मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

धर्मांतरण

ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया
पिछले कुछ दिनों से धर्मांतरण के मुद्दे को लेकर देश में खूब हो-हल्ला हो रहा है। इस मुद्दे ने जहां विपक्ष के लिए “डूबते को तिनके का सहारा...” वाला काम किया वहीं हमारे खबरनबीसों को एक माकूल मसाला मिला। इस मुद्दे को लेकर संसद ठप्प कर दी गई और जनता के लिए ज़रूरी कई बिल अधर में लटक गए। आम जनता बेचारी यह सोचती रह गई आखिर क्यूं हर बार धर्मांतरण इतना बड़ा मुद्दा बन जाता कि उसके सामने सभी कुछ बौना हो जाता है। आखिर यह धर्मांतरण है क्या...? इस सवाल का एक जवाब तो यह दिया जा सकता है कि अपनी इच्छा से बिना किसी प्रलोभन व भय के अपना धर्म छोड़ कर किसी और धर्म को अपना लेना या अंगीकार कर लेना “धर्मांतरण” है। इससे पूर्व कि हम “धर्मांतरण” की गहराई में प्रवेश करें उसके पहले हमें धर्म क्या है यह जान लेना अतिआवश्यक है। मेरी दृष्टि में धर्म एक व्यवस्था है। इसका ईश्वर से प्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध नहीं है। ईश्वर तो सभी प्राणियों को जन्म से ही प्राप्त है, नास्तिकों को भी। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि “धारयति इति धर्म” जो धारण किया जा सके वह धर्म है या जो धारण करने योग्य हो वह “धर्म” है। आचार्य रजनीश ने स्वभाव को ही धर्म कहा है। गीता से भी इसी बात की पुष्टि होती है जब कृष्ण कहते हैं “स्वधर्मे निधनं श्रेय, परधर्मो भयावह” अर्थात् अपने स्वभाव के अनुसार आचरण करते हुए मर जाना श्रेयस्कर होता है। अब प्रश्न उठता है कि यदि कोई स्वेच्छा से अपना स्वभाव या धर्म परिवर्तन करना चाहे तो इसमें कुछ बुरा है? मेरे देखे व्यक्ति के संबंध में बुरा नहीं किंतु समष्टि के संबंध में बुरा है। ऐसा करने से सामाजिक असंतुलन के पैदा होने का खतरा है। अब मुद्दे पर लौटते हैं कि आखिर क्यों किसी और धर्म के व्यक्ति द्वारा हिन्दु धर्म को अपनाने पर बवाल मचता है। मुख्य रूप से यह विशुद्ध राजनीतिक षडयंत्र है। “हिन्दु” कोई धर्म नहीं वरन् एक संस्कृति है। इसे धर्म से जोड़कर जो विष का बीज पूर्व में बोया जा चुका है वर्तमान परिस्थिति उसी का परिणाम मात्र है। आपने सुना होगा कई शायर व कवि अपने नाम के साथ अपने शहर का नाम अपने तख़ल्लुस या उपनाम के रूप में प्रयुक्त करते हैं जैसे इंदौरी, भोपाली, इलाहाबादी,बरेलवी आदि। इनमें सभी धर्मों के लोग होते हैं किंतु किसी के धर्म में कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि यह बात उनकी बद्धमूल धारणाओं के विपरीत प्रतीत नहीं होती किंतु जब “हिन्दु” शब्द का ज़िक्र  किसी भी रूप में आता है तो समस्या खड़ी हो जाती है जबकि यह भी शहरों व स्थानों पर आधारित अन्य उपनामों की भांति प्रयोग किया जाने वाला शब्द मात्र है; कोई “धर्म” नहीं। इसने रूपांतरण कर जिस धर्म का रूप ले लिया है वह वास्तव में “सनातन धर्म” है। वास्तविक रूप में “हिन्दु” एक फ़ारसी शब्द है जो कि “सिन्धु” से बना है जो कि सिंध नदी के निकट रहने वालों का द्योतक है चूंकि फ़ारसी भाषा में “स” अक्षर का उच्चारण “ह” के रूप में किया जाता है इसलिए शब्द बना “हिन्दु”। जैसे पूर्व में बताया जा चुका है कि इंदौर में रहने वालों को इंदौरी, भोपाल में रहने वालों को भोपाली, इलाहबाद में रहने वालों इलाहबादी, और नहर के समीप रहने वालों को नेहरू कहे जाने में किसी कोई आपत्ति नहीं होती ठीक उसी प्रकार सिंध के निकट बसे व्यक्तियों को “सिन्धु” या “हिन्दु” कहे जाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आज देश की राजनीति में “हिन्दु” शब्द एक अछूत बनता जा रहा है इसके पीछे दोष हमारे विकृत मानसिकता वाले राजनेताओं का है। जो अपनी सत्तालोलुप प्रवृत्ति के चलते इस मुद्दे बेवजह गर्माए रखते हैं। जब हिन्दुओं को प्रलोभन देकर किसी और धर्म में प्रवेश करा दिया जाता है तब किसी भी दिशा से कोई हलचल नहीं होती किंतु जब कोई अपनी स्वेच्छा से पुनः अपने धर्म को अंगीकार करना चाहता है या किसी और धर्म का व्यक्ति सनातन धर्म की ओर आकर्षित होता है तो सभी की पीड़ा प्रारंभ हो जाती है। यदि हम थोड़ा सचेत और पूर्वाग्रह रहित होकर “हिन्दु” शब्द पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि इस भारत-भूमि पर निवास करने वाले सभी “हिन्दु” हैं चाहे वे किसी भी पंथ या सम्प्रदाय के हों, रही बात धर्मांतरण की तो  बलपूर्वक एवं प्रलोभन देकर करवाया गया धर्म- परिवर्तन पाप और अपराध की श्रेणी में आता है; धर्म की नहीं।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

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