शनिवार, 27 दिसंबर 2014

“पीके” का विरोध - उचित या....?


आमिर खान अभिनीत फ़िल्म “पीके” रिलीज़ होते ही सुपरहिट हो गई और सुपरहिट होते ही विवादों में घिर गई। ऐसा लगता है मानो सुपरहिट होना और विवादित होना एक ही सिक्के दो पहलू हैं। हिन्दू संगठनों द्वारा फ़िल्म में दिखाए गए कुछ दृश्यों व संवादों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज़ कराई गई हैं। इस मुद्दे को लेकर मीडिया भी अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है किंतु पत्रकारों से निष्पक्ष रहने की अपेक्षा की जाती है। लगता है वर्तमान पत्रकारिता में यह बात दिन-ब-दिन मुश्किल होती जा रही है। विभिन्न समाचार चैनलों पर फ़िल्म “पीके” से उठे विवाद पर समीक्षात्मक बहस का प्रसारण हो रहा है। जिसे देखकर ऐसा लगा मानो एंकर और  संपादकों ने यह पहले ही तय कर लिया है कि हिन्दू संगठनों का विरोध अनुचित है। एंकर द्वारा बार-बार  सेंसर बोर्ड के फ़िल्म को पास कर इसे प्रमाण-पत्र प्रदान किए जाने की दलील दी जा रही थी। इस दलील को देते वक्त शायद पत्रकार महोदय इस बात को भूल गए थे कि कुछ माह पहले उन्हीं के चैनल ने सेंसर बोर्ड के कथित भ्रष्टाचार को लेकर एक रिपोर्ट दिखाई थी जिसमें सेंसर बोर्ड पर फ़िल्म निर्माताओं से पैसे (रिश्वत) लेकर फ़िल्म पास करने का आरोप था। दूसरी ओर एक फ़िल्म समीक्षक फ़िल्म के जर्बदस्त हिट होने की बात को लेकर हिन्दू संगठनों के आरोपों को खारिज कर रहे हैं। क्या किसी फ़िल्म का हिट होना ही उसमें दिखाई गई सामग्री के सही होने की एकमात्र कसौटी है? यदि ऐसा है तो फिर वीरसावरकर,चटगांव,स्वदेश, दो दूनी चार,चलो दिल्ली,गुज़ारिश,मि.एण्ड मिसेज अय्यर,जैसी अनेक संदेशात्मक फ़िल्में जो या तो असफ़ल रहीं या नाममात्र को सफ़ल रहीं, वे सब खराब और बकवास फ़िल्में हैं। आज हमारे देश में इस बात को बच्चा-बच्चा जानता है कि फ़िल्में कैसे हिट होती हैं या कराई जाती हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही “हैप्पी न्यू ईयर” नामक एक फ़िल्म आई थी जो सुपरहिट हुई थी इस फ़िल्म में कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर गाए जाने वाले हिन्दुओं के प्रसिद्ध भजन “राधे-राधे बोलो जय कन्हैया लाल की” को एक आईटम सांग की तरह प्रस्तुत कर उस पर एक अत्यंत भौंडा व अश्लील नृत्य दिखाया गया है, क्या यह भी सही था? फ़िल्म के पक्ष में तर्क देने वालों का कहना है कि इस फ़िल्म में कुरीतियों का विरोध किया गया है। मैं ऐसे तमाम लोगों से बड़ी विनम्रता से पूछना चाहता हूं कि क्या उन्हें कुरीति और आस्था में अन्तर समझ आता है? पूजा-पाठ करना,मंदिर जाना,दान देना,गौ-सेवा करना ये कुरीति नहीं; आस्था है। कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी भी धर्म के पूजा-पाठ करने के तरीके तब तक निर्धारित नहीं कर सकता जब तक कि वे किसी को हानि नहीं पहुंचाते हों। सती प्रथा,देवदासी प्रथा,बलिप्रथा,विधवा विवाह निषेध,भ्रूणहत्या ये सब कुरीतियां है जिनका समय-समय पर हमारे हिन्दू महापुरूषों ने ही विरोध किया और वे बन्द हुईं लेकिन कुरीति की आड़ में धर्म का मखौल स्वीकार नहीं किया जा सकता। केन्द्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को अविलम्ब इस मामले में हस्तक्षेप कर केन्द्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) को निर्देशित करना चाहिए जिससे इस फ़िल्म से विवादित अंश हटाए जाएं और भविष्य में इस प्रकार के विवादों पर अंकुश लग सके।
-संपादक

