शनिवार, 24 जनवरी 2015

लुईस ब्रेल

लुईस ब्रेल
लुईस ब्रेल नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए वरदान कही जाने वाली  “ब्रेल लिपि” के जनक माने जाते हैं। लुईस ब्रेल ने ही “ब्रेल लिपि” का अविष्कार कर नेत्रहीनों के लिए ज्ञान के मार्ग खोले। लुईस ब्रेल का जन्म फ़्रांस में पेरिस के निकट एक छोटे से गांव में 4 जनवरी सन् 1809 में हुआ। सिर्फ़ तीन साल की छोटी से उम्र में एक हादसे में उन्होंने अपनी दोनों आंखों की रोशनी गंवा दी। बुद्धिमान ब्रेल नेत्रहीनों के पढ़ने के लिए एक रास्ता खोजना चाहते थे। 12 साल की उम्र में उन्होंने डाट्स की एक प्रणाली के साथ प्रयोग किया। 17 साल की उम्र में उन्होंने एक नई प्रणाली का अविष्कार किया जिसे “ब्रेल लिपि” कहा जाता है। लुईस ब्रेल का निधन 6 जनवरी सन् 1852 को हुआ।
(साभार)

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

बदल रहा है “संघ”

कल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छः प्रमुख उत्सवों में से एक “मकर संक्राति” के अंतर्गत आयोजित नगर एकत्रीकरण सहभोज में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वहां संघ के एक पदाधिकारी(जिनके स्तरहीन बौद्धिक चर्चा मैं पूर्व में भी “सरल-चेतना” में कर चुका हूं) की विशिष्ट सेवा-सत्कार देख कर मुझे संघ के संस्थापक डाक्टरजी की याद आ गई। डाक्टरजी द्वारा संस्थापित संघ में और वर्तमान संघ में ज़मीन-आसमान का ना सही किंतु कुछ तो अन्तर है। कहां तो सादगी,समानता और राष्ट्रवादिता ही मूल मंत्र था और आज...! मेरे देखे सिर्फ़ कुर्ता-पायजामा पहन लेने मात्र से सादगी नहीं आ जाती। सादगी तो अंतःकरण का विषय है।डाक्टरजी के संघ को अपना आदर्श और स्वयं को उसके स्वयंसेवक मानने वाले मुझ जैसे कई मित्रों को इस कुरूप सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा कि “संघ” अब बदल रहा है। संघ के अधिकांश स्वयंसेवक इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने में हिचक महसूस करते हैं किंतु दबी ज़ुबान से वे भी इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकते। यदि हम बीमारी से ही मुंह फ़ेर लेंगे तो उसकी चिकित्सा किस प्रकार कर पाएंगे। आज संघ में कई ऐसे जीवनदायी सदस्य और पदाधिकारी हैं जो संघ की विचारधारा के विपरीत आचरण करते हैं। उनका यह आचरण संघ की छवि को धूमिल करता है। अक्सर उन पर किसी प्रकार की प्रतिबंधात्मक कार्रवाई को ना करने के पीछे तर्क के रूप में उनका जीवनदायी सदस्य होना बताया जाता है। यहां विचारणीय तथ्य यह है क्या किसी संगठन के जीवनदायी सदस्य होने से तात्पर्य उस संगठन को नष्ट करने की दिशा में कार्य करना है या उसे संवर्द्धित करना है? ऐसे जीवनदायी सदस्यों से क्या लाभ? हम यह नहीं कह रहे आज आवश्यकता संघ को पुराना स्वरूप छोड़कर बदलते युग के साथ बदलने की है। हमारे मतानुसार तो आवश्यकता संघ को बदलते युग के साथ ना बदलने की है; जबकि बदलाव प्रतीत हो रहा है। डाक्टरजी का संघ तो हर युग में प्रासंगिक व अनुकूल है। छोटे-मोटे परिवर्तन समझ में आते हैं किंतु मूल सिद्धांतो में परिवर्तन उचित नहीं। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि निरन्तर परीक्षण कर इस प्रकार के प्रदूषणों को रोका जाए। जिससे संघ की अविरल धारा निर्मल व निर्बाध बहती रहे।

-हेमन्त रिछारिया

ग़ज़ल

मौन दृष्टि निर्विकार चेहरा है
शब्द कैद अधरों पर पहरा है

सुधियों के सागर में डूब रहे
लगता है दंश कोई गहरा है

भारी एकान्त और तरूणाई
दुर्बल से प्राण बोझ दोहरा है

भ्रम है विश्वास जिसे समझे हो
यौवन बंजारा कब ठहरा है

-गौरी खान “गुमराह”

