शनिवार, 27 दिसंबर 2014

“पीके” का विरोध - उचित या....?


आमिर खान अभिनीत फ़िल्म “पीके” रिलीज़ होते ही सुपरहिट हो गई और सुपरहिट होते ही विवादों में घिर गई। ऐसा लगता है मानो सुपरहिट होना और विवादित होना एक ही सिक्के दो पहलू हैं। हिन्दू संगठनों द्वारा फ़िल्म में दिखाए गए कुछ दृश्यों व संवादों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज़ कराई गई हैं। इस मुद्दे को लेकर मीडिया भी अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है किंतु पत्रकारों से निष्पक्ष रहने की अपेक्षा की जाती है। लगता है वर्तमान पत्रकारिता में यह बात दिन-ब-दिन मुश्किल होती जा रही है। विभिन्न समाचार चैनलों पर फ़िल्म “पीके” से उठे विवाद पर समीक्षात्मक बहस का प्रसारण हो रहा है। जिसे देखकर ऐसा लगा मानो एंकर और  संपादकों ने यह पहले ही तय कर लिया है कि हिन्दू संगठनों का विरोध अनुचित है। एंकर द्वारा बार-बार  सेंसर बोर्ड के फ़िल्म को पास कर इसे प्रमाण-पत्र प्रदान किए जाने की दलील दी जा रही थी। इस दलील को देते वक्त शायद पत्रकार महोदय इस बात को भूल गए थे कि कुछ माह पहले उन्हीं के चैनल ने सेंसर बोर्ड के कथित भ्रष्टाचार को लेकर एक रिपोर्ट दिखाई थी जिसमें सेंसर बोर्ड पर फ़िल्म निर्माताओं से पैसे (रिश्वत) लेकर फ़िल्म पास करने का आरोप था। दूसरी ओर एक फ़िल्म समीक्षक फ़िल्म के जर्बदस्त हिट होने की बात को लेकर हिन्दू संगठनों के आरोपों को खारिज कर रहे हैं। क्या किसी फ़िल्म का हिट होना ही उसमें दिखाई गई सामग्री के सही होने की एकमात्र कसौटी है? यदि ऐसा है तो फिर वीरसावरकर,चटगांव,स्वदेश, दो दूनी चार,चलो दिल्ली,गुज़ारिश,मि.एण्ड मिसेज अय्यर,जैसी अनेक संदेशात्मक फ़िल्में जो या तो असफ़ल रहीं या नाममात्र को सफ़ल रहीं, वे सब खराब और बकवास फ़िल्में हैं। आज हमारे देश में इस बात को बच्चा-बच्चा जानता है कि फ़िल्में कैसे हिट होती हैं या कराई जाती हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही “हैप्पी न्यू ईयर” नामक एक फ़िल्म आई थी जो सुपरहिट हुई थी इस फ़िल्म में कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर गाए जाने वाले हिन्दुओं के प्रसिद्ध भजन “राधे-राधे बोलो जय कन्हैया लाल की” को एक आईटम सांग की तरह प्रस्तुत कर उस पर एक अत्यंत भौंडा व अश्लील नृत्य दिखाया गया है, क्या यह भी सही था? फ़िल्म के पक्ष में तर्क देने वालों का कहना है कि इस फ़िल्म में कुरीतियों का विरोध किया गया है। मैं ऐसे तमाम लोगों से बड़ी विनम्रता से पूछना चाहता हूं कि क्या उन्हें कुरीति और आस्था में अन्तर समझ आता है? पूजा-पाठ करना,मंदिर जाना,दान देना,गौ-सेवा करना ये कुरीति नहीं; आस्था है। कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी भी धर्म के पूजा-पाठ करने के तरीके तब तक निर्धारित नहीं कर सकता जब तक कि वे किसी को हानि नहीं पहुंचाते हों। सती प्रथा,देवदासी प्रथा,बलिप्रथा,विधवा विवाह निषेध,भ्रूणहत्या ये सब कुरीतियां है जिनका समय-समय पर हमारे हिन्दू महापुरूषों ने ही विरोध किया और वे बन्द हुईं लेकिन कुरीति की आड़ में धर्म का मखौल स्वीकार नहीं किया जा सकता। केन्द्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को अविलम्ब इस मामले में हस्तक्षेप कर केन्द्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) को निर्देशित करना चाहिए जिससे इस फ़िल्म से विवादित अंश हटाए जाएं और भविष्य में इस प्रकार के विवादों पर अंकुश लग सके।
-संपादक

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

नक्षत्र पुरूष-डा. फूफ़ाजी

जीवन के सफ़र में अक्सर कई लोग मिलते और बिछड़ जाते हैं किंतु कुछ लोग बिछड़ने के बावज़ूद एक मीठी याद बनकर हमेशा साथ रहते हैं। इन्हीं लोगों को डा. हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा “बसेरे से दूर” में “नक्षत्र पुरूष” कहा है। आज पुनः एक ऐसे ही “नक्षत्र पुरूष” का उल्लेख करने का मन कर रहा है। मेरे जीवन के यह नक्षत्र पुरूष हैं- डा.बाबूलालजी सोदावत जिन्हें मैं डा.फूफ़ाजी कहता था। ऊंचा-पूरा कद, गठीला शरीर, चमकती चांद के पीछे अर्द्धचंद्र के रूप में श्वेत केश, आंखों पर चश्मा,  तेजस्वी चेहरा। डा.फूफ़ाजी कुर्सी पर बैठे हुए अपना एक पैर हमेशा हिलाते रहते थे। उन्हें काफी पीना बहुत पसंद था। वर्तमान हरदा जिले की टिमरनी तहसील से कोई ४ किमी. दूर चारखेडा़ में डा. फूफ़ाजी रहते थे। पेशे से चिकित्सक किंतु व्यवहार से एक समाजसेवी। डा.साहब हरियाणवी ब्राह्मण थे। डा.फूफ़ाजी दादाजी के पारिवारिक चिकित्सक अर्थात् “फैमिली डाक्टर” तो थे ही साथ ही साथ दादाजी और डा.फूफ़ाजी में प्रगाढ़ मित्रता थी, वैसे कहने को जीजा-साले के रिश्ते का एक कच्चा-पक्का धागा भी था। डा. सोदावत जी की पत्नि गलाबाई और मेरे दादाजी का गांव एक ही होने की वजह से मेरे दादाजी ने गलाबाई को मुंहबोली बहन बना रखा था। इस नाते डा.फूफ़ाजी मेरे दादाजी को बड़े भाई सा सम्मान दिया करते थे। डा. फूफ़ाजी का कई वर्षों से निरन्तर हमारे घर हर दूसरे दिन आना और दादाजी, दादी और मेरे स्वास्थ्य का परीक्षण करने का नियम सुनिश्चित था। उनके इस नियम के बारे हमारे मुहल्ले में सभी को पता था इसी कारण कई मुहल्ले वाले भी सायं ४ बजते ही डा.फूफ़ाजी के आने का इंतज़ार करते थे। मैंने अक्सर दादाजी को दादी से पूछते हुए सुना था कि-“आज डा.साहब का टर्न है क्या?” डा.फूफ़ाजी के आने वाले दिन को दादाजी “टर्न” कहते थे। डा.फूफ़ाजी के आते ही हम सब उन्हें घेरकर उनके आस-पास एक सभा की तरह बैठ जाते थे; कुछ अस्वस्थ मुहल्ले वाले भी आ जाते थे। डा.फूफ़ाजी बारी-बारी सभी के स्वास्थ्य का परीक्षण कर उन्हें उचित सलाह या दवाईं देते थे। डा.फूफ़ाजी प्रायः निशुल्क ईलाज किया करते थे किंतु दादाजी के आक्रामक आग्रह के कारण उन्हें दादाजी-दादी के स्वास्थ्य परीक्षण की फ़ीस लेनी ही पड़ती थी। स्वास्थ्य परीक्षण के उपरांत हास-परिहास व किस्सागोई का सत्र शुरू होता था। डा.फूफ़ाजी के पास हमेशा किस्सों की भरमार रहती थी। वे अक्सर अपने बीते दो दिन में घटित होने वाली घटनाओं को मज़ेदार किस्से का रूप देकर सभी का मनोरंजन किया करते थे। डा.फूफ़ाजी का भरापूरा परिवार है उनके चार बेटे है। दो बेटे स्वंय चिकित्सक है। जो दादाजी को “मामाजी” कहकर संबोधित करते थे उनके ही कारण हरदा के अधिकांश चिकित्सक दादाजी को मामाजी कहकर पुकारने लगे थे। एक बार दादाजी गंभीर रूप से बीमार हो गए। बरसात का मौसम था। डा.फूफ़ाजी के अनुसार उन्हें पीलिया नामक रोग हो गया था। इस रोग का ईलाज डा.फूफ़ाजी ने अपने दैनिक नियमानुसार हमारे घर आकर ही किया किंतु अब वे हर दूसरे दिन के स्थान पर प्रतिदिन आने लगे थे। शाम होते डा.फूफ़ाजी आते और पीलियाग्रस्त दादाजी को बाटल चढ़ाते; इंजेक्शन लगाते और हमें उनकी देखभाल हेतु आवश्यक निर्देश देते। देखते ही देखते दादाजी के स्वास्थ्य पर डा.फूफ़ाजी के ईलाज का सकारात्मक असर होना भी शुरू हो गया था किंतु पूर्ण स्वस्थ होने में अभी कुछ दिन बाकी थे। एक दिन मूसलाधार बारिश हो रही थी। नदी-नाले अपने उफान पर थे। टिमरनी और चारखेड़ा मार्ग के बीच  का पुल नाले के उफान के कारन डूब गया था। दोनों ओर वाहनों की लंबी-लंबी कतारें लग चुकी थी। पुल के ऊपर से पानी के तेज बहाव को देखते हुए बड़े वाहन ट्रक-बस इत्यादि भी एक ओर खड़े कर दिये गए थे। इधर शाम धीरे-धीरे गुजरती जा रही थी। हम सब डा.फूफ़ाजी का इंतज़ार कर रहे थे। दादाजी ने हमारी व्याकुलता देखते हुए हमें सांत्वना देकर कहा-“इतनी तेज़ बारिश में रास्ता बंद हो गया होगा अब डा.साहब नहीं आएंगे और वैसे भी मैं पहले की अपेक्षा स्वस्थ हूं, चिंता मत करो।” डा.फूफ़ाजी के आने का नियत समय बीत जाने के उपरांत हमने दादाजी की सात्वंना को ही अपनी तसल्ली का आधार बनाया और अपने-अपने कार्यों में संलग्न हो गए। अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने दरवाज़ा खोला तो यह देखकर दंग रह गया कि सामने डा.फूफ़ाजी लंबा सा रेनकोट पहने हाथ में बैग थामें खड़े हैं। अंदर आते ही दादाजी थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा डा.साहब इतनी बारिश में आने की क्या आवश्यकता थी? अब मैं स्वस्थ हूं। इस पर डा. फूफ़ाजी ने दादाजी को बाटल लगाने का उपक्रम करते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा-“भैया, डाक्टर मैं हूं या आप।” उनके इस वाक्य ने गंभीर माहौल को हल्का-फुल्का कर दिया। कुछ देर बाटल समाप्ती के बाद किस्सागोई के सत्र में दादाजी ने डा.फूफ़ाजी से पुनः प्रश्न किया कि “आखिर आप यहां तक आए कैसे?” इस पर डा.फूफ़ाजी ने बताया कि कोई वाहन पुल पार ही नहीं कर रहा था। बड़ी देर के बाद एक ट्रक वाले ने डूबे पुल को पार करने की हिम्मत जुटाई तो मैंने उसे अपने साथ ले चलने का अनुरोध किया क इसपर उस ट्रक के चालक ने कहा कि “साहब देख लीजिए बहाव तेज है ट्रक बह भी सकता है। हमें तो खैर तैरना आता है।” इस पर मैंने कहा कि -“भाई यदि ट्रक बहा तो भी मरूंगा और यदि भैया को कुछ हो गया तो भी ये जीवन मृतवत ही हो जाएगा। जब मरना दोनों तरफ़ से ही है तो मित्रता और फ़र्ज़ निभाते हुए मरना ज़्यादा श्रेयस्कर है।” ये सुनकर हम सभी भाव-विभोर हो गए। इस प्रकार डा.फूफ़ाजी ने अपने जीवन की परवाह किए बिना अपना फ़र्ज़ व मित्रता निभाई।
-हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