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

नक्षत्र पुरूष-डा. फूफ़ाजी

जीवन के सफ़र में अक्सर कई लोग मिलते और बिछड़ जाते हैं किंतु कुछ लोग बिछड़ने के बावज़ूद एक मीठी याद बनकर हमेशा साथ रहते हैं। इन्हीं लोगों को डा. हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा “बसेरे से दूर” में “नक्षत्र पुरूष” कहा है। आज पुनः एक ऐसे ही “नक्षत्र पुरूष” का उल्लेख करने का मन कर रहा है। मेरे जीवन के यह नक्षत्र पुरूष हैं- डा.बाबूलालजी सोदावत जिन्हें मैं डा.फूफ़ाजी कहता था। ऊंचा-पूरा कद, गठीला शरीर, चमकती चांद के पीछे अर्द्धचंद्र के रूप में श्वेत केश, आंखों पर चश्मा,  तेजस्वी चेहरा। डा.फूफ़ाजी कुर्सी पर बैठे हुए अपना एक पैर हमेशा हिलाते रहते थे। उन्हें काफी पीना बहुत पसंद था। वर्तमान हरदा जिले की टिमरनी तहसील से कोई ४ किमी. दूर चारखेडा़ में डा. फूफ़ाजी रहते थे। पेशे से चिकित्सक किंतु व्यवहार से एक समाजसेवी। डा.साहब हरियाणवी ब्राह्मण थे। डा.फूफ़ाजी दादाजी के पारिवारिक चिकित्सक अर्थात् “फैमिली डाक्टर” तो थे ही साथ ही साथ दादाजी और डा.फूफ़ाजी में प्रगाढ़ मित्रता थी, वैसे कहने को जीजा-साले के रिश्ते का एक कच्चा-पक्का धागा भी था। डा. सोदावत जी की पत्नि गलाबाई और मेरे दादाजी का गांव एक ही होने की वजह से मेरे दादाजी ने गलाबाई को मुंहबोली बहन बना रखा था। इस नाते डा.फूफ़ाजी मेरे दादाजी को बड़े भाई सा सम्मान दिया करते थे। डा. फूफ़ाजी का कई वर्षों से निरन्तर हमारे घर हर दूसरे दिन आना और दादाजी, दादी और मेरे स्वास्थ्य का परीक्षण करने का नियम सुनिश्चित था। उनके इस नियम के बारे हमारे मुहल्ले में सभी को पता था इसी कारण कई मुहल्ले वाले भी सायं ४ बजते ही डा.फूफ़ाजी के आने का इंतज़ार करते थे। मैंने अक्सर दादाजी को दादी से पूछते हुए सुना था कि-“आज डा.साहब का टर्न है क्या?” डा.फूफ़ाजी के आने वाले दिन को दादाजी “टर्न” कहते थे। डा.फूफ़ाजी के आते ही हम सब उन्हें घेरकर उनके आस-पास एक सभा की तरह बैठ जाते थे; कुछ अस्वस्थ मुहल्ले वाले भी आ जाते थे। डा.फूफ़ाजी बारी-बारी सभी के स्वास्थ्य का परीक्षण कर उन्हें उचित सलाह या दवाईं देते थे। डा.फूफ़ाजी प्रायः निशुल्क ईलाज किया करते थे किंतु दादाजी के आक्रामक आग्रह के कारण उन्हें दादाजी-दादी के स्वास्थ्य परीक्षण की फ़ीस लेनी ही पड़ती थी। स्वास्थ्य परीक्षण के उपरांत हास-परिहास व किस्सागोई का सत्र शुरू होता था। डा.फूफ़ाजी के पास हमेशा किस्सों की भरमार रहती थी। वे अक्सर अपने बीते दो दिन में घटित होने वाली घटनाओं को मज़ेदार किस्से का रूप देकर सभी का मनोरंजन किया करते थे। डा.फूफ़ाजी का भरापूरा परिवार है उनके चार बेटे है। दो बेटे स्वंय चिकित्सक है। जो दादाजी को “मामाजी” कहकर संबोधित करते थे उनके ही कारण हरदा के अधिकांश चिकित्सक दादाजी को मामाजी कहकर पुकारने लगे थे। एक बार दादाजी गंभीर रूप से बीमार हो गए। बरसात का मौसम था। डा.फूफ़ाजी के अनुसार उन्हें पीलिया नामक रोग हो गया था। इस रोग का ईलाज डा.फूफ़ाजी ने अपने दैनिक नियमानुसार हमारे घर आकर ही किया किंतु अब वे हर दूसरे दिन के स्थान पर प्रतिदिन आने लगे थे। शाम होते डा.फूफ़ाजी आते और पीलियाग्रस्त दादाजी को बाटल चढ़ाते; इंजेक्शन लगाते और हमें उनकी देखभाल हेतु आवश्यक निर्देश देते। देखते ही देखते दादाजी के स्वास्थ्य पर डा.फूफ़ाजी के ईलाज का सकारात्मक असर होना भी शुरू हो गया था किंतु पूर्ण स्वस्थ होने में अभी कुछ दिन बाकी थे। एक दिन मूसलाधार बारिश हो रही थी। नदी-नाले अपने उफान पर थे। टिमरनी और चारखेड़ा मार्ग के बीच  का पुल नाले के उफान के कारन डूब गया था। दोनों ओर वाहनों की लंबी-लंबी कतारें लग चुकी थी। पुल के ऊपर से पानी के तेज बहाव को देखते हुए बड़े वाहन ट्रक-बस इत्यादि भी एक ओर खड़े कर दिये गए थे। इधर शाम धीरे-धीरे गुजरती जा रही थी। हम सब डा.फूफ़ाजी का इंतज़ार कर रहे थे। दादाजी ने हमारी व्याकुलता देखते हुए हमें सांत्वना देकर कहा-“इतनी तेज़ बारिश में रास्ता बंद हो गया होगा अब डा.साहब नहीं आएंगे और वैसे भी मैं पहले की अपेक्षा स्वस्थ हूं, चिंता मत करो।” डा.फूफ़ाजी के आने का नियत समय बीत जाने के उपरांत हमने दादाजी की सात्वंना को ही अपनी तसल्ली का आधार बनाया और अपने-अपने कार्यों में संलग्न हो गए। अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने दरवाज़ा खोला तो यह देखकर दंग रह गया कि सामने डा.फूफ़ाजी लंबा सा रेनकोट पहने हाथ में बैग थामें खड़े हैं। अंदर आते ही दादाजी थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा डा.साहब इतनी बारिश में आने की क्या आवश्यकता थी? अब मैं स्वस्थ हूं। इस पर डा. फूफ़ाजी ने दादाजी को बाटल लगाने का उपक्रम करते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा-“भैया, डाक्टर मैं हूं या आप।” उनके इस वाक्य ने गंभीर माहौल को हल्का-फुल्का कर दिया। कुछ देर बाटल समाप्ती के बाद किस्सागोई के सत्र में दादाजी ने डा.फूफ़ाजी से पुनः प्रश्न किया कि “आखिर आप यहां तक आए कैसे?” इस पर डा.फूफ़ाजी ने बताया कि कोई वाहन पुल पार ही नहीं कर रहा था। बड़ी देर के बाद एक ट्रक वाले ने डूबे पुल को पार करने की हिम्मत जुटाई तो मैंने उसे अपने साथ ले चलने का अनुरोध किया क इसपर उस ट्रक के चालक ने कहा कि “साहब देख लीजिए बहाव तेज है ट्रक बह भी सकता है। हमें तो खैर तैरना आता है।” इस पर मैंने कहा कि -“भाई यदि ट्रक बहा तो भी मरूंगा और यदि भैया को कुछ हो गया तो भी ये जीवन मृतवत ही हो जाएगा। जब मरना दोनों तरफ़ से ही है तो मित्रता और फ़र्ज़ निभाते हुए मरना ज़्यादा श्रेयस्कर है।” ये सुनकर हम सभी भाव-विभोर हो गए। इस प्रकार डा.फूफ़ाजी ने अपने जीवन की परवाह किए बिना अपना फ़र्ज़ व मित्रता निभाई।
-हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

धर्मांतरण

ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया
पिछले कुछ दिनों से धर्मांतरण के मुद्दे को लेकर देश में खूब हो-हल्ला हो रहा है। इस मुद्दे ने जहां विपक्ष के लिए “डूबते को तिनके का सहारा...” वाला काम किया वहीं हमारे खबरनबीसों को एक माकूल मसाला मिला। इस मुद्दे को लेकर संसद ठप्प कर दी गई और जनता के लिए ज़रूरी कई बिल अधर में लटक गए। आम जनता बेचारी यह सोचती रह गई आखिर क्यूं हर बार धर्मांतरण इतना बड़ा मुद्दा बन जाता कि उसके सामने सभी कुछ बौना हो जाता है। आखिर यह धर्मांतरण है क्या...? इस सवाल का एक जवाब तो यह दिया जा सकता है कि अपनी इच्छा से बिना किसी प्रलोभन व भय के अपना धर्म छोड़ कर किसी और धर्म को अपना लेना या अंगीकार कर लेना “धर्मांतरण” है। इससे पूर्व कि हम “धर्मांतरण” की गहराई में प्रवेश करें उसके पहले हमें धर्म क्या है यह जान लेना अतिआवश्यक है। मेरी दृष्टि में धर्म एक व्यवस्था है। इसका ईश्वर से प्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध नहीं है। ईश्वर तो सभी प्राणियों को जन्म से ही प्राप्त है, नास्तिकों को भी। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि “धारयति इति धर्म” जो धारण किया जा सके वह धर्म है या जो धारण करने योग्य हो वह “धर्म” है। आचार्य रजनीश ने स्वभाव को ही धर्म कहा है। गीता से भी इसी बात की पुष्टि होती है जब कृष्ण कहते हैं “स्वधर्मे निधनं श्रेय, परधर्मो भयावह” अर्थात् अपने स्वभाव के अनुसार आचरण करते हुए मर जाना श्रेयस्कर होता है। अब प्रश्न उठता है कि यदि कोई स्वेच्छा से अपना स्वभाव या धर्म परिवर्तन करना चाहे तो इसमें कुछ बुरा है? मेरे देखे व्यक्ति के संबंध में बुरा नहीं किंतु समष्टि के संबंध में बुरा है। ऐसा करने से सामाजिक असंतुलन के पैदा होने का खतरा है। अब मुद्दे पर लौटते हैं कि आखिर क्यों किसी और धर्म के व्यक्ति द्वारा हिन्दु धर्म को अपनाने पर बवाल मचता है। मुख्य रूप से यह विशुद्ध राजनीतिक षडयंत्र है। “हिन्दु” कोई धर्म नहीं वरन् एक संस्कृति है। इसे धर्म से जोड़कर जो विष का बीज पूर्व में बोया जा चुका है वर्तमान परिस्थिति उसी का परिणाम मात्र है। आपने सुना होगा कई शायर व कवि अपने नाम के साथ अपने शहर का नाम अपने तख़ल्लुस या उपनाम के रूप में प्रयुक्त करते हैं जैसे इंदौरी, भोपाली, इलाहाबादी,बरेलवी आदि। इनमें सभी धर्मों के लोग होते हैं किंतु किसी के धर्म में कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि यह बात उनकी बद्धमूल धारणाओं के विपरीत प्रतीत नहीं होती किंतु जब “हिन्दु” शब्द का ज़िक्र  किसी भी रूप में आता है तो समस्या खड़ी हो जाती है जबकि यह भी शहरों व स्थानों पर आधारित अन्य उपनामों की भांति प्रयोग किया जाने वाला शब्द मात्र है; कोई “धर्म” नहीं। इसने रूपांतरण कर जिस धर्म का रूप ले लिया है वह वास्तव में “सनातन धर्म” है। वास्तविक रूप में “हिन्दु” एक फ़ारसी शब्द है जो कि “सिन्धु” से बना है जो कि सिंध नदी के निकट रहने वालों का द्योतक है चूंकि फ़ारसी भाषा में “स” अक्षर का उच्चारण “ह” के रूप में किया जाता है इसलिए शब्द बना “हिन्दु”। जैसे पूर्व में बताया जा चुका है कि इंदौर में रहने वालों को इंदौरी, भोपाल में रहने वालों को भोपाली, इलाहबाद में रहने वालों इलाहबादी, और नहर के समीप रहने वालों को नेहरू कहे जाने में किसी कोई आपत्ति नहीं होती ठीक उसी प्रकार सिंध के निकट बसे व्यक्तियों को “सिन्धु” या “हिन्दु” कहे जाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आज देश की राजनीति में “हिन्दु” शब्द एक अछूत बनता जा रहा है इसके पीछे दोष हमारे विकृत मानसिकता वाले राजनेताओं का है। जो अपनी सत्तालोलुप प्रवृत्ति के चलते इस मुद्दे बेवजह गर्माए रखते हैं। जब हिन्दुओं को प्रलोभन देकर किसी और धर्म में प्रवेश करा दिया जाता है तब किसी भी दिशा से कोई हलचल नहीं होती किंतु जब कोई अपनी स्वेच्छा से पुनः अपने धर्म को अंगीकार करना चाहता है या किसी और धर्म का व्यक्ति सनातन धर्म की ओर आकर्षित होता है तो सभी की पीड़ा प्रारंभ हो जाती है। यदि हम थोड़ा सचेत और पूर्वाग्रह रहित होकर “हिन्दु” शब्द पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि इस भारत-भूमि पर निवास करने वाले सभी “हिन्दु” हैं चाहे वे किसी भी पंथ या सम्प्रदाय के हों, रही बात धर्मांतरण की तो  बलपूर्वक एवं प्रलोभन देकर करवाया गया धर्म- परिवर्तन पाप और अपराध की श्रेणी में आता है; धर्म की नहीं।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

