बुधवार, 28 दिसंबर 2016

पंचांग की त्रुटि -

हिन्दू नववर्ष आने वाला है। नववर्ष के आगमन के साथ ही पण्डित व ज्योतिषीगण नया पंचांग क्रय करते हैं। नवीन पंचांगों में सबसे ऊपर नए "संवत्सर" का नाम व संख्या प्रकाशित की जाती है। इस वर्ष "साधारण" (२०७४) नाम का संवत्सर प्रारम्भ होने जा रहा है। एक ज्योतिषी होने के नाते जब मैंने आज नवीन पंचांग क्रय किए तो "संवत्सर" का नाम देखते ही मुझे पिछले वर्ष की एक घटना याद आ गई जो "निर्णय सागर पंचांग" (नीमच, म.प्र.) से सम्बन्धित है। घटना कुछ इस प्रकार है कि मैंने प्रतिवर्षानुसार जब पिछले वर्ष हिन्दू नववर्ष के अवसर पर पंचांग क्रय किए तो देखा कि "निर्णय सागर पंचांग" में संवत्सर का नाम त्रुटिवश "सौम्य" के स्थान पर "साधारण" (यह आगामी संवत्सर का नाम है) छपा हुआ है जबकि अन्य सभी पंचांगों में तत्कालीन संवत्सर का नाम सही छपा हुआ था। मैंने "निर्णय सागर पंचांग" की इस त्रुटि की ओर ध्यानाकर्षण कराना अपना दायित्व समझते हुए उनके कार्यालय को पत्र लिखकर इस सम्बन्ध में सूचित किया। कुछ दिनों बाद मुझे "निर्णय सागर पंचांग" के कार्यालय से एक फोन आया। फोन करने वाले महानुभाव (जिनका नाम मुझे स्मरण नहीं है) ने अपने कुतर्कों के माध्यम से इस त्रुटि को सही ठहराने का असफ़ल प्रयास किया। मैंने उनके कुतर्कों से असहमत होते हुए बात समाप्त कर दी। आज जब मैंने नववर्ष हेतु नवीन पंचांग क्रय किए तो "निर्णय सागर पंचांग" में संवत्सर का नाम पुन: "साधारण" छपा हुआ पाया (जो कि इस वर्ष सही है)। शास्त्रों में संवत्सरों के नाम उनके क्रम के अनुसार दिए गए हैं, एक संवत्सर के बीतने के बाद दूसरा संवत्सर ठीक वैसे ही आता है जैसे अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार जनवरी के बाद फरवरी और हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार चैत्र के बाद वैशाख। उसी प्रकार "सौम्य" (२०७३) के बाद "साधारण" (२०७४) संवत्सर के आने का क्रम है और "साधारण" के बाद "विरोधकृत" (२०७५) नामक संवत्सर आएगा। यदि पिछले वर्ष "निर्णय सागर पंचांग" द्वारा प्रकाशित संवत्सर का नाम सही था जैसा कि उनके कार्यालय ने अपने कुतर्कों के आधार पर सिद्ध करने की कोशिश की थी तो इस वर्ष "निर्णय सागर" पंचांग में संवत्सर का नाम "विरोधकृत" प्रकाशित होना चाहिए था, किन्तु ऐसा नहीं है। इसका आशय यह है कि वे स्वयं भी यह जानते थे कि पिछले वर्ष के पंचांग में संवत्सर का नाम प्रकाशित करने में उनसे त्रुटि हुई है किन्तु उन्होंने हठधर्मिता के चलते अपनी इस त्रुटि को स्वीकार नहीं किया अपितु अपने कुतर्कों के माध्यम से इसे सही ठहराने का असफल प्रयास भी किया। इस प्रकार हठधर्मितापूर्वक अपनी त्रुटि को उचित ठहराए जाने के "निर्णय सागर पंचांग" कार्यालय के व्यवहार की मैं कड़ी निन्दा व भर्त्सना करता हूं। मेरे देखे त्रुटि करना करना मानवीय स्वभाव है किन्तु त्रुटि को स्वीकारना सज्जन का स्वभाव है लेकिन अपनी त्रुटि को सुधारना सन्त का स्वभाव है। अब ज़रा सोचिए जिन पंचांगों को आधार मानकर पण्डित व ज्योतिषीगण ग्रह-नक्षत्र आदि की गणना करते हैं आज के दौर में वे पंचांग कितने प्रामाणिक हैं!

