मंगलवार, 30 अगस्त 2016

पत्रकारिता कोई फ़ैशन की वस्तु नहीं है


आज सुबह जब अख़बार देखा तो उसमें अपने परिजन के शव को कांधे या मोटर साईकल पर ढोने दो ख़बरें, कल के अख़बार में इसी प्रकार की ख़बर थी। कुछ ऐसा ही हाल न्यूज़ चैनलों का भी है।  वहां भी इसी प्रकार की ख़बरें विगत कुछ दिनों से निर्बाध रूप से चल रहीं हैं। आपने भी कुछ समय से यह महसूस कर रहे होंगे कि जब कोई प्रतिष्ठित अख़बार या न्यूज़ चैनल कोई विशेष ख़बर जैसे "पढ़ाई के तनाव में बच्चों द्वारा की गई आत्महत्या, रिश्तेदारों द्वारा किया गया दुष्कर्म या हत्या, पलायन, धार्मिक उन्माद इत्यादि" दिखाता या प्रकाशित करता है तो अन्य न्यूज़ चैनल व अख़बारों में भी "महाजनो येन गत: स पन्था: ..." की तर्ज पर ठीक उसी विषय पर आधारित ख़बरों को प्रकाशित करने की होड़ लग जाती है। यह भी संभव है कि उन्हें ऐसा करने के लिए चैनल की ओर से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के जैसे लक्ष्य (टारगेट) दिए गए हों। यह सब तीन-चार दिन तक चलता रहता है फ़िर इस प्रकार की "खबरें" अचानक मौसमी फ़ल-फ़ूल की तरह गायब हो जाती हैं। मैं इसी ऊहापोह में हूं कि क्या यह महज़ संयोग है! यदि संयोग है तो बहुत अद्भुत संयोग है, किन्तु कुछ और है; तो निश्चित ही हमें वर्तमान पत्रकारिता के बारे में विचार करना पड़ेगा, क्योंकि मेरी समझ से घटनाएं न्यूज़ चैनलों की रिपोर्टिंग के आधार पर नहीं घटतीं वे तो घटतीं ही रहती हैं। यह अलग बात है कि हर घटना "ख़बर" या "ब्रेकिंग न्यूज़" ना बन पाएं। मेरे देखे पत्रकारिता कोई फ़ैशन की वस्तु नहीं है। जिस प्रकार केश सज्जा या परिधानों की फ़ैशन का एक दौर होता है जब चहुंओर उसी प्रकार की वस्तुएं दिखाई देती हैं ठीक इसी प्रकार आज "खबरें" भी शनै: शनै: फ़ैशन की वस्तुएं बनती जा रही है। मेरे देखे पत्रकारिता कोई फ़ैशन नहीं है। रिपोर्टिंग सामाजिक सरोकारों एवं संवेदनात्मक आधार पर होनी चाहिए, प्रतिस्पर्धा के आधार पर नहीं। आज कितने ऐसे न्यूज़ चैनल या अख़बार हैं जो सकारात्मक या समाज को दिशा देने वाली ख़बरों को प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं? आज समाज के ख़लनायकों को टी.वी पर दिखा-दिखाकर या प्रतिदिन उनसे जुड़ी ख़बरें प्रकाशित कर करीब-करीब उन्हें नायक ही बना दिया जाता है और वे लोग जो वास्तविक रूप में समाज के नायक हैं कहीं दूर-दराज़ के क्षेत्रों में नितान्त एकान्त में समाज सुधार के अपने कार्य में लगे रहते हैं। आज उन्हें एवं उनके कार्यों को समाज के सम्मुख उपस्थित करने की महती आवश्यकता है। जिससे समाज के अन्य लोग भी उनके कार्यों को देखकर प्रेरित हो सकें। विकास सिर्फ़ सरकारों का दायित्व नहीं है इसमें सामाजिक सहभागिता की भी बहुत आवश्यकता है और यह बिना सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन के सम्भव नहीं है। आज भी कई ऐसे न्यूज़ चैनल और अख़बार हैं जो वास्तविक पत्रकारिता कर रहे हैं किन्तु उनकी संख्या सीमित है। देश का यह चौथा स्तंभ आज बुरी तरह प्रकम्पित है इससे पूर्व की वह कटी पतंग की भांति लहराकर ज़मींदोज़ हो जाए उसे स्थिर करना होगा; सशक्त करना होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया कि देश व समाज का भविष्य प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेगा।
-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया


मंगलवार, 16 अगस्त 2016

अखण्ड भारत-


जानिए "अखण्ड भारत" कब-कब खण्ड-खण्ड हुआ-
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अफ़गानिस्तान-१८७६
नेपाल-१९०४
भूटान-१९०६
तिब्बत-१९१४
म्यांमार (बांग्लादेश)-१९३७
श्रीलंका-१९३९
बांग्लादेश-१९४७
पाकिस्तान-१९४७
पाक अधिकृत कश्मीर-१९४८
अक्षयचीन-१९६२