रविवार, 21 दिसंबर 2014

नक्षत्र पुरूष-रणछोड़ मामा

काल्पनिक चित्र
 जीवन के सफ़र में यूं तो कई लोग मिलते और बिछ्ड़ जाते हैं, पर कुछ लोग दिल में हमेशा-हमेशा के लिए बस जाते हैं। जिन्हें स्व. श्री हरिवंशराय बच्चन अपनी आत्मकथा "बसेरे से दूर" में "नक्षत्र पुरूष" कहते हैं, जब कभी उनकी याद आती है तो एक मीठा स्पंदन सा महसूस होता है। ऐसे ही एक व्यक्ति की याद आज मुझे आ रही और वही मीठा स्पंदन मैं महसूस कर रहा हूं, उनका नाम था-रणछोड़ दास। मैं उन्हें प्यार से "रणछोड़ मामा" कहता था। इससे पहले कि हम उनकी बात करें ज़रा इस प्रसंग की पृष्ठभूमि समझ लेते हैं। बात कुछ ४०-५० वर्ष पुरानी है। आज़ादी के पश्चात ज़मींदारी प्रथा धीरे-धीरे समाप्त होने लगी परंतु मानसिक गुलामी से आज़ाद होने में थोड़ा वक्त तो लगता ही है, सो अनौपचारिक रूप से ज़मींदारी व ज़मींदार दोनों बहुत बाद तक हमारी व्यवस्था में उपस्थित रहे और कमोबेश आज भी हैं। मेरे दादाजी जिन्हें लोग "पटेल साहब"  कहते थे, कपासी सहित ५ गांवों के ज़मींदार थे। सैंकड़ों एकड़ ज़मीन, सागौन के जंगल, तालाब, पशुओं से भरी-पूरी ज़मींदारी। उस ज़माने में ज़मींदारी को संभालने वाला जो मुख्य व्यक्ति होता था उसे "जिराती" कहा जाता था। वर्तमान परिदृश्य में “सीईओ”। दादाजी की ज़मींदारी "बड़ी जिरात" के नाम से जानी जाती थी और उसके जिराती थे-रणछोड़ दास यानि हमारे "रणछोड़ मामा"। उम्र लगभग ६० वर्ष, कद लंबा, बलिष्ठ शरीर, रंग सांवला,घुंघराले धवल केश,कान में बाली। पहनावे में घुटनों से ऊंची धोती, आधी बांह की बंडी और गमछा। रणछोड़ मामा के दोनों पैर कुछ टेड़े थे जिससे चलते वक्त उनके घुटने आपस में मंजीरों की तरह टकराते थे। बिना लाठी के सहारे वो ठीक से चल नहीं पाते थे। उन दिनों मैं काफी छोटा था। मेरा पूरा बचपन दादाजी के पास ही बीता है। मेरे जन्म से कुछ वर्षों पूर्व सन १९७२ में दादाजी ने कपासी से ३५ किमी. दूर टिमरनी नामक कस्बे में रहने का निर्णय कर लिया था। यहां उन्होंने एक दुमंज़िला भवन बनाया जो "मोरवाली बिल्डिंग" के नाम से उस पूरे क्षेत्र में आज भी मशहूर है। साल में दो-तीन बार हम टिमरनी से कपासी जाते थे। कपासी में रणछोड़ मामा का स्नेह मुझे प्राप्त होता था। वो मुझे अपनी गोद में बिठाते, घोड़ागाड़ी में सैर कराते, ता़ज़ा-ताज़ा मक्खन खिलाते, ऐसे स्नेह-दुलार भरे माहौल में समय बीतता रहा। दादाजी बताया करते थे कि रणछोड़ मामा जब ९ वर्ष के थे तब से ही कपासी की जिरात में थे। जिसके ज़मींदार उस समय दादाजी के श्वसुर स्व.