रेम में इस भाँति निमग्न हों कि आपको खाने-पीने की सुध ही भूल जाए, सच्चे अर्थों में व्रत यही है। अब इस प्रकार के प्रेमासिक्त व्रत में तिथि कहाँ बाधक है? भला प्रेम करने के लिए भी कोई नियम या रीति होती है? बाबा पलटूदास कहते हैं- "लगन मुहूरत झूठ सब, और बिगाड़े काम। पलटू शुभ-दिन; शुभ-घड़ी याद पड़ै जब नाम॥" इस प्रकार का हार्दिक व्रत किसी भी दिन किया जाए सफ़ल होता है। वहीं बलात् व दमनपूर्वक भूखा रहने के लिए खूब मुहूर्त्त इत्यादि साध भी लिया जाए तो व्यर्थ है। अत: मेरा सभी देशवासियों से विनम्र निवेदन है कि वे परमात्म प्रीति का भाव साधैं, मुहूर्त्त इत्यादि के फ़ेर में ना उलझें। मुहूर्त्त सधे तो ठीक, ना सधे तो भी ठीक। एक शायर ने क्या खूब कहा है-" सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर। जिस दिन सोए देर तक, भूखा रहे फ़कीर॥
आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
राधे-राधे
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

रविवार, 13 अगस्त 2017

आजाद भारत की प्रथम मुद्रा

एक लाख का नोट-1
एक लाख का नोट-2
एक हजार का नोट
सौ रु. का नोट-1
सौ रु. का नोट-2
दस रु. का नोट
पाँच रु. का नोट

आजादी का सच

क्या आप जानते हैं भारत को स्वतन्त्रता कब प्राप्त हुई? आप कहेंगे- "हाँ", 15 अगस्त 1947 को। यदि मैं कहूँ कि आपका जवाब गलत है, तो आप चौंक जाएँगे। लेकिन इतिहास बताता है भारत की आजादी का शँखनाद 30 दिसम्बर सन 1943 को अण्डमान-निकोबार से हो गया था। 30 दिसम्बर सन 1943 के ही दिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान में सर्वप्रथम आजादी की घोषणा करते हुए तिरंगा फ़हराया था। यह भारत की आज़ादी का शँखनाद था। विडम्बना है कि काँग्रेसी शासन ने विद्वेषता के चलते इस अति-महत्त्वपूर्ण तथ्य को नज़रअंदाज़ किया।
विश्व  ज्ञानकोश भी इस बात की पुष्टि करता है-
"21 अक्टूबर 1943 को सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया।"

-(साभार: विश्व ज्ञानकोश)

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

पानसिंह तोमर: एथलीट या डकैत

जब भी  फ़िल्म "पानसिंह तोमर" देखता हूं तो मुझे बड़ी पीड़ा होती है। आखिर कैसे हमारी भ्रष्ट व्यवस्था ने एक अन्तर्राष्ट्रीय एथलीट को डकैत बना दिया। आप भी जानिए कहानी "पानसिंह तोमर" की-
- पानसिंह तोमर वर्ष 1949 फ़ौज में भर्ती हुए।
- पानसिंह तोमर वर्ष 1958 में स्टीपल चेज़ (बाधा दौड़) के नम्बर 1 खिलाड़ी बनें।
- पानसिंह तोमर 7 वर्षों तक लगातार नेशनल चैम्पियन रहे।
- पानसिंह तोमर ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर 30 पदक जीते।
- पानसिंह तोमर ने वर्ष 1979 में फ़ौज से रिटायरमेन्ट लिया।
- पानसिंह तोमर अपनी 1 बीघा जमीन वापस लेने के लिए बागी बने।
- पानसिंह तोमर का एनकाउण्टर 1 अक्टूबर 1981 को पुलिस अधिकारी एम. पी. सिंह चौहान ने किया।
- पानसिंह तोमर को पहली गोली हवलदार त्रिभुवन सिंह की लगी।

इनका कहना है-
* पानसिंह बहुत ही अच्छा और हंसमुख इंसान था मगर हालात के कारण उसे डाकू बनना पड़ा
  (मिल्खा सिंह)
* पानसिंह शराफ़त के पुतले थे- जे.एस. सैनी (पानसिंह के कोच व पूर्व नेशनल कोच)
* पानसिंह तो फ़ौज का आदमी था; अच्छा आदमी था, जमीन वापस दिला देते तो डकैत नहीं बनता।
  (दस्यु  मोहर सिंह गुर्जर)

