गुरुवार, 26 मार्च 2015

त्रि-आयामी है “ज्योतिष”

ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया
ज्योतिषियों से एक प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि “जब एक ही समय पर विश्व में कई बच्चे जन्म लेते हैं तो उनकी जन्मकुण्डली एक होने के बावजूद उनका जीवन भिन्न कैसे होता है?” ज्योतिष पर विश्वास नहीं करने वालों के लिए यह प्रश्न ब्रह्मास्त्र की तरह है। यह प्रश्न बड़े से बड़े ज्योतिष के जानकार की प्रतिष्ठा को ध्वस्त करने की सामर्थ्य रखता है। जब इस ब्रह्मास्त्र रूपी प्रश्न का प्रहार मुझ पर किया गया तो मैंने ढाल के स्थान पर ज्योतिष शास्त्र रूपी अस्त्र से ही इसे काटना श्रेयस्कर समझा। इस प्रश्न को लेकर मैंने बहुत अनुसंधान किया, कई वैज्ञानिकों के ब्रह्माण्ड विषयक अनुसंधान के निष्कर्षों की पड़ताल की, कई सनातन ग्रंथों को खंगाला और अपने कुछ वर्षों के ज्योतिषीय अनुभव को इसमें समावेशित करते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि किसी जातक के जीवन निर्धारण में केवल जन्म-समय ही नहीं अपितु गर्भाधान-समय और उसके प्रारब्ध (पूर्व संचित कर्म) की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस प्रकार ज्योतिष तीन आयामों पर आधारित है, ये तीन आयाम हैं-१. प्रारब्ध २. गर्भाधान ३.जन्म। इन्हीं तीन महत्वपूर्ण आयामों अर्थात् जन्म-समय, गर्भाधान-समय एवं प्रारब्ध के समेकित प्रभाव से ही किसी जातक का संपूर्ण जीवन संचालित होता है। किसी जातक की जन्मपत्रिका के निर्माण में जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है; वह है- समय। अब जन्म-समय को लेकर भी ज्योतिषाचार्यों में मतभेद है, कुछ विद्वान शिशु के रोने को ही सही मानते हैं, वहीं कुछ नाल-विच्छेदन के समय को सही ठहराते हैं, खैर; यहां हमारा मुद्दा जन्म-समय नहीं है। किसी भी जातक की जन्मपत्रिका के निर्माण के लिए उसके जन्म का समय ज्ञात होना अति-आवश्यक है। अब जन्मसमय तो ज्ञात किया जा सकता है किंतु गर्भाधान का समय ज्ञात नहीं किया जा सकता इसीलिए हमारे शास्त्रों में “गर्भाधान” संस्कार के द्वारा उस समय को बहुत सीमा तक ज्ञात करने व्यवस्था  है। यह अब वैज्ञानिक अनुसंधानों से स्पष्ट हो चुका है कि माता-पिता का पूर्ण प्रभाव बच्चे पर पड़ता है, विशेषकर मां का, क्योंकि बच्चा मां के ही पेट नौ माह तक आश्रय पाता है। आजकल सोनोग्राफ़ी और डीएनए जैसी तकनीक इस बात को प्रमाणित करती हैं। अतः जिस समय एक दंपत्ति गर्भाधान कर रहे होते हैं उस समय ब्रह्माण्ड में नक्षत्रों की व्यवस्था और ग्रहस्थितियां भी होने वाले बच्चे पर पूर्ण प्रभाव डालती हैं। इस महत्वपूर्ण तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमारे शास्त्रों में “गर्भाधान” के मुर्हूत की व्यवस्था है। गर्भाधान का दिन, समय,तिथि,वार,नक्षत्र,चंद्र स्थिति, दंपत्तियों की कुण्डलियों का ग्रह-गोचर आदि सभी बातों का गहनता से परीक्षण करने के उपरान्त ही “गर्भाधान” का मुर्हूत निकाला जाता है। अब यदि किन्हीं जातकों का जन्म इस समान त्रिआयामी व्यवस्था में होता है (जो असंभव है) तो उनका जीवन भी ठीक एक जैसा ही होगा इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि हमें इन तीन आयामों में से केवल एक ही आयाम अर्थात् जन्म-समय ज्ञात होता है, दूसरा आयाम अर्थात् गर्भाधान-समय हमें सामान्यतः ज्ञात नहीं होता किंतु उसे ज्ञात किया जा सकता है परन्तु तीसरा आयाम अर्थात् प्रारब्ध ना तो हमें ज्ञात होता है और ना ही सामान्यतः उसे ज्ञात किया जा सकता है इसलिए इस समूचे विश्व में एक ही समय जन्म लेने वाले व्यक्तियों का जीवन एक-दूसरे से भिन्न पाया जाता है। मेरे देखे ज्योतिष मनुष्य के भविष्य को ज्ञात करने की पद्धति का नाम है, ये पद्धतियां भिन्न हो सकती हैं। इन पद्धतियों को समय के साथ अद्यतन(अपडेट) करने की भी आवश्यकता है। एक योगी भी किसी व्यक्ति के बारे उतनी ही सटीक भविष्यवाणी कर सकता है जितनी एक जन्मपत्रिका देखने वाला ज्योतिषी या एक हस्तरेखा विशेषज्ञ कर सकता है और यह भी संभव है कि इन तीनों में योगी सर्वाधिक प्रामाणिक साबित हो। “ज्योतिष” एक समुद्र की भांति अथाह है इसमें जितना गहरा उतरेंगे आगे बढ़ने की संभावनाएं भी उतनी ही बढ़ती जाएंगी। जब तक भविष्य है तब तक ज्योतिष भी है। अतः ज्योतिष के संबंध में क्षुद्र एवं संकुचित दृष्टिकोण अपनाकर केवल अपने अहं की तुष्टि के लिए प्रश्न उठाने के स्थान पर इसके वास्तविक विराट स्वरूप को समझकर जीवन में इसकी महत्ता स्वीकार करना अपेक्षाकृत अधिक लाभप्रद है।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 24 मार्च 2015