आजादी की ख़बर

१५ अगस्त १९४७ का "हिन्दुस्तान" समाचार पत्र की मूल प्रति-

शनिवार, 13 अगस्त 2016

लार्ड मैकाले का पत्र

भारत में शिक्षा नीति के जनक कहे जाने वाले लार्ड मैकाले ने सन १८३६ में अपने पिता को एक पत्र लिखा था जिसमें उसने कहा था-
"अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण करने वाला कोई हिन्दू अपने धर्म प्रति सच्ची निष्ठा नहीं रख सकता। यदि हमारी शिक्षा-पद्धति को अपनाया गया तो ३० वर्ष बाद बंगाल में एक भी मूर्तिपूजक नहीं रह जाएगा और यह सब धर्मांतरण के पचड़े में पड़े बिना ही हो जाएगा। लोगों का एक ऐसा वर्ग तैयार हो जो देखने में तो भारतीय हो, लेकिन रुचि, विचार, मन और बुद्धि से अंग्रेज हो।"
(....और देश बंट गया से साभार)

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

भारत का "भरत" कौन...!

भारतवर्ष में जन्म लेने वाले हर हिन्दू अभी तक यही मान्यता रही है कि भारत का नाम दुष्यंत-शकुन्तला के पुत्र "भरत" पर रखा गया है, लेकिन यह सच नहीं है। चौंकिए मत...ऐसा दावा किया है श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली के सहायकाचार्य डा. अनेकान्त कुमार जैन ने, जिनका मानना है कि भारतवर्ष का नाम दुष्यंत-शकुन्तला के पुत्र "भरत" पर नहीं बल्कि ऋषभदेव के प्रथम पुत्र चक्रवर्ती सम्राट "भरत" के नाम पर पड़ा है। इस बात के समर्थन में डा. जैन कई तथ्य प्रस्तुत करते हैं। उनका मानना है कि आधुनिक शोधों के परिणाम से स्पष्ट है कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के प्रथम पुत्र चक्रवर्ती सम्राट "भरत" के नाम पर ही इस देश का नाम "भारत" पड़ा है और इससे पूर्व ऋषभदेव के पिता "नाभिराय" के नाम पर इस देश का नाम "अजनाभवर्ष" था। डा. जैन के अनुसार पुराणों में दर्जनों श्लोक ऐसे हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि ऋषभदेव के पुत्र "भरत" के नाम पर ही इस देश का नाम "भारत" पड़ा है। दरअसल भरत के नाम से चार प्रमुख व्यक्तित्व भारतीय परम्परा में जाने जाते हैं।
१. तीर्थंकर ऋषभदेव के प्रथम पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत
२. राजा रामचन्द्र के अनुज भरत
३. राजा दुष्यन्त के पुत्र भरत
४. नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत
डा. जैन के मतानुसार इन चारों विकलों में केवल प्रथम विकल्प के ही शिलालेखीय तथा शास्त्रीय साक्ष्य प्राप्त हैं। अग्निपुराण में स्पष्ट लिखा है-
"ऋषभो मरूदेव्यां च ऋषभाद् भरतोऽभवत्।
ऋषभोऽदात् श्री पुत्रे शाल्यग्रामे हरिंगत:,
भरताद् भारतं वर्ष भरतात् सुमतिस्त्वभूत॥"
वहीं स्कन्द पुराण के अनुसार-
"नाभे: पुत्रश्च ऋषभ ऋषभाद भरतोऽभवत्।
तस्य नाम्ना त्विदं वर्षं भारतं चेति कीर्त्यते॥"
(माहेश्वर खण्ड)
ऐसा ही उदाहरण मार्कण्डेय पुराण में भी मिलता है। डा. जैन, डा. वासुदेव शरण अग्रवाल की पुस्तक "मार्कण्डेय पुराण का अध्ययन" का उल्लेख करते हुए कहते हैं जिसमें डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ने अपनी भूल स्वीकारते हुए लिखा है कि-"मैंने अपनी "भारत की मौलिकता" नामक पुस्तक में दौषयन्ति-भरत से "भारतवर्ष" लिखकर भूल की थी, इसकी ओर कुछ मित्रों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया उसे अब सुधार लेना चाहिए।"
कुछ विद्वान भी इस तथ्य से अपरिचित होंगे कि आर्यखण्ड रूप इस भारतवर्ष का एक प्राचीन नाम "नाभिखण्ड" या "अजनाभवर्ष" भी इन्हीं ऋषभदेव के पिता अजनाभ के नाम से प्रसिद्ध था। नाभिराज का एक नाम "अजनाभ" भी था। श्रीमदभागवत (५/७/३) में कहा है कि-
"अजनाभं नामैतदवर्षभारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति।"
प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका "हंस" के अक्टूबर २००२ के अंक के अतिथि सम्पादक प्रेमकुमार मणि के सम्पादकीय में भी उल्लेख मिला है कि मिथकीय कथा के अनुसार भारत का नाम दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर पड़ा"। डा. अनेकान्त जैन के द्वारा प्रस्तुत तथ्य और ऐतिहासिक प्रमाणों से भले यह बात पूर्णरूपेण सिद्ध ना होती हो कि भारतवर्ष का नाम ऋषभदेव के प्रथम पुत्र "भरत" के नाम पर पड़ा किन्तु उनके तर्कों से भारत का नाम दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र "भरत" पर पड़ा इस बात पर संदेह अवश्य होता है।

