बुधवार, 22 जनवरी 2014

एक अभिशाप


बड़ा प्रचलित शेर है कि “लम्हों ने ख़ता की और सदियों ने सज़ा पाई” बदकिस्मती ये अशआर भारतवर्ष के संदर्भ बहुत ही प्रासंगिक हैं। एक भूल आजादी के समय हुई थी जब कांग्रेस और महात्मा गांधी ने मुसलमानों को विशेष दृष्टि से देखने की कोशिश की थी उस समय संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार जी ने उनके इस कदम का तीव्र विरोध करते हुए कहा था कि ऐसा करने से मुसलमान और हिंदुओं में खाई पैदा हो जाएगी लेकिन गांधी जी नहीं माने और नतीजा आज सबके सामने है। ठीक वैसी ही एक भूल हमारे आज के नीति-नियंता कर रहे महिलाओं को लेकर, महिला सशक्तीकरण अच्छी बात है लेकिन किस हद तक? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि “अति सर्वत्र वर्जयेत्”। आज महिलाओं को जो विशेषाधिकार देने की वकालत की जा रही है वह मेरे देख उचित कदम नहीं है समानता तो स्वीकार की जा सकती है परन्तु किसी भी व्यक्ति को विशेषाधिकार देने का मैं समर्थन नहीं कर सकता। वर्तमान में इसके दुष्परिणाम भी धीरे-धीरे सामने आने लगे हैं चाहे वह दहेज का कानून हो, चाहे घरेलू हिंसा, या हरिजन एक्ट हो इन सब कानूनों का किस प्रकार दुरूपयोग किया जा रहा है यह किसी से छिपा नहीं है। ताज़ा मामला देश की राजधानी दिल्ली का है जहां सूबे के कानून मंत्री को एक इलाके में जाकर संदिग्ध महिलाओं पर कार्रवाई करने के लिए पुलिस वालों पर दबाव डालना महंगा पड़ गया। हैरानी की बात तो यह है इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले दलों में से कोई भी इस पूरे मामले में महिला पुलिस का ज़िक्र तक नहीं कर रहा। क्या महिला पुलिस बस पार्क में बैठे प्रेमी युगलों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटने के लिए है? यदि किसी महिला द्वारा अपराध कारित किया गया था या उस महिला द्वारा अपराध कारित करने का शक था तो महिला पुलिस द्वारा कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या महिलाओं को अपराध के लिए सिर्फ़ इस लिए क्षमादान दे दिया जाएगा कि वे एक महिला है। सारे महिला आयोग कानून मंत्री के पीछे पड़ गए किसी ने भी उन महिलाओं की जांच तक की बात नहीं की जिन पर आरोप लगाए जा रहे थे ऐसा क्यों? यदि इसी तरह का पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया जाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी यही छोटी सी भूल भस्मासुर की तरह हमारी संस्कृति व कानून व्यवस्था के लिए एक अभिशाप साबित होगी।
-हेमन्त रिछारिया

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