श्री द्वारकाप्रसाद जी पटेल थे। उनके निधन के बाद यूं समझिए कि ज़मींदारी के साथ-साथ रणछोड़ मामा भी दादाजी को विरासत में मिले। दादाजी का उनसे अटूट प्यार था। रणछोड़ मामा भी दादाजी को उतना ही चाहते थे। वे दादाजी को "फुआजी" कहते थे। ज़मींदारी की सारी ज़िम्मेदारी रणछोड़ मामा पर ही थी। बहू-बेटों व नाती-पोतों से अपना भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद वो हमारे घर यानि "जिरात" में ही रहते थे और भोजन अपने घर से मंगवाते थे। सर्द रातों में वे "जिरात" की बैठक में अलाव का इंतज़ाम करते जिसमें गांव वाले आकर अपनी मंडली जमाते। देर रात तक अलाव के पास चिलम,बीड़ी व बातों का सिलसिला चलता रहता। उनके विश्वास की छांव तले दादाजी ज़मींदारी के कार्य-कलापों से मुक्त थे। समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा। इधर दादाजी तो उधर रणछोड़ मामा पर उम्र का प्रभाव झलकने लगा। बढ़ती आयु के साथ दादाजी को ज़मींदारी जब बोझ लगने लगी तो उन्होंने धीरे-धीरे ज़मीन बेचना शुरू कर दिया। सागौन का जंगल सरकार को बेच दिया गया और ज़मीन व्यक्ति व रिश्तेदारों को। उम्रदराज़ होने व ज़मींदारी कार्य के कुशल संचालन में असमर्थ होने पर भी रणछोड़ मामा ने दादाजी के इस फैसले का तीव्र विरोध किया पर अंत में शायद यह सोचकर कि "होई सोई जो राम रचि राखा...", भारी मन से दादाजी की बात मान ली। जिस दिन ज़मीन का आखिरी टुकड़ा व गांव का हवेलीनुमा मकान बेचा गया रणछोड़ मामा फूट-फूट कर रोए। ये औपचारिक रूप से उनकी सेवानिवृत्ति थी। उस वक्त उनकी आयु लगभग ६२ वर्ष के करीब थी। समय बीतता रहा, कोई २ वर्षों बाद दादाजी के पास गांव से शादी का निमंत्रण आया वैसे दादाजी आवागमन कम ही किया करते थे पर शायद वहां जाना आवश्यक था सो दादाजी समारोह में शामिल होने के लिए कपासी गए। मैं भी उनके साथ था। वहां कपासी छोड़ने के २ वर्षों के बाद हमारा मिलना रणछोड़ मामा से हुआ। हम उनसे मिलकर अत्यंत आनंदित थे। रणछोड़ मामा भी अति प्रसन्न थे। भोजन के उपरांत जब दादाजी वापस आने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने देखा कि उनके जूते नहीं मिल रहे। बहुत खोजबीन करने के बाद भी जब जूते नहीं मिले तो इसे दादाजी शादियों में होने वाली सहज घटना मानकर बिना जूतों के ही अपनी जीप की ओर चल दिए जैसे वे जीप के पास पहुंचे उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। वहां रणछोड़ मामा दादाजी के जूते अपने गमछे में लपेटे खड़े थे। दादाजी ने यह देखकर उनसे पूछा कि "तुझे ये कहां मिले ?" तो उन्होंने अपनी भाषा में उत्तर दिया-"फुआजी शादी को टेम है, कोई चुरा नी ले जाए ऐके लेने मैंने तुम्हारा उतारतई उठा लिया था।" ये सुनते ही दादाजी की आंखों मे नमी आ गई उन्होंने रणछोड़ मामा को गले लगा लिया और उनसे विदा ली। आज रणछोड़ मामा हमारे साथ नहीं है पर उनकी याद अक्सर मुझे दादाजी और उनके निःस्वार्थ प्रेम का स्मरण करा जाती है और जब भी ऐसा होता है मैं आसमान की ओर देखकर अपने इस नक्षत्र पुरूष को ढूंढने की कोशिश करता हूं।
-हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

