बुधवार, 28 दिसंबर 2016

पंचांग की त्रुटि -

हिन्दू नववर्ष आने वाला है। नववर्ष के आगमन के साथ ही पण्डित व ज्योतिषीगण नया पंचांग क्रय करते हैं। नवीन पंचांगों में सबसे ऊपर नए "संवत्सर" का नाम व संख्या प्रकाशित की जाती है। इस वर्ष "साधारण" (२०७४) नाम का संवत्सर प्रारम्भ होने जा रहा है। एक ज्योतिषी होने के नाते जब मैंने आज नवीन पंचांग क्रय किए तो "संवत्सर" का नाम देखते ही मुझे पिछले वर्ष की एक घटना याद आ गई जो "निर्णय सागर पंचांग" (नीमच, म.प्र.) से सम्बन्धित है। घटना कुछ इस प्रकार है कि मैंने प्रतिवर्षानुसार जब पिछले वर्ष हिन्दू नववर्ष के अवसर पर पंचांग क्रय किए तो देखा कि "निर्णय सागर पंचांग" में संवत्सर का नाम त्रुटिवश "सौम्य" के स्थान पर "साधारण" (यह आगामी संवत्सर का नाम है) छपा हुआ है जबकि अन्य सभी पंचांगों में तत्कालीन संवत्सर का नाम सही छपा हुआ था। मैंने "निर्णय सागर पंचांग" की इस त्रुटि की ओर ध्यानाकर्षण कराना अपना दायित्व समझते हुए उनके कार्यालय को पत्र लिखकर इस सम्बन्ध में सूचित किया। कुछ दिनों बाद मुझे "निर्णय सागर पंचांग" के कार्यालय से एक फोन आया। फोन करने वाले महानुभाव (जिनका नाम मुझे स्मरण नहीं है) ने अपने कुतर्कों के माध्यम से इस त्रुटि को सही ठहराने का असफ़ल प्रयास किया। मैंने उनके कुतर्कों से असहमत होते हुए बात समाप्त कर दी। आज जब मैंने नववर्ष हेतु नवीन पंचांग क्रय किए तो "निर्णय सागर पंचांग" में संवत्सर का नाम पुन: "साधारण" छपा हुआ पाया (जो कि इस वर्ष सही है)। शास्त्रों में संवत्सरों के नाम उनके क्रम के अनुसार दिए गए हैं, एक संवत्सर के बीतने के बाद दूसरा संवत्सर ठीक वैसे ही आता है जैसे अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार जनवरी के बाद फरवरी और हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार चैत्र के बाद वैशाख। उसी प्रकार "सौम्य" (२०७३) के बाद "साधारण" (२०७४) संवत्सर के आने का क्रम है और "साधारण" के बाद "विरोधकृत" (२०७५) नामक संवत्सर आएगा। यदि पिछले वर्ष "निर्णय सागर पंचांग" द्वारा प्रकाशित संवत्सर का नाम सही था जैसा कि उनके कार्यालय ने अपने कुतर्कों के आधार पर सिद्ध करने की कोशिश की थी तो इस वर्ष "निर्णय सागर" पंचांग में संवत्सर का नाम "विरोधकृत" प्रकाशित होना चाहिए था, किन्तु ऐसा नहीं है। इसका आशय यह है कि वे स्वयं भी यह जानते थे कि पिछले वर्ष के पंचांग में संवत्सर का नाम प्रकाशित करने में उनसे त्रुटि हुई है किन्तु उन्होंने हठधर्मिता के चलते अपनी इस त्रुटि को स्वीकार नहीं किया अपितु अपने कुतर्कों के माध्यम से इसे सही ठहराने का असफल प्रयास भी किया। इस प्रकार हठधर्मितापूर्वक अपनी त्रुटि को उचित ठहराए जाने के "निर्णय सागर पंचांग" कार्यालय के व्यवहार की मैं कड़ी निन्दा व भर्त्सना करता हूं। मेरे देखे त्रुटि करना करना मानवीय स्वभाव है किन्तु त्रुटि को स्वीकारना सज्जन का स्वभाव है लेकिन अपनी त्रुटि को सुधारना सन्त का स्वभाव है। अब ज़रा सोचिए जिन पंचांगों को आधार मानकर पण्डित व ज्योतिषीगण ग्रह-नक्षत्र आदि की गणना करते हैं आज के दौर में वे पंचांग कितने प्रामाणिक हैं!

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

"कुबेर" नहीं "अर्थपिशाच" कहिए

अभी-अभी एक न्यूज़ चैनल पर खबर देखी कि एक वकील का कालधन पकड़ाया। खबर के तथाकथित विद्वान सम्पादक ने खबर का शीर्षक किया "कालेधन के कुबेर"....ऐसी ही यदि कहीं कोई कुकृत्य करता पाया जाता है तो उस खबर का शीर्षक देते हैं....."रासलीला"। मुझे इस प्रकार के शीर्षकों से सख़्त आपत्ति है मैं इस प्रकार की शब्दावली की कड़ी निन्दा करता हूं। हिन्दू धर्म के सहिष्णु होने का यह तो अर्थ नहीं कि उनके आराध्य को चाहे जिसके साथ सम्बद्ध कर दें। हिन्दू धर्म में कुबेर खज़ाने अर्थात धन का अधिपति व रक्षक माना गया है। मैं इन ख़बरनबीसों से पूछना चाहता हूं क्या कुबेर के खजाने का धन कालाधन था? ऐसे ही क्या "रासलीला" कोई व्यभिचार कर्म था? यदि नहीं तो इस प्रकार के कुकृत्यों के साथ ऐसे पवित्र प्रतीकों को क्यों सम्बन्धित किया जाता है और कोई शंकराचार्य आवाज़ नहीं उठाता, कोई पंडित मौन नहीं तोड़ता। इस प्रकार के कालेधन के स्वामियों को नाम ही देना है तो इन्हें "अर्थपिशाच" कहिए कुबेर कहकर क्यों हिन्दू धर्म का अपमान करते हैं। मैं पुन: इस प्रकार की शब्दावली की घोर भर्त्सना करता हूं।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

हम "कैशलेस" से पहले "कैरेक्टर लैस" ना हो जाएं

यदि आप अपने १०० परिचितों और मित्रों से पूछें कि आपके घर एलसीडी है तो लगभग सभी का जवाब "हां" होगा। आप उन्हीं मित्रों से पुन: पूछें कि आपके घर में फ्रिज,एसी,वाशिंग मशीन, माइक्रोवेब, कम्प्यूटर,दुपहिया वाहन इत्यादि है? तो भी जवाब बहुमत से "हां" में ही मिलेगा। मेरे कहने का आशय है कि विलासिता से जुड़ी किसी भी वस्तु के बारे में आप अपने मित्रों और परिचितों से पूछें तो जवाब ९९ फ़ीसदी "हां" में ही आएगा लेकिन जब इन्हीं १०० मित्रों और परिचितों से आप पूछेंगे कि आपके घर में आपका अपना निजी पुस्तकालय है? चलिए पुस्तकालय को छोड़िए बस इतना पूछ लीजिए कि आप इन दिनों कौन सी पुस्तक पढ़ रहे हैं? तो ९९.९९ फ़ीसदी का जवाब "ना" में आएगा। मेरे देखे यह गंभीर चिन्ता का विषय है। आज हम पुस्तकों से दूर होते जा रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी में पुस्तकों के प्रति कोई रुझान ही नहीं है ऐसे में वे अपने देश की साहित्यिक विरासत को क्या समझेंगे। कहीं ऐसा ना हो कि "कैशलेस" होने से पहले भारत "कैरेक्टर लैस" हो जाए। यदि इसे रोकना है तो अपने घर में विलासिता की वस्तुओं के साथ-साथ एक छोटा सा पुस्तकालय अवश्य बनाईए।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

हमारे षोडश संस्कार

जानिए षोडश संस्कारों एवं उनके करने का शास्त्रोक्त समय-
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१. गर्भाधान संस्कार- सायंकाल, व्रतादि तिथियों एवं श्राद्ध तिथियों को छोड़कर किसी भी शुभ मुहूर्त में।
२. पुंसवन संस्कार- गर्भस्थापन के दूसरे या तीसरे माह में।
३. सीमान्तोन्न्यन संस्कार- गर्भस्थापन के छठे या आठवें माह में।
४. जातकर्म संस्कार- प्रसवपीड़ा होने पर।
५. नामकरण संस्कार- जन्म के ग्यारहवें या बाहरवें दिन।
६. निष्क्रमण संस्कार (बाहर घुमाना)- नामकरण संस्कार के दूसरे दिन या जन्म के चौथे माह में।
७. अन्नप्राशन संस्कार- जन्म के पांच माह के बाद और छ: माह के अन्दर।
८. चूड़ाकर्म संस्कार (मुण्डन)- ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य का जन्म के प्रथम वर्ष अथवा तीसरे वर्ष में।
९. कर्णवेध संस्कार- जन्म के तीसरे या पांचवे वर्ष में।
१०. उपनयन (जनेऊ) संस्कार- ब्राह्मण का आठवें वर्ष में, क्षत्रिया का ग्यारहवें वर्ष में व वैश्य का बारहवें वर्ष में।
११. वेदारम्भ संस्कार- उपनयन संस्कार वाले दिन अथवा उससे तीसरे दिन।
१२. समावर्तन संस्कार- वेदाध्ययन समाप्त होने पर। ब्राह्मणों का केशान्त कर्म सोलहवें वर्ष में, क्षत्रिय का बाईसवें वर्ष में और वैश्य का चौबीसवें वर्ष में होना चाहिए।
१३. विवाह संस्कार- विवाह की उचित आयु होने पर।
१४. आवस्थ्याधान संस्कार- विवाह के पश्चात।
१५. श्रोताधान संस्कार- आवस्थ्याधान संस्कार के पश्चात।
१६. अन्तेष्टि संस्कार- मृत्यु होने पर।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2016

देवी विसर्जन का महत्त्व-

 हमारे सनातन धर्म में हर पर्व का एक ख़ास महत्त्व होता है। देवी विसर्जन या गणेश विसर्जन का भी बहुत गूढ़ अर्थ है। देवी या गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन हमारी साधना की प्रगति को इंगित करता है। जब साधना का प्रथम चरण होता है तब हमें किसी ना किसी आधार की; किसी ना किसी अवलम्बन की आवश्यकता होती है किन्तु जब साधना की पूर्णता होनी होती है तब हमें सारे आधार गिराने होने होते हैं, सारे आकार विसर्जित करने पड़ते हैं तभी हम उस निराकार को जान पाते हैं। निराकार से मेरा तात्पर्य है जिसका कोई एक निश्चित आकार ना हो अपितु सारे आकर उसी के हों, वही सच्चे अर्थों में निराकार है। यह विसर्जन की क्रिया उसी का संकेत मात्र है कि जिस देवी प्रतिमा की हमने इतने दिनों तक साकार रूप में पूजा की अन्तिम दिन उसी आकार को जाकर विसर्जित कर समष्टि से एकाकार कर आए। पहले सिर्फ़ एक प्रतिमा हमारे लिए आराध्य थी किन्तु विसर्जन के पश्चात पूरी स्रष्टि ही हमारे लिए परमात्मा की प्रतिमा का प्रकट स्वरूप बन कर आराध्य हो जाती है। मेरे देखे जब क्षुद्र मिटता है तभी विराट मिलता है।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सोमवार, 10 अक्तूबर 2016

परम्पराओं को रूढ़ रूप में ना मानें

आज विजयदशमी है। यह दिन विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। हम हमारी शास्त्रीय परम्पराओं को कैसे बिना जाने; बिना समझे एक रस्म अदायगी कर देते हैं इसका एक उदाहरण आज के दिन आपको घर-घर में देखने को मिलेगा जब लोग अपने वाहनों को धोकर उनकी पूजा करेंगे। कई उत्साही श्रद्धालुजन मां नर्मदा के जल में वाहनों को खड़ा कर पवित्र करने का प्रयास भी करते नज़र आएंगे लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस प्रकार वाहनों की पूजा की परम्परा का प्रारम्भ कहां से हुआ? शायद नहीं, क्योंकि शास्त्र में आज के दिन शस्त्र पूजन एवं अश्व पूजन का विधान है क्योंकि ये दोनों ही युद्ध में प्रयुक्त होते हैं। हमारा सनातन धर्म हमें कृतज्ञता ज्ञापित करना सिखाता है, प्रत्येक उस वस्तु के प्रति जिसने हमें कुछ प्रदान किया है। हम समय- समय पर उनके प्रति अपना अनुग्रह व धन्यवाद अर्पित करते हैं। चाहे वह पर्वत हों, नदियां हों, पशु हों या फ़िर यह सम्पूर्ण प्रकृति ही क्यों ना हो। मेरे देखे परम्पराओं को बिना जाने; बिना उनका भाव समझे केवल रूढ़ रूप उन्हें मानकर रस्म अदायगी कर देना सर्वथा अनुचित है।

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

"आंख तो फ़ूटी अंजन काहे"

कल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शस्त्र पूजा का कार्यक्रम में जाने सुअवसर प्राप्त हुआ। मैंने वहां खेल रहे कुछ बच्चों से बातचीत की तो एक ऐसी घटना हुई जिससे मन बहुत आहत हो गया। घटना कुछ इस प्रकार है कि- मैंने वहां एक लड़के (जिसकी आयु ९-१० वर्ष की होगी) से पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है तो फ़र्राटेदार अंग्रेजी में बोला- My Name is Varun. यह सुनते ही मैंने उसे कहा कि बेटा अब यही बात हिन्दी में बोलो तो उसने इसे कुछ इस अंदाज़ में कहा- मेरा नाम हेगा बरुन। यह सुनकर मैं आहत हो गया मैंने वहां संघ के एक पदाधिकारी से कहा कि देखिए यह मैकाले की शिक्षा पद्धति का दुष्परिणाम। इसीलिए हमारे शास्त्र कहते हैं "आंख तो फ़ूटी अंजन काहे"।

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

भारत की जन्मपत्रिका: एक भ्रामक दुष्प्रचार

भारतवर्ष की कुण्डली का विश्लेषण समय-समय पर ज्योतिषीगण करते ही रहते हैं। आज पहली बार मैं इस मुद्दे पर अपना मत प्रकट कर रहा हूं-

१.जड़ वस्तु का ज्योतिषीय विश्लेषण नहीं-
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मेरे देखे किसी भी जड़ वस्तु का ज्योतिषीय विश्लेषण नहीं हो सकता फ़िर चाहे वह देश हो, खेत-खलिहान हो या मकान इत्यादि। उनके ज्योतिषीय विश्लेषण के लिए वह जिस व्यक्ति के आधिपत्य में है उसकी जन्मपत्री का विश्लेषण किया जाना चाहिए ना कि उस वस्तु का। जैसे यदि किसी राज्य का विश्लेषण करना हो तो वह उसके राजा की जन्मपत्री के आधार पर किया जाएगा।
२. भारत की  प्रचलित कुण्डली ही गलत है-
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यदि हम यह मान भी लें कि भारतवर्ष की कुण्डली के आधार पर भारत के भविष्य के सम्बन्ध में कुछ भविष्यवाणियां की जा सकती हैं तो उसके लिए भारत की प्रामाणिक जन्मपत्रिका का होना आवश्यक है। अभी तक तथाकथित ज्योतिषीगण जिस जन्मपत्री को भारत की जन्मपत्रिका बताकर उसका विश्लेषण करते हैं वह जन्मपत्रिका सर्वथा असत्य व गलत है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि जन्मपत्रिका के निर्माण के लिए जातक के जन्म की सही दिनांक, समय व स्थान की आवश्यकता होती है। भारत के सम्बन्ध में यह तीनों ही अप्राप्त हैं अब आप शायद मेरी बातों का विश्वास ना करें क्योंकि आप कहेंगे भारत का जन्म तो १५ अगस्त सन १९४७ को रात्रि १२:०० बजे हुआ था। भारतवर्ष की बताई जाने वाली जन्मपत्रिका भी इसी समय व दिनांक के आधार पर बनी हुई होती है लेकिन यह पूर्णत: गलत है क्योंकि जन्म तो "पाकिस्तान" का हुआ था ना कि भारत का, भारत का तो विभाजन हुआ था। विभाजन के आधार पर यदि भारत का जन्म माने तो भारत का विभाजन तो इससे पूर्व भी कई बार हो चुका था। अत: भारत के जन्म अर्थात निर्माण के सम्बन्ध में कोई दिनांक व समय प्राप्त ही नहीं है तो फ़िर जन्मपत्रिका का निर्माण कैसे हो?
३. समान कुण्डली-
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१४ एवं १५ अगस्त को रात्रि १२:०० बजे को आधार मानकर निर्माण की जाने वाली कुण्डलियों में चन्द्र को छोड़कर सभी ग्रहों व लग्नादि की समानता है क्योंकि ग्रह परिवर्तन सामान्यत: कम से कम १ माह में ही होता है। अत: जब कुण्डली एक ही समान हैं तो फ़लित विलग-विलग कैसे संभव है? इसका निर्णय आप स्वयं कीजिए।
४. विभाजन के आधार पर समय अलग नहीं हो सकता-
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हम यदि भारत के विभाजन को भी जन्मपत्रिका निर्माण का आधार मानें जो कि सर्वथा गलत है तो भी विभाजन का समय अलग-अलग नहीं हो सकता। जिस दिन पाकिस्तान का निर्माण किया गया ठीक उसी समय वर्तमान भारत भी अस्तित्व में आ गया फ़िर दोनों देशों का निर्माण समय अलग-अलग कैसे हुआ? स्वतंत्रता या परतंत्रता ज्योतिष का आधार नहीं हो सकती।
अत: उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतवर्ष की कुण्डली बनाकर उसका फ़लित व भविष्य विश्लेषण सम्बन्धी बातें करना नितांत असत्य व भ्रामक हैं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

पत्रकारिता कोई फ़ैशन की वस्तु नहीं है


आज सुबह जब अख़बार देखा तो उसमें अपने परिजन के शव को कांधे या मोटर साईकल पर ढोने दो ख़बरें, कल के अख़बार में इसी प्रकार की ख़बर थी। कुछ ऐसा ही हाल न्यूज़ चैनलों का भी है।  वहां भी इसी प्रकार की ख़बरें विगत कुछ दिनों से निर्बाध रूप से चल रहीं हैं। आपने भी कुछ समय से यह महसूस कर रहे होंगे कि जब कोई प्रतिष्ठित अख़बार या न्यूज़ चैनल कोई विशेष ख़बर जैसे "पढ़ाई के तनाव में बच्चों द्वारा की गई आत्महत्या, रिश्तेदारों द्वारा किया गया दुष्कर्म या हत्या, पलायन, धार्मिक उन्माद इत्यादि" दिखाता या प्रकाशित करता है तो अन्य न्यूज़ चैनल व अख़बारों में भी "महाजनो येन गत: स पन्था: ..." की तर्ज पर ठीक उसी विषय पर आधारित ख़बरों को प्रकाशित करने की होड़ लग जाती है। यह भी संभव है कि उन्हें ऐसा करने के लिए चैनल की ओर से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के जैसे लक्ष्य (टारगेट) दिए गए हों। यह सब तीन-चार दिन तक चलता रहता है फ़िर इस प्रकार की "खबरें" अचानक मौसमी फ़ल-फ़ूल की तरह गायब हो जाती हैं। मैं इसी ऊहापोह में हूं कि क्या यह महज़ संयोग है! यदि संयोग है तो बहुत अद्भुत संयोग है, किन्तु कुछ और है; तो निश्चित ही हमें वर्तमान पत्रकारिता के बारे में विचार करना पड़ेगा, क्योंकि मेरी समझ से घटनाएं न्यूज़ चैनलों की रिपोर्टिंग के आधार पर नहीं घटतीं वे तो घटतीं ही रहती हैं। यह अलग बात है कि हर घटना "ख़बर" या "ब्रेकिंग न्यूज़" ना बन पाएं। मेरे देखे पत्रकारिता कोई फ़ैशन की वस्तु नहीं है। जिस प्रकार केश सज्जा या परिधानों की फ़ैशन का एक दौर होता है जब चहुंओर उसी प्रकार की वस्तुएं दिखाई देती हैं ठीक इसी प्रकार आज "खबरें" भी शनै: शनै: फ़ैशन की वस्तुएं बनती जा रही है। मेरे देखे पत्रकारिता कोई फ़ैशन नहीं है। रिपोर्टिंग सामाजिक सरोकारों एवं संवेदनात्मक आधार पर होनी चाहिए, प्रतिस्पर्धा के आधार पर नहीं। आज कितने ऐसे न्यूज़ चैनल या अख़बार हैं जो सकारात्मक या समाज को दिशा देने वाली ख़बरों को प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं? आज समाज के ख़लनायकों को टी.वी पर दिखा-दिखाकर या प्रतिदिन उनसे जुड़ी ख़बरें प्रकाशित कर करीब-करीब उन्हें नायक ही बना दिया जाता है और वे लोग जो वास्तविक रूप में समाज के नायक हैं कहीं दूर-दराज़ के क्षेत्रों में नितान्त एकान्त में समाज सुधार के अपने कार्य में लगे रहते हैं। आज उन्हें एवं उनके कार्यों को समाज के सम्मुख उपस्थित करने की महती आवश्यकता है। जिससे समाज के अन्य लोग भी उनके कार्यों को देखकर प्रेरित हो सकें। विकास सिर्फ़ सरकारों का दायित्व नहीं है इसमें सामाजिक सहभागिता की भी बहुत आवश्यकता है और यह बिना सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन के सम्भव नहीं है। आज भी कई ऐसे न्यूज़ चैनल और अख़बार हैं जो वास्तविक पत्रकारिता कर रहे हैं किन्तु उनकी संख्या सीमित है। देश का यह चौथा स्तंभ आज बुरी तरह प्रकम्पित है इससे पूर्व की वह कटी पतंग की भांति लहराकर ज़मींदोज़ हो जाए उसे स्थिर करना होगा; सशक्त करना होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया कि देश व समाज का भविष्य प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेगा।
-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया


मंगलवार, 16 अगस्त 2016

अखण्ड भारत-


जानिए "अखण्ड भारत" कब-कब खण्ड-खण्ड हुआ-
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अफ़गानिस्तान-१८७६
नेपाल-१९०४
भूटान-१९०६
तिब्बत-१९१४
म्यांमार (बांग्लादेश)-१९३७
श्रीलंका-१९३९
बांग्लादेश-१९४७
पाकिस्तान-१९४७
पाक अधिकृत कश्मीर-१९४८
अक्षयचीन-१९६२

आजादी की ख़बर

१५ अगस्त १९४७ का "हिन्दुस्तान" समाचार पत्र की मूल प्रति-

शनिवार, 13 अगस्त 2016

लार्ड मैकाले का पत्र

भारत में शिक्षा नीति के जनक कहे जाने वाले लार्ड मैकाले ने सन १८३६ में अपने पिता को एक पत्र लिखा था जिसमें उसने कहा था-
"अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण करने वाला कोई हिन्दू अपने धर्म प्रति सच्ची निष्ठा नहीं रख सकता। यदि हमारी शिक्षा-पद्धति को अपनाया गया तो ३० वर्ष बाद बंगाल में एक भी मूर्तिपूजक नहीं रह जाएगा और यह सब धर्मांतरण के पचड़े में पड़े बिना ही हो जाएगा। लोगों का एक ऐसा वर्ग तैयार हो जो देखने में तो भारतीय हो, लेकिन रुचि, विचार, मन और बुद्धि से अंग्रेज हो।"
(....और देश बंट गया से साभार)

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

भारत का "भरत" कौन...!

भारतवर्ष में जन्म लेने वाले हर हिन्दू अभी तक यही मान्यता रही है कि भारत का नाम दुष्यंत-शकुन्तला के पुत्र "भरत" पर रखा गया है, लेकिन यह सच नहीं है। चौंकिए मत...ऐसा दावा किया है श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली के सहायकाचार्य डा. अनेकान्त कुमार जैन ने, जिनका मानना है कि भारतवर्ष का नाम दुष्यंत-शकुन्तला के पुत्र "भरत" पर नहीं बल्कि ऋषभदेव के प्रथम पुत्र चक्रवर्ती सम्राट "भरत" के नाम पर पड़ा है। इस बात के समर्थन में डा. जैन कई तथ्य प्रस्तुत करते हैं। उनका मानना है कि आधुनिक शोधों के परिणाम से स्पष्ट है कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के प्रथम पुत्र चक्रवर्ती सम्राट "भरत" के नाम पर ही इस देश का नाम "भारत" पड़ा है और इससे पूर्व ऋषभदेव के पिता "नाभिराय" के नाम पर इस देश का नाम "अजनाभवर्ष" था। डा. जैन के अनुसार पुराणों में दर्जनों श्लोक ऐसे हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि ऋषभदेव के पुत्र "भरत" के नाम पर ही इस देश का नाम "भारत" पड़ा है। दरअसल भरत के नाम से चार प्रमुख व्यक्तित्व भारतीय परम्परा में जाने जाते हैं।
१. तीर्थंकर ऋषभदेव के प्रथम पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत
२. राजा रामचन्द्र के अनुज भरत
३. राजा दुष्यन्त के पुत्र भरत
४. नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत
डा. जैन के मतानुसार इन चारों विकलों में केवल प्रथम विकल्प के ही शिलालेखीय तथा शास्त्रीय साक्ष्य प्राप्त हैं। अग्निपुराण में स्पष्ट लिखा है-
"ऋषभो मरूदेव्यां च ऋषभाद् भरतोऽभवत्।
ऋषभोऽदात् श्री पुत्रे शाल्यग्रामे हरिंगत:,
भरताद् भारतं वर्ष भरतात् सुमतिस्त्वभूत॥"
वहीं स्कन्द पुराण के अनुसार-
"नाभे: पुत्रश्च ऋषभ ऋषभाद भरतोऽभवत्।
तस्य नाम्ना त्विदं वर्षं भारतं चेति कीर्त्यते॥"
(माहेश्वर खण्ड)
ऐसा ही उदाहरण मार्कण्डेय पुराण में भी मिलता है। डा. जैन, डा. वासुदेव शरण अग्रवाल की पुस्तक "मार्कण्डेय पुराण का अध्ययन" का उल्लेख करते हुए कहते हैं जिसमें डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ने अपनी भूल स्वीकारते हुए लिखा है कि-"मैंने अपनी "भारत की मौलिकता" नामक पुस्तक में दौषयन्ति-भरत से "भारतवर्ष" लिखकर भूल की थी, इसकी ओर कुछ मित्रों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया उसे अब सुधार लेना चाहिए।"
कुछ विद्वान भी इस तथ्य से अपरिचित होंगे कि आर्यखण्ड रूप इस भारतवर्ष का एक प्राचीन नाम "नाभिखण्ड" या "अजनाभवर्ष" भी इन्हीं ऋषभदेव के पिता अजनाभ के नाम से प्रसिद्ध था। नाभिराज का एक नाम "अजनाभ" भी था। श्रीमदभागवत (५/७/३) में कहा है कि-
"अजनाभं नामैतदवर्षभारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति।"
प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका "हंस" के अक्टूबर २००२ के अंक के अतिथि सम्पादक प्रेमकुमार मणि के सम्पादकीय में भी उल्लेख मिला है कि मिथकीय कथा के अनुसार भारत का नाम दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर पड़ा"। डा. अनेकान्त जैन के द्वारा प्रस्तुत तथ्य और ऐतिहासिक प्रमाणों से भले यह बात पूर्णरूपेण सिद्ध ना होती हो कि भारतवर्ष का नाम ऋषभदेव के प्रथम पुत्र "भरत" के नाम पर पड़ा किन्तु उनके तर्कों से भारत का नाम दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र "भरत" पर पड़ा इस बात पर संदेह अवश्य होता है।

-(साभार-वैचारिकी जुलाई-अगस्त २०१२, पेज न.९६)
- सन्दर्भ: ("किस भरत का भारत" लेखक- डा. अनेकान्त कुमार जैन)

म.प्र. विधानसभा अध्यक्ष से भेंट


म.प्र. विधानसभा अध्यक्ष डा. सीताशरण शर्मा को "ज्योतिष: एक रहस्य" की प्रति भेंट करते हुए ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