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

"कुबेर" नहीं "अर्थपिशाच" कहिए

अभी-अभी एक न्यूज़ चैनल पर खबर देखी कि एक वकील का कालधन पकड़ाया। खबर के तथाकथित विद्वान सम्पादक ने खबर का शीर्षक किया "कालेधन के कुबेर"....ऐसी ही यदि कहीं कोई कुकृत्य करता पाया जाता है तो उस खबर का शीर्षक देते हैं....."रासलीला"। मुझे इस प्रकार के शीर्षकों से सख़्त आपत्ति है मैं इस प्रकार की शब्दावली की कड़ी निन्दा करता हूं। हिन्दू धर्म के सहिष्णु होने का यह तो अर्थ नहीं कि उनके आराध्य को चाहे जिसके साथ सम्बद्ध कर दें। हिन्दू धर्म में कुबेर खज़ाने अर्थात धन का अधिपति व रक्षक माना गया है। मैं इन ख़बरनबीसों से पूछना चाहता हूं क्या कुबेर के खजाने का धन कालाधन था? ऐसे ही क्या "रासलीला" कोई व्यभिचार कर्म था? यदि नहीं तो इस प्रकार के कुकृत्यों के साथ ऐसे पवित्र प्रतीकों को क्यों सम्बन्धित किया जाता है और कोई शंकराचार्य आवाज़ नहीं उठाता, कोई पंडित मौन नहीं तोड़ता। इस प्रकार के कालेधन के स्वामियों को नाम ही देना है तो इन्हें "अर्थपिशाच" कहिए कुबेर कहकर क्यों हिन्दू धर्म का अपमान करते हैं। मैं पुन: इस प्रकार की शब्दावली की घोर भर्त्सना करता हूं।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

हम "कैशलेस" से पहले "कैरेक्टर लैस" ना हो जाएं

यदि आप अपने १०० परिचितों और मित्रों से पूछें कि आपके घर एलसीडी है तो लगभग सभी का जवाब "हां" होगा। आप उन्हीं मित्रों से पुन: पूछें कि आपके घर में फ्रिज,एसी,वाशिंग मशीन, माइक्रोवेब, कम्प्यूटर,दुपहिया वाहन इत्यादि है? तो भी जवाब बहुमत से "हां" में ही मिलेगा। मेरे कहने का आशय है कि विलासिता से जुड़ी किसी भी वस्तु के बारे में आप अपने मित्रों और परिचितों से पूछें तो जवाब ९९ फ़ीसदी "हां" में ही आएगा लेकिन जब इन्हीं १०० मित्रों और परिचितों से आप पूछेंगे कि आपके घर में आपका अपना निजी पुस्तकालय है? चलिए पुस्तकालय को छोड़िए बस इतना पूछ लीजिए कि आप इन दिनों कौन सी पुस्तक पढ़ रहे हैं? तो ९९.९९ फ़ीसदी का जवाब "ना" में आएगा। मेरे देखे यह गंभीर चिन्ता का विषय है। आज हम पुस्तकों से दूर होते जा रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी में पुस्तकों के प्रति कोई रुझान ही नहीं है ऐसे में वे अपने देश की साहित्यिक विरासत को क्या समझेंगे। कहीं ऐसा ना हो कि "कैशलेस" होने से पहले भारत "कैरेक्टर लैस" हो जाए। यदि इसे रोकना है तो अपने घर में विलासिता की वस्तुओं के साथ-साथ एक छोटा सा पुस्तकालय अवश्य बनाईए।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

हमारे षोडश संस्कार

जानिए षोडश संस्कारों एवं उनके करने का शास्त्रोक्त समय-
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१. गर्भाधान संस्कार- सायंकाल, व्रतादि तिथियों एवं श्राद्ध तिथियों को छोड़कर किसी भी शुभ मुहूर्त में।
२. पुंसवन संस्कार- गर्भस्थापन के दूसरे या तीसरे माह में।
३. सीमान्तोन्न्यन संस्कार- गर्भस्थापन के छठे या आठवें माह में।
४. जातकर्म संस्कार- प्रसवपीड़ा होने पर।
५. नामकरण संस्कार- जन्म के ग्यारहवें या बाहरवें दिन।
६. निष्क्रमण संस्कार (बाहर घुमाना)- नामकरण संस्कार के दूसरे दिन या जन्म के चौथे माह में।
७. अन्नप्राशन संस्कार- जन्म के पांच माह के बाद और छ: माह के अन्दर।
८. चूड़ाकर्म संस्कार (मुण्डन)- ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य का जन्म के प्रथम वर्ष अथवा तीसरे वर्ष में।
९. कर्णवेध संस्कार- जन्म के तीसरे या पांचवे वर्ष में।
१०. उपनयन (जनेऊ) संस्कार- ब्राह्मण का आठवें वर्ष में, क्षत्रिया का ग्यारहवें वर्ष में व वैश्य का बारहवें वर्ष में।
११. वेदारम्भ संस्कार- उपनयन संस्कार वाले दिन अथवा उससे तीसरे दिन।
१२. समावर्तन संस्कार- वेदाध्ययन समाप्त होने पर। ब्राह्मणों का केशान्त कर्म सोलहवें वर्ष में, क्षत्रिय का बाईसवें वर्ष में और वैश्य का चौबीसवें वर्ष में होना चाहिए।
१३. विवाह संस्कार- विवाह की उचित आयु होने पर।
१४. आवस्थ्याधान संस्कार- विवाह के पश्चात।
१५. श्रोताधान संस्कार- आवस्थ्याधान संस्कार के पश्चात।
१६. अन्तेष्टि संस्कार- मृत्यु होने पर।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र