गुरुवार, 4 अगस्त 2016

"उड़ता पंजाब"


फ़िल्म "उड़ता पंजाब" विवाद में बाम्बे हाईकोर्ट अपना फ़ैसला सोमवार को सुनाएगा लेकिन सिर्फ़ लिफ़ाफ़ा देखकर मजमून भांपने की तर्ज़ पर सभी को पता चल ही गया होगा कि फ़ैसला क्या आने वाला है। हाईकोर्ट ने इस विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा कि "यह दर्शकों को तय करने दें कि उन्हें क्या देखना है। कोर्ट ने यह भी कहा कि फ़िल्म सेंसर बोर्ड का कार्य फ़िल्म का सर्टिफ़िकेशन करना है फ़िल्म को सेंसर करना नहीं।" मैं उच्च न्यायालय का सम्मान करते हुए कहना चाहता हूं कि क्या किसी आपत्तिजनक सामग्री वाली फ़िल्म (यदि है तो) को सिर्फ़ इस आधार पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है कि इसे देखने का निर्णय दर्शक करेंगे, नहीं। क्योंकि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग तो बहुत कुछ आपत्तिजनक भी देखना पसन्द करता है और लुक-छिप कर देखता भी है। जब दर्शकों की पसन्द-नापसन्द ही आधार है तो यदा-कदा "पोर्न साइट्स" पर क्यों बैन लगाने की मांग उठती है। फ़िर क्यों किसी विधायक को विधानसभा में "पोर्न वीडियो" देखने पर निलंबित कर दिया जाता है? किसी भी अश्लील या आपत्तिजनक सामग्री को समाज में प्रवाहित होने से बचाना मार्गदर्शकों का दायित्व है। एक ज़माना था जब अत्यधिक हिंसक कथानकों वाली फ़िल्में भी सेंसर बोर्ड से पास नहीं होती थीं। फ़िल्मों के माध्यम से आज का युवा अपना आदर्श गढ़ता है, वह फ़िल्म के नायक की भांति अपने आप को बनाना चाहता है यदि फ़िल्म किसी ऐसे नायक को प्रस्तुत करती है जो सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन करता हो तो ऐसी फ़िल्मों को निश्चित ही सार्वजनिक प्रस्तुतिकरण से रोकना चाहिए। आज जहां बच्चे-बच्चे के हाथों में इंटरनेट युक्त मोबाईल है द्रुत गति से चलने वाला इंटरनेट हैं वहां आप कहां इस बात का निर्णय दर्शकों पर छोड़ सकते हैं कि उन्हें क्या देखना है ये वही तय करें। जैसा कि माननीय उच्च न्यायालय ने कहा कि फ़िल्म सेंसर बोर्ड का कार्य फ़िल्म का सर्टिफ़िकेशन करना है, तो फ़िल्म सेंसर बोर्ड वही कार्य तो कर रहा था। मेरी जानकारी के अनुसार फ़िल्म "उड़ता पंजाब" को "" सर्टिफ़िकेट दिया जा रहा था जिस पर निर्माता-निर्देशकों को आपत्ति थी। इस पर फ़िल्म सेंसर बोर्ड ने "यू" सर्टिफ़िकेट जारी करने के लिए फ़िल्म के ८९ सीन को काटने का सुझाव दिया। मैं यहां निर्माता-निर्देशकों से पूछना चाहता हूं कि यदि फ़िल्म की सामग्री आपत्तिजनक है तो फ़िर सर्टिफ़िकेट भी उसी अनुरूप क्यों नहीं दिया जाना चाहिए। क्योंकि ज़माना भले ही कितना बदल गया हो आज भी समाज में सभ्य व्यक्ति का "" सर्टिफ़िकेट वाली फ़िल्म देखना सभ्यता की निशानी नहीं माना जाता। आज भी बहुत से दर्शक फ़िल्म देखने या ना देखने का निर्णय फ़िल्म को दिए गए "" या "यू" सर्टिफ़िकेट को देखकर करते हैं। जब इसी सर्टिफ़िकेशन में धांधली होगी को माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार दर्शक यह तय कैसे करेंगे कि उन्हें क्या देखना है और क्या नहीं।

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