धर्मांतरण

ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया
पिछले कुछ दिनों से धर्मांतरण के मुद्दे को लेकर देश में खूब हो-हल्ला हो रहा है। इस मुद्दे ने जहां विपक्ष के लिए “डूबते को तिनके का सहारा...” वाला काम किया वहीं हमारे खबरनबीसों को एक माकूल मसाला मिला। इस मुद्दे को लेकर संसद ठप्प कर दी गई और जनता के लिए ज़रूरी कई बिल अधर में लटक गए। आम जनता बेचारी यह सोचती रह गई आखिर क्यूं हर बार धर्मांतरण इतना बड़ा मुद्दा बन जाता कि उसके सामने सभी कुछ बौना हो जाता है। आखिर यह धर्मांतरण है क्या...? इस सवाल का एक जवाब तो यह दिया जा सकता है कि अपनी इच्छा से बिना किसी प्रलोभन व भय के अपना धर्म छोड़ कर किसी और धर्म को अपना लेना या अंगीकार कर लेना “धर्मांतरण” है। इससे पूर्व कि हम “धर्मांतरण” की गहराई में प्रवेश करें उसके पहले हमें धर्म क्या है यह जान लेना अतिआवश्यक है। मेरी दृष्टि में धर्म एक व्यवस्था है। इसका ईश्वर से प्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध नहीं है। ईश्वर तो सभी प्राणियों को जन्म से ही प्राप्त है, नास्तिकों को भी। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि “धारयति इति धर्म” जो धारण किया जा सके वह धर्म है या जो धारण करने योग्य हो वह “धर्म” है। आचार्य रजनीश ने स्वभाव को ही धर्म कहा है। गीता से भी इसी बात की पुष्टि होती है जब कृष्ण कहते हैं “स्वधर्मे निधनं श्रेय, परधर्मो भयावह” अर्थात् अपने स्वभाव के अनुसार आचरण करते हुए मर जाना श्रेयस्कर होता है। अब प्रश्न उठता है कि यदि कोई स्वेच्छा से अपना स्वभाव या धर्म परिवर्तन करना चाहे तो इसमें कुछ बुरा है? मेरे देखे व्यक्ति के संबंध में बुरा नहीं किंतु समष्टि के संबंध में बुरा है। ऐसा करने से सामाजिक असंतुलन के पैदा होने का खतरा है। अब मुद्दे पर लौटते हैं कि आखिर क्यों किसी और धर्म के व्यक्ति द्वारा हिन्दु धर्म को अपनाने पर बवाल मचता है। मुख्य रूप से यह विशुद्ध राजनीतिक षडयंत्र है। “हिन्दु” कोई धर्म नहीं वरन् एक संस्कृति है। इसे धर्म से जोड़कर जो विष का बीज पूर्व में बोया जा चुका है वर्तमान परिस्थिति उसी का परिणाम मात्र है। आपने सुना होगा कई शायर व कवि अपने नाम के साथ अपने शहर का नाम अपने तख़ल्लुस या उपनाम के रूप में प्रयुक्त करते हैं जैसे इंदौरी, भोपाली, इलाहाबादी,बरेलवी आदि। इनमें सभी धर्मों के लोग होते हैं किंतु किसी के धर्म में कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि यह बात उनकी बद्धमूल धारणाओं के विपरीत प्रतीत नहीं होती किंतु जब “हिन्दु” शब्द का ज़िक्र  किसी भी रूप में आता है तो समस्या खड़ी हो जाती है जबकि यह भी शहरों व स्थानों पर आधारित अन्य उपनामों की भांति प्रयोग किया जाने वाला शब्द मात्र है; कोई “धर्म” नहीं। इसने रूपांतरण कर जिस धर्म का रूप ले लिया है वह वास्तव में “सनातन धर्म” है। वास्तविक रूप में “हिन्दु” एक फ़ारसी शब्द है जो कि “सिन्धु” से बना है जो कि सिंध नदी के निकट रहने वालों का द्योतक है चूंकि फ़ारसी भाषा में “स” अक्षर का उच्चारण “ह” के रूप में किया जाता है इसलिए शब्द बना “हिन्दु”। जैसे पूर्व में बताया जा चुका है कि इंदौर में रहने वालों को इंदौरी, भोपाल में रहने वालों को भोपाली, इलाहबाद में रहने वालों इलाहबादी, और नहर के समीप रहने वालों को नेहरू कहे जाने में किसी कोई आपत्ति नहीं होती ठीक उसी प्रकार सिंध के निकट बसे व्यक्तियों को “सिन्धु” या “हिन्दु” कहे जाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आज देश की राजनीति में “हिन्दु” शब्द एक अछूत बनता जा रहा है इसके पीछे दोष हमारे विकृत मानसिकता वाले राजनेताओं का है। जो अपनी सत्तालोलुप प्रवृत्ति के चलते इस मुद्दे बेवजह गर्माए रखते हैं। जब हिन्दुओं को प्रलोभन देकर किसी और धर्म में प्रवेश करा दिया जाता है तब किसी भी दिशा से कोई हलचल नहीं होती किंतु जब कोई अपनी स्वेच्छा से पुनः अपने धर्म को अंगीकार करना चाहता है या किसी और धर्म का व्यक्ति सनातन धर्म की ओर आकर्षित होता है तो सभी की पीड़ा प्रारंभ हो जाती है। यदि हम थोड़ा सचेत और पूर्वाग्रह रहित होकर “हिन्दु” शब्द पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि इस भारत-भूमि पर निवास करने वाले सभी “हिन्दु” हैं चाहे वे किसी भी पंथ या सम्प्रदाय के हों, रही बात धर्मांतरण की तो  बलपूर्वक एवं प्रलोभन देकर करवाया गया धर्म- परिवर्तन पाप और अपराध की श्रेणी में आता है; धर्म की नहीं।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

रविवार, 21 दिसंबर 2014

नक्षत्र पुरूष-रणछोड़ मामा

काल्पनिक चित्र
 जीवन के सफ़र में यूं तो कई लोग मिलते और बिछ्ड़ जाते हैं, पर कुछ लोग दिल में हमेशा-हमेशा के लिए बस जाते हैं। जिन्हें स्व. श्री हरिवंशराय बच्चन अपनी आत्मकथा "बसेरे से दूर" में "नक्षत्र पुरूष" कहते हैं, जब कभी उनकी याद आती है तो एक मीठा स्पंदन सा महसूस होता है। ऐसे ही एक व्यक्ति की याद आज मुझे आ रही और वही मीठा स्पंदन मैं महसूस कर रहा हूं, उनका नाम था-रणछोड़ दास। मैं उन्हें प्यार से "रणछोड़ मामा" कहता था। इससे पहले कि हम उनकी बात करें ज़रा इस प्रसंग की पृष्ठभूमि समझ लेते हैं। बात कुछ ४०-५० वर्ष पुरानी है। आज़ादी के पश्चात ज़मींदारी प्रथा धीरे-धीरे समाप्त होने लगी परंतु मानसिक गुलामी से आज़ाद होने में थोड़ा वक्त तो लगता ही है, सो अनौपचारिक रूप से ज़मींदारी व ज़मींदार दोनों बहुत बाद तक हमारी व्यवस्था में उपस्थित रहे और कमोबेश आज भी हैं। मेरे दादाजी जिन्हें लोग "पटेल साहब"  कहते थे, कपासी सहित ५ गांवों के ज़मींदार थे। सैंकड़ों एकड़ ज़मीन, सागौन के जंगल, तालाब, पशुओं से भरी-पूरी ज़मींदारी। उस ज़माने में ज़मींदारी को संभालने वाला जो मुख्य व्यक्ति होता था उसे "जिराती" कहा जाता था। वर्तमान परिदृश्य में “सीईओ”। दादाजी की ज़मींदारी "बड़ी जिरात" के नाम से जानी जाती थी और उसके जिराती थे-रणछोड़ दास यानि हमारे "रणछोड़ मामा"। उम्र लगभग ६० वर्ष, कद लंबा, बलिष्ठ शरीर, रंग सांवला,घुंघराले धवल केश,कान में बाली। पहनावे में घुटनों से ऊंची धोती, आधी बांह की बंडी और गमछा। रणछोड़ मामा के दोनों पैर कुछ टेड़े थे जिससे चलते वक्त उनके घुटने आपस में मंजीरों की तरह टकराते थे। बिना लाठी के सहारे वो ठीक से चल नहीं पाते थे। उन दिनों मैं काफी छोटा था। मेरा पूरा बचपन दादाजी के पास ही बीता है। मेरे जन्म से कुछ वर्षों पूर्व सन १९७२ में दादाजी ने कपासी से ३५ किमी. दूर टिमरनी नामक कस्बे में रहने का निर्णय कर लिया था। यहां उन्होंने एक दुमंज़िला भवन बनाया जो "मोरवाली बिल्डिंग" के नाम से उस पूरे क्षेत्र में आज भी मशहूर है। साल में दो-तीन बार हम टिमरनी से कपासी जाते थे। कपासी में रणछोड़ मामा का स्नेह मुझे प्राप्त होता था। वो मुझे अपनी गोद में बिठाते, घोड़ागाड़ी में सैर कराते, ता़ज़ा-ताज़ा मक्खन खिलाते, ऐसे स्नेह-दुलार भरे माहौल में समय बीतता रहा। दादाजी बताया करते थे कि रणछोड़ मामा जब ९ वर्ष के थे तब से ही कपासी की जिरात में थे। जिसके ज़मींदार उस समय दादाजी के श्वसुर स्व.श्री द्वारकाप्रसाद जी पटेल थे। उनके निधन के बाद यूं समझिए कि ज़मींदारी के साथ-साथ रणछोड़ मामा भी दादाजी को विरासत में मिले। दादाजी का उनसे अटूट प्यार था। रणछोड़ मामा भी दादाजी को उतना ही चाहते थे। वे दादाजी को "फुआजी" कहते थे। ज़मींदारी की सारी ज़िम्मेदारी रणछोड़ मामा पर ही थी। बहू-बेटों व नाती-पोतों से अपना भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद वो हमारे घर यानि "जिरात" में ही रहते थे और भोजन अपने घर से मंगवाते थे। सर्द रातों में वे "जिरात" की बैठक में अलाव का इंतज़ाम करते जिसमें गांव वाले आकर अपनी मंडली जमाते। देर रात तक अलाव के पास चिलम,बीड़ी व बातों का सिलसिला चलता रहता। उनके विश्वास की छांव तले दादाजी ज़मींदारी के कार्य-कलापों से मुक्त थे। समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा। इधर दादाजी तो उधर रणछोड़ मामा पर उम्र का प्रभाव झलकने लगा। बढ़ती आयु के साथ दादाजी को ज़मींदारी जब बोझ लगने लगी तो उन्होंने धीरे-धीरे ज़मीन बेचना शुरू कर दिया। सागौन का जंगल सरकार को बेच दिया गया और ज़मीन व्यक्ति व रिश्तेदारों को। उम्रदराज़ होने व ज़मींदारी कार्य के कुशल संचालन में असमर्थ होने पर भी रणछोड़ मामा ने दादाजी के इस फैसले का तीव्र विरोध किया पर अंत में शायद यह सोचकर कि "होई सोई जो राम रचि राखा...", भारी मन से दादाजी की बात मान ली। जिस दिन ज़मीन का आखिरी टुकड़ा व गांव का हवेलीनुमा मकान बेचा गया रणछोड़ मामा फूट-फूट कर रोए। ये औपचारिक रूप से उनकी सेवानिवृत्ति थी। उस वक्त उनकी आयु लगभग ६२ वर्ष के करीब थी। समय बीतता रहा, कोई २ वर्षों बाद दादाजी के पास गांव से शादी का निमंत्रण आया वैसे दादाजी आवागमन कम ही किया करते थे पर शायद वहां जाना आवश्यक था सो दादाजी समारोह में शामिल होने के लिए कपासी गए। मैं भी उनके साथ था। वहां कपासी छोड़ने के २ वर्षों के बाद हमारा मिलना रणछोड़ मामा से हुआ। हम उनसे मिलकर अत्यंत आनंदित थे। रणछोड़ मामा भी अति प्रसन्न थे। भोजन के उपरांत जब दादाजी वापस आने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने देखा कि उनके जूते नहीं मिल रहे। बहुत खोजबीन करने के बाद भी जब जूते नहीं मिले तो इसे दादाजी शादियों में होने वाली सहज घटना मानकर बिना जूतों के ही अपनी जीप की ओर चल दिए जैसे वे जीप के पास पहुंचे उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। वहां रणछोड़ मामा दादाजी के जूते अपने गमछे में लपेटे खड़े थे। दादाजी ने यह देखकर उनसे पूछा कि "तुझे ये कहां मिले ?" तो उन्होंने अपनी भाषा में उत्तर दिया-"फुआजी शादी को टेम है, कोई चुरा नी ले जाए ऐके लेने मैंने तुम्हारा उतारतई उठा लिया था।" ये सुनते ही दादाजी की आंखों मे नमी आ गई उन्होंने रणछोड़ मामा को गले लगा लिया और उनसे विदा ली। आज रणछोड़ मामा हमारे साथ नहीं है पर उनकी याद अक्सर मुझे दादाजी और उनके निःस्वार्थ प्रेम का स्मरण करा जाती है और जब भी ऐसा होता है मैं आसमान की ओर देखकर अपने इस नक्षत्र पुरूष को ढूंढने की कोशिश करता हूं।
-हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

नाथूराम गोडसे कौन?


नाथूराम गोडसे
भाजपा सांसद साक्षी महाराज के नाथूराम गोडसे को राष्ट्रभक्त कहने पर राज्य सभा में खूब हंगामा हुआ। विपक्षी दलों का कहना था कि नाथूराम गोडसे गांधी जी का हत्यारा वह राष्ट्रभक्त नहीं हो सकता। मेरे देखे सिर्फ़ हत्या के कारण ही यदि कोई हत्यारा करार दिया जाता है तो फ़ांसी भी एक प्रकार की हत्या ही है और सेना द्वारा सीमा पर की जाने वाली कार्रवाई, पुलिस कार्रवाई ये सब भी हत्या ही हैं लेकिन इस प्रकार की कार्रवाई को मूर्तरूप देने वालों को हम कभी भी हत्यारा नहीं कहते। जहां तक नाथूराम गोडसे का प्रश्न है तो जिन लोगों ने भी “गांधी वध क्यों?” पढ़ी है वे सब निश्चित ही नाथूराम गोडसे को हत्यारे की श्रेणी में रखना कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। यहां मैं दो बातों का उल्लेख करना चाहूंगा- पहली नाथूराम गोडसे ने कही है और दूसरी उन्हें फ़ांसी की सजा देने वाले जस्टिस खोसला ने, ये दोनों बातें पाठकों को किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में सहायता करेंगी है ऐसा मेरा विश्वास है।

“नाथूराम का वक्तव्य न्यायालय में उपस्थित दर्शकगण के लिए एक आकर्षक वस्तु थी। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावाकुल हुआ था कि उनकी आहें और सिसकियां सुनने में आतीं थीं और उनके गीले-गीले नेत्र और गिरने वाले आंसू दिखाई देते थे। न्यायालय में उपस्थित उन प्रेक्षकों को यदि न्यायदान का कार्य सौंपा जाता तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि उन्होंने अधिक से अधिक संख्या में यह कहा होता कि नाथूराम निर्दोष है।”
-जस्टिस खोसला
(द मर्डर आफ महात्मा-पेज नं.- २३४)
(गांधीवध क्यों?- पेज नं.- ४८) से साभार

“यदि देशभक्ति पाप है तो मैं मानता हूं कि मैंने पाप किया है। यदि प्रशंसनीय है तो मैं अपने आपको उस प्रशंसा का अधिकारी समझता हूं। मुझे विश्वास है कि मनुष्यों द्वारा स्थापित न्यायालय के ऊपर कोई न्यायालय हो तो उसमें मेरे काम को अपराध नहीं समझा जाएगा। मैंने देश और जाति की भलाई के लिए यह काम किया। मैने उस व्यक्ति पर गोली चलाई जिसकी नीति से हिन्दुओं पर घोर संकट आए, हिन्दू नष्ट हुए।”
-नाथूराम गोडसे
अब गोडसे राष्ट्रभक्त हैं या हत्यारा... इस बात को हम इस सबसे बड़े लोकतंत्र के अधिनायक इस देश की जनता पर छोड़ते हैं।
-संपादक