रत्न धारण में सावधानी रखें

कई लोगों को रत्न धारण करने शौक होता है। कुछ अल्प ज्ञानी ज्योतिषी भी इस शौक के लिए जिम्मेवार होते हैं जिनका अक्सर रत्न बेचने वालों से बड़ा गहरा संबंध होता है इसलिए जब भी मैं किसी मित्र को रत्न ना धारण करने सलाह देता हूं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता। कुछ मित्र मायूस भी हो जाते हैं। सामान्यतः ज्योतिष के क्षेत्र में राशि रत्न, लग्नेश का रत्न, विवाह के गुरू का रत्न, तो आजकल एक नया फ़ैशन लाकेट का चल निकला है जिसमें ज्योतिषीगण लग्नेश,पंचमेश व नवमेश के रत्नों का लाकेट बनवाकर पहनने का परामर्श देते हैं। मेरे देखे ऐसा करना अनुचित है। रत्नों के धारण करने में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। रत्नों को धारण करने से पहले उन ग्रहों की जन्मपत्रिका में स्थिति व अन्य ग्रहों से संबंध का ज्ञान होना अतिआवश्यक है, चाहे वे रत्न लग्नेश अथवा राशीश के ही क्यों ना हों। यह भी देखना आवश्यक है कि जिस ग्रहा रत्न धारण कर रहे हैं वह किस ग्रह से क्या संबंध बना रहा है अथवा किस ग्रह से अधिष्ठित राशि का स्वामी है। यदि एकाधिक रत्न धारण की स्थिति बन रही हो तो वर्जित रत्नों का ध्यान भी रखा जाना आवश्यक है। पंचधा मैत्री में ग्रहों के आपसी संबंध की भी रत्न धारण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक सर्वथा गलत धारणा यह है कि रत्न हमेशा ग्रह शांति के लिए पहना जाता है जबकि वास्तविकता इसे ठीक विपरीत है, रत्न हमेशा ग्रह के बल में वृद्धि करने के लिए धारण किया जाता है। कुछ रत्न ग्रहशांति के उपरान्त अल्प समयावधि के लिए ही धारण किए जाते हैं। अतः रत्न धारण करने से पूर्व अत्यंत सावधानी रखते हुए रत्न धारण करने से पूर्व किसी श्रेष्ठ ज्योतिषी से भलीभांति परामर्श के बाद ही रत्न धारण करें अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि हो सकती है।
-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया
“प्रारब्ध ज्योतिष केन्द्र”

