शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

बदल रहा है “संघ”

कल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छः प्रमुख उत्सवों में से एक “मकर संक्राति” के अंतर्गत आयोजित नगर एकत्रीकरण सहभोज में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वहां संघ के एक पदाधिकारी(जिनके स्तरहीन बौद्धिक चर्चा मैं पूर्व में भी “सरल-चेतना” में कर चुका हूं) की विशिष्ट सेवा-सत्कार देख कर मुझे संघ के संस्थापक डाक्टरजी की याद आ गई। डाक्टरजी द्वारा संस्थापित संघ में और वर्तमान संघ में ज़मीन-आसमान का ना सही किंतु कुछ तो अन्तर है। कहां तो सादगी,समानता और राष्ट्रवादिता ही मूल मंत्र था और आज...! मेरे देखे सिर्फ़ कुर्ता-पायजामा पहन लेने मात्र से सादगी नहीं आ जाती। सादगी तो अंतःकरण का विषय है।डाक्टरजी के संघ को अपना आदर्श और स्वयं को उसके स्वयंसेवक मानने वाले मुझ जैसे कई मित्रों को इस कुरूप सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा कि “संघ” अब बदल रहा है। संघ के अधिकांश स्वयंसेवक इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने में हिचक महसूस करते हैं किंतु दबी ज़ुबान से वे भी इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकते। यदि हम बीमारी से ही मुंह फ़ेर लेंगे तो उसकी चिकित्सा किस प्रकार कर पाएंगे। आज संघ में कई ऐसे जीवनदायी सदस्य और पदाधिकारी हैं जो संघ की विचारधारा के विपरीत आचरण करते हैं। उनका यह आचरण संघ की छवि को धूमिल करता है। अक्सर उन पर किसी प्रकार की प्रतिबंधात्मक कार्रवाई को ना करने के पीछे तर्क के रूप में उनका जीवनदायी सदस्य होना बताया जाता है। यहां विचारणीय तथ्य यह है क्या किसी संगठन के जीवनदायी सदस्य होने से तात्पर्य उस संगठन को नष्ट करने की दिशा में कार्य करना है या उसे संवर्द्धित करना है? ऐसे जीवनदायी सदस्यों से क्या लाभ? हम यह नहीं कह रहे आज आवश्यकता संघ को पुराना स्वरूप छोड़कर बदलते युग के साथ बदलने की है। हमारे मतानुसार तो आवश्यकता संघ को बदलते युग के साथ ना बदलने की है; जबकि बदलाव प्रतीत हो रहा है। डाक्टरजी का संघ तो हर युग में प्रासंगिक व अनुकूल है। छोटे-मोटे परिवर्तन समझ में आते हैं किंतु मूल सिद्धांतो में परिवर्तन उचित नहीं। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि निरन्तर परीक्षण कर इस प्रकार के प्रदूषणों को रोका जाए। जिससे संघ की अविरल धारा निर्मल व निर्बाध बहती रहे।

-हेमन्त रिछारिया

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