शनिवार, 26 जुलाई 2014

भगवान अर्थात् भगवत्ता को उपलब्ध व्यक्ति -ओशो

अभी कुछ दिनों पहले द्वारका पीठ के शंकराचार्य जिनकी धर्म से ज़्यादा विवादों में रूचि है उन्होंने एक साईं बाबा पर एक विवादास्पद बयान देकर नाहक ही एक बिना मतलब की बहस को जन्म दे दिया। कोई भगवान हैं या नहीं इसे किसी के प्रमाण की आवश्यकता नहीं। यदि शंकराचार्य किसी को भगवान होने ना होने की मान्यता या प्रमाण-पत्र देने लगे तो ये तो भगवान से भी ऊपर होने चाहिए। “ओशो” कहते हैं भगवान से आशय है “भगवत्ता को उपलब्ध व्यक्ति, जिसमें भी भगवत्ता उतरी हो वो भगवान है।” कितनी सुंदर बात कही है। साईं बाबा को भगवान ना बताने वाले और उनकी पूजा ना करने का निर्देश देने वाले स्वरूपानंद सरस्वती जी को शायद वेद के “अहं ब्रह्रमास्मि” वाले सिद्धांत विस्मरण हो गया। जिसमें जीव यह घोषणा करता है कि मैं ही ब्रह्रम हूं। रही बात मासांहार की तो बुद्ध जिन्हें २४ अवतारों में मान्यता प्राप्त है स्वयं मांसाहारी थे बाद में उन्होंने उसका त्याग किया। बहरहाल...कौन क्या कहता इससे मेरा प्रयोजन नहीं मैं हैरान हूं हमें क्या हो गया है। कोई शंकराचार्य कुछ बोल देते हैं, कोई फ़तवा जारी कर देता और हम चल पड़ते हाथ में झंडा लिए;बिल्कुल भेड़ों की तरह, सत्य का ज़रा भी विचार नहीं करते...! इस प्रकार का अंधानुकरण क्यों। एक बड़ी मज़ेदार कहावत है-“अंधा अंधे ठेलिया...दोनों कूप पडंत।” अर्थात यदि अंधा व्यक्ति यदि अंधे का अनुसरण करे तो दोनों कुएं में गिरते हैं। दरअसल शंकराचार्य जी को चिंता अपने अनुयायियों की हैं कि कहीं इनकी संख्या ना घट जाए। यदि वास्तव में धर्म की इतनी चिंता है तो अपने शिष्यों को सत्य का साक्षात्कार करवाईये, अपनी लकीर को बड़ा कीजिए अन्य लकीरों को नाहक क्यों छोटा करते हैं। क्या सनातन धर्म इतना क़मज़ोर है कि इस प्रकार साईं बाबा या किसी अन्य की पूजा से समाप्त हो जाएगा? मंदिर तो फिल्म अभिनेताओं के भी हैं। बड़ी हास्यास्पद बात है ये। किंतु जिसे सत्य का साक्षात्कार नहीं हुआ वह इसी प्रकार का अनर्गल प्रलाप करता है। शंकराचार्य जी को उम्र के इस पड़ाव पर स्वयं के अंदर भगवत्ता कैसे जगे इस बात चिंता होनी चाहिए। संत वही है जिसकी दृष्टि स्वयं में स्थिर है गीता में कृष्ण जिसे स्थितप्रज्ञ कहते हैं। “पर” की ओर निहारना संसारी का काम है। तुलसीदास जी ने भी कहा है “सियाराममय सब जग जानी करहुं प्रणाम जोर जुगपानी” जब सारा जगत ही राममय है तो फ़िर शेष क्या रहा। शास्त्र का भी तो यही वचन है-“ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखराशी”। हम सब उसी परमात्मा के अंश है। “ओशो” कहते हैं ईश्वर सभी प्राणियों में बीज रूप में विद्यमान है बस उसी बीज को साधना के माध्यम खिला कर परमात्मा रूपी फूल बनाना है। धर्म प्रत्येक व्यक्ति का निजी होता और परमात्मा भी भीड़ को उपलब्ध नहीं होता। बुद्ध ने अपना अंतिम संदेश देते हुए कहा था “अप्प दीपो भवः”, अपने दिए स्वयं बनो। सही मायने में यही संन्यास है और यही संत की पहचान। धर्म के ठेकेदारी संतत्व की पहचान नहीं हो सकती।

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