गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

“ग्रहण” को जानें

आप सभी “चंद्रग्रहण” और “सूर्यग्रहण” से तो भलीभांति परिचित हैं। ग्रहण किस प्रकार लगता है यह बताकर हम आपकी विद्वत्ता को कम करके नहीं आंक सकते। यहां हमारा उद्देश्य केवल “ग्रहण” विषयक रूढ़ियों को समाप्त करना है। ग्रहणकाल के दौरान सूतक के नाम पर मंदिरों के पट बंद कर दिए जाते हैं, भोजन करना एवं बाहर निकलना निषेध कर दिया जाता है। मोक्ष के उपरान्त स्नान का विधान है। इनमें मूल बात के पीछे तो वैज्ञानिक कारण हैं और शेष उस कारण से होने वाले दुष्प्रभावों को रोकने के उद्देश्य से बनाए गए देश-काल-परिस्थिति विषयक नियम। वैज्ञानिक कारण स्थिर होते हैं लेकिन दुष्प्रभावों को रोकने हेतु बनाए गए देश-काल-परिस्थिति विषयक नियमों को हमें वर्तमान समयानुसार अद्यतन (अपडेट) करते रहना आवश्यक होता है तभी वे अधिकांश जनसामान्य द्वारा मान्य होते हैं। मेरे देखे किसी भी नियम को स्थापित करने के पीछे दो बातें मुख्य रूप से प्रभावी होती हैं, पहली “भय” और दूसरी “लालच”। इन दो बातों को विधिवत प्रचारित कर आप कोई भी नियम समाज में स्थापित कर सकते हैं। धर्म में इन दोनों बातों का समावेश होता है। अतः हमारे धर्म नीति-निर्धारकों इन वैज्ञानिक कारणों से होने वाले दुष्प्रभावों से जन मानस को बचाने के लिए धर्म का सहारा लिया। जिससे ये दुष्प्रभाव जनसामान्य को प्रभावित ना कर सकें किंतु वर्तमान में जब हम विज्ञान से भलीभांति परिचित हैं तब भी इन नियमों के लिए धर्म का सहारा लेकर आसानी ग्राह्य ना हो सकने वाली बेतुकी दलीलें देना कुछ अनुचित सा लगता है। जिसे आज की युवा पीढ़ी स्वीकार करने से झिझकती है जैसे ग्रहण के दौरान भगवान कष्ट में रहते हैं, मंदिर के पट इसलिए बंद किए जाते हैं क्योंकि भगवान को सूतक लग जाता है, ग्रहण के दौरान किए गए पूजा-पाठ, जप-तप का कई गुना फ़ल मिलता है आदि-आदि। कितनी हास्यास्पद बातें हैं भला भगवान को कैसे कष्ट और सूतक हो सकता है? भगवान कोई व्यक्तिवादी अवधारणा नहीं बल्कि अस्तित्ववादी रूप है लेकिन जिस समय यह नियम बनाए गए  उस काल की परिस्थिति अनुसार यह उचित थे, आज नहीं है। आज तो आपको स्पष्ट रूप से यह बताना आवश्यक है कि ग्रहण के दौरान चंद्र और सूर्य से कुछ ऐसी हानिकारक किरणें उत्सर्जित होती हैं जो मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं अतः इन किरणों से बचना चाहिए और यदि इन किरणों से ना चाहते हुए भी संपर्क हो जाए तो स्नान द्वारा उनके प्रभाव को समाप्त कर लेना चाहिए। इन सब में धर्म केवल मूल उद्देश्य जो कि दुष्प्रभावों से रोकथाम है, के लिए साधन मात्र है।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

कोई टिप्पणी नहीं: