मंगलवार, 12 मई 2015

पर्यटन विभाग की नाकामी

अपनी अष्ट दिवसीय पर्यटन यात्रा के दौरान मुझे इस देश की लचर व्यवस्था का कुरूप चेहरा देखने को मिला। हमारे अधिकतर तीर्थस्थल लूट का केंद्र बने हुए है। धर्म के नाम व्यवसायिकता अपने चरम पर है। इसमें दोष धर्माचार्यों का तो है ही साथ में हमारी राज्य व केन्द्र सरकारों का भी है जो इस लूटमार को पनपने देने में सहायक है। आखिर पर्यटन विभाग का कार्य क्या है? मुझे कहीं भी पर्यटन विभाग की उपस्थिति नहीं दिखी सिवाय होटलों के जो अत्यंत मंहगे थे। सामान्य पर्यटक उनमें प्रवेश की जुर्रत भी नहीं कर सकता। कहीं-कहीं ट्रस्ट के होटलों को देखकर मन हुआ कि काश हमारे पर्यटन विभाग के होटल इस प्रकार होते तो कितना अच्छा होता। प्राइवेट गाईड से लेकर मंदिर के बाहर लगने वाली दुकानें और आटो चालक सब के सब पर्यटक को छलने का कार्य करते हैं। क्या यह व्यवस्थाएं पर्यटन विभाग के माध्यम से सुचारू रूप से नहीं चलाई जा सकतीं? जिससे आम पर्यटक इस प्रकार बिचौलियों के हाथों ठगाने से बचे। क्या पर्यटन विभाग मंदिर परिसर के आसपास केवल पर्यटन विभाग से अनुबंधित पूजा-सामग्री की दुकानें, गाइड, और परिवहन की व्यवस्था नहीं कर सकता। जिससे उचित मूल्य पर प्रामाणिक सामग्री व जानकारी प्राप्त हो सके। यदि अपने देश के पर्यटकों के साथ ये बिचौलिए इस प्रकार का व्यवहार करते हैं तो ज़रा सोचिए विदेशी पर्यटकों का ये क्या हाल करते होंगे। मैं इस बात से चिंतित हूं विदेशी पर्यटक इस प्रकार व्यवस्थाओं से आहत हो हमारे देश की क्या छवि लेकर जाते होंगे। केवल किसी मशहूर खान से “अतिथि देवो भवः” का विज्ञापन करवाने मात्र से देश की छवि नहीं सुधरेगी। इसके लिए व्यवस्था परिवर्तन बेहद आवश्यक है।

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

संवेदनहीन पत्रकारिता

मैं पत्रकारिता और पत्रकारों का बहुत सम्मान करता हूं। कई पत्रकारों से मेरे बहुत घनिष्ठ संबंध भी हैं लेकिन किसान गजेन्द्र  की आत्महत्या को लेकर जिस प्रकार रिपोर्टिंग की जा रही है उसे देखकर बड़ी शर्म आ रही है और क्रोध भी। बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि आज के दौर के कई पत्रकारों को सवाल तक पूछने की तमीज़ नहीं है। एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल की एंकर जो बेतुके सवाल पूछने के लिए जगप्रसिद्ध हैं, वे आज भी अपने स्वभाव से विवश नज़र आईं। एक ओर जहां उनसे बात करते समय पूर्व पत्रकार और “आप” के प्रवक्ता फ़ूट-फ़ूटकर रो पड़े वहीं उनके बचकाने और बेहूदा सवाल जारी रहे। किसान गजेन्द्र की बेटी से पूछे गए उनके सवालों की बानगी देखिए-
आपको कैसा लग रहा है? आपके रिश्ते कैसे थे अपने पिता से? वो आपसे कैसी बातें करते थे? आपका परिवार किस तरह के दर्द का सामना कर रहा है?
भला एक १३-१४ वर्ष की बच्ची को जिसने अपने पिता को खो दिया हो उसे कैसा महसूस होगा क्या इसकी कल्पना एंकर महोदया नहीं सकतीं? एक बेटी से पिता के कैसे रिश्ते होते हैं? क्या इसकी भी उन्हें “बाइट” चाहिए। आखिर इस प्रकार के भावनाओं को उद्धेलित करने वाले सवाल पूछकर आप क्यों किसी के आंसुओं को बेचना चाहते हैं? आप सबकी जिम्मेदारी तय कर रहे हैं, क्या पत्रकारों की कोई जिम्मेदारी नहीं थी? क्या किसी पत्रकार ने गजेन्द्र को बचाने की कोशिश की? सारे पत्रकार तो कैमरों को ज़ूम करके मसालेदार खबर को गढ़ने में व्यस्त थे क्योंकि अगर गजेन्द्र बच जाता; तो माफ़ कीजिएगा उनकी खबर में तथाकथित वज़न नहीं आता। इस प्रकार की संवेदनहीन पत्रकारिता के चलते ही आज पत्रकारिता का स्तर दिनोंदिन गिरता जा रहा है और जब कोई “जनरल” आपको आईना दिखाता है तो आप हाय-तौबा मचाने लगते हैं। मेरा इन सारे खबरनवीसों से बस इतना ही आग्रह है कम से कम देश-काल-परिस्थिति की तो थोड़ी मर्यादा रखकर अपनी पत्रकारिता करें जिससे किसी के दुःख का मखौल ना बने।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

कालसर्प दोषः सच या झूठ..!