पानसिंह का परिवार


मुठभेड़ के बाद पानसिंह की आखिरी तस्वीर-
मृतक पानसिंह तोमर

                                           पानसिंह का एनकाउण्टर करने वाले पुलिस अधिकारी-

एम. पी. सिंह चौहान


शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

किसमें कितना है दम



            भारत                      -            चीन

 

1.    सेना (लाख में) -            13       -                 23
2.    हमलावर विमान-       809       -             1,385
3.    लड़ाकू विमान-           679       -             1,230
4.    मालवाहक विमान-      857     -               782
5.     टोड आर्टिलरी-        7,414       -            6,246
6.    मल्टीपल लांच
      राकेट सिस्टम -           292      -           1,770
7.    विमानवाहक-              01       -               01
8.    डिस्ट्रायर-                    10       -              32 
9.     फ्रिगेट-                       14       -               48
10.    पनडुब्बी-                   14      -               68



         भारत                      -           पाकिस्तान

 


1.    सेना (लाख में) -            13       -                6.3
2.    हमलावर विमान-        809      -               394
3.    लड़ाकू विमान-            679       -               301
4.    मालवाहक विमान-     857      -               261
5.     टोड आर्टिलरी-        7,414        -            3,278
6.    मल्टीपल लांच
      राकेट सिस्टम -          292        -              134
7.    विमानवाहक-             01        -                   0
8.    डिस्ट्रायर-                  10        -                   0 
9.     फ्रिगेट-                     14        -                 10
10.    पनडुब्बी-                 14        -                  5


-(इण्डिया टुडे से साभार)           

पाकिस्तान या चीनिस्तान...!



जानिए कहाँ-कहाँ से गुजरेगा "चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा" (CPEC)-
1. रशकई इकोनामिक जोन, एम-1, नौशेरा, खैबर पख़्तूनख्वा
2. चाइना सेज, ढाबेजी, सिन्ध
3. पँजाब-चाइना इकोनामिक जोन, एम-2, शेखपुरा, पँजाब (पाक)
4. भिंबर औद्योगिक परिक्षेत्र, पीओके
5. मोहम्मद मार्बल सिटी, खैबर पख़्तूनख्वा
6. मोक्पोंदास सेज, गिलगित-बल्तिस्तान, पीओके

चीन की पाकिस्तान में प्राथमिक उर्जा परियोजनाएँ -
1. कराची के पोर्ट कासिम में 660 मेगावाट के दो कोयला चालित पावर प्लाँट2. खैबर पख़्तूनख्वा के नारन में 870 मेगावाट का सुकी किनारी पनबिजली केन्द्र
3. पँजाब के साहीवाल में 660 मेगावाट के 2 कोयला चालित पावर प्लाँट
4. सिंध के थार में 330 मेगावाट के 4 कोयला चालित पावर प्लाँट
5. बलूचिस्तान के हब में 1320 मेगावाट का कोयला चालित पावर प्लाँट
6. ग्वादर में 300 मेगावाट की आयातित कोयला आधारित उर्जा परियोजना
7. बहावलपुर में 1000 मेगावाट का कायदे-आज़म सौर पार्क
8. पीओके के करोट में 750 मेगावाट का पनबिजली केन्द्र
9. पीओके में 1,100 मेगावाट की कोहाला पनबिजली परियोजना

चीन-पाकिस्तान के मध्य व्यापार-
- 2015-16 में बढ़कर 13.77 अरब डालर पर पहुँच गया है जो वर्ष 2007 में 4 अरब डालर था।- मास्टर प्लान के अनुसार पाकिस्तान की करीब 65,000 एकड़ भूमि चीन को पट्टे में दी जाएगी जिस पर वह   कृषि परियोजनाओं का सँचालन करेगा। ऐसी 17 परियोजनाएँ सूचीबद्ध हैं।

-(इण्डिया टुडे से साभार)

रविवार, 23 जुलाई 2017

मन्दिरों की अनोखी परम्पराएँ


श्रीजगन्नाथ मन्दिर पुरी (ओड़ीसा)- 
श्रीजगन्नाथ मन्दिर में प्रात:काल भगवान श्री जगन्नाथ को खिचड़ी का बालभोग लगाया जाता है। प्राचीनकाल में एक भक्त कर्माबाई प्रात:काल बिना स्नान किए ही ठाकुर जी के लिए खिचड़ी बनाती थी। कथानुसार ठाकुर जी स्वयं बालरूप में कर्माबाई की खिचड़ी खाने आते थे लेकिन एक दिन कर्माबाई के यहाँ एक साधु मेहमान हुआ। उसने जब देखा कि कर्माबाई बिना स्नान किए ही खिचड़ी बनाकर ठाकुर जी को भोग लगा देती हैं तो उसने उन्हें ऐसा करने से मना किया और ठाकुर जी का भोग बनाने व अर्पित करने के कुछ विशेष नियम बता दिए। अगले दिन कर्माबाई ने इन नियमों के अनुसार ठाकुर जी के लिए खिचड़ी बनाई जिससे उन्हें देर हो गई और वे बहुत दु:खी हुई कि आज मेरा ठाकुर भूखा है। ठाकुर जी जब उनकी खिचड़ी खाने आए तभी मन्दिर में दोपहर के भोग का समय हो गया और ठाकुर जी जूठे मुँह ही मन्दिर पहुँच गए। वहाँ पुजारियों ने देखा कि ठाकुर जी मुँह पर खिचड़ी लगी हुई है, तब पूछने पर ठाकुर जी ने सारी कथा उन्हें बताई। जब यह बात साधु को पता चली तो वह बहुत पछताया और उसने कर्माबाई से क्षमायाचना करते हुए उसे पूर्व की तरह बिना स्नान किए ही ठाकुर जी के लिए खिचड़ी बनाकर ठाकुर जी को खिलाने को कहा। आज भी पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में प्रात:काल बालभोग में खिचड़ी का ही भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि यह कर्माबाई की ही खिचड़ी है। -
जगन्नाथ मन्दिर पुरी (उड़ीसा)- भगवान को बुखार-
ज्येष्ठ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ को ठण्डे जल से स्नान कराया जाता है। इस स्नान के बाद भगवान को ज्वर (बुखार) आ जाता है। १५ दिनों तक भगवान जगन्नाथ को एकान्त एक विशेष कक्ष में रखा जाता है। जहां केवल उनके वैद्य और निजी सेवक ही उनके दर्शन कर सकते हैं। इसे "अनवसर" कहा जाता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ को फ़लों के रस, औषधि एवं दलिया का भोग लगाया जाता है। भगवान स्वस्थ होने पर अपने भक्तों से मिलने रथ पर सवार होकर निकलते हैं जिसे जगप्रसिद्ध "रथयात्रा" कहा जाता है। "रथयात्रा" प्रतिवर्ष आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकलती है।
ब्रज की अनोखी परम्परा-
ब्रज के मन्दिरों में एक अनोखी परम्परा है। जब वहाँ कोई भक्त मन्दिर के विग्रह के लिए माला लेकर जाता है तो वहाँ के पुजारी उस माला को विग्रह से स्पर्श कराकर उसी भक्त के गले में पहना देते हैं। इसके पीछे एक बड़ी प्रीतिकर कथा है। श्रुति अनुसार अकबर के समय की बात है एक वैष्णव भक्त प्रतिदिन श्रीनाथ जी के लिए माला लेकर जाता था। एक दिन अकबर का सेनापति भी ठीक उसी समय माला लेने पहुँचा जबकि माली के पास केवल १ ही माला शेष थी। वैष्णव भक्त और अकबर के सेनापति दोनों ही माला खरीदने के लिए अड़ गए। इस धर्मसंकट से मुक्ति पाने के लिए माली ने कहा कि जो भी अधिक दाम देगा उसी को मैं यह माला दूँगा। दोनों ओर से माला के लिए बोली लगनी आरम्भ हो गई। जब माला की बोली