मंगलवार, 12 मई 2015

पर्यटन विभाग की नाकामी

अपनी अष्ट दिवसीय पर्यटन यात्रा के दौरान मुझे इस देश की लचर व्यवस्था का कुरूप चेहरा देखने को मिला। हमारे अधिकतर तीर्थस्थल लूट का केंद्र बने हुए है। धर्म के नाम व्यवसायिकता अपने चरम पर है। इसमें दोष धर्माचार्यों का तो है ही साथ में हमारी राज्य व केन्द्र सरकारों का भी है जो इस लूटमार को पनपने देने में सहायक है। आखिर पर्यटन विभाग का कार्य क्या है? मुझे कहीं भी पर्यटन विभाग की उपस्थिति नहीं दिखी सिवाय होटलों के जो अत्यंत मंहगे थे। सामान्य पर्यटक उनमें प्रवेश की जुर्रत भी नहीं कर सकता। कहीं-कहीं ट्रस्ट के होटलों को देखकर मन हुआ कि काश हमारे पर्यटन विभाग के होटल इस प्रकार होते तो कितना अच्छा होता। प्राइवेट गाईड से लेकर मंदिर के बाहर लगने वाली दुकानें और आटो चालक सब के सब पर्यटक को छलने का कार्य करते हैं। क्या यह व्यवस्थाएं पर्यटन विभाग के माध्यम से सुचारू रूप से नहीं चलाई जा सकतीं? जिससे आम पर्यटक इस प्रकार बिचौलियों के हाथों ठगाने से बचे। क्या पर्यटन विभाग मंदिर परिसर के आसपास केवल पर्यटन विभाग से अनुबंधित पूजा-सामग्री की दुकानें, गाइड, और परिवहन की व्यवस्था नहीं कर सकता। जिससे उचित मूल्य पर प्रामाणिक सामग्री व जानकारी प्राप्त हो सके। यदि अपने देश के पर्यटकों के साथ ये बिचौलिए इस प्रकार का व्यवहार करते हैं तो ज़रा सोचिए विदेशी पर्यटकों का ये क्या हाल करते होंगे। मैं इस बात से चिंतित हूं विदेशी पर्यटक इस प्रकार व्यवस्थाओं से आहत हो हमारे देश की क्या छवि लेकर जाते होंगे। केवल किसी मशहूर खान से “अतिथि देवो भवः” का विज्ञापन करवाने मात्र से देश की छवि नहीं सुधरेगी। इसके लिए व्यवस्था परिवर्तन बेहद आवश्यक है।

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