बुधवार, 18 मार्च 2015

बुद्धत्व


जीवन की आपाधापी में,
अक्सर जब मन घबराता है।
उस पार से कोई बुलाता है,
तन चलने को अकुलाता है।
मगर “यशोधरा” का पल्लू ,
पैरों से लिपट जाता है।
“सिद्धार्थ” रूपी  ये मन मेरा,
“बुद्ध” होते-होते रह जाता है॥

-हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 16 मार्च 2015

फ़ूलों में भी है संवेदनाएं

एक दिन मेरे मित्र जो श्रीविद्या के साधक हैं वे ढेर सारे पलाश के फ़ूलों से भरी थैली (जिसमें कुछ अधखिली कलियां भी शामिल थीं) लिए मुझसे मिलने आए। मैंने जब इतने फ़ूलों का प्रायोजन उनसे पूछा तो कहने लगे कि इन फ़ूलों से भगवती का अर्चन करूंगा। मैंने पुनः पूछा कि ये कितने फ़ूल हैं? उन्होंने उत्तर दिया कि-सवा लाख! ये सुनते ही मैं चौंक पड़ा। मैंने उनसे कहा कि आपने सिर्फ़ अपने अर्चन के लिए प्रकृति का कितना नुकसान कर दिया, आखिर प्रकृति भी तो परमात्मा का ही अंग है। इसे नुकसान पहुंचाना परमात्मा को पीड़ा पहुंचाना है, मेरे देखे यह उचित नहीं है। चूंकि उन्होंने दिन भर बड़ा अथक परिश्रम करके इन फ़ूलों को तोड़ा था और स्वभाव से वे पंडित थे सो उन्होंने मेरी इस बात का कड़ा विरोध किया। वो मुझे समझाने लगे कि फ़ूल तो ईश्वर पर चढ़ाने के लिए ही होते हैं। मैंने कहा आपको नहीं लगता कि डाल पर खिले फ़ूल पहले ही प्रकृति ने ईश्वर पर चढ़ा दिए अब और क्या चढ़ाना? और चढ़ाना ही है तो डाल से गिरे हुए फ़ूलों को चुनकर चढ़ाओं किंतु शास्त्रों में इस प्रकार की भ्रामक बातें लिखी हैं कि सवा लाख फ़ूल चढ़ाने से यह होगा, सवा लाख बेलपत्र चढ़ाने से वह होगा सो सब निकल पड़ते है पर्यावरण को हानि पहुंचाने। इस पर वे कहने लगे क्या भगवती पर फ़ूल नहीं चढ़ाएं? प्रत्युत्तर में मैंने कहा कि कोई फ़ूल का पौधा रोपित कर दो जब इसमें सवा लाख फ़ूल आएंगे तो आपका अर्चन पूर्ण हो जाएगा। इसी प्रकार की भ्रामक बातों के कारण ही हमारे धर्म पर कटाक्ष करने का अवसर अक्सर लोगों को मिल जाता है। मेरे देखे संख्या नहीं भाव महत्वपूर्ण है। यदि प्रेमपूर्ण ह्रदय से मात्र एक पांखुरी अर्पित कर दी जाए तो सवा लाख क्या सवा अरब के बराबर हो जाती है। आपने सुना है जब भगवान कृष्ण को उनकी रानियों ने अपने आभूषणों से तौलना चाहा तो वे नहीं तुले जब एक तुलसी दल पलड़े पर रखा तब भगवान आसानी से तुल गए। मगर पंडित यदि शास्त्रों से मुक्त हो जाए तो संत हो जाए। शास्त्रों में काम की बातें थोड़ी हैं और जो हैं उन्हें समझना और भी कठिन। भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक श्री जगदीशचंद्र बोस ने क्रैस्कोग्राफ़ नामक यंत्र बनाकर एक अनुसंधान किया जिसमें उन्होंने यह सिद्ध किया कि पेड़-पौधों में भी संवेदनशील स्नायु तंत्र होता है और उनका जीवन भी विभिन्न भावनाओं से युक्त होता है। प्रेम,घृणा,भय,सुख,दुःख,आनन्द,मूर्छा के प्रति असंख्य प्रकार की प्रतिक्रियाओं की भावानुभूति जिस प्रकार सब प्राणियों में होती है उसी प्रकार पेड़-पौधों में भी होती है। सनातन धर्म ने बड़ी मूल्यवान पहल की जो पत्थर की ईश्वर की प्रतिमा बनाई। उसके पीछे उद्देश्य यह था हमारी दृष्टि इतनी संवेदनशील हो जाए कि पाषाण में भी सजीव ईश्वर का दर्शन कर सके किंतु अभी तक कोमल फ़ूलों में भी जिन लोगों को संवेदना नज़र नहीं आ रही वे क्या पाषाण में इसे देख पाने में समर्थ होंगे इसमें मुझे संदेह है।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 9 मार्च 2015