अधिक दाम पर पहुँची तो अकबर के सेनापति बोली बन्द कर दी। अब वैष्णव भक्त को अपनी बोली के अनुसार दाम देने थे। भक्त तो अंकिचन ब्राह्मण था उसके पास इतना धन नहीं था सो उसने उसके घर सहित जो कुछ भी पास था वह सब बेच कर दाम चुकाकर माला खरीद ली। जैसे ही उसने यह माला श्रीनाथजी की गले में डाली वैसे ही उनकी गर्दन झुक गई। श्रीनाथजी को झुके देख उनके सेवा में लगे पुजारी भयभीत हो गए। उनके पूछने पर जब श्रीनाथ जी ने सारी कथा उन्हें बताकर उस भक्त की सहायता करने को कहा। जब पुजारियों ने उस भक्त का घर सहित सब व्यवस्थाएं पूर्ववत की तब जाकर श्रीनाथ जी सीधे हुए। तब से आज तक ब्रज में यह परम्परा है कि भक्त की माला श्रीविग्रह को स्पर्श कराकर उसे ही पहना दी जाती है। किंवदंतियों अनुसार यह घटना गोवर्धन स्थित जतीपुरा मुखारबिन्द की है। ऐसी मान्यता है कि नाथद्वारा में जो श्रीनाथ जी का विग्रह है वह इन्हीं ठाकुर जी का रूप है।
मन्दिरों के रोचक किस्से-
- राजस्थान के डाकौर के रणछोड़दास जी मन्दिर में भगवान को श्रृँगार में आज भी पट्टी बाँधी जाती है। मान्यता है कि यहाँ भगवान ने अपने भक्त को मार से बचाने के लिए उसकी चोटें अपने शरीर पर ले ली थीं।
- उदयपुर के समीप श्रीरूप चतुर्भुजस्वामी के मन्दिर में आज भी वहाँ के राजा का प्रवेश वर्जित है। मान्यता है कि यहाँ भगवान ने अपने भक्त देवाजी पण्डा की अवमानना करने पर राजा को श्राप दे रखा है कि वे उनके मन्दिर में प्रवेश ना करें और ना ही उनके दर्शन करें।
- ओरछा के रामराजा सरकार का मुख्य विग्रह उनके लिए बनाए गए मन्दिर के स्थान पर राजमहल के रसोईघर में स्थित है। कथानुसार यहाँ की महारानी गणेशदेई जब भगवान श्रीराम को अयोध्या लाने गई तो श्रीराम प्रभु ने साथ चलने के लिए अपनी दो शर्ते रखीं, पहली कि वे केवल महारानी की गोद में बैठकर ही यात्रा करेंगे और जहाँ वे उन्हें अपनी गोद से उतारेंगी वे वहीं स्थापित हो जाएँगे। दूसरी शर्त थी कि महारानी केवल पुष्य नक्षत्र में ही यात्रा करेंगी। ओरछा पहुँचने पर महारानी अपनी पहली शर्त भूल गई क्योंकि तब तक मन्दिर अपूर्ण था इसलिए महारानी गणेशदेई ने श्रीराम का विग्रह अपनी गोद से उतारकर महल के रसोईघर में रख दिया। अपनी शर्त के अनुसार भगवान राम महारानी की गोद से उतरते ही वहीं स्थापित हो गए। तब से आज तक यह विग्रह महल के रसोईघर में ही स्थापित है। यद्यपि वर्तमान में उसे मन्दिर का रूप दे दिया गया है।
-उज्जैन स्थित महाकाल व ओरछा स्थित रामराजा सरकार को राजा माना जाता है और राज्य सरकार द्वारा गार्ड आफ़ आनर दिया जाता है।
- हरदा जिले के नेमावर स्थित सिद्धनाथ जी के सिद्धेश्वर मन्दिर का मुख्य द्वार प्रवेश द्वार से उल्टी दिशा में है। मन्दिर प्राँगण में प्रवेश करने पर सर्वप्रथम मन्दिर का पार्श्व भाग दिखाई देता है। मान्यता है कि महाभारत काल में एक विशेष पूजा के चलते प्रात:काल सूर्य की किरणें मन्दिर में प्रवेश ना कर पाएँ इसलिए महाबली भीम ने इस मन्दिर को घुमा दिया था। यह मन्दिर आज तक उसी स्थिति में है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

