रविवार, 20 अक्तूबर 2013

कभी लौट कर नहीं आया...

बिछ्ड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया
सफ़र में उसके कहीं अपना घर नहीं आया

वो एहतराम से करते हैं खून भरोसे का
हमें अब तक मगर ये हुनर नहीं आया

मेरे वादे का जुनूं देख,तुझसे बिछड़ा तो
कभी ख़्वावों में भी तेरा जिकर नहीं आया

दुश्मनी हमने भी की है मगर सलीके से
हमारे लहज़े में तुमसा ज़हर नहीं आया

(साभार)

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