रविवार, 30 नवंबर 2014

मतदान करें-


विनम्र निवेदन-


सम्माननीय़ मतदाताओं,
विश्व में भारत एक विशाल और सम्मानित लोकतंत्र के रूप में प्रतिष्ठित है। यहां समय-समय पर चुनाव
रूपी यज्ञ  होते रहते हैं। जिसमें आप सभी मतदाता “मत” के रूप में अपनी आहुति डालते रहते हैं। निश्चित ही आपके द्वारा दिया गया एक “मत” आपके नगर, ग्राम, प्रदेश एवं देश के भाग्य निर्माण की क्षमता रखता है। आपका एक “मत” भारत की उन्नति व अवनति की फ़सल का बीज है। अतः इसका प्रयोग अत्य़ंत विवेकपूर्ण तरीके से होना चाहिए। जातिवाद, क्षेत्रवाद, परिवारवाद एवं धार्मिकता के आधार पर “मत” देने की अपेक्षा राष्टवाद, विकास, चरित्र एवं राजनैतिक शुचिता के अधार पर ही वोट दें। जब हम अस्वस्थ होने पर अपने चिकित्सक का चुनाव एवं गंतव्य तक पहुंचने के लिए साधन का चुनाव पूर्ण सावधानी व विवेक से करते हैं तो अपने जन-प्रतिनिधियों के चुनाव में लापरवाही क्यों? यदि आज हमारे जन-प्रतिनिधियों में अधिकांश आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हैं तो उन्हें चुनने वाले हम ही हैं। पिछले कुछ वर्षों से राजनीति में असामाजिक तत्वों का प्रवेश बढ़ता जा रहा है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए स्वस्थ परम्परा की शुरूआत नहीं है। आज देश का मतदाता जागरूक नहीं है। जिसके परिणामस्वरूप सत्ता की कुंजी जनता के हाथ से फ़िसलकर चंद बिचौलियों व भ्रष्टाचारियों के हाथों में चली गई है। जो अपने स्वार्थ के लिए सरकारी तंत्र को कठपुतलियों की तरह नचाते हैं। आज सत्ता की डोर फ़िर से जनता के हाथों में लाने की आवश्यकता है। अतः पूर्ण विवेक से मतदान करें, शत-प्रतिशत मतदान करें। विवेकपूर्ण मतदान कर भारतीय लोकतंत्र को पतन के गर्त में जाने से रोकने में सहभागी बनें।
जय हिन्द...!

-“ज्योतिर्विद” हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

प्राण-प्रतिष्ठा का गूढ़ अर्थ

पंडितजन कहते हैं कि हम भगवान की प्राण प्रतिष्ठा कर रहे हैं। भगवान की प्राण प्रतिष्ठा! आश्चर्य की बात है। जो परमात्मा इस जगत के समस्त प्राणियों में प्राणों का संचार करता है हम उस परमात्मा में प्राणों की प्रतिष्ठा कर रहे हैं। कैसी मूढ़तापूर्ण बात है। मेरे देखे यदि शास्त्र गलत हाथों में पड़ जाए तो वह शस्त्र से भी ज़्यादा खतरनाक हो जाता है। यदि नर, नारायण के प्राणों की प्रतिष्ठा करने में सक्षम हो जाए तो वह नारायण से भी बड़ा हो जाएगा क्योंकि जन्म देने वाला सदा ही जातक से बड़ा होता है। इसीलिए नारायण की नर लीलाओं में नारायण को जन्म देने वाले माता-पिता के आगे स्वयं नारायण झुके हैं। ये बड़ी गहरी बात है। शास्त्रों में किसी पाषाण प्रतिमा या पार्थिव की प्राण प्रतिष्ठा करना बहुत सांकेतिक है। यहां प्राण प्रतिष्ठा से आशय केवल इतना ही है कि हमें एक ना एक दिन अपनी इस पंचमहाभूतों से बनी देह-प्रतिमा में परमात्मा; जो कि पहले से ही इसमें उपस्थित है, उसका साक्षात्कार कर उसे इस देह में प्रतिष्ठित करना है; प्रकट करना है। मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्टा का उपक्रम करना इसी बात का स्मरण मात्र है इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। अब इस गूढ़ बात का अपने स्वार्थ के लिए अर्थ का अनर्थ कर कुछ पीठाधीश्वर कह देते हैं कि अचेतन-अयोग्य की पूजा नहीं की जानी चाहिए इसलिए हम परमात्मा की प्राण प्रतिष्ठा कर रहे हैं और जिनकी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं की जा सकती वे पूजनीय नहीं है। कितनी निम्न स्तरीय बात है, शास्त्रों के गूढ रहस्यों को कैसा दूषित किया है। ऐसी ही बातों से सनातन धर्म की सबसे ज़्यादा होती है। मैं कोई प्राण-प्रतिष्ठा करने का विरोध नहीं कर रहा हूं किंतु प्राण-प्रतिष्ठा को इस रूप में प्रचारित करने का विरोध कर रहा हूं। ये तथाकथित जगतगुरू एक चींटी में भी प्राण का संचार नहीं कर सकते तो परमात्मा की प्राण-प्रतिष्ठा करना तो हास्यास्पद ही है। किंतु जैसा कि मैंने पूर्व में कहा प्राण-प्रतिष्ठा का कोई विरोध नहीं, विरोध इसके गलत अर्थ निकालने से है। यदि प्राण-प्रतिष्ठा का अर्थ करना ही है तो कौशल्या-दशरथ, मनु-शतरूपा, वसुदेव-देवकी, नंद-यशोदा के रूप में करें जिनकी भक्ति व प्रेम के कारण निराकार को नराकार लेना पड़ा। सच्ची प्राण-प्रतिष्ठा का यही अर्थ है। हम स्वयं को परमात्मा की भक्ति व प्रेम से इतना भरें कि एक ना एक दिन उसे इस देह रूपी प्रतिमा; जो उसने स्वयं अपने हाथों से निर्मित की है उसमें उसे प्रकट हो प्रतिष्ठित होना पड़े। जो ऐसी प्राण-प्रतिष्ठा करनें में समर्थ हो जाता है वही उदघोष करता है “अहं ब्रह्मास्मि”। इसलिए चाहें मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा करें; चाहें ना करें, किंतु अपनी देह रूपी प्रतिमा में परमात्मा को प्रतिष्ठित अवश्य करें। मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा करना तो इसी बात का संकेत मात्र है।
-हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 7 अक्तूबर 2014

अर्ज़ किया है...


“सुनकर जमाने कि बाते, तु अपनी अदा मत बदल
 यकीन रख अपने खुदा पर, यूँ बार बार खुदा मत बदल।”

“जिस नजाकत से ये लहरें मेरे पैरों को छूती हैं,
 यकीन नहीं होता इन्होने कभी कश्तियाँ डुबोई होंगी।”

“बहुत दूर तक जाना पड़ता है,
 सिर्फ यह जानने के लिए, नज़दीक कौन है।”

“झूठ अगर यह है कि तुम मेरे हो,
 यकीं मानो,मेरे लिए सच का कोई मायना नहीं।”

“वो दोस्त मेरी नजर में बहुत मायने रखते हैं,
 वक़्त आने पर सामने मेरे जो आइने रखते हैं।”

“मौत का भी यकीन है उनपर भी ऐतबार है,
 देखते हैं पहले कौन आता है हमे तो दोनों का इंतजार है।”

“हमारे दिल की मत पूछो बड़ी मुश्किल में रहता है,
 हमारी जान का दुश्मन हमारे दिल में रहता है।”

“गुमनाम है लोग वतन पर जान देने वाले,
 यहाँ लोग तो थपड खाकर मशहूर हो जाते है।”

“आग लगाना मेरी फितरत में नही है,
 मेरी सादगी से लोग जलें तो मेरा क्या कसूर।”

“मयखाने में आऊंगा ,मगर पिऊंगा नहीं साकी
 ये शराब मेरे गम भुलाने की औकात नहीं रखती।”

कहां ज़रूरत है हाथ में पत्थर उठाने की
तोड़नेवाले तो दिल ज़ुबां से तोड़ देते है....

