बुधवार, 20 अगस्त 2014

“वंदे मातरम्”-कुछ रोचक तथ्य

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बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा “वंदे मातरम्” की रचना दो हिस्सों की गई। कविता के पहले दो अंतरे सन् 1872 से 1875 ई. के बीच लिखे गए थे जबकि शेष अंश सन् 1881 ई. में जोडे़ गये जब “आनंदमठ” का पत्रिका में धारावाहिक रूप में प्रकाशन हुआ।
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“वंदे मातरम्”  गीत की एक पंक्ति “सप्तकोटि कण्ठ...” को गाने वालों ने अपने-अपने हिसाब से संशोधित किया उदाहरणार्थ सन् 1905 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में इसे “सप्तकोटि” के स्थान पर “त्रिदश कोटि” गाया गया क्योंकि उस वक्त भारतवर्ष की जनसंख्या 30 करोड़ के लगभग थी। वर्तमान में यह पंक्ति  “कोटि-कोटि कण्ठ” के रूप में गाई जाती है जिसका आशय आज की जनसंख्या के मान से करोड़ों-करोड़ों कण्ठ होता है। मूल में जब “सप्तकोटि कण्ठ...” लिखा गया उस समय बंकिम चंद्र बंगाल प्रेसीडेंसी की जनसंख्या का वर्णन कर रहे थे जिसकी जनसंख्या सन् 1874 की जनगणना के अनुसार 6.7 करोड़ के लगभग थी। कविता की ध्वन्यात्मकता के लिहाज से इसे “सप्तकोटि” कहा गया।
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“वंदे मातरम्”  कविता मूल रूप में केवल लेखन की दृष्टि से ही नहीं अपितु भाव की दृष्टि से भी दो हिस्सों में बंटी हुई है। पहले हिस्से में मूर्तिपूजा का कोई बिम्ब नज़र नहीं आता जबकि दूसरे हिस्से मूर्तिपूजा का रूपक दृष्टव्य होता है। ऐसा “आनंदमठ” के संदर्भ में हुआ है क्योंकि वास्तव में बंकिम चंद्र चटर्जी स्वयं मूर्तिपूजा के विरोधी थे। सन् 1874 ई. में उन्होंने बंगाल में प्रचलित देवपूजा पर लेख लिखा था और इस लेख में उन्होंने मूर्तिपूजा का खंडन किया था। उन्होंने इस लेख में लिखा था-
“यदि पत्थर या मिट्टी की बनी कोई वस्तु हमारे मन में भक्ति जगाती है तो फिर अखिल ब्रह्मांड में व्याप्त अदृश्य सत्ता के प्रति भक्ति-भावना क्यों नहीं उदित हो सकती? मूर्तिपूजा विज्ञान विरुद्ध है। जहां भी मूर्तिपूजा का चलन होता है वहां ज्ञान की उन्नति नहीं होती। मूर्तिपूजा मनुष्य के “आत्म” की उन्नति में बाधा है। मूर्तिपूजा मनुष्य के मस्तिष्क को बांध लेती है और मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास,सुधार और उन्नति को खत्म कर देती है।”
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“आनंदमठ” उपन्यास में “वंदे मातरम्” कुल पांच बार क्रमशः (खंड-1,अध्याय-10) (खंड-2,अध्याय-5)
(खंड-3,अध्याय-3) (खंड-3,अध्याय-9) (खंड-4,अध्याय-6) में गाया गया है।
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“वंदे मातरम्” नामक कविता बंकिमचंद्र चटर्जी के अध्ययन कक्ष में कई वर्षों तक पड़ी रही। साहित्यिक पत्रिका के संपादन में उनकी मदद करने वाले एक सहायक की नज़र इस कविता पर पड़ी और उसने कविता को दिखाते हुए बंकिम से कहा-“यह इतनी खराब भी नहीं है।”
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सन् 1905 के आसपास “वंदे मातरम्” एक नारे के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

(साभार-वंदे मातरम्)

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