बुधवार, 5 जुलाई 2017

"गुरू वही जो राम मिलावे"


शास्त्र का कथन है-
"गुरू वही जो विपिन बसावे, गुरू वही जो सन्त सिवावे।
 गुरू वही जो राम मिलावे, इन करनी बिन गुरू ना कहावे॥"
इन वचनों का सार है कि गुरू वही है जो "राम" अर्थात् उस परम तत्व से साक्षात्कार कराने में सक्षम हो, गुरू अर्थात् जागा हुआ व्यक्तित्व। इसी प्रकार शिष्य वह है जो जागरण में उत्सुक हो। गुरू ईश्वर और जीव के बीच ठीक मध्य की कड़ी है, इसलिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मनुष्य के जीवन में गुरू की उपस्थिति बड़ी आवश्यक है। गुरू ही वह द्वार है जहाँ से जीव परमात्मा में प्रवेश करता है। गुरू निन्द्रा व जागरण दोनों अवस्थाओं का साक्षी होता है। सिद्ध सन्त सहजो कहती हैं कि "राम तजूँ पर गुरू ना बिसारूँ" अर्थात् मैं उस परम तत्व का भी विस्मरण करने को तैयार हूँ लेकिन गुरू का नहीं क्योंकि यदि गुरू का स्मरण है; गुरू समीप है तो उस परम तत्व से साक्षात्कार पुन: सम्भव है। मेरे देखे गुरू व्यक्ति नहीं अपितु एक अवस्था का नाम है ऐसी अवस्था जब कोई रहस्य जानने को शेष नहीं रहा किन्तु फ़िर भी करूणावश वह इस जगत् में है, जो जाना गया है उसे बाँटने के लिए है। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश को सीधे देखना आँखों के लिए हानिकारक है, उसके लिए एक होना माध्यम आवश्यक है। ठीक उसी प्रकार ईश्वर का साक्षात्कार भी जीव सीधे करने में सक्षम नहीं उसके लिए भी गुरू रूपी माध्यम आवश्यक है क्योंकि ध्यान-समाधि में जब वह घटना घटेगी और परमात्मा अपने सारे अवगुँठन हटा तत्क्षण प्रकट होगा तो उस घटना को समझाएगा कौन! क्योंकि जीव इस प्रकार के साक्षात्कार का अभ्यस्त नहीं वह तो बहुत भयभीत हो जाएगा जैसे अर्जुन भयभीत हुआ था भगवान कृष्ण का विराट रूप देखकर, इसलिए गुरू का समीप होना आवश्यक है। गुरू के माध्यम से ही परमात्मा की थोड़ी-थोड़ी झलक मिलनी शुरू होती है। परमात्मा के आने की ख़बर का नाम ही गुरू है। जब गुरू जीवन में आ जाएँ तो समझिए कि अब देर-सवेर परमात्मा आने ही वाला है। एक शब्द हमारी सामाजिक परम्परा में है "गुरू बनाना", यह बिल्कुल असत्य व भ्रामक बात है क्योंकि यदि जीव इतना योग्य हो जाए कि अपना गुरू स्वयं चुन सके तो फ़िर गुरू की आवश्यकता ही नहीं रही। सत्य यही है कि गुरू ही चुनता है जब शिष्य तैयार होता है शिष्य होने के लिए। गुरू की ही तरह शिष्य होना भी कोई साधारण बात नहीं है, शिष्य अर्थात् जो जागरण में उत्सुक हो। वर्तमान समय में गुरू व शिष्य दोनों की परिभाषाएँ बदल गई हैं। आज अधिकांश केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए गुरू-शिष्य परम्परा चल रही है। वर्तमान समय में गुरू यह देखता है कि सामाजिक जीवन में उसके शिष्य का कद कितना बड़ा और शिष्य यह देखता है कि उसका गुरू कितना प्रतिष्ठित है। जागरण की बात विस्मृत कर दी जाती है, गुरू इस बात की फ़िक्र ही नहीं करता कि वह जिसे शिष्य के रूप में स्वीकार कर रहा है व जागरण में उत्सुक भी है या नहीं। वास्तविकता यह है कि जब शिष्य की ईश्वरानुभूति की प्यास प्रगाढ़ हो जाती है तब गुरू उसे परमात्मा रूपी अमृत पिलाने स्वयं ही उसके जीवन में उपस्थित हो जाते हैं। हमारे सनातन धर्म ने भी ईश्वर को रस रूप कहा है "रसौ वै स:"। गुरू व शिष्य दोनों ही इस जगत् की बड़ी असाधारण घटनाएँ है क्योंकि यह एकमात्र सम्बन्ध है जो विशुद्ध प्रेम पर आधारित है और जिसकी अन्तिम परिणति परमात्मा है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 2 जुलाई 2017