(सभी अशआर बराए-मेहरबानी)

“एक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है
 बेजान छ्त; दीवारों को घर कर देता है।”
-महेश्वर
 

सोमवार, 25 अगस्त 2014

गलत परंपरा का विरोध हो,संत का नहीं

इन दिनों आध्यात्मिक जगत में साईं-शंकराचार्य विवाद का उन्माद अपने चरम पर है। मीडिया के लिए तो यह विवाद संजीवनी बना हुआ है। कवर्धा में हुई धर्म-संसद की इकतरफ़ा बहस के उपरांत में कुछ प्रस्ताव पारित किए गए जिनमें कहा गया कि “साईं बाबा भगवान नहीं है;संत नहीं और ना ही गुरू हैं”। उनकी मूर्तीयां सनातन हिन्दू मंदिरों से हटाई जानी चाहिए। अब प्रथम दृष्टया तो ये बचकानी बातें हैं जिनसे देश व समाज में अराजकता स्थिति उत्पन्न होने की संभावना है। मशहूर शायर बशीर बद्र का बहुचर्चित शेर है-“सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा”, भगवान से आशय क्या है? राम, कृष्ण, शिव, ब्रह्मा,दुर्गा क्या ये भगवान की श्रेणी में आते हैं, फ़िर बुद्ध,महावीर,जीसस,नानक,मुहम्मद कौन है! भगवान कोई संकीर्ण अवधारणा नहीं है वरन भगवान एक सर्वव्यापी;सर्वसमावेशी तत्व है। व्यक्तिवादी भगवान जिस रूप में हिन्दू धर्म में पूजा जाता है वह एक थोथी परिकल्पना मात्र है। वहीं ये भी अकाट्य सत्य है कि नर ही नारायण बनता है। ओशो कहते हैं भगवान से आशय है-“भगवत्ता को उपलब्ध व्यक्ति, जिसमें भगवत्ता उतरी हो।” हमारे सारे तत्वदर्शियों का सारा जोर भगवत्ता पर भगवान पर नहीं। अद्वैत का दर्शन हमारा अपना दर्शन है। हिन्दू धर्म की कई शाखाएं मूर्ती पूजा विरोधी है उदाहरण के तौर पर आर्य समाज। कौन भगवान है;कौन नहीं, धर्म-संसद में इस बात का निर्णय कर प्रमाण-पत्र जारी करना अपने आप में हास्यास्पद बात है। किसी को भगवान मानना या नहीं मानना ये आस्था का विषय है;प्रेम का विषय है, ये और बात है कि वर्तमान में प्रेम का स्थान लाभ ने लिया है। भगवान तर्क व बुद्धि का विषय नहीं बल्कि ह्रदय और प्रेम का विषय है। भगवान और भक्त का संबंध;या यूं कहें कि प्रेम का संबंध नितांत निजी होता है इसके बीच कोई भी नहीं आ सकता, स्वयं शंकराचार्य भी नहीं क्योंकि “प्रेम गली अति सांकरी तां में दो ना समाय। मैं था तब हरि नहीं,अब हरि हैं मैं नाय॥” एक बड़ा प्यारा पद है-“ये तो प्रेम की बात है उधौ बंदिगी तेरे बस की नहीं है।” संत दरिया कहते हैं-“ब्रह्मा विष्णु दस औतार, ये सब के सुपने के व्यवहार।” कबीरदासजी ने भी इस प्रकार की जड़ मान्यताओं का कडा विरोध करते हुए कहते हैं-“पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ,पंडित भया ना कोय। ढ़ाई आखर प्रेम का,पढै़ सो पंडित होय”,किंतु इसका यह आशय कदापि नहीं है कि साईं बाबा को सनातनी मंदिरों के हिन्दू देवी-देवताओं को साथ रखकर उनकी पूजा-अर्चना करना सही है। साईं बाबा निर्विवाद रूप से एक उच्च कोटि के संत थे जिनमें बुद्धत्व की झलक थी। संत की समाधि होती है मंदिर नहीं, वास्तव में शिरडी का साईं मंदिर एक समाधि है। यह बात स्पष्ट रूप से शिरड़ी के साईं मंदिर में भी बड़े-बड़े अक्षरों में लिखी हुई है। यदि उस जगह केवल साईं बाबा की मूर्ती स्थापित करके उनकी पूजा अर्चना हो रही है तो उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है ,वह आपत्तिजनक तब हो जाता है जब उनकी मूर्ती अन्य हिन्दू मंदिरों में स्थापित की जाती है। समाधि केवल उस स्थान पर होती है जहां उस संत का दिव्य शरीर रखा होता है,अन्यत्र नहीं। समाधियों का प्रचलन हमारे देश व धर्म में बहुत प्राचीन काल से है। कई संतों की समाधियां हमारे देश में है किंतु उनकी मूर्तीयों की जगह-जगह स्थापना करना;विशेषकर हिन्दू मंदिरों में हिन्दू देवी-देवताओं के साथ स्थापना करना एक गलत परम्परा है। शंकराचार्य को इस गलत परंपरा का विरोध करना चाहिए था, इसके उलट वे एक तत्वदर्शी संत का ही विरोध कर बैठे। उनके इस एक गलत कदम से आध्यात्मिक जगत में तो अराजकता माहौल उत्पन्न हुआ ही है किंतु इससे हिन्दू धर्म व शंकराचार्य पद की गरिमा को जो क्षति हुई है उसकी भरपाई करना असंभव नहीं तो दुष्कर कार्य अवश्य है।

“ज्योतिर्विद” हेमन्त रिछारिया
 प्रारब्ध ज्योतिष संस्थान

बुधवार, 20 अगस्त 2014

“वंदे मातरम्”-कुछ रोचक तथ्य

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बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा “वंदे मातरम्” की रचना दो हिस्सों की गई। कविता के पहले दो अंतरे सन् 1872 से 1875 ई. के बीच लिखे गए थे जबकि शेष अंश सन् 1881 ई. में जोडे़ गये जब “आनंदमठ” का पत्रिका में धारावाहिक रूप में प्रकाशन हुआ।
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“वंदे मातरम्”  गीत की एक पंक्ति “सप्तकोटि कण्ठ...” को गाने वालों ने अपने-अपने हिसाब से संशोधित किया उदाहरणार्थ सन् 1905 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में इसे “सप्तकोटि” के स्थान पर “त्रिदश कोटि” गाया गया क्योंकि उस वक्त भारतवर्ष की जनसंख्या 30 करोड़ के लगभग थी। वर्तमान में यह पंक्ति  “कोटि-कोटि कण्ठ” के रूप में गाई जाती है जिसका आशय आज की जनसंख्या के मान से करोड़ों-करोड़ों कण्ठ होता है। मूल में जब “सप्तकोटि कण्ठ...” लिखा गया उस समय बंकिम चंद्र बंगाल प्रेसीडेंसी की जनसंख्या का वर्णन कर रहे थे जिसकी जनसंख्या सन् 1874 की जनगणना के अनुसार 6.7 करोड़ के लगभग थी। कविता की ध्वन्यात्मकता के लिहाज से इसे “सप्तकोटि” कहा गया।
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“वंदे मातरम्”  कविता मूल रूप में केवल लेखन की दृष्टि से ही नहीं अपितु भाव की दृष्टि से भी दो हिस्सों में बंटी हुई है। पहले हिस्से में मूर्तिपूजा का कोई बिम्ब नज़र नहीं आता जबकि दूसरे हिस्से मूर्तिपूजा का रूपक दृष्टव्य होता है। ऐसा “आनंदमठ” के संदर्भ में हुआ है क्योंकि वास्तव में बंकिम चंद्र चटर्जी स्वयं मूर्तिपूजा के विरोधी थे। सन् 1874 ई. में उन्होंने बंगाल में प्रचलित देवपूजा पर लेख लिखा था और इस लेख में उन्होंने मूर्तिपूजा का खंडन किया था। उन्होंने इस लेख में लिखा था-
“यदि पत्थर या मिट्टी की बनी कोई वस्तु हमारे मन में भक्ति जगाती है तो फिर अखिल ब्रह्मांड में व्याप्त अदृश्य सत्ता के प्रति भक्ति-भावना क्यों नहीं उदित हो सकती? मूर्तिपूजा विज्ञान विरुद्ध है। जहां भी मूर्तिपूजा का चलन होता है वहां ज्ञान की उन्नति नहीं होती। मूर्तिपूजा मनुष्य के “आत्म” की उन्नति में बाधा है। मूर्तिपूजा मनुष्य के मस्तिष्क को बांध लेती है और मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास,सुधार और उन्नति को खत्म कर देती है।”
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“आनंदमठ” उपन्यास में “वंदे मातरम्” कुल पांच बार क्रमशः (खंड-1,अध्याय-10) (खंड-2,अध्याय-5)
(खंड-3,अध्याय-3) (खंड-3,अध्याय-9) (खंड-4,अध्याय-6) में गाया गया है।
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“वंदे मातरम्” नामक कविता बंकिमचंद्र चटर्जी के अध्ययन कक्ष में कई वर्षों तक पड़ी रही। साहित्यिक पत्रिका के संपादन में उनकी मदद करने वाले एक सहायक की नज़र इस कविता पर पड़ी और उसने कविता को दिखाते हुए बंकिम से कहा-“यह इतनी खराब भी नहीं है।”
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सन् 1905 के आसपास “वंदे मातरम्” एक नारे के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

(साभार-वंदे मातरम्)

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

वन्दे मातरम्

सुजलां सुफलां, मलयज शीतलां
शस्य-श्यामलां मातरम्।
वन्दे मातरम्.....

शुभ्र-ज्योत्सना-पुलकित-यामिनीम्
फुल्ल-कुसमित-द्रुमदल-शोभनीम्
सुहासिनीं सुमधुर-भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्॥
वन्दे मातरम्....

सप्तकोटि-कण्ठ-कलकल-निनाद-कराले
द्विसत्कोटि भुजै धृत-खरकरवाले
के बले मा तुमि अबले।*

बहुबल-धारिणीं नमामि तारिणीं
रिपुदल-वारिणीं मातरम्॥
वन्दे मातरम्....

तुमि विद्या तुमि धर्म्म
तुमि ह्रदि तुमि मर्म्म
त्वं हि प्राणाः शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति
ह्रदये तुमि मा भक्ति
तोमारइ प्रतिमा गड़ि
मन्दिरे मन्दिरे।

त्वं हिं दुर्गा दशप्रहरण-धारिणीं
कमला-कमल-दल-विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी
नमामि त्वां।

नमामि कमलां अमलां अतुलां
सुजलां सुफलां मातरम्।
वन्दे मातरम्....

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषितां
धरणीं भरणीं मातरम्॥
वन्दे मातरम्....

*आनन्द मठ के पांचवे संस्करण में इस पंक्ति को संशोधित कर इस प्रकार कर दिया गया-“अबला केन मा एत बले।”

रविवार, 3 अगस्त 2014

कालसर्प दोष मूल रूप में ”कर्तरी दोष” है


“कालसर्प दोष” का नाम सुनते ही जनमानस में भय व्यापत हो जाता है, वहीं कुछ विद्वान इसे सिरे से नकारते हैं। हमारी दृष्टि में दोनों ही भ्रमित हैं। कालसर्प योग से ना तो अनावश्यक डरने की आवश्यकता है और ना ही इसकी उपेक्षा करने की ज़रूरत है बल्कि इसे भी अन्य अशुभ योगों की तरह स्वीकार कर इसके शमन की आवश्यकता है। मूल रूप से कालसर्प योग एक प्रकार का महाकर्तरी योग होता है। ज्योतिष शास्त्र में कर्तरी योगों को सभी विद्वानों ने मान्यता प्रदान की है। जब किसी भाव या ग्रह के दोनों ओर पाप ग्रह उपस्थित हों तो इसे “कर्तरी या पाप कर्तरी” योग कहा जाता है। कर्तरी से आशय है काटने वाला, अतः इन पाप ग्रहों के मध्य जब कोई भाव या ग्रह आ जाता है तो उसका फल नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार कुण्डली के समस्त ग्रह जब राहु-केतु के मध्य आ जाते हैं तो इसे “कालसर्प योग” कहा जाता है। राहु को हमारे शास्त्रों में सर्प का मुख माना है वहीं केतु को पूंछ और सर्प को काल संज्ञा दी है, इसीलिए इस कर्तरी दोष को “कालसर्प योग” कहा जाता है क्योंकि इस प्रकार का कर्तरी योग राहु-केतु के कारण बनता है। “कालसर्प योग” को सिरे से नकारने वाले विद्वानों से यही प्रश्न है कि जब कोई एक ग्रह कर्तरी दोष से पीड़ित हो। कर अपना फल खो देता है तो क्या समस्त ग्रह कर्तरी योग से पीड़ित होकर अपना फल नष्ट नहीं करेंगे? अतः कालसर्प योग को ना तो बहुत बढ़ा-चढ़ा कर देखने की आवश्यकता है और ना ही इसकी उपेक्षा करने की आवश्यकता है। यह एक अशुभ योग है और “नागबली-नारायण बली” कर्म द्वारा इसकी विधिवत शांति करवाकर इसके दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। इसकी विधिवत शांति त्र्यंबकेश्वर (नासिक-महराष्ट्र) में होती है।
कुछ प्रसिद्ध कालसर्प योग वाले जातकों के नाम-
१. मोरारी बापू
२. जवाहर लाल नेहरू
३. हर्षद मेहता
४. मुसोलिनी
५. सम्राट अकबर
(विशेष-जिन मित्रों की कुण्डली में यह दुर्योग उपस्थित हो और वे त्र्यंबकेश्वर में इसकी विधिवत शांति करवाना चाहते हों तो वे “प्रारब्ध ज्योतिष संस्थान” में संपर्क कर सकते हैं।
हमारा ई-मेल पता है- astropoint_hbd@yahoo.in

शनिवार, 26 जुलाई 2014

घड़ी वाले कान्हा-


घड़ी वाले कान्हा
गुजरात के मंदिर में स्थापित यह मूर्ती कृष्ण पाषाण (काले पत्थर) से निर्मित है और ५०० वर्ष पूर्व की बताई जा रही है। इस मूर्ती के बाएं हाथ में एक घड़ी बंधी हुई है। ऐसा बताया जा गया है कि यह घड़ी बिना किसी बैटरी के मानवीय नब्ज़ के आधार पर चलती है। यह एक अंग्रेज ने मूर्ती का मखौल उड़ाते हुए यह कहते हुए बांधी थी कि यदि मूर्ती में प्राण है तो यह घड़ी चलेगी और घड़ी मूर्ती के हाथ में बांधते ही चल पड़ी। ऐसा बताया जा रहा है आज भी यह घड़ी चल रही है और जब ठाकुर जी के अभिषेक-स्नानादि के समय इसे उतारते हैं तो यह बंद हो जाती है फिर श्रृंगार के साथ जब इसे विग्रह पर बांधा जाता है तो पुनः चल पड़ती है।
(यह अभी तक सिर्फ़ किंवंदती ही है। हम उक्त बात की प्रामाणिकता का दावा नहीं करते)

अर्ज़ किया है...

“मासूम हाथों से निवाला खा लिया
 रोज़ा टूटा; मगर दिल बचा लिया”


“तुम चाहे मुहब्बत कह लो इसे
 आदत हो गई है तुम्हारी मुझे”


“ना जाने कैसा रिश्ता है तेरा मुझसे
 नामुकम्मल लगती है ज़िंदगी तेरे बगैर”

“अपने हाथों से जब वो इफ़्तार कराता है
 कौन है जो मुंह से निवाला छीन ले”

“जंग ऐसी भी हुई हैं ज़िंदगी में तुझसे
 जिनमें तेरी हार से मेरी जीत शर्मसार है”

“मेरी आंखों में तो आए नहीं कभी
 सुना है खुशी के आंसू भी होते हैं”

-हेमन्त रिछारिया

जगन्नाथ पुरी “रथयात्रा”-

जगन्नाथ पुरी में विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा का शुभारंभ आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से होता है। जिसमें भगवान कृष्ण और बलराम अपनी बहन सुभद्रा के साथ रथों पर सवार होकर “श्रीगुण्डीचा” मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे और अपने भक्तों को दर्शन देंगे। जगन्नाथ रथयात्रा प्रत्येक वर्ष की आषाढ़ शुक्ल द्वितीय को प्रारंभ होती है। जो आषाढ़ शुक्ल दशमी तक नौ दिन तक चलती है। यह रथयात्रा वर्तमान मन्दिर से “श्रीगुण्डीचा मंदिर” तक जाती है इस कारण इसे “श्रीगुण्डीचा यात्रा” भी कहते हैं। इस यात्रा हेतु लकड़ी के तीन रथ बनाए जाते हैं- बलरामजी के लिए लाल एवं हरे रंग का “तालध्वज”नामक रथ; सुभद्रा जी के लिए नीले और लाल रंग का “दर्पदलना” नामक रथ और भगवान जगन्नाथ के लिए लाल और पीले रंग का “नन्दीघोष” नामक रथ बनाया जाता है। रथों का निर्माण कार्य अक्षय तृतीया से प्रारंभ होता है। रथों के निर्माण में प्रत्येक वर्ष नई लकड़ी का प्रयोग होता है। लकड़ी चुनने का कार्य बसन्त पंचमी से प्रारंभ होता है। रथों के निर्माण में कहीं भी लोहे व लोहे से बनी कीलों का प्रयोग नहीं किया जाता है। रथयात्रा के दिन तीनो रथों मुख्य मंदिर के सामने क्रमशः खड़ा किया जाता है। जिसमें सबसे आगे बलरामजी का रथ “तालध्वज” बीच में सुभद्राजी का रथ “दर्पदलना” और तीसरे स्थान पर भगवान जगन्नाथ का रथ “नन्दीघोष” होता है। रथयात्रा के दिन प्रातकाल सर्वप्रथम “पोहंडी बिजे” होती है। भगवान को रथ पर विराजमान करने की क्रिया “पोहंडी बिजे” कहलाती है। फिर पुरी राजघराने वंशज सोने की झाडू से रथों व उनके मार्ग को बुहारते हैं जिसे “छेरा पोहरा” कहा जाता है। “छेरा पोहरा” के बाद रथयात्रा प्रारंभ होती है। रथों को श्रद्धालु अपने हाथों से खींचते हैं जिसे “रथटण” कहा जाता है। सायंकाल रथयात्रा “श्रीगुण्डीचा मंदिर” पहुंचती है। जहां भगवान नौ दिनों तक विश्राम करते हैं और अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। मंदिर से बाहर इन नौ दिनों के दर्शन को “आड़प दर्शन” कहा जाता है। दशमी तिथि को यात्रा वापस होती है जिसे “बहुड़ाजात्रा” कहते हैं। वापस आने पर भगवान एकादशी के दिन मंदिर के बाहर ही दर्शन देते हैं जहां उनका स्वर्णाभूषणों से श्रृंगार किया जाता है जिसे “सुनाभेस” कहते हैं। द्वादशी के दिन रथों पर  “अधर पणा” (भोग) के पश्चात भगवान को मन्दिर में प्रवेश कराया जाता है इसे “नीलाद्रि बिजे” कहते हैं।
-(जगन्नाथ पुरीधाम की यात्रा के दौरान प्राप्त जानकारी के अनुसार)

