शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

“हिन्दू” कोई धर्म नहीं



किसी शायर ने कहा है “लम्हों ने ख़ता की; सदियों ने सज़ा पाई”, भारतवर्ष के संदर्भ में ये लाइनें अक्सर सटीक बैठती हैं चाहे भारत विभाजन हो,चाहे कश्मीर का मुद्दा हो,हिन्दू-मुस्लिम संबंध हों या धर्म हो। इन सब मुद्दों की जड़ में छोटी-छोटी भूलें छिपी हुई हैं। “हिन्दू धर्म” को ही लें;मैंने हमेशा कहा है कि हिन्दू कोई धर्म नहीं है, हिन्दू एक परिचय है;संस्कृति है। इसे जिस धर्म के साथ संबद्ध करने की भूल की गई है वह है-“सनातन धर्म”। आज हिन्दू शब्द “सनातन धर्म” का पर्याय बन चुका है। सारी समस्याएं यहीं से प्रारंभ होती हैं। जिस प्रकार बंगाली मिठाई,कलकतिया या सोहागपुरी पान, बनारसी या चंदेरी साड़ी वास्तविक रूप से इन वस्तुओं की श्रेणी नहीं है किंतु उस जगह बनने या पैदा होने के कारण ये सब इन वस्तुओं की श्रेणी के सदृश्य भासती हैं। वहीं दूसरी ओर ये उस स्थान को इंगित करने वाली एक श्रेणी है भी। अब ये बड़ी विरोधाभासी बात है। ऐसा समझें कि मुख्य रूप से श्रेणियां दो प्रकार की हैं- पहली स्थानबोधक और दूसरी गुणबोधक। मिठाई के संदर्भ में जहां मावे से बनी,छैने से बनी,बेसन से बनी आदि, वहीं साड़ियों की बात करें तो सिल्क,जार्जेट,पोलिएस्टर;सूती इत्यादि ये सब गुणबोधक श्रेणियां है। व्यक्तियों के संदर्भ में जैसे बिहारी,बुंदेलखंडी,कानपुरी,भोपाली,इंदौरी,इलाहाबादी,बरेलवी,सरयूपारी,ये सब स्थानबोधक श्रेणियां है वैसे ही हिन्दू भी एक स्थानबोधक श्रेणी मात्र है धर्म नहीं। जिस धर्म को हिन्दू धर्म कहा जा रहा है वह तो “सनातन धर्म” है। बहुत संभव है कि प्राचीन काल में सिन्धु नदी किनारे निवास करने वाले लोग जिस धर्म का अनुपालन करते थे में उसे ही लोकाचार की भाषा में “हिन्दू धर्म” कहा जाने लगा। आज “हिन्दू” शब्द को लेकर तरह-तरह गलतफ़हमियां फ़ैलाई जा रहीं हैं। इसे धर्म विशेष से जोड़ा जा रहा है जो समाज में अराजकता और अशांति का कारण बन रहा है। हमें इसके मूल स्वरूप को देखने व समझने की नितांत आवश्यकता है।

-हेमन्त रिछारिया

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