कालसर्प दोष एक ऐसा दुर्योग है जिसका नाम सुनते ही अधिकांश जनमानस में भय व चिंता व्याप्त हो जाती है। कुछ विद्वान शास्त्रों का आधान लेकर इसे सिरे से नकारते हैं। मेरे देखे दोनों ही गलत हैं और लोगों को भ्रमित कर रहे हैं। “कालसर्प दोष” को ना तो अत्यधिक महिमामंडित कर प्रस्तुत करना सही है और ना ही इसके अस्तित्व प्रश्नचिन्ह लगाना सही है। “कालसर्प दोष” भी जन्मपत्रिका के अन्य बुरे योगों की तरह ही एक बुरा योग है जो जीवन में दुष्प्रभाव डालता है। शास्त्रों में इसे “सर्पयोग” के नाम स्वीकार किया गया है। इसके अस्तित्व को ही नकारने वाले विद्वानों तनिक इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि जब “कर्तरी दोष” जिसमें केवल एक ग्रह और एक भाव के दो पाप ग्रह के मध्य आ जाने से उस भाव व ग्रह का शुभफ़ल नष्ट हो जाता है तो क्या सभी ग्रहों और एकाधिक भावों के पापमध्यत्व से उनका शुभफ़ल नष्ट नहीं होगा? मेरे देखे “कालसर्प दोष” मूल रूप में कर्तरी दोष ही है चूंकि राहु को शास्त्रों में “काल” कहा गया है और केतु को “सर्प” की संज्ञा दी गई है इसलिए किंचिंत इसका नाम “कालसर्प” पड़ा। काशी-वाराणासी से प्रकाशित “व्यवहारिक ज्योतिष तत्वम्” में कालसर्प दोष को सिद्ध करते हुए कहा गया है-
“राहु केतु मध्ये सप्तो विघ्ना हा कालसर्प सारिकः
 सुतयासादि सकलादोषा रोगेन प्रवासे चरणं ध्रुवम्॥”
वराहमिहिर ने अपनी संहिता “जातक नभ संयोग” में इसका “सर्पयोग” नाम से उल्लेख किया है। कल्याण वर्मा ने “सारावली” में “सर्पयोग” नाम से इसकी व्याख्या की है। इन सबसे अधिक प्रामाणिक स्वीकृति तो स्वयं द्वादश ज्योतिर्लिंग त्र्यंम्बकेश्वर के विद्वानों ने प्रदान की है जहां इस दोष की शांति का विधान प्रचलित है। यदि “कालसर्प दोष” का कोई अस्तित्व ही नहीं होता अथवा यह योग सर्वथा मिथ्या प्रचार होता तो इतने प्राचीन और मान्य ज्योतिर्लिंग त्र्यंम्बकेश्वर में यह आज तक स्वीकार कैसे किया जाता रहा? यदि “कालसर्प दोष” झूठ है तो इसका आशय यह हुआ कि हमारा सर्वाधिक मान्य तीर्थस्थान व्यवसायिकता का केन्द्र मात्र है जो व्यवसायिक लाभ के लिए “कालसर्प दोष” रूपी विज्ञापन का मिथ्या प्रचार कर रहा है। दोनों में से कोई एक ही तथ्य सत्य हो सकता है। यदि हम द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक त्र्यंम्बकेश्वर को महानता और मान्यता प्रदान करते हैं तो हमें इस योग को भी मान्यता देनी ही होगी। अतः “कालसर्प दोष” से अत्यधिक भयभीत होने और इसे अस्वीकार करने के स्थान पर जन्मपत्रिका के  अन्य बुरे योगों की भांति ही इसकी विधिवत शांति करवाएं।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

“ग्रहण” को जानें

आप सभी “चंद्रग्रहण” और “सूर्यग्रहण” से तो भलीभांति परिचित हैं। ग्रहण किस प्रकार लगता है यह बताकर हम आपकी विद्वत्ता को कम करके नहीं आंक सकते। यहां हमारा उद्देश्य केवल “ग्रहण” विषयक रूढ़ियों को समाप्त करना है। ग्रहणकाल के दौरान सूतक के नाम पर मंदिरों के पट बंद कर दिए जाते हैं, भोजन करना एवं बाहर निकलना निषेध कर दिया जाता है। मोक्ष के उपरान्त स्नान का विधान है। इनमें मूल बात के पीछे तो वैज्ञानिक कारण हैं और शेष उस कारण से होने वाले दुष्प्रभावों को रोकने के उद्देश्य से बनाए गए देश-काल-परिस्थिति विषयक नियम। वैज्ञानिक कारण स्थिर होते हैं लेकिन दुष्प्रभावों को रोकने हेतु बनाए गए देश-काल-परिस्थिति विषयक नियमों को हमें वर्तमान समयानुसार अद्यतन (अपडेट) करते रहना आवश्यक होता है तभी वे अधिकांश जनसामान्य द्वारा मान्य होते हैं। मेरे देखे किसी भी नियम को स्थापित करने के पीछे दो बातें मुख्य रूप से प्रभावी होती हैं, पहली “भय” और दूसरी “लालच”। इन दो बातों को विधिवत प्रचारित कर आप कोई भी नियम समाज में स्थापित कर सकते हैं। धर्म में इन दोनों बातों का समावेश होता है। अतः हमारे धर्म नीति-निर्धारकों इन वैज्ञानिक कारणों से होने वाले दुष्प्रभावों से जन मानस को बचाने के लिए धर्म का सहारा लिया। जिससे ये दुष्प्रभाव जनसामान्य को प्रभावित ना कर सकें किंतु वर्तमान में जब हम विज्ञान से भलीभांति परिचित हैं तब भी इन नियमों के लिए धर्म का सहारा लेकर आसानी ग्राह्य ना हो सकने वाली बेतुकी दलीलें देना कुछ अनुचित सा लगता है। जिसे आज की युवा पीढ़ी स्वीकार करने से झिझकती है जैसे ग्रहण के दौरान भगवान कष्ट में रहते हैं, मंदिर के पट इसलिए बंद किए जाते हैं क्योंकि भगवान को सूतक लग जाता है, ग्रहण के दौरान किए गए पूजा-पाठ, जप-तप का कई गुना फ़ल मिलता है आदि-आदि। कितनी हास्यास्पद बातें हैं भला भगवान को कैसे कष्ट और सूतक हो सकता है? भगवान कोई व्यक्तिवादी अवधारणा नहीं बल्कि अस्तित्ववादी रूप है लेकिन जिस समय यह नियम बनाए गए  उस काल की परिस्थिति अनुसार यह उचित थे, आज नहीं है। आज तो आपको स्पष्ट रूप से यह बताना आवश्यक है कि ग्रहण के दौरान चंद्र और सूर्य से कुछ ऐसी हानिकारक किरणें उत्सर्जित होती हैं जो मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं अतः इन किरणों से बचना चाहिए और यदि इन किरणों से ना चाहते हुए भी संपर्क हो जाए तो स्नान द्वारा उनके प्रभाव को समाप्त कर लेना चाहिए। इन सब में धर्म केवल मूल उद्देश्य जो कि दुष्प्रभावों से रोकथाम है, के लिए साधन मात्र है।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 26 मार्च 2015