प्रभु कभी नहीं सोते



वैदिक पँचांग अनुसार आज विष्णुशयन एकादशी है अर्थात् भगवान् के शयन का प्रारम्भ । देवशयन के साथ ही "चातुर्मास" भी प्रारम्भ हो जाता है। देवशयन के साथ ही विवाह, गृहारम्भ, गृहप्रवेश, मुण्डन जैसे माँगलिक प्रसंगो पर विराम लग जाता है। हमारे सनातन धर्म की खूबसूरती यही है कि हमने देश-काल-परिस्थितिगत व्यवस्थाओं को भी धर्म व ईश्वर से जोड़ दिया। धर्म एक व्यवस्था है और इस व्यवस्था को सुव्यवस्थित रूप से प्रवाहमान रखने हेतु यह आवश्यक था कि इसके नियमों का पालन किया जाए। किसी भी नियम को समाज केवल दो कारणों से मानता है पहला कारण है- "लोभ" और दूसरा कारण है-"भय", इसके अतिरिक्त एक तीसरा व सर्वश्रेष्ठ कारण भी है वह है-"प्रेम" किन्तु उस आधार को महत्त्व देने वाले विरले ही होते हैं। यदि हम वर्तमान समाज के ईश्वर को "लोभ" व "भय" का संयुक्त रूप कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। हिन्दू धर्म के देवशयन उत्सव के पीछे आध्यात्मिक कारणों से अधिक देश-काल-परिस्थितगत कारण हैं। इन दिनों वर्षा ऋतु प्रारम्भ हो चुकी होती है सामान्य जन-जीवन वर्षा के कारण थोड़ा अस्त-व्यस्त व गृहकेन्द्रित हो जाता है। यदि आध्यत्मिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो देवशयन कभी होता ही नहीं। जिसे निन्द्रा छू ना सके और जो व्यक्ति को निन्द्रा से जगा दे वही तो ईश्वर है। विचार कीजिए परमात्मा यदि सो जाए तो इस सृष्टि का सन्चालन कैसे होगा! "ईश्वर" निन्द्रा में भी जागने वाले तत्व का नाम है और उसके प्राकट्य मात्र से व्यक्ति भी निन्द्रा में जागने में सक्षम हो जाता है। गीता में भगवान् कृष्ण कहते हैं - "या निशा सर्वभूतानाम् तस्याँ जागर्ति सँयमी"  अर्थात् जब सबके लिए रात्रि होती है योगी तब भी जागता रहता है। इसका आशय यह नहीं कि शारीरिक रूप से योगी सोता नहीं; सोता है किन्तु वह चैतन्य के तल पर जागा हुआ होता है। निन्द्रा का नाम ही सँसार है और जागरण का नाम "ईश्वर"। आप स्वयं विचार कीजिए कि वह परम जागृत तत्व कैसे सो सकता है! देवशयन; देवजागरण ये सब व्यवस्थागत बातें हैं। वर्तमान पीढ़ी को यदि धर्म से जोड़ना है तो उन्हें इन परम्पराओं के छिपे उद्देश्यों को समझाना आवश्यक है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