नाथूराम गोडसे कौन?


नाथूराम गोडसे
भाजपा सांसद साक्षी महाराज के नाथूराम गोडसे को राष्ट्रभक्त कहने पर राज्य सभा में खूब हंगामा हुआ। विपक्षी दलों का कहना था कि नाथूराम गोडसे गांधी जी का हत्यारा वह राष्ट्रभक्त नहीं हो सकता। मेरे देखे सिर्फ़ हत्या के कारण ही यदि कोई हत्यारा करार दिया जाता है तो फ़ांसी भी एक प्रकार की हत्या ही है और सेना द्वारा सीमा पर की जाने वाली कार्रवाई, पुलिस कार्रवाई ये सब भी हत्या ही हैं लेकिन इस प्रकार की कार्रवाई को मूर्तरूप देने वालों को हम कभी भी हत्यारा नहीं कहते। जहां तक नाथूराम गोडसे का प्रश्न है तो जिन लोगों ने भी “गांधी वध क्यों?” पढ़ी है वे सब निश्चित ही नाथूराम गोडसे को हत्यारे की श्रेणी में रखना कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। यहां मैं दो बातों का उल्लेख करना चाहूंगा- पहली नाथूराम गोडसे ने कही है और दूसरी उन्हें फ़ांसी की सजा देने वाले जस्टिस खोसला ने, ये दोनों बातें पाठकों को किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में सहायता करेंगी है ऐसा मेरा विश्वास है।

“नाथूराम का वक्तव्य न्यायालय में उपस्थित दर्शकगण के लिए एक आकर्षक वस्तु थी। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावाकुल हुआ था कि उनकी आहें और सिसकियां सुनने में आतीं थीं और उनके गीले-गीले नेत्र और गिरने वाले आंसू दिखाई देते थे। न्यायालय में उपस्थित उन प्रेक्षकों को यदि न्यायदान का कार्य सौंपा जाता तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि उन्होंने अधिक से अधिक संख्या में यह कहा होता कि नाथूराम निर्दोष है।”
-जस्टिस खोसला
(द मर्डर आफ महात्मा-पेज नं.- २३४)
(गांधीवध क्यों?- पेज नं.- ४८) से साभार

“यदि देशभक्ति पाप है तो मैं मानता हूं कि मैंने पाप किया है। यदि प्रशंसनीय है तो मैं अपने आपको उस प्रशंसा का अधिकारी समझता हूं। मुझे विश्वास है कि मनुष्यों द्वारा स्थापित न्यायालय के ऊपर कोई न्यायालय हो तो उसमें मेरे काम को अपराध नहीं समझा जाएगा। मैंने देश और जाति की भलाई के लिए यह काम किया। मैने उस व्यक्ति पर गोली चलाई जिसकी नीति से हिन्दुओं पर घोर संकट आए, हिन्दू नष्ट हुए।”
-नाथूराम गोडसे
अब गोडसे राष्ट्रभक्त हैं या हत्यारा... इस बात को हम इस सबसे बड़े लोकतंत्र के अधिनायक इस देश की जनता पर छोड़ते हैं।
-संपादक