शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

ग़ज़ल

मौन दृष्टि निर्विकार चेहरा है
शब्द कैद अधरों पर पहरा है

सुधियों के सागर में डूब रहे
लगता है दंश कोई गहरा है

भारी एकान्त और तरूणाई
दुर्बल से प्राण बोझ दोहरा है

भ्रम है विश्वास जिसे समझे हो
यौवन बंजारा कब ठहरा है

-गौरी खान “गुमराह”

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