बुधवार, 28 जून 2017

युधिष्ठिर का नारी जाति को श्राप

महाभारत का प्रसंग है। जब अर्जुन द्वारा अंगराज कर्ण का वध कर दिया गया तब पाण्डवों की माता कुन्ती कर्ण के शव पर उसकी मृत्यु का विलाप करने पहुँची। अपनी माता को कर्ण के शव पर विलाप करते देख युधिष्ठिर ने कुन्ती से प्रश्न किया कि "आप हमारे शत्रु की मृत्यु पर विलाप क्यों कर रहीं है?" तब कुन्ती ने युधिष्ठिर को कहा कि "ये तुम्हारे शत्रु नहीं, ज्येष्ठ भ्राता हैं।" यह सुनकर युधिष्ठिर अत्यन्त दु:खी हुए। उन्होंने माता कुन्ती से कहा कि आपने इतनी बड़ी बात छिपाकर हमें हमारे ज्येष्ठ भ्राता का हत्यारा बना दिया। तत्पश्चात् समस्त नारी जाति श्राप देते हुए युधिष्ठिर बोले "मैं आज से समस्त नारी जाति को श्राप देता हूँ कि वे अब चाहकर भी कोई बात अपने ह्रदय में नहीं छिपा सकेंगी।" जनश्रुति है कि धर्मराज युधिष्ठिर के इसी श्राप के कारण स्त्रियाँ कोई भी बात छिपा नहीं सकतीं।


-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 20 जून 2017

जीएसटी


हमारे देश में कोई कार्य सादगी से हो ही नहीं सकता। ख़ामोशी से तो केवल इस देश में भ्रष्टाचार हो सकता है। आप सही समझ रहे हैं मैं जीएसटी की ही बात कर रहा हूं। सरकार के द्वारा इसे इतना महिमामण्डित किया जा रहा है जैसे यह कोई अद्भुत कर सुधार हो। पहले तो आपने अपनी कर प्रणाली ही इतनी अव्यावहारिक बनाई फ़िर उसे थोड़ा-बहुत ठीक-ठाक करने के नाम पर इतना हो-हल्ला अनुचित है। जीएसटी के पीछे जो सबसे सशक्त दलील दी जा रही है वह यह कि इससे मंहगाई कम होगी। टैक्स स्लैब देखकर मुझे तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता, इसके विपरीत 15 प्रतिशत सर्विस टैक्स का दायर बढ़कर 18 प्रतिशत होने से जनसामान्य पर बोझ अवश्य बढ़ेगा। मेरे देखे विकास आंकड़ों में नहीं ज़मीनी स्तर पर महसूस होना चाहिए ठीक इसी प्रकार यदि वाकई जीएसटी कोई अद्भुत कर सुधार है तो यह भी इस देश की जनता को महसूस होना चाहिए केवल वित्त मन्त्री के कह देने मात्र से यह कोई ऐतिहासिक कर सुधार नहीं हो जाएगा। अत: आने वाले समय की प्रतीक्षा करें जिसकी कसौटी पर जीएसटी को परखना जाना अभी शेष है।

-संपादक

शनिवार, 10 जून 2017

ज़हर परोसने वाले काहे के "अन्नदाता"

हाल ही में प्रदेश एक उग्र किसान आन्दोलन से दहल उठा। इस आन्दोलन ने मेरे मन में कई सवाल खड़े कर दिए। आन्दोलन के पीछे जो मुख्य वजह बताई गई वह यह थी कि किसानों को उनकी पैदावार का उचित मूल्य नहीं किया जा रहा है। फ़सलों के दाम गिरे हुए हैं ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस वर्ष पैदावार बहुत अधिक मात्रा में हुई। महद्आश्चर्य है कि पैदावार अधिक होने के उपरान्त आम जनता को सस्ते दामों पर वस्तुएँ उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। जहाँ तक मेरी अल्प बुद्धि की समझ है कि किसी भी वस्तु के दाम अर्थशास्त्र के माँग-पूर्ती के सिद्धान्त पर आधारित होते हैं। इसके लिए भला सरकार कैसे ज़िम्मेवार हो सकती है? यदि पैदावार ना हो तो सरकार की ज़िम्मेवारी और यदि अधिक पैदावार हो तो भी सरकार की ज़िम्मेवारी ये गणित मेरी समझ से परे है। जहाँ तक मैं समझता हूँ सरकार की ज़िम्मेवारी फ़सलों के क्रय-विक्रय और भण्डारण की उचित व्यवस्था करने तक की है जिसके लिए मण्डियाँ व वेयर हाऊस इत्यादि की व्यवस्था होती है। अब यदि मण्डियों में फ़सल के दाम गिरे हुए हैं तो यह माँग-पूर्ती के सिद्धान्त के कारण हैं। अब थोड़ी बात करें किसान की, मेरे देखे आज वास्तविक किसान तो बहुत गिने-चुने शेष रह गए हैं। ये जो अपने आप को किसान कहते हैं ये तो किसान के भेष में शुद्ध व्यापारी हैं। मेरे देखे इनकी यह निम्नतम समर्थन मूल्य बढ़ाने और फ़सलों को क्रय करने गारण्टी वाली माँग सर्वथा अनुचित है। मैं जानता हूँ मेरे इस दृष्टिकोण की बहुत आलोचना होगी। कई बुद्धिजीवी स्वयं को किसान हितैषी बताने की होड़ में मुझे किसान विरोधी भी ठहराएँगे। बहरहाल, मैं ऐसे सभी किसान हितैषियों से यह पूछना चाहूँगा कि यदि इस प्रकार माँग कोई व्यापारी करे तब भी क्या वे उस व्यापारी का समर्थन करेंगे? कोई माल तो उनकी फ़ैक्ट्रियों में भी तैयार होता है। अब मैं इन तथाकथित अन्नदाताओं से यह पूछना चाहता हूँ जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ के लिए अन्न को सड़कों पर फ़ेंक कर विरोध जताया वास्तविक अन्नदाता अन्न का ऐसा अपमान नहीं करता; कि आपमें से ऐसे कितने किसान हैं जिन्होंने जैविक खेती करके इतनी अधिक पैदावार की है? शायद एक भी नहीं। ये सारे व्यापारी जो आज किसान का भेष धारण किए हुए हैं निजी आर्थिक लाभ के चलते रासायनिक खेती व विषयुक्त कीटनाशकों के दम पर अपनी पैदावार में वृद्धि किए हुए हैं और इसका ठीकरा वे सरकार के सिर पर फ़ोड़ना चाहते हैं, ये सर्वथा अनुचित है। ये व्यापारी अपने निजी स्वार्थ के कारण जनता के स्वास्थ्य व ज़िंदगी के साथ कितना बड़ा अत्याचार कर रहे हैं ये शायद इस देश की भोली-भाली जनता समझ भी नहीं पा रही क्योंकि उसने तो किसानों को अपना अन्नदाता मानकर उसे सदैव आदर व सम्मान ही प्रदान किया है। ये सारे व्यापारी ऐसे-ऐसे कीटनाशक व रासायनिक खाद का प्रयोग अपने खेतों में पैदावार बढ़ाने के लिए करते हैं जिनसे कैंसर जैसी गम्भीर बीमारियों के होने का खतरा रहता है। चाहे वह सब्ज़ियाँ हो, फ़ल हों या अन्य कोई खाद्यान्न, अन्न के नाम पर भोली-भाली जनता को शुद्ध ज़हर परोसने वाले ये काहे के अन्नदाता और काहे के किसान! ये तो व्यापारी हैं और व्यापार में हानि-लाभ तो स्वयं के व्यापारिक चातुर्य पर निर्भर होता है सरकार या कोई अन्य इसके लिए उत्तरदायी नहीं। विपन्न बुद्धियों का लोकतन्त्र हानिकारक होता है। इसके गम्भीर परिणाम पीढ़ियों भुगतने पढ़ते हैं। आज सरकार से अपनी अनुचित माँगे मनवाकर ये अपना अहँकार तुष्ट भले ही कर लें लेकिन ये नहीं जानते कि अन्ततोगत्वा ये पैसा जनता से ही वसूल किया जाता है। हमारे देश में अल्पसँख्यक, दलित, किसान जैसे कुछ नामों को हमने बेहद संवेदनशील बना दिया है जिसके चलते हमें कई बार बड़े हानिकारक परिणाम भुगतने पड़ते हैं। ऐसे नामों की आड़ में यदा-कदा ही चाहे राजनैतिक दल हों चाहे असामाजिक तत्व व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करते नज़र आते हैं। आज आवश्यकता है इन नामों के नकाब के पीछे छिपे असली चेहरों को पहचानने की। वर्तमान समय में वास्तविक हितग्राही की पहचान सर्वाधिक दुष्कर कार्य है। यदि इन हितग्राहियों के नाम पर बहरूपिए अपनी अनुचित नीतियाँ लागू करवाने में समर्थ होते जाएँगे तो यह देश व समाज के लिए हानिकारक सिद्ध होगा और इसके गम्भीर परिणाम हमारी आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेंगे।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया