शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

संवेदनहीन पत्रकारिता

मैं पत्रकारिता और पत्रकारों का बहुत सम्मान करता हूं। कई पत्रकारों से मेरे बहुत घनिष्ठ संबंध भी हैं लेकिन किसान गजेन्द्र  की आत्महत्या को लेकर जिस प्रकार रिपोर्टिंग की जा रही है उसे देखकर बड़ी शर्म आ रही है और क्रोध भी। बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि आज के दौर के कई पत्रकारों को सवाल तक पूछने की तमीज़ नहीं है। एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल की एंकर जो बेतुके सवाल पूछने के लिए जगप्रसिद्ध हैं, वे आज भी अपने स्वभाव से विवश नज़र आईं। एक ओर जहां उनसे बात करते समय पूर्व पत्रकार और “आप” के प्रवक्ता फ़ूट-फ़ूटकर रो पड़े वहीं उनके बचकाने और बेहूदा सवाल जारी रहे। किसान गजेन्द्र की बेटी से पूछे गए उनके सवालों की बानगी देखिए-
आपको कैसा लग रहा है? आपके रिश्ते कैसे थे अपने पिता से? वो आपसे कैसी बातें करते थे? आपका परिवार किस तरह के दर्द का सामना कर रहा है?
भला एक १३-१४ वर्ष की बच्ची को जिसने अपने पिता को खो दिया हो उसे कैसा महसूस होगा क्या इसकी कल्पना एंकर महोदया नहीं सकतीं? एक बेटी से पिता के कैसे रिश्ते होते हैं? क्या इसकी भी उन्हें “बाइट” चाहिए। आखिर इस प्रकार के भावनाओं को उद्धेलित करने वाले सवाल पूछकर आप क्यों किसी के आंसुओं को बेचना चाहते हैं? आप सबकी जिम्मेदारी तय कर रहे हैं, क्या पत्रकारों की कोई जिम्मेदारी नहीं थी? क्या किसी पत्रकार ने गजेन्द्र को बचाने की कोशिश की? सारे पत्रकार तो कैमरों को ज़ूम करके मसालेदार खबर को गढ़ने में व्यस्त थे क्योंकि अगर गजेन्द्र बच जाता; तो माफ़ कीजिएगा उनकी खबर में तथाकथित वज़न नहीं आता। इस प्रकार की संवेदनहीन पत्रकारिता के चलते ही आज पत्रकारिता का स्तर दिनोंदिन गिरता जा रहा है और जब कोई “जनरल” आपको आईना दिखाता है तो आप हाय-तौबा मचाने लगते हैं। मेरा इन सारे खबरनवीसों से बस इतना ही आग्रह है कम से कम देश-काल-परिस्थिति की तो थोड़ी मर्यादा रखकर अपनी पत्रकारिता करें जिससे किसी के दुःख का मखौल ना बने।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

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