मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

कालसर्प दोषः सच या झूठ..!

कालसर्प दोष एक ऐसा दुर्योग है जिसका नाम सुनते ही अधिकांश जनमानस में भय व चिंता व्याप्त हो जाती है। कुछ विद्वान शास्त्रों का आधान लेकर इसे सिरे से नकारते हैं। मेरे देखे दोनों ही गलत हैं और लोगों को भ्रमित कर रहे हैं। “कालसर्प दोष” को ना तो अत्यधिक महिमामंडित कर प्रस्तुत करना सही है और ना ही इसके अस्तित्व प्रश्नचिन्ह लगाना सही है। “कालसर्प दोष” भी जन्मपत्रिका के अन्य बुरे योगों की तरह ही एक बुरा योग है जो जीवन में दुष्प्रभाव डालता है। शास्त्रों में इसे “सर्पयोग” के नाम स्वीकार किया गया है। इसके अस्तित्व को ही नकारने वाले विद्वानों तनिक इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि जब “कर्तरी दोष” जिसमें केवल एक ग्रह और एक भाव के दो पाप ग्रह के मध्य आ जाने से उस भाव व ग्रह का शुभफ़ल नष्ट हो जाता है तो क्या सभी ग्रहों और एकाधिक भावों के पापमध्यत्व से उनका शुभफ़ल नष्ट नहीं होगा? मेरे देखे “कालसर्प दोष” मूल रूप में कर्तरी दोष ही है चूंकि राहु को शास्त्रों में “काल” कहा गया है और केतु को “सर्प” की संज्ञा दी गई है इसलिए किंचिंत इसका नाम “कालसर्प” पड़ा। काशी-वाराणासी से प्रकाशित “व्यवहारिक ज्योतिष तत्वम्” में कालसर्प दोष को सिद्ध करते हुए कहा गया है-
“राहु केतु मध्ये सप्तो विघ्ना हा कालसर्प सारिकः
 सुतयासादि सकलादोषा रोगेन प्रवासे चरणं ध्रुवम्॥”
वराहमिहिर ने अपनी संहिता “जातक नभ संयोग” में इसका “सर्पयोग” नाम से उल्लेख किया है। कल्याण वर्मा ने “सारावली” में “सर्पयोग” नाम से इसकी व्याख्या की है। इन सबसे अधिक प्रामाणिक स्वीकृति तो स्वयं द्वादश ज्योतिर्लिंग त्र्यंम्बकेश्वर के विद्वानों ने प्रदान की है जहां इस दोष की शांति का विधान प्रचलित है। यदि “कालसर्प दोष” का कोई अस्तित्व ही नहीं होता अथवा यह योग सर्वथा मिथ्या प्रचार होता तो इतने प्राचीन और मान्य ज्योतिर्लिंग त्र्यंम्बकेश्वर में यह आज तक स्वीकार कैसे किया जाता रहा? यदि “कालसर्प दोष” झूठ है तो इसका आशय यह हुआ कि हमारा सर्वाधिक मान्य तीर्थस्थान व्यवसायिकता का केन्द्र मात्र है जो व्यवसायिक लाभ के लिए “कालसर्प दोष” रूपी विज्ञापन का मिथ्या प्रचार कर रहा है। दोनों में से कोई एक ही तथ्य सत्य हो सकता है। यदि हम द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक त्र्यंम्बकेश्वर को महानता और मान्यता प्रदान करते हैं तो हमें इस योग को भी मान्यता देनी ही होगी। अतः “कालसर्प दोष” से अत्यधिक भयभीत होने और इसे अस्वीकार करने के स्थान पर जन्मपत्रिका के  अन्य बुरे योगों की भांति ही इसकी विधिवत शांति करवाएं।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

कोई टिप्पणी नहीं: