रविवार, 21 दिसंबर 2014

नक्षत्र पुरूष-रणछोड़ मामा

काल्पनिक चित्र
 जीवन के सफ़र में यूं तो कई लोग मिलते और बिछ्ड़ जाते हैं, पर कुछ लोग दिल में हमेशा-हमेशा के लिए बस जाते हैं। जिन्हें स्व. श्री हरिवंशराय बच्चन अपनी आत्मकथा "बसेरे से दूर" में "नक्षत्र पुरूष" कहते हैं, जब कभी उनकी याद आती है तो एक मीठा स्पंदन सा महसूस होता है। ऐसे ही एक व्यक्ति की याद आज मुझे आ रही और वही मीठा स्पंदन मैं महसूस कर रहा हूं, उनका नाम था-रणछोड़ दास। मैं उन्हें प्यार से "रणछोड़ मामा" कहता था। इससे पहले कि हम उनकी बात करें ज़रा इस प्रसंग की पृष्ठभूमि समझ लेते हैं। बात कुछ ४०-५० वर्ष पुरानी है। आज़ादी के पश्चात ज़मींदारी प्रथा धीरे-धीरे समाप्त होने लगी परंतु मानसिक गुलामी से आज़ाद होने में थोड़ा वक्त तो लगता ही है, सो अनौपचारिक रूप से ज़मींदारी व ज़मींदार दोनों बहुत बाद तक हमारी व्यवस्था में उपस्थित रहे और कमोबेश आज भी हैं। मेरे दादाजी जिन्हें लोग "पटेल साहब"  कहते थे, कपासी सहित ५ गांवों के ज़मींदार थे। सैंकड़ों एकड़ ज़मीन, सागौन के जंगल, तालाब, पशुओं से भरी-पूरी ज़मींदारी। उस ज़माने में ज़मींदारी को संभालने वाला जो मुख्य व्यक्ति होता था उसे "जिराती" कहा जाता था। वर्तमान परिदृश्य में “सीईओ”। दादाजी की ज़मींदारी "बड़ी जिरात" के नाम से जानी जाती थी और उसके जिराती थे-रणछोड़ दास यानि हमारे "रणछोड़ मामा"। उम्र लगभग ६० वर्ष, कद लंबा, बलिष्ठ शरीर, रंग सांवला,घुंघराले धवल केश,कान में बाली। पहनावे में घुटनों से ऊंची धोती, आधी बांह की बंडी और गमछा। रणछोड़ मामा के दोनों पैर कुछ टेड़े थे जिससे चलते वक्त उनके घुटने आपस में मंजीरों की तरह टकराते थे। बिना लाठी के सहारे वो ठीक से चल नहीं पाते थे। उन दिनों मैं काफी छोटा था। मेरा पूरा बचपन दादाजी के पास ही बीता है। मेरे जन्म से कुछ वर्षों पूर्व सन १९७२ में दादाजी ने कपासी से ३५ किमी. दूर टिमरनी नामक कस्बे में रहने का निर्णय कर लिया था। यहां उन्होंने एक दुमंज़िला भवन बनाया जो "मोरवाली बिल्डिंग" के नाम से उस पूरे क्षेत्र में आज भी मशहूर है। साल में दो-तीन बार हम टिमरनी से कपासी जाते थे। कपासी में रणछोड़ मामा का स्नेह मुझे प्राप्त होता था। वो मुझे अपनी गोद में बिठाते, घोड़ागाड़ी में सैर कराते, ता़ज़ा-ताज़ा मक्खन खिलाते, ऐसे स्नेह-दुलार भरे माहौल में समय बीतता रहा। दादाजी बताया करते थे कि रणछोड़ मामा जब ९ वर्ष के थे तब से ही कपासी की जिरात में थे। जिसके ज़मींदार उस समय दादाजी के श्वसुर स्व.श्री द्वारकाप्रसाद जी पटेल थे। उनके निधन के बाद यूं समझिए कि ज़मींदारी के साथ-साथ रणछोड़ मामा भी दादाजी को विरासत में मिले। दादाजी का उनसे अटूट प्यार था। रणछोड़ मामा भी दादाजी को उतना ही चाहते थे। वे दादाजी को "फुआजी" कहते थे। ज़मींदारी की सारी ज़िम्मेदारी रणछोड़ मामा पर ही थी। बहू-बेटों व नाती-पोतों से अपना भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद वो हमारे घर यानि "जिरात" में ही रहते थे और भोजन अपने घर से मंगवाते थे। सर्द रातों में वे "जिरात" की बैठक में अलाव का इंतज़ाम करते जिसमें गांव वाले आकर अपनी मंडली जमाते। देर रात तक अलाव के पास चिलम,बीड़ी व बातों का सिलसिला चलता रहता। उनके विश्वास की छांव तले दादाजी ज़मींदारी के कार्य-कलापों से मुक्त थे। समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा। इधर दादाजी तो उधर रणछोड़ मामा पर उम्र का प्रभाव झलकने लगा। बढ़ती आयु के साथ दादाजी को ज़मींदारी जब बोझ लगने लगी तो उन्होंने धीरे-धीरे ज़मीन बेचना शुरू कर दिया। सागौन का जंगल सरकार को बेच दिया गया और ज़मीन व्यक्ति व रिश्तेदारों को। उम्रदराज़ होने व ज़मींदारी कार्य के कुशल संचालन में असमर्थ होने पर भी रणछोड़ मामा ने दादाजी के इस फैसले का तीव्र विरोध किया पर अंत में शायद यह सोचकर कि "होई सोई जो राम रचि राखा...", भारी मन से दादाजी की बात मान ली। जिस दिन ज़मीन का आखिरी टुकड़ा व गांव का हवेलीनुमा मकान बेचा गया रणछोड़ मामा फूट-फूट कर रोए। ये औपचारिक रूप से उनकी सेवानिवृत्ति थी। उस वक्त उनकी आयु लगभग ६२ वर्ष के करीब थी। समय बीतता रहा, कोई २ वर्षों बाद दादाजी के पास गांव से शादी का निमंत्रण आया वैसे दादाजी आवागमन कम ही किया करते थे पर शायद वहां जाना आवश्यक था सो दादाजी समारोह में शामिल होने के लिए कपासी गए। मैं भी उनके साथ था। वहां कपासी छोड़ने के २ वर्षों के बाद हमारा मिलना रणछोड़ मामा से हुआ। हम उनसे मिलकर अत्यंत आनंदित थे। रणछोड़ मामा भी अति प्रसन्न थे। भोजन के उपरांत जब दादाजी वापस आने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने देखा कि उनके जूते नहीं मिल रहे। बहुत खोजबीन करने के बाद भी जब जूते नहीं मिले तो इसे दादाजी शादियों में होने वाली सहज घटना मानकर बिना जूतों के ही अपनी जीप की ओर चल दिए जैसे वे जीप के पास पहुंचे उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। वहां रणछोड़ मामा दादाजी के जूते अपने गमछे में लपेटे खड़े थे। दादाजी ने यह देखकर उनसे पूछा कि "तुझे ये कहां मिले ?" तो उन्होंने अपनी भाषा में उत्तर दिया-"फुआजी शादी को टेम है, कोई चुरा नी ले जाए ऐके लेने मैंने तुम्हारा उतारतई उठा लिया था।" ये सुनते ही दादाजी की आंखों मे नमी आ गई उन्होंने रणछोड़ मामा को गले लगा लिया और उनसे विदा ली। आज रणछोड़ मामा हमारे साथ नहीं है पर उनकी याद अक्सर मुझे दादाजी और उनके निःस्वार्थ प्रेम का स्मरण करा जाती है और जब भी ऐसा होता है मैं आसमान की ओर देखकर अपने इस नक्षत्र पुरूष को ढूंढने की कोशिश करता हूं।
-हेमन्त रिछारिया

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