शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

नक्षत्र पुरूष-डा. फूफ़ाजी

जीवन के सफ़र में अक्सर कई लोग मिलते और बिछड़ जाते हैं किंतु कुछ लोग बिछड़ने के बावज़ूद एक मीठी याद बनकर हमेशा साथ रहते हैं। इन्हीं लोगों को डा. हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा “बसेरे से दूर” में “नक्षत्र पुरूष” कहा है। आज पुनः एक ऐसे ही “नक्षत्र पुरूष” का उल्लेख करने का मन कर रहा है। मेरे जीवन के यह नक्षत्र पुरूष हैं- डा.बाबूलालजी सोदावत जिन्हें मैं डा.फूफ़ाजी कहता था। ऊंचा-पूरा कद, गठीला शरीर, चमकती चांद के पीछे अर्द्धचंद्र के रूप में श्वेत केश, आंखों पर चश्मा,  तेजस्वी चेहरा। डा.फूफ़ाजी कुर्सी पर बैठे हुए अपना एक पैर हमेशा हिलाते रहते थे। उन्हें काफी पीना बहुत पसंद था। वर्तमान हरदा जिले की टिमरनी तहसील से कोई ४ किमी. दूर चारखेडा़ में डा. फूफ़ाजी रहते थे। पेशे से चिकित्सक किंतु व्यवहार से एक समाजसेवी। डा.साहब हरियाणवी ब्राह्मण थे। डा.फूफ़ाजी दादाजी के पारिवारिक चिकित्सक अर्थात् “फैमिली डाक्टर” तो थे ही साथ ही साथ दादाजी और डा.फूफ़ाजी में प्रगाढ़ मित्रता थी, वैसे कहने को जीजा-साले के रिश्ते का एक कच्चा-पक्का धागा भी था। डा. सोदावत जी की पत्नि गलाबाई और मेरे दादाजी का गांव एक ही होने की वजह से मेरे दादाजी ने गलाबाई को मुंहबोली बहन बना रखा था। इस नाते डा.फूफ़ाजी मेरे दादाजी को बड़े भाई सा सम्मान दिया करते थे। डा. फूफ़ाजी का कई वर्षों से निरन्तर हमारे घर हर दूसरे दिन आना और दादाजी, दादी और मेरे स्वास्थ्य का परीक्षण करने का नियम सुनिश्चित था। उनके इस नियम के बारे हमारे मुहल्ले में सभी को पता था इसी कारण कई मुहल्ले वाले भी सायं ४ बजते ही डा.फूफ़ाजी के आने का इंतज़ार करते थे। मैंने अक्सर दादाजी को दादी से पूछते हुए सुना था कि-“आज डा.साहब का टर्न है क्या?” डा.फूफ़ाजी के आने वाले दिन को दादाजी “टर्न” कहते थे। डा.फूफ़ाजी के आते ही हम सब उन्हें घेरकर उनके आस-पास एक सभा की तरह बैठ जाते थे; कुछ अस्वस्थ मुहल्ले वाले भी आ जाते थे। डा.फूफ़ाजी बारी-बारी सभी के स्वास्थ्य का परीक्षण कर उन्हें उचित सलाह या दवाईं देते थे। डा.फूफ़ाजी प्रायः निशुल्क ईलाज किया करते थे किंतु दादाजी के आक्रामक आग्रह के कारण उन्हें दादाजी-दादी के स्वास्थ्य परीक्षण की फ़ीस लेनी ही पड़ती थी। स्वास्थ्य परीक्षण के उपरांत हास-परिहास व किस्सागोई का सत्र शुरू होता था। डा.फूफ़ाजी के पास हमेशा किस्सों की भरमार रहती थी। वे अक्सर अपने बीते दो दिन में घटित होने वाली घटनाओं को मज़ेदार किस्से का रूप देकर सभी का मनोरंजन किया करते थे। डा.फूफ़ाजी का भरापूरा परिवार है उनके चार बेटे है। दो बेटे स्वंय चिकित्सक है। जो दादाजी को “मामाजी” कहकर संबोधित करते थे उनके ही कारण हरदा के अधिकांश चिकित्सक दादाजी को मामाजी कहकर पुकारने लगे थे। एक बार दादाजी गंभीर रूप से बीमार हो गए। बरसात का मौसम था। डा.फूफ़ाजी के अनुसार उन्हें पीलिया नामक रोग हो गया था। इस रोग का ईलाज डा.फूफ़ाजी ने अपने दैनिक नियमानुसार हमारे घर आकर ही किया किंतु अब वे हर दूसरे दिन के स्थान पर प्रतिदिन आने लगे थे। शाम होते डा.फूफ़ाजी आते और पीलियाग्रस्त दादाजी को बाटल चढ़ाते; इंजेक्शन लगाते और हमें उनकी देखभाल हेतु आवश्यक निर्देश देते। देखते ही देखते दादाजी के स्वास्थ्य पर डा.फूफ़ाजी के ईलाज का सकारात्मक असर होना भी शुरू हो गया था किंतु पूर्ण स्वस्थ होने में अभी कुछ दिन बाकी थे। एक दिन मूसलाधार बारिश हो रही थी। नदी-नाले अपने उफान पर थे। टिमरनी और चारखेड़ा मार्ग के बीच  का पुल नाले के उफान के कारन डूब गया था। दोनों ओर वाहनों की लंबी-लंबी कतारें लग चुकी थी। पुल के ऊपर से पानी के तेज बहाव को देखते हुए बड़े वाहन ट्रक-बस इत्यादि भी एक ओर खड़े कर दिये गए थे। इधर शाम धीरे-धीरे गुजरती जा रही थी। हम सब डा.फूफ़ाजी का इंतज़ार कर रहे थे। दादाजी ने हमारी व्याकुलता देखते हुए हमें सांत्वना देकर कहा-“इतनी तेज़ बारिश में रास्ता बंद हो गया होगा अब डा.साहब नहीं आएंगे और वैसे भी मैं पहले की अपेक्षा स्वस्थ हूं, चिंता मत करो।” डा.फूफ़ाजी के आने का नियत समय बीत जाने के उपरांत हमने दादाजी की सात्वंना को ही अपनी तसल्ली का आधार बनाया और अपने-अपने कार्यों में संलग्न हो गए। अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने दरवाज़ा खोला तो यह देखकर दंग रह गया कि सामने डा.फूफ़ाजी लंबा सा रेनकोट पहने हाथ में बैग थामें खड़े हैं। अंदर आते ही दादाजी थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा डा.साहब इतनी बारिश में आने की क्या आवश्यकता थी? अब मैं स्वस्थ हूं। इस पर डा. फूफ़ाजी ने दादाजी को बाटल लगाने का उपक्रम करते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा-“भैया, डाक्टर मैं हूं या आप।” उनके इस वाक्य ने गंभीर माहौल को हल्का-फुल्का कर दिया। कुछ देर बाटल समाप्ती के बाद किस्सागोई के सत्र में दादाजी ने डा.फूफ़ाजी से पुनः प्रश्न किया कि “आखिर आप यहां तक आए कैसे?” इस पर डा.फूफ़ाजी ने बताया कि कोई वाहन पुल पार ही नहीं कर रहा था। बड़ी देर के बाद एक ट्रक वाले ने डूबे पुल को पार करने की हिम्मत जुटाई तो मैंने उसे अपने साथ ले चलने का अनुरोध किया क इसपर उस ट्रक के चालक ने कहा कि “साहब देख लीजिए बहाव तेज है ट्रक बह भी सकता है। हमें तो खैर तैरना आता है।” इस पर मैंने कहा कि -“भाई यदि ट्रक बहा तो भी मरूंगा और यदि भैया को कुछ हो गया तो भी ये जीवन मृतवत ही हो जाएगा। जब मरना दोनों तरफ़ से ही है तो मित्रता और फ़र्ज़ निभाते हुए मरना ज़्यादा श्रेयस्कर है।” ये सुनकर हम सभी भाव-विभोर हो गए। इस प्रकार डा.फूफ़ाजी ने अपने जीवन की परवाह किए बिना अपना फ़र्ज़ व मित्रता निभाई।
-हेमन्त रिछारिया

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