रविवार, 20 अक्तूबर 2013

कभी लौट कर नहीं आया...

बिछ्ड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया
सफ़र में उसके कहीं अपना घर नहीं आया

वो एहतराम से करते हैं खून भरोसे का
हमें अब तक मगर ये हुनर नहीं आया

मेरे वादे का जुनूं देख,तुझसे बिछड़ा तो
कभी ख़्वावों में भी तेरा जिकर नहीं आया

दुश्मनी हमने भी की है मगर सलीके से
हमारे लहज़े में तुमसा ज़हर नहीं आया

(साभार)

रिक्त


मंगलवार, 15 अक्तूबर 2013

चुनावी माहौल

एक बार देखी हमने श्वानों की लडा़ई
हड्डी एक थी किंतु सबने उसपर नज़र गड़ाई
एक गुर्राया; दूजे ने पंजा बढ़ाया; तीसरा काटने को आतुर,
हड्डी ले भागा वही जो श्वान था सबसे चातुर।

फिर कुछ दिनों के बाद जब चुनाव है आया,
हमारी नज़रों के सामने वही दृश्य दोहराया।
हमने देखी फिर से वही श्वानों की लड़ाई,
हड्डी एक थी किंतु सबने उसपर नज़र गड़ाई।
सुना था कि अपने क्षेत्र में "श्वान" भी "सिंह" होता है,
ये कैसा माहौल है यारों जहां "सिंह" "श्वान" होता है।

-हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

“गांधीजी के बंदर”

चार बंदर आपस में बात कर रहे थे। एक बोला-"गांधी बापू ने कहा है बुरा मत देखो",  दूसरा बोला-"बुरा मत सुनो",  तीसरे ने कहा-बुरा मत कहो", तभी चौथे ने कहा- "यारों, लेकिन बुरा करने से मना थोड़े किया है।" चारों बंदर खिलखिला के हँस पड़े।”

-हेमन्त रिछारिया