शनिवार, 14 दिसंबर 2013

दुख का मौसम

तेरा हाथ मेरे कांधे पर दरिया बहता जाता है
कितनी ख़ामोशी से दुख का मौसम गुज़रा जाता है

पहले ईंट;फिर दरवाजे;अबके छत की बारी है
याद नगर में एक महल था,वो भी गिरता जाता है

अपना दिल है एक परिंदा जिसके बाज़ू टूटे हैं
हसरत से बादल को देखे बादल उड़ता जाता है

सारी रात बरसने वाली बारिश का मैं आंचल हूं
दिन में कांटों पर फैलाकर मुझे सुखाया जाता है

हमने तो बाज़ार में दुनिया बेची और खरीदी है
हमको क्या मालूम किसी को कैसे चाहा जाता है

-बशीर बद्र

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