भगवान अर्थात् भगवत्ता को उपलब्ध व्यक्ति -ओशो

अभी कुछ दिनों पहले द्वारका पीठ के शंकराचार्य जिनकी धर्म से ज़्यादा विवादों में रूचि है उन्होंने एक साईं बाबा पर एक विवादास्पद बयान देकर नाहक ही एक बिना मतलब की बहस को जन्म दे दिया। कोई भगवान हैं या नहीं इसे किसी के प्रमाण की आवश्यकता नहीं। यदि शंकराचार्य किसी को भगवान होने ना होने की मान्यता या प्रमाण-पत्र देने लगे तो ये तो भगवान से भी ऊपर होने चाहिए। “ओशो” कहते हैं भगवान से आशय है “भगवत्ता को उपलब्ध व्यक्ति, जिसमें भी भगवत्ता उतरी हो वो भगवान है।” कितनी सुंदर बात कही है। साईं बाबा को भगवान ना बताने वाले और उनकी पूजा ना करने का निर्देश देने वाले स्वरूपानंद सरस्वती जी को शायद वेद के “अहं ब्रह्रमास्मि” वाले सिद्धांत विस्मरण हो गया। जिसमें जीव यह घोषणा करता है कि मैं ही ब्रह्रम हूं। रही बात मासांहार की तो बुद्ध जिन्हें २४ अवतारों में मान्यता प्राप्त है स्वयं मांसाहारी थे बाद में उन्होंने उसका त्याग किया। बहरहाल...कौन क्या कहता इससे मेरा प्रयोजन नहीं मैं हैरान हूं हमें क्या हो गया है। कोई शंकराचार्य कुछ बोल देते हैं, कोई फ़तवा जारी कर देता और हम चल पड़ते हाथ में झंडा लिए;बिल्कुल भेड़ों की तरह, सत्य का ज़रा भी विचार नहीं करते...! इस प्रकार का अंधानुकरण क्यों। एक बड़ी मज़ेदार कहावत है-“अंधा अंधे ठेलिया...दोनों कूप पडंत।” अर्थात यदि अंधा व्यक्ति यदि अंधे का अनुसरण करे तो दोनों कुएं में गिरते हैं। दरअसल शंकराचार्य जी को चिंता अपने अनुयायियों की हैं कि कहीं इनकी संख्या ना घट जाए। यदि वास्तव में धर्म की इतनी चिंता है तो अपने शिष्यों को सत्य का साक्षात्कार करवाईये, अपनी लकीर को बड़ा कीजिए अन्य लकीरों को नाहक क्यों छोटा करते हैं। क्या सनातन धर्म इतना क़मज़ोर है कि इस प्रकार साईं बाबा या किसी अन्य की पूजा से समाप्त हो जाएगा? मंदिर तो फिल्म अभिनेताओं के भी हैं। बड़ी हास्यास्पद बात है ये। किंतु जिसे सत्य का साक्षात्कार नहीं हुआ वह इसी प्रकार का अनर्गल प्रलाप करता है। शंकराचार्य जी को उम्र के इस पड़ाव पर स्वयं के अंदर भगवत्ता कैसे जगे इस बात चिंता होनी चाहिए। संत वही है जिसकी दृष्टि स्वयं में स्थिर है गीता में कृष्ण जिसे स्थितप्रज्ञ कहते हैं। “पर” की ओर निहारना संसारी का काम है। तुलसीदास जी ने भी कहा है “सियाराममय सब जग जानी करहुं प्रणाम जोर जुगपानी” जब सारा जगत ही राममय है तो फ़िर शेष क्या रहा। शास्त्र का भी तो यही वचन है-“ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखराशी”। हम सब उसी परमात्मा के अंश है। “ओशो” कहते हैं ईश्वर सभी प्राणियों में बीज रूप में विद्यमान है बस उसी बीज को साधना के माध्यम खिला कर परमात्मा रूपी फूल बनाना है। धर्म प्रत्येक व्यक्ति का निजी होता और परमात्मा भी भीड़ को उपलब्ध नहीं होता। बुद्ध ने अपना अंतिम संदेश देते हुए कहा था “अप्प दीपो भवः”, अपने दिए स्वयं बनो। सही मायने में यही संन्यास है और यही संत की पहचान। धर्म के ठेकेदारी संतत्व की पहचान नहीं हो सकती।

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

“भद्रा” करेगी मोदी की राह आसान

आज सभी की निगाहें बनारस की ओर लगी हुई हैं। बनारस से आज भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी नामांकन भरने वाले हैं। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार यदि सिर्फ़ शुद्ध मुहूर्त ही साध लिया जाए तो कुण्डली कुयोग आधे से अधिक तक निष्प्रभावी हो जाते हैं और अभीष्ट की सिद्धि होती है किंतु काशी के विद्वान ज्योतिषियों ने आज के दिन को नामांकन के लिए शुभ नहीं माना है, क्योंकि आज “भद्रा” है। ज्योतिष शास्त्रानुसार “भद्रा” एक बहुत ही अशुभ योग होता है जिसमें किए गए समस्त कार्य सदा निष्फ़ल हो जाते हैं। यही कारण है कि कल अनेक न्यूज़ चैनलों पर आज के दिन मोदी के नामांकन भरने को लेकर चर्चा होती रही। काशी के एक विद्वान ज्योतिषी ने तो यहां तक कह दिया कि मोदी को ज्योतिष पर विश्वास नहीं है और वे इसकी उपेक्षा करने के लिए ही इस दिन नामांकन दाखिल करने जा रहे हैं, बहरहाल यह सत्य कि आज “भद्रा” है परन्तु ज्योतिष के विद्वान अध्येयताओं को यह पता होना चाहिए कि आज “उत्तरार्द्ध” की भद्रा है;ना कि “पूर्वाद्ध” की। “उत्तरार्द्ध” की भद्रा रात्रि में त्याज्य होती है जबकि “पूर्वाद्ध” की भद्रा दिन में, इसके विपरीत “उत्तरार्द्ध” की “भद्रा” दिन में सभी कार्यों में प्रशस्त होती है और “पूर्वाद्ध” की रात्रि में। शास्त्रानुसार “भद्रा” में समस्त शुभ कार्य वर्जित होते हैं किंतु समस्त क्रूर कार्य जैसे शत्रु पर आक्रमण,शत्रु वध,मारण, उच्चाटन आदि “भद्रा” में ही शुभ होते हैं इस दृष्टि से भी आज का दिन नामांकन के लिए शुभ है। वैसे भी “भद्रा” के मुख की ५ घटियां अर्थात् २ घंटे ही त्याज्य होते है “भद्रा” का पृष्ठ भाग कार्यों में सफलता दिलाता है। अतः यदि मोदी की कुण्डली के कुयोगों की शांति होती है तो “भद्रा” मोदी की राह बहुत हद तक आसान कर देगी।
-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

मीडिया का दोहरा मापदंड

आज शाम एक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल पर मनसे प्रमुख राज ठाकरे का साक्षात्कार देख रहा था। जिसमें मनसे प्रमुख ने  साक्षात्कार लेने वाले चैनल के एडिटर-इन-चीफ़ का कई बार अपमान किया। उनके इस बर्ताव पर हर बार संपादक महोदय सिटपिटा कर रह गए। हद तो तब हो गई जब एक सवाल का जवाब देने से पूर्व राज ठाकरे ने खुले तौर पर कहा कि-“आप भौंक चुके”, इस पर भी संपादक महोदय निर्लज्जता से शांत रह गए। इस घटना की ना तो उस चैनल ने और ना ही किसी अन्य मीडिया समूह ने निंदा की। ना ही मनसे प्रमुख के संपादक के साथ किए इस दुर्रव्यवहार की खबरें चलाईं। वहीं कुछ दिनों पूर्व नरेन्द्र मोदी द्वारा अंग्रेजी अखबार को दिये गए साक्षात्कार के दौरान तथाकथित "पपी" (कुत्ते) वाले मुहावरे को लेकर मीडिया में खूब खबरें चलीं। उनके इस बयान की कड़ी निंदा की गई जबकि उस साक्षात्कार को लेने वाले पत्रकार ने स्वयं ये ट्वीट करके सफाई दी थी कि मोदी के बयान को गलत तरीके से पेश किया जा रहा जबकि उन्होंने वह बयान मुहावरे के तौर पर दिया था। मीडिया के इस दोहरे मापदंड के पीछे क्या राज़ है? ज़रा सोचिए....!

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

ग़ज़ल

ना आहो-फुगां; ना गम लिख रहा हूं
मैं इन दिनों बहुत कम लिख रहा हूं

मुहब्बत;वफ़ा;दोस्ती;कस्मे-वादे
ये तो जहां के भरम लिख रहा हूं

नये दौर के कुछ नये हैं सलीके
आंखों की मैं शरम लिख रहा हूं

कैसी कमी देखो कागज़ की आई
सियासतदां का सितम लिख रहा हूं

वो कहते हैं बेवफ़ा मुझको अक्सर
मैं अब भी उनको सनम लिख रहा हूं

वो लिख रहे हैं शिकस्त आंधियों की
मैं हथेली के अपने ज़खम लिख रहा हूं

-हेमन्त रिछारिया

रसखान के स्याम जू

सेस;गनेस;महेस;दिनेस;सुरेसहु;जाहि निरंतर गावै।
जाहि अनादि;अनंत;अखंड;अछेद;अभेद;सुबेद बतावै॥
नारद से सुक व्यास रहे पचिहारे तु पुनि पार ना पावै।
ताहि अहीर की छोहरियां छछिया भर छाछ पे नाच नचावै॥

धूरि भरे अति सोहत स्याम जू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटि।
खेलत खात फिरे अंगना पग पैंजनी बाजति पीरी कछोटि॥
वा छवि को "रसखान" बिलोकत वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ सौं ले गयो माखन रोटी॥

या लकुटि अरु कामरिया पर राज तिहूं पुर को तजि डारौं।
आठहुं सिद्धि;नवौं निधि को सुख नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
"रसखान" कबौं इन आंखन सौं ब्रज के बन बाग तडा़ग निहारौं।
कोटिक हूं कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं॥


मानुस हौं तो वही "रसखान" बसौ मिलि गोकुल गांव के ग्वारन।
जों पशु हौं तो कहां बस मेरौ, चरौ नित नंद की धेनु मंझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धरयो कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हों तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन॥

रविवार, 23 मार्च 2014

होली है...!

बुरा ना मानो होली है.....

सोमवार, 27 जनवरी 2014

सोलह श्रृंगार


सोलह श्रृंगार की चर्चा तो आप सभी ने सुनी ही होगी लेकिन क्या आप जानते हैं कि वे सोलह श्रृंगार कौन से हैं, यदि नहीं तो हम आपको बताते हैं। सोलह श्रृंगार निम्न हैं-
अंगशुचि,मंजन,वसन,मांग,महावर,केश।
तिलक भाल,तिल चिबुक में,भूषण मेंहदी वेश।
मिस्सी,काजल,अरगजा,वीरी और सुगंध॥
अर्थात् शरीर पर उबटन लगाना,स्नान करना,स्वच्छ वस्त्र धारण करना,मांग भरना,महावर लगाना,बाल संवारना, टीका या बिंदी लगाना,ठोढ़ी पर तिल बनाना,आभूषण धारण करना,मेंहदी रचाना,दांतो में मिस्सी लगाना,आंखों में काजल लगाना, सुगंधित द्रव्य जैसे इत्र लगाना,पान खाना,माला पहनना और हाथों व केश में गजरा धारण करना।

बुधवार, 22 जनवरी 2014

एक अभिशाप


बड़ा प्रचलित शेर है कि “लम्हों ने ख़ता की और सदियों ने सज़ा पाई” बदकिस्मती ये अशआर भारतवर्ष के संदर्भ बहुत ही प्रासंगिक हैं। एक भूल आजादी के समय हुई थी जब कांग्रेस और महात्मा गांधी ने मुसलमानों को विशेष दृष्टि से देखने की कोशिश की थी उस समय संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार जी ने उनके इस कदम का तीव्र विरोध करते हुए कहा था कि ऐसा करने से मुसलमान और हिंदुओं में खाई पैदा हो जाएगी लेकिन गांधी जी नहीं माने और नतीजा आज सबके सामने है। ठीक वैसी ही एक भूल हमारे आज के नीति-नियंता कर रहे महिलाओं को लेकर, महिला सशक्तीकरण अच्छी बात है लेकिन किस हद तक? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि “अति सर्वत्र वर्जयेत्”। आज महिलाओं को जो विशेषाधिकार देने की वकालत की जा रही है वह मेरे देख उचित कदम नहीं है समानता तो स्वीकार की जा सकती है परन्तु किसी भी व्यक्ति को विशेषाधिकार देने का मैं समर्थन नहीं कर सकता। वर्तमान में इसके दुष्परिणाम भी धीरे-धीरे सामने आने लगे हैं चाहे वह दहेज का कानून हो, चाहे घरेलू हिंसा, या हरिजन एक्ट हो इन सब कानूनों का किस प्रकार दुरूपयोग किया जा रहा है यह किसी से छिपा नहीं है। ताज़ा मामला देश की राजधानी दिल्ली का है जहां सूबे के कानून मंत्री को एक इलाके में जाकर संदिग्ध महिलाओं पर कार्रवाई करने के लिए पुलिस वालों पर दबाव डालना महंगा पड़ गया। हैरानी की बात तो यह है इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले दलों में से कोई भी इस पूरे मामले में महिला पुलिस का ज़िक्र तक नहीं कर रहा। क्या महिला पुलिस बस पार्क में बैठे प्रेमी युगलों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटने के लिए है? यदि किसी महिला द्वारा अपराध कारित किया गया था या उस महिला द्वारा अपराध कारित करने का शक था तो महिला पुलिस द्वारा कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या महिलाओं को अपराध के लिए सिर्फ़ इस लिए क्षमादान दे दिया जाएगा कि वे एक महिला है। सारे महिला आयोग कानून मंत्री के पीछे पड़ गए किसी ने भी उन महिलाओं की जांच तक की बात नहीं की जिन पर आरोप लगाए जा रहे थे ऐसा क्यों? यदि इसी तरह का पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया जाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी यही छोटी सी भूल भस्मासुर की तरह हमारी संस्कृति व कानून व्यवस्था के लिए एक अभिशाप साबित होगी।
-हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 11 जनवरी 2014

अरविंद केजरीवाल हैं लंबी रेस का घोड़ा


अरविंद केजरीवाल की कुण्डली वृष लग्न एवं वृष राशि की है। लग्नेश एवं राशि स्वामी शुक्र चतुर्थ भाव में केंद्रस्थ हैं। यहां शुक्र को दिग्बल प्राप्त है।चतुर्थ भाव में चतुर्ग्रही योग है।इसी भाव में बुधादित्य योग भी बन रहा है। वाणी के कारक द्वितीयेश बुध एवं गुरू की शुभ युति के कारण केजरीवाल अपनी वाणी के बल पर अतीव प्रसिद्धि प्राप्त कर रहे हैं, वहीं  केंद्र में कुल ५ ग्रह विद्यमान है जिनमें एक उच्चराशिस्थ व एक स्वराशिस्थ है। लग्नेश दिग्बली है। यह एक अत्यंत शुभयोग है। केजरीवाल की कुण्डली में चतुर्थेश जो कि जनता के भाव का स्वामी है स्वराशि में स्थित है वहीं जनता का कारक शनि व्यय भाव में वक्री होकर नीचराशिस्थ है। ज्योतिषीय नियमानुसार यह उच्चफलदायक है जिसके फलस्वरूप केजरीवाल को जनता का असीम प्यार प्राप्त हो रहा है। वहीं तृतीयेश चंद्र केंद्र में उच्चराशिस्थ होकर गुरू से दशम में स्थित होने के कारण “गजकेसरी योग” बना रहा है जिसके कारण केजरीवाल में अति साहस का गुण का परिलक्षित हो रहा है। वहीं पराक्रम भाव में मंगल उनके साहस में वृद्धि कर रहा है। यहां मंगल के नीचराशिस्थ होने व चंद्र के उच्चराशिस्थ होने के कारण “नीचभंग राजयोग” बन रहा है। चतुर्थेश सूर्य के स्वराशि में स्थित होने व शनि के बलवान होने से केजरीवाल का संबंध सदा-सर्वदा जनता से रहा है। वे आंदोलनों से जुड़े रहे हैं। वहीं यह योग उनके राजनीति में या यूं कहें की सार्वजनिक जीवन में होने के भी स्पष्ट संकेत दे रहा है। नवमांश में “रूचक योग” के बनने व लग्न कुण्डली में मंगल की पराक्रम भाव में स्थित होने से केजरीवाल अत्यधिक साहसी हैं वे साहसिक निर्णय लेने में ज़रा भी संकोच नहीं करते चाहे वह उच्च पद से त्यागपत्र देने का मामला हो या नए दल के गठन कर चुनावी में राजनीति में भाग्य आज़माने का। केजरीवाल की कुण्डली में चतुर्थेश सूर्य नवमांश में उच्चराशिस्थ हैं यह योग भी जनता से संबंध, प्यार एवं सत्ता का संकेत दे रहा है। सत्ता के कारक सूर्य-राहु-शनि व जनता के कारक शनि की कुण्डली में अत्यंत शुभ स्थित यह स्पष्ट संकेत दे रही है कि अरविंद केजरीवाल भारतीय राजनीति के लंबी रेस के घो़ड़े साबित हो सकते हैं किंतु इन शुभ योगों के साथ ही केजरीवाल की कुण्डली में   विषाक्त नामक “कालसर्प योग” भी उपस्थित है। यह एक अशुभ योग है जिसके कारण केजरीवाल को जीवन में कड़ा संघर्ष करना पड़ेगा। कई बार वे उपलब्धियां प्राप्त करते-करते रह जाएंगे। यद्यपि कुण्डली में उपस्थित कई शुभ योगों, राजयोग एवं केन्द्रस्थ गुरू की उपस्थिति से “कालसर्प योग” के दुष्प्रभावों में कमी आएगी किंतु अपेक्षित सफलता प्राप्ति  के लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना ही पड़ेगा। राहु की महादशा-अंतर्दशा उनके लिए लाभकारी सिद्ध होगी। एकादश स्थानगत राहु राजयोग कारक होता है। इसकी दशा-अंतर्दशा उन्हें सत्ता के केन्द्र में स्थापित करने वाली होगी। केजरीवाल इस समय गुरू की महादशा एवं ल़ग्नेश शुक्र की अंतर्दशा के प्रभाव में है। गुरू उनकी कुण्डली में “गजकेसरी” योगकारक होकर लाभस्थ राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी है वहीं शुक्र जनता के भाव चतुर्थ में चंद्र अधिष्ठित राशि का स्वामी होकर स्थित है जिसके फस्वरूप उन्हें जनता का असीम स्नेह व सत्ता प्राप्त होगी। यह दशा २०१५ तक रहेगी। इसके बाद आनेवाली दशाएं भी उनके लिए अनुकूल हैं। निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि अरविंद केजरीवाल आने वाले दिनों में  मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, केंन्द्रीय मंत्री, जैसे उच्च पदों  को ग्रहण करेंगे बल्कि यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि वे एक दिन भारतीय लोकतंत्र के सर्वोच्च पद पर आसीन हो जाएं।
(उपर्युक्त फलादेश उपलब्ध कुण्डली का है जो अरविंद केजरीवाल की बताई गई है। हम इसकी प्रामाणिकता के बारे में कोई दावा नहीं करते।)
-हेमन्त रिछारिया
(ज्योतिर्विद,ज्योतिष प्रभाकर)