शनिवार, 27 दिसंबर 2014

“पीके” का विरोध - उचित या....?


आमिर खान अभिनीत फ़िल्म “पीके” रिलीज़ होते ही सुपरहिट हो गई और सुपरहिट होते ही विवादों में घिर गई। ऐसा लगता है मानो सुपरहिट होना और विवादित होना एक ही सिक्के दो पहलू हैं। हिन्दू संगठनों द्वारा फ़िल्म में दिखाए गए कुछ दृश्यों व संवादों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज़ कराई गई हैं। इस मुद्दे को लेकर मीडिया भी अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है किंतु पत्रकारों से निष्पक्ष रहने की अपेक्षा की जाती है। लगता है वर्तमान पत्रकारिता में यह बात दिन-ब-दिन मुश्किल होती जा रही है। विभिन्न समाचार चैनलों पर फ़िल्म “पीके” से उठे विवाद पर समीक्षात्मक बहस का प्रसारण हो रहा है। जिसे देखकर ऐसा लगा मानो एंकर और  संपादकों ने यह पहले ही तय कर लिया है कि हिन्दू संगठनों का विरोध अनुचित है। एंकर द्वारा बार-बार  सेंसर बोर्ड के फ़िल्म को पास कर इसे प्रमाण-पत्र प्रदान किए जाने की दलील दी जा रही थी। इस दलील को देते वक्त शायद पत्रकार महोदय इस बात को भूल गए थे कि कुछ माह पहले उन्हीं के चैनल ने सेंसर बोर्ड के कथित भ्रष्टाचार को लेकर एक रिपोर्ट दिखाई थी जिसमें सेंसर बोर्ड पर फ़िल्म निर्माताओं से पैसे (रिश्वत) लेकर फ़िल्म पास करने का आरोप था। दूसरी ओर एक फ़िल्म समीक्षक फ़िल्म के जर्बदस्त हिट होने की बात को लेकर हिन्दू संगठनों के आरोपों को खारिज कर रहे हैं। क्या किसी फ़िल्म का हिट होना ही उसमें दिखाई गई सामग्री के सही होने की एकमात्र कसौटी है? यदि ऐसा है तो फिर वीरसावरकर,चटगांव,स्वदेश, दो दूनी चार,चलो दिल्ली,गुज़ारिश,मि.एण्ड मिसेज अय्यर,जैसी अनेक संदेशात्मक फ़िल्में जो या तो असफ़ल रहीं या नाममात्र को सफ़ल रहीं, वे सब खराब और बकवास फ़िल्में हैं। आज हमारे देश में इस बात को बच्चा-बच्चा जानता है कि फ़िल्में कैसे हिट होती हैं या कराई जाती हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही “हैप्पी न्यू ईयर” नामक एक फ़िल्म आई थी जो सुपरहिट हुई थी इस फ़िल्म में कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर गाए जाने वाले हिन्दुओं के प्रसिद्ध भजन “राधे-राधे बोलो जय कन्हैया लाल की” को एक आईटम सांग की तरह प्रस्तुत कर उस पर एक अत्यंत भौंडा व अश्लील नृत्य दिखाया गया है, क्या यह भी सही था? फ़िल्म के पक्ष में तर्क देने वालों का कहना है कि इस फ़िल्म में कुरीतियों का विरोध किया गया है। मैं ऐसे तमाम लोगों से बड़ी विनम्रता से पूछना चाहता हूं कि क्या उन्हें कुरीति और आस्था में अन्तर समझ आता है? पूजा-पाठ करना,मंदिर जाना,दान देना,गौ-सेवा करना ये कुरीति नहीं; आस्था है। कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी भी धर्म के पूजा-पाठ करने के तरीके तब तक निर्धारित नहीं कर सकता जब तक कि वे किसी को हानि नहीं पहुंचाते हों। सती प्रथा,देवदासी प्रथा,बलिप्रथा,विधवा विवाह निषेध,भ्रूणहत्या ये सब कुरीतियां है जिनका समय-समय पर हमारे हिन्दू महापुरूषों ने ही विरोध किया और वे बन्द हुईं लेकिन कुरीति की आड़ में धर्म का मखौल स्वीकार नहीं किया जा सकता। केन्द्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को अविलम्ब इस मामले में हस्तक्षेप कर केन्द्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) को निर्देशित करना चाहिए जिससे इस फ़िल्म से विवादित अंश हटाए जाएं और भविष्य में इस प्रकार के विवादों पर अंकुश लग सके।
-संपादक

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