त्रि-आयामी है “ज्योतिष”

ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया
ज्योतिषियों से एक प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि “जब एक ही समय पर विश्व में कई बच्चे जन्म लेते हैं तो उनकी जन्मकुण्डली एक होने के बावजूद उनका जीवन भिन्न कैसे होता है?” ज्योतिष पर विश्वास नहीं करने वालों के लिए यह प्रश्न ब्रह्मास्त्र की तरह है। यह प्रश्न बड़े से बड़े ज्योतिष के जानकार की प्रतिष्ठा को ध्वस्त करने की सामर्थ्य रखता है। जब इस ब्रह्मास्त्र रूपी प्रश्न का प्रहार मुझ पर किया गया तो मैंने ढाल के स्थान पर ज्योतिष शास्त्र रूपी अस्त्र से ही इसे काटना श्रेयस्कर समझा। इस प्रश्न को लेकर मैंने बहुत अनुसंधान किया, कई वैज्ञानिकों के ब्रह्माण्ड विषयक अनुसंधान के निष्कर्षों की पड़ताल की, कई सनातन ग्रंथों को खंगाला और अपने कुछ वर्षों के ज्योतिषीय अनुभव को इसमें समावेशित करते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि किसी जातक के जीवन निर्धारण में केवल जन्म-समय ही नहीं अपितु गर्भाधान-समय और उसके प्रारब्ध (पूर्व संचित कर्म) की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस प्रकार ज्योतिष तीन आयामों पर आधारित है, ये तीन आयाम हैं-१. प्रारब्ध २. गर्भाधान ३.जन्म। इन्हीं तीन महत्वपूर्ण आयामों अर्थात् जन्म-समय, गर्भाधान-समय एवं प्रारब्ध के समेकित प्रभाव से ही किसी जातक का संपूर्ण जीवन संचालित होता है। किसी जातक की जन्मपत्रिका के निर्माण में जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है; वह है- समय। अब जन्म-समय को लेकर भी ज्योतिषाचार्यों में मतभेद है, कुछ विद्वान शिशु के रोने को ही सही मानते हैं, वहीं कुछ नाल-विच्छेदन के समय को सही ठहराते हैं, खैर; यहां हमारा मुद्दा जन्म-समय नहीं है। किसी भी जातक की जन्मपत्रिका के निर्माण के लिए उसके जन्म का समय ज्ञात होना अति-आवश्यक है। अब जन्मसमय तो ज्ञात किया जा सकता है किंतु गर्भाधान का समय ज्ञात नहीं किया जा सकता इसीलिए हमारे शास्त्रों में “गर्भाधान” संस्कार के द्वारा उस समय को बहुत सीमा तक ज्ञात करने व्यवस्था  है। यह अब वैज्ञानिक अनुसंधानों से स्पष्ट हो चुका है कि माता-पिता का पूर्ण प्रभाव बच्चे पर पड़ता है, विशेषकर मां का, क्योंकि बच्चा मां के ही पेट नौ माह तक आश्रय पाता है। आजकल सोनोग्राफ़ी और डीएनए जैसी तकनीक इस बात को प्रमाणित करती हैं। अतः जिस समय एक दंपत्ति गर्भाधान कर रहे होते हैं उस समय ब्रह्माण्ड में नक्षत्रों की व्यवस्था और ग्रहस्थितियां भी होने वाले बच्चे पर पूर्ण प्रभाव डालती हैं। इस महत्वपूर्ण तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमारे शास्त्रों में “गर्भाधान” के मुर्हूत की व्यवस्था है। गर्भाधान का दिन, समय,तिथि,वार,नक्षत्र,चंद्र स्थिति, दंपत्तियों की कुण्डलियों का ग्रह-गोचर आदि सभी बातों का गहनता से परीक्षण करने के उपरान्त ही “गर्भाधान” का मुर्हूत निकाला जाता है। अब यदि किन्हीं जातकों का जन्म इस समान त्रिआयामी व्यवस्था में होता है (जो असंभव है) तो उनका जीवन भी ठीक एक जैसा ही होगा इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि हमें इन तीन आयामों में से केवल एक ही आयाम अर्थात् जन्म-समय ज्ञात होता है, दूसरा आयाम अर्थात् गर्भाधान-समय हमें सामान्यतः ज्ञात नहीं होता किंतु उसे ज्ञात किया जा सकता है परन्तु तीसरा आयाम अर्थात् प्रारब्ध ना तो हमें ज्ञात होता है और ना ही सामान्यतः उसे ज्ञात किया जा सकता है इसलिए इस समूचे विश्व में एक ही समय जन्म लेने वाले व्यक्तियों का जीवन एक-दूसरे से भिन्न पाया जाता है। मेरे देखे ज्योतिष मनुष्य के भविष्य को ज्ञात करने की पद्धति का नाम है, ये पद्धतियां भिन्न हो सकती हैं। इन पद्धतियों को समय के साथ अद्यतन(अपडेट) करने की भी आवश्यकता है। एक योगी भी किसी व्यक्ति के बारे उतनी ही सटीक भविष्यवाणी कर सकता है जितनी एक जन्मपत्रिका देखने वाला ज्योतिषी या एक हस्तरेखा विशेषज्ञ कर सकता है और यह भी संभव है कि इन तीनों में योगी सर्वाधिक प्रामाणिक साबित हो। “ज्योतिष” एक समुद्र की भांति अथाह है इसमें जितना गहरा उतरेंगे आगे बढ़ने की संभावनाएं भी उतनी ही बढ़ती जाएंगी। जब तक भविष्य है तब तक ज्योतिष भी है। अतः ज्योतिष के संबंध में क्षुद्र एवं संकुचित दृष्टिकोण अपनाकर केवल अपने अहं की तुष्टि के लिए प्रश्न उठाने के स्थान पर इसके वास्तविक विराट स्वरूप को समझकर जीवन में इसकी महत्ता स्वीकार करना अपेक्षाकृत अधिक लाभप्रद है।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 24 मार्च 2015