-(साभार-वैचारिकी जुलाई-अगस्त २०१२, पेज न.९६)
- सन्दर्भ: ("किस भरत का भारत" लेखक- डा. अनेकान्त कुमार जैन)

म.प्र. विधानसभा अध्यक्ष से भेंट


म.प्र. विधानसभा अध्यक्ष डा. सीताशरण शर्मा को "ज्योतिष: एक रहस्य" की प्रति भेंट करते हुए ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

"उड़ता पंजाब"


फ़िल्म "उड़ता पंजाब" विवाद में बाम्बे हाईकोर्ट अपना फ़ैसला सोमवार को सुनाएगा लेकिन सिर्फ़ लिफ़ाफ़ा देखकर मजमून भांपने की तर्ज़ पर सभी को पता चल ही गया होगा कि फ़ैसला क्या आने वाला है। हाईकोर्ट ने इस विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा कि "यह दर्शकों को तय करने दें कि उन्हें क्या देखना है। कोर्ट ने यह भी कहा कि फ़िल्म सेंसर बोर्ड का कार्य फ़िल्म का सर्टिफ़िकेशन करना है फ़िल्म को सेंसर करना नहीं।" मैं उच्च न्यायालय का सम्मान करते हुए कहना चाहता हूं कि क्या किसी आपत्तिजनक सामग्री वाली फ़िल्म (यदि है तो) को सिर्फ़ इस आधार पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है कि इसे देखने का निर्णय दर्शक करेंगे, नहीं। क्योंकि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग तो बहुत कुछ आपत्तिजनक भी देखना पसन्द करता है और लुक-छिप कर देखता भी है। जब दर्शकों की पसन्द-नापसन्द ही आधार है तो यदा-कदा "पोर्न साइट्स" पर क्यों बैन लगाने की मांग उठती है। फ़िर क्यों किसी विधायक को विधानसभा में "पोर्न वीडियो" देखने पर निलंबित कर दिया जाता है? किसी भी अश्लील या आपत्तिजनक सामग्री को समाज में प्रवाहित होने से बचाना मार्गदर्शकों का दायित्व है। एक ज़माना था जब अत्यधिक हिंसक कथानकों वाली फ़िल्में भी सेंसर बोर्ड से पास नहीं होती थीं। फ़िल्मों के माध्यम से आज का युवा अपना आदर्श गढ़ता है, वह फ़िल्म के नायक की भांति अपने आप को बनाना चाहता है यदि फ़िल्म किसी ऐसे नायक को प्रस्तुत करती है जो सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन करता हो तो ऐसी फ़िल्मों को निश्चित ही सार्वजनिक प्रस्तुतिकरण से रोकना चाहिए। आज जहां बच्चे-बच्चे के हाथों में इंटरनेट युक्त मोबाईल है द्रुत गति से चलने वाला इंटरनेट हैं वहां आप कहां इस बात का निर्णय दर्शकों पर छोड़ सकते हैं कि उन्हें क्या देखना है ये वही तय करें। जैसा कि माननीय उच्च न्यायालय ने कहा कि फ़िल्म सेंसर बोर्ड का कार्य फ़िल्म का सर्टिफ़िकेशन करना है, तो फ़िल्म सेंसर बोर्ड वही कार्य तो कर रहा था। मेरी जानकारी के अनुसार फ़िल्म "उड़ता पंजाब" को "" सर्टिफ़िकेट दिया जा रहा था जिस पर निर्माता-निर्देशकों को आपत्ति थी। इस पर फ़िल्म सेंसर बोर्ड ने "यू" सर्टिफ़िकेट जारी करने के लिए फ़िल्म के ८९ सीन को काटने का सुझाव दिया। मैं यहां निर्माता-निर्देशकों से पूछना चाहता हूं कि यदि फ़िल्म की सामग्री आपत्तिजनक है तो फ़िर सर्टिफ़िकेट भी उसी अनुरूप क्यों नहीं दिया जाना चाहिए। क्योंकि ज़माना भले ही कितना बदल गया हो आज भी समाज में सभ्य व्यक्ति का "" सर्टिफ़िकेट वाली फ़िल्म देखना सभ्यता की निशानी नहीं माना जाता। आज भी बहुत से दर्शक फ़िल्म देखने या ना देखने का निर्णय फ़िल्म को दिए गए "" या "यू" सर्टिफ़िकेट को देखकर करते हैं। जब इसी सर्टिफ़िकेशन में धांधली होगी को माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार दर्शक यह तय कैसे करेंगे कि उन्हें क्या देखना है और क्या नहीं।