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

“हिन्दू” कोई धर्म नहीं



किसी शायर ने कहा है “लम्हों ने ख़ता की; सदियों ने सज़ा पाई”, भारतवर्ष के संदर्भ में ये लाइनें अक्सर सटीक बैठती हैं चाहे भारत विभाजन हो,चाहे कश्मीर का मुद्दा हो,हिन्दू-मुस्लिम संबंध हों या धर्म हो। इन सब मुद्दों की जड़ में छोटी-छोटी भूलें छिपी हुई हैं। “हिन्दू धर्म” को ही लें;मैंने हमेशा कहा है कि हिन्दू कोई धर्म नहीं है, हिन्दू एक परिचय है;संस्कृति है। इसे जिस धर्म के साथ संबद्ध करने की भूल की गई है वह है-“सनातन धर्म”। आज हिन्दू शब्द “सनातन धर्म” का पर्याय बन चुका है। सारी समस्याएं यहीं से प्रारंभ होती हैं। जिस प्रकार बंगाली मिठाई,कलकतिया या सोहागपुरी पान, बनारसी या चंदेरी साड़ी वास्तविक रूप से इन वस्तुओं की श्रेणी नहीं है किंतु उस जगह बनने या पैदा होने के कारण ये सब इन वस्तुओं की श्रेणी के सदृश्य भासती हैं। वहीं दूसरी ओर ये उस स्थान को इंगित करने वाली एक श्रेणी है भी। अब ये बड़ी विरोधाभासी बात है। ऐसा समझें कि मुख्य रूप से श्रेणियां दो प्रकार की हैं- पहली स्थानबोधक और दूसरी गुणबोधक। मिठाई के संदर्भ में जहां मावे से बनी,छैने से बनी,बेसन से बनी आदि, वहीं साड़ियों की बात करें तो सिल्क,जार्जेट,पोलिएस्टर;सूती इत्यादि ये सब गुणबोधक श्रेणियां है। व्यक्तियों के संदर्भ में जैसे बिहारी,बुंदेलखंडी,कानपुरी,भोपाली,इंदौरी,इलाहाबादी,बरेलवी,सरयूपारी,ये सब स्थानबोधक श्रेणियां है वैसे ही हिन्दू भी एक स्थानबोधक श्रेणी मात्र है धर्म नहीं। जिस धर्म को हिन्दू धर्म कहा जा रहा है वह तो “सनातन धर्म” है। बहुत संभव है कि प्राचीन काल में सिन्धु नदी किनारे निवास करने वाले लोग जिस धर्म का अनुपालन करते थे में उसे ही लोकाचार की भाषा में “हिन्दू धर्म” कहा जाने लगा। आज “हिन्दू” शब्द को लेकर तरह-तरह गलतफ़हमियां फ़ैलाई जा रहीं हैं। इसे धर्म विशेष से जोड़ा जा रहा है जो समाज में अराजकता और अशांति का कारण बन रहा है। हमें इसके मूल स्वरूप को देखने व समझने की नितांत आवश्यकता है।

-हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

जीवन-दान


क्या आप जानते हैं कि एक मौत नौ लोगों को ज़िंदगी दे सकती है? चिकित्सा विज्ञान (मेडिकल साइंस) के अनुसार जिस व्यक्ति का मस्तिष्क नाकाम (ब्रेन डेड) हो गया हो लेकिन शरीर के दूसरे अंग काम कर रहे हों, उसके परिजन मरीज के पेनक्रियाज़,किडनी,आंखे (कार्निया),हार्ट,लीवर एवं बोनमेरो जैसे अंगों का दान कर अतिगंभीर हालत वाले मरीजों को नया “जीवनदान” दे सकते हैं। ब्रेन डेड व्यक्ति वह होता है जो वेंटिलेटर पर है जिसकी सांसे चल रही हैं, दिल धड़क रहा है और रक्त संचार चालू है। हमारे देश में प्रति दस लाख में से सिर्फ़ १६ लोग ही अंगदान करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक हर साल देश में लगभग डेढ़ लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं। डाक्टरों के अनुसार हादसे,हार्ट-अटैक और ब्रेन स्ट्रोक के मामलों में अंगदान की संभावना सौ फ़ीसदी तक रहती है। ऐसे में लोगों के परिजन स्वीकृति दें या फ़िर वे लोग पहले से ही अंगदान के पंजीकृत हों तो ज़रूरतमंद लोगों को नया जीवन मिल सकता है। एक व्यक्ति मृत्योपरांत अपने अंगदान से नौ लोगों को “जीवनदान” दे सकता है। चिकित्सकों का कहना है कि ब्रेन डेड व्यक्ति के अंगदान की समस्त प्रक्रिया (आर्गन रिट्राइल) २४ घंटों के भीतर हो जानी चाहिए। जिसमें काउंसलिंग कमेटी व डाक्टर को सूचना एवं ओटी में प्रवेश आदि शामिल हैं। यदि अंगदान के लिए सामाजिक जागृति लाने हेतु विभिन्न स्तरों प्रयास किया जाता है तो कई व्यक्ति इससे लाभान्वित हो सकते हैं।
(स्वतंत्र वार्ता-हैदराबाद से साभार)

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

पुरी में मनेगा “नवकलेवर उत्सव”-

जगन्नाथ पुरी में इस वर्ष २०१५ आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को रथयात्रा के साथ “नवकलेवर उत्सव”भी मनाया जाएगा। पुराने काष्ठ निर्मित विग्रहों को समाधि देकर नवीन विग्रहों के निर्माण एवं प्राण-प्रतिष्ठा “नवकलेवर उत्सव” कहा जाता है। यह “नवकलेवर” जिस वर्ष आषाढ़ का अधिक मास (जो कि सामान्यतः ८ व १९ वर्षों के अंतराल पर होता है) आने पर मनाया जाता है। इस उत्सव में दारू वृक्ष के काष्ठ से निर्मित नवीन विग्रहों का निर्माण व उनकी प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। पुराने विग्रहों को मन्दिर परिसर में ही “कोयली वैकुण्ठ” नामक स्थान पर समाधि दे दी जाती है। पूर्व में यह उत्सव वर्ष १९९६ में मनाया गया था।

“खुदा तू भी नहीं; मैं भी नहीं”

गल्तियों से जुदा तू भी नहीं;
मैं भी नहीं,
दोनों इंसान हैं; खुदा,
तू भी नहीं, मैं भी नहीं।
दोनों इल्ज़ाम देते हैं;
तू मुझे और मैं तुझे,
अपने अंदर झांकता
तू भी नहीं; मैं भी नहीं।
गलतफ़हमियों ने कर दी
दोनों में पैदा दूरियां,
वर्ना फ़ितरत का बुरा
तू भी नहीं; मैं भी नहीं॥
(साभार)

ओरछा

इसका इतिहास 16वीं शताब्दी से शुरू होता है, जब बुंदेला राजाओं ने इसकी स्थापना की थी। इस जगह की पहली और सबसे रोचक कहानी एक मंदिर की है। दरअसल, यह मंदिर भगवान राम की मूर्ति के लिए बनवाया गया था, लेकिन मूर्ति स्थापना के वक्त यह अपने स्थान से हिली नहीं। इस मूर्ति को मधुकर शाह के राज्यकाल (1554-92) के दौरान उनकी रानी [अयोध्या] से लाई थीं। चतुर्भुज मंदिर बनने से पहले इसे कुछ समय के लिए महल में स्थापित किया गया। लेकिन मंदिर बनने के बाद कोई भी मूर्ति को उसके स्थान से हिला नहीं पाया। इसे ईश्वर का चमत्कार मानते हुए महल को ही मंदिर का रूप दे दिया गया और इसका नाम रखा गया राम राजा मंदिर। आज इस महल के चारों ओर शहर बसा है और राम नवमी पर यहां हजारों श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं। वैसे, भगवान राम को यहां भगवान मानने के साथ यहां का राजा भी माना जाता है, क्योंकि उस मूर्ति का चेहरा मंदिर की ओर न होकर महल की ओर है।
देखने योग्य स्थल-
१. रामराजा मंदिर
२. जहागीर महल
३. राजमहल
४. लक्ष्मीनारायण मंदिर
५. चर्तुभुज मंदिर
६. फूल बाग
७. सुन्दर महल
८. राय प्रवीन महल

नक्षत्र पुरूष-“पंडितजी”

इस संसार में प्रेम एक ऐसा तत्व है जो हर नियम-कायदे से ऊपर है। जहां प्रेम होता है वहां जात-पात, अमीर-गरीब, मूढ़-विद्वान आदि सब भेद समाप्त हो जाते हैं तभी तो रहीम जी कहते हैं-“प्रेम ना बाड़ी उपजै, प्रेम ना हाट बिकाय। राजा-परजा जेहि रुचै, सीस देय लै जाए॥” इस बार के मेरे नक्षत्र पुरूष के संबंध में उक्त सारी बातें सत्य प्रमाणित होतीं हैं। टिमरनी में जहां हमारा निवास था उस मुहल्ले का नाम था-“शीतलामाता मार्केट” क्योंकि इसमें शीतलामाता का एक भव्य मंदिर है जो हमारे घर से दिखाई देता था। इस मंदिर के पुजारी थे-शंकर महाराज जिन्हें सभी प्यार से “पंडितजी” कहते थे। “पंडितजी” एक अकिंचन ब्राह्मण थे। वे अविवाहित थे। मंझौला कद,सांवला रंग, गले में तुलसी की कंठी, माथे पर चंदन-तिलक, पहनावे में भगवा-सफेद बंडी और धोती; ऐसे दिखते थे-“पंडितजी”। पंडितजी का हमारे घर से अटूट संबंध था। वे हमारे पारिवारिक सदस्य के रूप में थे। वे दादाजी को “दरबार” और दादी को “जीजीबाई” कहते थे। हमारे दादाजी-दादी उन्हें बहुत सम्मान देते थे। हमारे अधिकांश रिश्तेदार पंडित जी से परिचित थे और पंडित जी उनसे। दादाजी और पंडित का निश्छल प्रेम ही था जो इस प्रकार असमानता होते हुए भी वे प्रायः मित्रवत ही प्रतीत होते थे। मैंने अपनी दादी से सुना था कि जब वे टिमरनी आए थे तब यह मंदिर नहीं था सिर्फ़ एक वृक्ष की नीचे देवी की तीन प्रतिमाएं थी। पंडितजी ने अपने कांधों पर टीन ढो-ढोकर इसे एक मड़िया का रूप दिया। पंडितजी नियमित रूप से देवी की सेवा-अर्चना करते थे। मुहल्ले की महिलाओं को एकत्र कर भजन-कीर्तन आदि करवाया करते थे। कुछ समय बाद प्रबुद्ध लोगों के सहयोग से यहां भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। दादाजी ने भी इस निर्माण कार्य में अपना यथोचित सहयोग प्रदान किया। भव्य मंदिर के पुजारी की प्रतिष्ठा पाने के उपरांत भी पंडितजी और दादाजी का व्यवहार पूर्ववत बना रहा। पंडितजी करीब-करीब रोज़ हमारे घर आया करते थे। पंडित जी नज़र झाड़ने और गंडा-ताबीज़ बनाने मे सिद्धहस्त थे। बचपन में मुझपर नज़र का प्रकोप बहुत होता था। मेरी दादी को यह खुशफ़हमी थी कि मैं दिखने में और बच्चों की अपेक्षा अधिक आकर्षक हूं सो उन्होंने “पंडितजी” से कहकर मुझे बचपन में ही एक अभिमंत्रित ताबीज़ पहना दिया था जिसे मैंने दांतो से चबा-चबाकर किंचित कुरूप बना दिया था। नज़र मुझे फिर भी लग ही जाया करती थी जो “पंडितजी” के झाड़ने के उपरांत ही ठीक होती थी ऐसा मेरा भी विश्वास है। पंडितजी के नज़र झाड़ने का तरीका बहुत सादगीपूर्ण था। मैं उनके इस तरीके की अक्सर नकल उतारा करता था। नज़र झाड़ने के लिए पंडितजी थोड़ी से भभूत लेकर मंत्रोच्चार करते हुए मुझपर फ़ूंकते थे बस नज़र का प्रकोप शांत हो जाता था। अब जो कुछ भी हो मुझे राहत अवश्य मिल जाती थी। एक बार अर्द्धरात्रि को मुझे भयंकर पेट दर्द हुआ। दादाजी ने इसे नज़र का प्रकोप मानकर आधी रात को ही मंदिर जाकर पंडितजी को जगाया। पंडितजी तत्काल गहरी नींद से जागे और दादाजी के साथ हमारे घर आए और मुझे झाड़नी दी जिससे मुझे तुरन्त राहत मिल गई। यह तो सिर्फ़ एक बानगी है ऐसे ना जाने कितने किस्से है जब “पंडितजी” ने अपने निश्छल प्रेम का परिचय दिया था। आज “पंडितजी” हमारे बीच नहीं है किंतु उनकी स्नेहिल यादें हमारे साथ हैं।
-हेमन्त रिछारिया