रत्न धारण में सावधानी रखें

कई लोगों को रत्न धारण करने शौक होता है। कुछ अल्प ज्ञानी ज्योतिषी भी इस शौक के लिए जिम्मेवार होते हैं जिनका अक्सर रत्न बेचने वालों से बड़ा गहरा संबंध होता है इसलिए जब भी मैं किसी मित्र को रत्न ना धारण करने सलाह देता हूं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता। कुछ मित्र मायूस भी हो जाते हैं। सामान्यतः ज्योतिष के क्षेत्र में राशि रत्न, लग्नेश का रत्न, विवाह के गुरू का रत्न, तो आजकल एक नया फ़ैशन लाकेट का चल निकला है जिसमें ज्योतिषीगण लग्नेश,पंचमेश व नवमेश के रत्नों का लाकेट बनवाकर पहनने का परामर्श देते हैं। मेरे देखे ऐसा करना अनुचित है। रत्नों के धारण करने में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। रत्नों को धारण करने से पहले उन ग्रहों की जन्मपत्रिका में स्थिति व अन्य ग्रहों से संबंध का ज्ञान होना अतिआवश्यक है, चाहे वे रत्न लग्नेश अथवा राशीश के ही क्यों ना हों। यह भी देखना आवश्यक है कि जिस ग्रहा रत्न धारण कर रहे हैं वह किस ग्रह से क्या संबंध बना रहा है अथवा किस ग्रह से अधिष्ठित राशि का स्वामी है। यदि एकाधिक रत्न धारण की स्थिति बन रही हो तो वर्जित रत्नों का ध्यान भी रखा जाना आवश्यक है। पंचधा मैत्री में ग्रहों के आपसी संबंध की भी रत्न धारण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक सर्वथा गलत धारणा यह है कि रत्न हमेशा ग्रह शांति के लिए पहना जाता है जबकि वास्तविकता इसे ठीक विपरीत है, रत्न हमेशा ग्रह के बल में वृद्धि करने के लिए धारण किया जाता है। कुछ रत्न ग्रहशांति के उपरान्त अल्प समयावधि के लिए ही धारण किए जाते हैं। अतः रत्न धारण करने से पूर्व अत्यंत सावधानी रखते हुए रत्न धारण करने से पूर्व किसी श्रेष्ठ ज्योतिषी से भलीभांति परामर्श के बाद ही रत्न धारण करें अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि हो सकती है।
-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया
“प्रारब्ध ज्योतिष केन्द्र”

बुधवार, 18 मार्च 2015

बुद्धत्व


जीवन की आपाधापी में,
अक्सर जब मन घबराता है।
उस पार से कोई बुलाता है,
तन चलने को अकुलाता है।
मगर “यशोधरा” का पल्लू ,
पैरों से लिपट जाता है।
“सिद्धार्थ” रूपी  ये मन मेरा,
“बुद्ध” होते-होते रह जाता है॥

-हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 16 मार्च 2015

फ़ूलों में भी है संवेदनाएं

एक दिन मेरे मित्र जो श्रीविद्या के साधक हैं वे ढेर सारे पलाश के फ़ूलों से भरी थैली (जिसमें कुछ अधखिली कलियां भी शामिल थीं) लिए मुझसे मिलने आए। मैंने जब इतने फ़ूलों का प्रायोजन उनसे पूछा तो कहने लगे कि इन फ़ूलों से भगवती का अर्चन करूंगा। मैंने पुनः पूछा कि ये कितने फ़ूल हैं? उन्होंने उत्तर दिया कि-सवा लाख! ये सुनते ही मैं चौंक पड़ा। मैंने उनसे कहा कि आपने सिर्फ़ अपने अर्चन के लिए प्रकृति का कितना नुकसान कर दिया, आखिर प्रकृति भी तो परमात्मा का ही अंग है। इसे नुकसान पहुंचाना परमात्मा को पीड़ा पहुंचाना है, मेरे देखे यह उचित नहीं है। चूंकि उन्होंने दिन भर बड़ा अथक परिश्रम करके इन फ़ूलों को तोड़ा था और स्वभाव से वे पंडित थे सो उन्होंने मेरी इस बात का कड़ा विरोध किया। वो मुझे समझाने लगे कि फ़ूल तो ईश्वर पर चढ़ाने के लिए ही होते हैं। मैंने कहा आपको नहीं लगता कि डाल पर खिले फ़ूल पहले ही प्रकृति ने ईश्वर पर चढ़ा दिए अब और क्या चढ़ाना? और चढ़ाना ही है तो डाल से गिरे हुए फ़ूलों को चुनकर चढ़ाओं किंतु शास्त्रों में इस प्रकार की भ्रामक बातें लिखी हैं कि सवा लाख फ़ूल चढ़ाने से यह होगा, सवा लाख बेलपत्र चढ़ाने से वह होगा सो सब निकल पड़ते है पर्यावरण को हानि पहुंचाने। इस पर वे कहने लगे क्या भगवती पर फ़ूल नहीं चढ़ाएं? प्रत्युत्तर में मैंने कहा कि कोई फ़ूल का पौधा रोपित कर दो जब इसमें सवा लाख फ़ूल आएंगे तो आपका अर्चन पूर्ण हो जाएगा। इसी प्रकार की भ्रामक बातों के कारण ही हमारे धर्म पर कटाक्ष करने का अवसर अक्सर लोगों को मिल जाता है। मेरे देखे संख्या नहीं भाव महत्वपूर्ण है। यदि प्रेमपूर्ण ह्रदय से मात्र एक पांखुरी अर्पित कर दी जाए तो सवा लाख क्या सवा अरब के बराबर हो जाती है। आपने सुना है जब भगवान कृष्ण को उनकी रानियों ने अपने आभूषणों से तौलना चाहा तो वे नहीं तुले जब एक तुलसी दल पलड़े पर रखा तब भगवान आसानी से तुल गए। मगर पंडित यदि शास्त्रों से मुक्त हो जाए तो संत हो जाए। शास्त्रों में काम की बातें थोड़ी हैं और जो हैं उन्हें समझना और भी कठिन। भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक श्री जगदीशचंद्र बोस ने क्रैस्कोग्राफ़ नामक यंत्र बनाकर एक अनुसंधान किया जिसमें उन्होंने यह सिद्ध किया कि पेड़-पौधों में भी संवेदनशील स्नायु तंत्र होता है और उनका जीवन भी विभिन्न भावनाओं से युक्त होता है। प्रेम,घृणा,भय,सुख,दुःख,आनन्द,मूर्छा के प्रति असंख्य प्रकार की प्रतिक्रियाओं की भावानुभूति जिस प्रकार सब प्राणियों में होती है उसी प्रकार पेड़-पौधों में भी होती है। सनातन धर्म ने बड़ी मूल्यवान पहल की जो पत्थर की ईश्वर की प्रतिमा बनाई। उसके पीछे उद्देश्य यह था हमारी दृष्टि इतनी संवेदनशील हो जाए कि पाषाण में भी सजीव ईश्वर का दर्शन कर सके किंतु अभी तक कोमल फ़ूलों में भी जिन लोगों को संवेदना नज़र नहीं आ रही वे क्या पाषाण में इसे देख पाने में समर्थ होंगे इसमें मुझे संदेह है।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 9 मार्च 2015

ज्योतिष को “विंडो शापिंग” ना समझें

अक्सर यात्रा के दौरान या किसी समारोह में जब मैं अपना परिचय एक ज्योतिषी के रूप में देता हूं तब बड़ी रोचक प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं। कुछ लोग इसे अंधविश्वास को बढ़ाने वाली ठग विद्या सिद्ध करने के लिए कुतर्क करने लगते हैं, कुछ परीक्षक की भांति मेरे ज्ञान का परीक्षण करने लगते हैं तो कुछ झट अपनी कुण्डली निकालकर या पास ही पड़े किसी कागज़ पर कुण्डली उकेरकर फ़लित पूछने लगते हैं। मेरा इस प्रकार का व्यवहार करने वाले तमाम महानुभावों से यही निवेदन है कि ज्योतिष कोई “विंडो शापिंग” नहीं है कि आप यूं ही तफ़री के लिए बाज़ार गए वहां निरूद्देश्य दुकानों पर ताक-झांक करते हुए कोई वस्तु पसन्द आ गई और दुकानदार से मोल-भाव जम गया तो खरीद ली अन्यथा आगे बढ़ गए। यहां मुझे रामायण का रावण -वध प्रसंग स्मरण आ रहा है। जब प्रभु श्रीराम ने भूमि पर गिरे अंतिम सांसे गिनते रावण की ओर इशारा कर लक्ष्मण जी को आदेश दिया कि जाओ इस महापंडित से उपदेश ग्रहण करो तब लक्ष्मण जी रावण के सिर की ओर जाकर खड़े हो गए तब रावण ने यह कहते हुए अपना मुंह फ़ेर लिया कि लक्ष्मण जब हम किसी से कुछ ग्रहण करने जाते हैं तो याचक की भांति जाना चाहिए तब लक्ष्मण जी रावण के पैर की तरफ़ जाकर बैठे किंतु  पुनः  रावण ने यह कहते हुए मुंह फ़ेर लिया किया जब भी किसी विद्वान से भेंट करने जाओ तो खाली हाथ नहीं जाना चाहिए तब कहते हैं लक्ष्मण जी ने वहीं भूमि से एक तिनका उठाकर महापंडित रावण को भेंट किया तब जाकर रावण ने लक्ष्मण को उपदेश दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि हर कार्य की एक मर्यादा होती है; एक उचित तरीका होता है, उस मर्यादा से परे जाकर उस कार्य को करना मेरे देखे पाप करने जैसा है। विद्वानों को चाहिए कि महत्वपूर्ण कार्यों की मर्यादा एवं उचित मार्ग के संबंध में जनमानस को मार्गदर्शित करें।


-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 24 जनवरी 2015

लुईस ब्रेल

लुईस ब्रेल
लुईस ब्रेल नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए वरदान कही जाने वाली  “ब्रेल लिपि” के जनक माने जाते हैं। लुईस ब्रेल ने ही “ब्रेल लिपि” का अविष्कार कर नेत्रहीनों के लिए ज्ञान के मार्ग खोले। लुईस ब्रेल का जन्म फ़्रांस में पेरिस के निकट एक छोटे से गांव में 4 जनवरी सन् 1809 में हुआ। सिर्फ़ तीन साल की छोटी से उम्र में एक हादसे में उन्होंने अपनी दोनों आंखों की रोशनी गंवा दी। बुद्धिमान ब्रेल नेत्रहीनों के पढ़ने के लिए एक रास्ता खोजना चाहते थे। 12 साल की उम्र में उन्होंने डाट्स की एक प्रणाली के साथ प्रयोग किया। 17 साल की उम्र में उन्होंने एक नई प्रणाली का अविष्कार किया जिसे “ब्रेल लिपि” कहा जाता है। लुईस ब्रेल का निधन 6 जनवरी सन् 1852 को हुआ।
(साभार)

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

बदल रहा है “संघ”

कल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छः प्रमुख उत्सवों में से एक “मकर संक्राति” के अंतर्गत आयोजित नगर एकत्रीकरण सहभोज में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वहां संघ के एक पदाधिकारी(जिनके स्तरहीन बौद्धिक चर्चा मैं पूर्व में भी “सरल-चेतना” में कर चुका हूं) की विशिष्ट सेवा-सत्कार देख कर मुझे संघ के संस्थापक डाक्टरजी की याद आ गई। डाक्टरजी द्वारा संस्थापित संघ में और वर्तमान संघ में ज़मीन-आसमान का ना सही किंतु कुछ तो अन्तर है। कहां तो सादगी,समानता और राष्ट्रवादिता ही मूल मंत्र था और आज...! मेरे देखे सिर्फ़ कुर्ता-पायजामा पहन लेने मात्र से सादगी नहीं आ जाती। सादगी तो अंतःकरण का विषय है।डाक्टरजी के संघ को अपना आदर्श और स्वयं को उसके स्वयंसेवक मानने वाले मुझ जैसे कई मित्रों को इस कुरूप सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा कि “संघ” अब बदल रहा है। संघ के अधिकांश स्वयंसेवक इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने में हिचक महसूस करते हैं किंतु दबी ज़ुबान से वे भी इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकते। यदि हम बीमारी से ही मुंह फ़ेर लेंगे तो उसकी चिकित्सा किस प्रकार कर पाएंगे। आज संघ में कई ऐसे जीवनदायी सदस्य और पदाधिकारी हैं जो संघ की विचारधारा के विपरीत आचरण करते हैं। उनका यह आचरण संघ की छवि को धूमिल करता है। अक्सर उन पर किसी प्रकार की प्रतिबंधात्मक कार्रवाई को ना करने के पीछे तर्क के रूप में उनका जीवनदायी सदस्य होना बताया जाता है। यहां विचारणीय तथ्य यह है क्या किसी संगठन के जीवनदायी सदस्य होने से तात्पर्य उस संगठन को नष्ट करने की दिशा में कार्य करना है या उसे संवर्द्धित करना है? ऐसे जीवनदायी सदस्यों से क्या लाभ? हम यह नहीं कह रहे आज आवश्यकता संघ को पुराना स्वरूप छोड़कर बदलते युग के साथ बदलने की है। हमारे मतानुसार तो आवश्यकता संघ को बदलते युग के साथ ना बदलने की है; जबकि बदलाव प्रतीत हो रहा है। डाक्टरजी का संघ तो हर युग में प्रासंगिक व अनुकूल है। छोटे-मोटे परिवर्तन समझ में आते हैं किंतु मूल सिद्धांतो में परिवर्तन उचित नहीं। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि निरन्तर परीक्षण कर इस प्रकार के प्रदूषणों को रोका जाए। जिससे संघ की अविरल धारा निर्मल व निर्बाध बहती रहे।

-हेमन्त रिछारिया

ग़ज़ल

मौन दृष्टि निर्विकार चेहरा है
शब्द कैद अधरों पर पहरा है

सुधियों के सागर में डूब रहे
लगता है दंश कोई गहरा है

भारी एकान्त और तरूणाई
दुर्बल से प्राण बोझ दोहरा है

भ्रम है विश्वास जिसे समझे हो
यौवन बंजारा कब ठहरा है

-गौरी खान “गुमराह”

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

“हिन्दू” कोई धर्म नहीं



किसी शायर ने कहा है “लम्हों ने ख़ता की; सदियों ने सज़ा पाई”, भारतवर्ष के संदर्भ में ये लाइनें अक्सर सटीक बैठती हैं चाहे भारत विभाजन हो,चाहे कश्मीर का मुद्दा हो,हिन्दू-मुस्लिम संबंध हों या धर्म हो। इन सब मुद्दों की जड़ में छोटी-छोटी भूलें छिपी हुई हैं। “हिन्दू धर्म” को ही लें;मैंने हमेशा कहा है कि हिन्दू कोई धर्म नहीं है, हिन्दू एक परिचय है;संस्कृति है। इसे जिस धर्म के साथ संबद्ध करने की भूल की गई है वह है-“सनातन धर्म”। आज हिन्दू शब्द “सनातन धर्म” का पर्याय बन चुका है। सारी समस्याएं यहीं से प्रारंभ होती हैं। जिस प्रकार बंगाली मिठाई,कलकतिया या सोहागपुरी पान, बनारसी या चंदेरी साड़ी वास्तविक रूप से इन वस्तुओं की श्रेणी नहीं है किंतु उस जगह बनने या पैदा होने के कारण ये सब इन वस्तुओं की श्रेणी के सदृश्य भासती हैं। वहीं दूसरी ओर ये उस स्थान को इंगित करने वाली एक श्रेणी है भी। अब ये बड़ी विरोधाभासी बात है। ऐसा समझें कि मुख्य रूप से श्रेणियां दो प्रकार की हैं- पहली स्थानबोधक और दूसरी गुणबोधक। मिठाई के संदर्भ में जहां मावे से बनी,छैने से बनी,बेसन से बनी आदि, वहीं साड़ियों की बात करें तो सिल्क,जार्जेट,पोलिएस्टर;सूती इत्यादि ये सब गुणबोधक श्रेणियां है। व्यक्तियों के संदर्भ में जैसे बिहारी,बुंदेलखंडी,कानपुरी,भोपाली,इंदौरी,इलाहाबादी,बरेलवी,सरयूपारी,ये सब स्थानबोधक श्रेणियां है वैसे ही हिन्दू भी एक स्थानबोधक श्रेणी मात्र है धर्म नहीं। जिस धर्म को हिन्दू धर्म कहा जा रहा है वह तो “सनातन धर्म” है। बहुत संभव है कि प्राचीन काल में सिन्धु नदी किनारे निवास करने वाले लोग जिस धर्म का अनुपालन करते थे में उसे ही लोकाचार की भाषा में “हिन्दू धर्म” कहा जाने लगा। आज “हिन्दू” शब्द को लेकर तरह-तरह गलतफ़हमियां फ़ैलाई जा रहीं हैं। इसे धर्म विशेष से जोड़ा जा रहा है जो समाज में अराजकता और अशांति का कारण बन रहा है। हमें इसके मूल स्वरूप को देखने व समझने की नितांत आवश्यकता है।

-हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

जीवन-दान


क्या आप जानते हैं कि एक मौत नौ लोगों को ज़िंदगी दे सकती है? चिकित्सा विज्ञान (मेडिकल साइंस) के अनुसार जिस व्यक्ति का मस्तिष्क नाकाम (ब्रेन डेड) हो गया हो लेकिन शरीर के दूसरे अंग काम कर रहे हों, उसके परिजन मरीज के पेनक्रियाज़,किडनी,आंखे (कार्निया),हार्ट,लीवर एवं बोनमेरो जैसे अंगों का दान कर अतिगंभीर हालत वाले मरीजों को नया “जीवनदान” दे सकते हैं। ब्रेन डेड व्यक्ति वह होता है जो वेंटिलेटर पर है जिसकी सांसे चल रही हैं, दिल धड़क रहा है और रक्त संचार चालू है। हमारे देश में प्रति दस लाख में से सिर्फ़ १६ लोग ही अंगदान करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक हर साल देश में लगभग डेढ़ लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं। डाक्टरों के अनुसार हादसे,हार्ट-अटैक और ब्रेन स्ट्रोक के मामलों में अंगदान की संभावना सौ फ़ीसदी तक रहती है। ऐसे में लोगों के परिजन स्वीकृति दें या फ़िर वे लोग पहले से ही अंगदान के पंजीकृत हों तो ज़रूरतमंद लोगों को नया जीवन मिल सकता है। एक व्यक्ति मृत्योपरांत अपने अंगदान से नौ लोगों को “जीवनदान” दे सकता है। चिकित्सकों का कहना है कि ब्रेन डेड व्यक्ति के अंगदान की समस्त प्रक्रिया (आर्गन रिट्राइल) २४ घंटों के भीतर हो जानी चाहिए। जिसमें काउंसलिंग कमेटी व डाक्टर को सूचना एवं ओटी में प्रवेश आदि शामिल हैं। यदि अंगदान के लिए सामाजिक जागृति लाने हेतु विभिन्न स्तरों प्रयास किया जाता है तो कई व्यक्ति इससे लाभान्वित हो सकते हैं।
(स्वतंत्र वार्ता-हैदराबाद से साभार)

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

पुरी में मनेगा “नवकलेवर उत्सव”-

जगन्नाथ पुरी में इस वर्ष २०१५ आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को रथयात्रा के साथ “नवकलेवर उत्सव”भी मनाया जाएगा। पुराने काष्ठ निर्मित विग्रहों को समाधि देकर नवीन विग्रहों के निर्माण एवं प्राण-प्रतिष्ठा “नवकलेवर उत्सव” कहा जाता है। यह “नवकलेवर” जिस वर्ष आषाढ़ का अधिक मास (जो कि सामान्यतः ८ व १९ वर्षों के अंतराल पर होता है) आने पर मनाया जाता है। इस उत्सव में दारू वृक्ष के काष्ठ से निर्मित नवीन विग्रहों का निर्माण व उनकी प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। पुराने विग्रहों को मन्दिर परिसर में ही “कोयली वैकुण्ठ” नामक स्थान पर समाधि दे दी जाती है। पूर्व में यह उत्सव वर्ष १९९६ में मनाया गया था।

“खुदा तू भी नहीं; मैं भी नहीं”

गल्तियों से जुदा तू भी नहीं;
मैं भी नहीं,
दोनों इंसान हैं; खुदा,
तू भी नहीं, मैं भी नहीं।
दोनों इल्ज़ाम देते हैं;
तू मुझे और मैं तुझे,
अपने अंदर झांकता
तू भी नहीं; मैं भी नहीं।
गलतफ़हमियों ने कर दी
दोनों में पैदा दूरियां,
वर्ना फ़ितरत का बुरा
तू भी नहीं; मैं भी नहीं॥
(साभार)