ज्योतिष को “विंडो शापिंग” ना समझें

अक्सर यात्रा के दौरान या किसी समारोह में जब मैं अपना परिचय एक ज्योतिषी के रूप में देता हूं तब बड़ी रोचक प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं। कुछ लोग इसे अंधविश्वास को बढ़ाने वाली ठग विद्या सिद्ध करने के लिए कुतर्क करने लगते हैं, कुछ परीक्षक की भांति मेरे ज्ञान का परीक्षण करने लगते हैं तो कुछ झट अपनी कुण्डली निकालकर या पास ही पड़े किसी कागज़ पर कुण्डली उकेरकर फ़लित पूछने लगते हैं। मेरा इस प्रकार का व्यवहार करने वाले तमाम महानुभावों से यही निवेदन है कि ज्योतिष कोई “विंडो शापिंग” नहीं है कि आप यूं ही तफ़री के लिए बाज़ार गए वहां निरूद्देश्य दुकानों पर ताक-झांक करते हुए कोई वस्तु पसन्द आ गई और दुकानदार से मोल-भाव जम गया तो खरीद ली अन्यथा आगे बढ़ गए। यहां मुझे रामायण का रावण -वध प्रसंग स्मरण आ रहा है। जब प्रभु श्रीराम ने भूमि पर गिरे अंतिम सांसे गिनते रावण की ओर इशारा कर लक्ष्मण जी को आदेश दिया कि जाओ इस महापंडित से उपदेश ग्रहण करो तब लक्ष्मण जी रावण के सिर की ओर जाकर खड़े हो गए तब रावण ने यह कहते हुए अपना मुंह फ़ेर लिया कि लक्ष्मण जब हम किसी से कुछ ग्रहण करने जाते हैं तो याचक की भांति जाना चाहिए तब लक्ष्मण जी रावण के पैर की तरफ़ जाकर बैठे किंतु  पुनः  रावण ने यह कहते हुए मुंह फ़ेर लिया किया जब भी किसी विद्वान से भेंट करने जाओ तो खाली हाथ नहीं जाना चाहिए तब कहते हैं लक्ष्मण जी ने वहीं भूमि से एक तिनका उठाकर महापंडित रावण को भेंट किया तब जाकर रावण ने लक्ष्मण को उपदेश दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि हर कार्य की एक मर्यादा होती है; एक उचित तरीका होता है, उस मर्यादा से परे जाकर उस कार्य को करना मेरे देखे पाप करने जैसा है। विद्वानों को चाहिए कि महत्वपूर्ण कार्यों की मर्यादा एवं उचित मार्ग के संबंध में जनमानस को मार्गदर्शित करें।


-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया