मंगलवार, 6 जनवरी 2015

नक्षत्र पुरूष-“पंडितजी”

इस संसार में प्रेम एक ऐसा तत्व है जो हर नियम-कायदे से ऊपर है। जहां प्रेम होता है वहां जात-पात, अमीर-गरीब, मूढ़-विद्वान आदि सब भेद समाप्त हो जाते हैं तभी तो रहीम जी कहते हैं-“प्रेम ना बाड़ी उपजै, प्रेम ना हाट बिकाय। राजा-परजा जेहि रुचै, सीस देय लै जाए॥” इस बार के मेरे नक्षत्र पुरूष के संबंध में उक्त सारी बातें सत्य प्रमाणित होतीं हैं। टिमरनी में जहां हमारा निवास था उस मुहल्ले का नाम था-“शीतलामाता मार्केट” क्योंकि इसमें शीतलामाता का एक भव्य मंदिर है जो हमारे घर से दिखाई देता था। इस मंदिर के पुजारी थे-शंकर महाराज जिन्हें सभी प्यार से “पंडितजी” कहते थे। “पंडितजी” एक अकिंचन ब्राह्मण थे। वे अविवाहित थे। मंझौला कद,सांवला रंग, गले में तुलसी की कंठी, माथे पर चंदन-तिलक, पहनावे में भगवा-सफेद बंडी और धोती; ऐसे दिखते थे-“पंडितजी”। पंडितजी का हमारे घर से अटूट संबंध था। वे हमारे पारिवारिक सदस्य के रूप में थे। वे दादाजी को “दरबार” और दादी को “जीजीबाई” कहते थे। हमारे दादाजी-दादी उन्हें बहुत सम्मान देते थे। हमारे अधिकांश रिश्तेदार पंडित जी से परिचित थे और पंडित जी उनसे। दादाजी और पंडित का निश्छल प्रेम ही था जो इस प्रकार असमानता होते हुए भी वे प्रायः मित्रवत ही प्रतीत होते थे। मैंने अपनी दादी से सुना था कि जब वे टिमरनी आए थे तब यह मंदिर नहीं था सिर्फ़ एक वृक्ष की नीचे देवी की तीन प्रतिमाएं थी। पंडितजी ने अपने कांधों पर टीन ढो-ढोकर इसे एक मड़िया का रूप दिया। पंडितजी नियमित रूप से देवी की सेवा-अर्चना करते थे। मुहल्ले की महिलाओं को एकत्र कर भजन-कीर्तन आदि करवाया करते थे। कुछ समय बाद प्रबुद्ध लोगों के सहयोग से यहां भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। दादाजी ने भी इस निर्माण कार्य में अपना यथोचित सहयोग प्रदान किया। भव्य मंदिर के पुजारी की प्रतिष्ठा पाने के उपरांत भी पंडितजी और दादाजी का व्यवहार पूर्ववत बना रहा। पंडितजी करीब-करीब रोज़ हमारे घर आया करते थे। पंडित जी नज़र झाड़ने और गंडा-ताबीज़ बनाने मे सिद्धहस्त थे। बचपन में मुझपर नज़र का प्रकोप बहुत होता था। मेरी दादी को यह खुशफ़हमी थी कि मैं दिखने में और बच्चों की अपेक्षा अधिक आकर्षक हूं सो उन्होंने “पंडितजी” से कहकर मुझे बचपन में ही एक अभिमंत्रित ताबीज़ पहना दिया था जिसे मैंने दांतो से चबा-चबाकर किंचित कुरूप बना दिया था। नज़र मुझे फिर भी लग ही जाया करती थी जो “पंडितजी” के झाड़ने के उपरांत ही ठीक होती थी ऐसा मेरा भी विश्वास है। पंडितजी के नज़र झाड़ने का तरीका बहुत सादगीपूर्ण था। मैं उनके इस तरीके की अक्सर नकल उतारा करता था। नज़र झाड़ने के लिए पंडितजी थोड़ी से भभूत लेकर मंत्रोच्चार करते हुए मुझपर फ़ूंकते थे बस नज़र का प्रकोप शांत हो जाता था। अब जो कुछ भी हो मुझे राहत अवश्य मिल जाती थी। एक बार अर्द्धरात्रि को मुझे भयंकर पेट दर्द हुआ। दादाजी ने इसे नज़र का प्रकोप मानकर आधी रात को ही मंदिर जाकर पंडितजी को जगाया। पंडितजी तत्काल गहरी नींद से जागे और दादाजी के साथ हमारे घर आए और मुझे झाड़नी दी जिससे मुझे तुरन्त राहत मिल गई। यह तो सिर्फ़ एक बानगी है ऐसे ना जाने कितने किस्से है जब “पंडितजी” ने अपने निश्छल प्रेम का परिचय दिया था। आज “पंडितजी” हमारे बीच नहीं है किंतु उनकी स्नेहिल यादें हमारे साथ हैं।
-हेमन्त रिछारिया

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