ओरछा

इसका इतिहास 16वीं शताब्दी से शुरू होता है, जब बुंदेला राजाओं ने इसकी स्थापना की थी। इस जगह की पहली और सबसे रोचक कहानी एक मंदिर की है। दरअसल, यह मंदिर भगवान राम की मूर्ति के लिए बनवाया गया था, लेकिन मूर्ति स्थापना के वक्त यह अपने स्थान से हिली नहीं। इस मूर्ति को मधुकर शाह के राज्यकाल (1554-92) के दौरान उनकी रानी [अयोध्या] से लाई थीं। चतुर्भुज मंदिर बनने से पहले इसे कुछ समय के लिए महल में स्थापित किया गया। लेकिन मंदिर बनने के बाद कोई भी मूर्ति को उसके स्थान से हिला नहीं पाया। इसे ईश्वर का चमत्कार मानते हुए महल को ही मंदिर का रूप दे दिया गया और इसका नाम रखा गया राम राजा मंदिर। आज इस महल के चारों ओर शहर बसा है और राम नवमी पर यहां हजारों श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं। वैसे, भगवान राम को यहां भगवान मानने के साथ यहां का राजा भी माना जाता है, क्योंकि उस मूर्ति का चेहरा मंदिर की ओर न होकर महल की ओर है।
देखने योग्य स्थल-
१. रामराजा मंदिर
२. जहागीर महल
३. राजमहल
४. लक्ष्मीनारायण मंदिर
५. चर्तुभुज मंदिर
६. फूल बाग
७. सुन्दर महल
८. राय प्रवीन महल

नक्षत्र पुरूष-“पंडितजी”

इस संसार में प्रेम एक ऐसा तत्व है जो हर नियम-कायदे से ऊपर है। जहां प्रेम होता है वहां जात-पात, अमीर-गरीब, मूढ़-विद्वान आदि सब भेद समाप्त हो जाते हैं तभी तो रहीम जी कहते हैं-“प्रेम ना बाड़ी उपजै, प्रेम ना हाट बिकाय। राजा-परजा जेहि रुचै, सीस देय लै जाए॥” इस बार के मेरे नक्षत्र पुरूष के संबंध में उक्त सारी बातें सत्य प्रमाणित होतीं हैं। टिमरनी में जहां हमारा निवास था उस मुहल्ले का नाम था-“शीतलामाता मार्केट” क्योंकि इसमें शीतलामाता का एक भव्य मंदिर है जो हमारे घर से दिखाई देता था। इस मंदिर के पुजारी थे-शंकर महाराज जिन्हें सभी प्यार से “पंडितजी” कहते थे। “पंडितजी” एक अकिंचन ब्राह्मण थे। वे अविवाहित थे। मंझौला कद,सांवला रंग, गले में तुलसी की कंठी, माथे पर चंदन-तिलक, पहनावे में भगवा-सफेद बंडी और धोती; ऐसे दिखते थे-“पंडितजी”। पंडितजी का हमारे घर से अटूट संबंध था। वे हमारे पारिवारिक सदस्य के रूप में थे। वे दादाजी को “दरबार” और दादी को “जीजीबाई” कहते थे। हमारे दादाजी-दादी उन्हें बहुत सम्मान देते थे। हमारे अधिकांश रिश्तेदार पंडित जी से परिचित थे और पंडित जी उनसे। दादाजी और पंडित का निश्छल प्रेम ही था जो इस प्रकार असमानता होते हुए भी वे प्रायः मित्रवत ही प्रतीत होते थे। मैंने अपनी दादी से सुना था कि जब वे टिमरनी आए थे तब यह मंदिर नहीं था सिर्फ़ एक वृक्ष की नीचे देवी की तीन प्रतिमाएं थी। पंडितजी ने अपने कांधों पर टीन ढो-ढोकर इसे एक मड़िया का रूप दिया। पंडितजी नियमित रूप से देवी की सेवा-अर्चना करते थे। मुहल्ले की महिलाओं को एकत्र कर भजन-कीर्तन आदि करवाया करते थे। कुछ समय बाद प्रबुद्ध लोगों के सहयोग से यहां भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। दादाजी ने भी इस निर्माण कार्य में अपना यथोचित सहयोग प्रदान किया। भव्य मंदिर के पुजारी की प्रतिष्ठा पाने के उपरांत भी पंडितजी और दादाजी का व्यवहार पूर्ववत बना रहा। पंडितजी करीब-करीब रोज़ हमारे घर आया करते थे। पंडित जी नज़र झाड़ने और गंडा-ताबीज़ बनाने मे सिद्धहस्त थे। बचपन में मुझपर नज़र का प्रकोप बहुत होता था। मेरी दादी को यह खुशफ़हमी थी कि मैं दिखने में और बच्चों की अपेक्षा अधिक आकर्षक हूं सो उन्होंने “पंडितजी” से कहकर मुझे बचपन में ही एक अभिमंत्रित ताबीज़ पहना दिया था जिसे मैंने दांतो से चबा-चबाकर किंचित कुरूप बना दिया था। नज़र मुझे फिर भी लग ही जाया करती थी जो “पंडितजी” के झाड़ने के उपरांत ही ठीक होती थी ऐसा मेरा भी विश्वास है। पंडितजी के नज़र झाड़ने का तरीका बहुत सादगीपूर्ण था। मैं उनके इस तरीके की अक्सर नकल उतारा करता था। नज़र झाड़ने के लिए पंडितजी थोड़ी से भभूत लेकर मंत्रोच्चार करते हुए मुझपर फ़ूंकते थे बस नज़र का प्रकोप शांत हो जाता था। अब जो कुछ भी हो मुझे राहत अवश्य मिल जाती थी। एक बार अर्द्धरात्रि को मुझे भयंकर पेट दर्द हुआ। दादाजी ने इसे नज़र का प्रकोप मानकर आधी रात को ही मंदिर जाकर पंडितजी को जगाया। पंडितजी तत्काल गहरी नींद से जागे और दादाजी के साथ हमारे घर आए और मुझे झाड़नी दी जिससे मुझे तुरन्त राहत मिल गई। यह तो सिर्फ़ एक बानगी है ऐसे ना जाने कितने किस्से है जब “पंडितजी” ने अपने निश्छल प्रेम का परिचय दिया था। आज “पंडितजी” हमारे बीच नहीं है किंतु उनकी स्नेहिल यादें हमारे साथ हैं।
-हेमन्त रिछारिया