"उड़ता पंजाब"


फ़िल्म "उड़ता पंजाब" विवाद में बाम्बे हाईकोर्ट अपना फ़ैसला सोमवार को सुनाएगा लेकिन सिर्फ़ लिफ़ाफ़ा देखकर मजमून भांपने की तर्ज़ पर सभी को पता चल ही गया होगा कि फ़ैसला क्या आने वाला है। हाईकोर्ट ने इस विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा कि "यह दर्शकों को तय करने दें कि उन्हें क्या देखना है। कोर्ट ने यह भी कहा कि फ़िल्म सेंसर बोर्ड का कार्य फ़िल्म का सर्टिफ़िकेशन करना है फ़िल्म को सेंसर करना नहीं।" मैं उच्च न्यायालय का सम्मान करते हुए कहना चाहता हूं कि क्या किसी आपत्तिजनक सामग्री वाली फ़िल्म (यदि है तो) को सिर्फ़ इस आधार पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है कि इसे देखने का निर्णय दर्शक करेंगे, नहीं। क्योंकि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग तो बहुत कुछ आपत्तिजनक भी देखना पसन्द करता है और लुक-छिप कर देखता भी है। जब दर्शकों की पसन्द-नापसन्द ही आधार है तो यदा-कदा "पोर्न साइट्स" पर क्यों बैन लगाने की मांग उठती है। फ़िर क्यों किसी विधायक को विधानसभा में "पोर्न वीडियो" देखने पर निलंबित कर दिया जाता है? किसी भी अश्लील या आपत्तिजनक सामग्री को समाज में प्रवाहित होने से बचाना मार्गदर्शकों का दायित्व है। एक ज़माना था जब अत्यधिक हिंसक कथानकों वाली फ़िल्में भी सेंसर बोर्ड से पास नहीं होती थीं। फ़िल्मों के माध्यम से आज का युवा अपना आदर्श गढ़ता है, वह फ़िल्म के नायक की भांति अपने आप को बनाना चाहता है यदि फ़िल्म किसी ऐसे नायक को प्रस्तुत करती है जो सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन करता हो तो ऐसी फ़िल्मों को निश्चित ही सार्वजनिक प्रस्तुतिकरण से रोकना चाहिए। आज जहां बच्चे-बच्चे के हाथों में इंटरनेट युक्त मोबाईल है द्रुत गति से चलने वाला इंटरनेट हैं वहां आप कहां इस बात का निर्णय दर्शकों पर छोड़ सकते हैं कि उन्हें क्या देखना है ये वही तय करें। जैसा कि माननीय उच्च न्यायालय ने कहा कि फ़िल्म सेंसर बोर्ड का कार्य फ़िल्म का सर्टिफ़िकेशन करना है, तो फ़िल्म सेंसर बोर्ड वही कार्य तो कर रहा था। मेरी जानकारी के अनुसार फ़िल्म "उड़ता पंजाब" को "" सर्टिफ़िकेट दिया जा रहा था जिस पर निर्माता-निर्देशकों को आपत्ति थी। इस पर फ़िल्म सेंसर बोर्ड ने "यू" सर्टिफ़िकेट जारी करने के लिए फ़िल्म के ८९ सीन को काटने का सुझाव दिया। मैं यहां निर्माता-निर्देशकों से पूछना चाहता हूं कि यदि फ़िल्म की सामग्री आपत्तिजनक है तो फ़िर सर्टिफ़िकेट भी उसी अनुरूप क्यों नहीं दिया जाना चाहिए। क्योंकि ज़माना भले ही कितना बदल गया हो आज भी समाज में सभ्य व्यक्ति का "" सर्टिफ़िकेट वाली फ़िल्म देखना सभ्यता की निशानी नहीं माना जाता। आज भी बहुत से दर्शक फ़िल्म देखने या ना देखने का निर्णय फ़िल्म को दिए गए "" या "यू" सर्टिफ़िकेट को देखकर करते हैं। जब इसी सर्टिफ़िकेशन में धांधली होगी को माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार दर्शक यह तय कैसे करेंगे कि उन्हें क्या देखना है और क्या नहीं।