रविवार, 20 अक्तूबर 2013

कभी लौट कर नहीं आया...

बिछ्ड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया
सफ़र में उसके कहीं अपना घर नहीं आया

वो एहतराम से करते हैं खून भरोसे का
हमें अब तक मगर ये हुनर नहीं आया

मेरे वादे का जुनूं देख,तुझसे बिछड़ा तो
कभी ख़्वावों में भी तेरा जिकर नहीं आया

दुश्मनी हमने भी की है मगर सलीके से
हमारे लहज़े में तुमसा ज़हर नहीं आया

(साभार)

“मेरा सब्ज़ीवाला”

आज रविवार है। नगर के साप्ताहिक हाट बाज़ार का दिन, परन्तु आज इस बाज़ार की सूरत कुछ बदली-बदली सी नज़र आ रही है। आज सड़क के दोनों किनारों पर बोरियों में; बांस की टोकनियों व ठेलों पर ताज़ी-ताज़ी सब्ज़ी रखकर बेचने वाले अब दिखाई नहीं दे रहे क्योंकि उन्हें स्थानीय नगरपालिका ने एक सुव्यवस्थित व पक्का सब्ज़ी बाज़ार बनाकर दे दिया है। विकास का पर्याय यह नवीन सब्ज़ी बाज़ार अभी दोनों ही को यानि सब्ज़ीवालों को और नागरिकों को रास नहीं आ रहा क्योंकि यह परिवर्तित सब्ज़ी बाज़ार नगर की मुख्यधारा से थोड़ा अलग व हटकर है किंतु धीर-धीरे दोनों ही को इसकी आदत हो जाएगी और हो भी क्यों ना जब पेट्रोल और प्याज़ के दामों की व राजनीति के भ्रष्टाचार की आदत हो गई तो यह तो सब्ज़ी बाज़ार है। मेरी चिंता का विषय दूसरा है; चिंता कहूं या दुःख समझ में नहीं आ रहा। मेरा बरसों पुराना सब्ज़ीवाला इस विकास की भेंट चढ़कर पता नहीं कहां खो गया है बहुत ढूंढने पर भी आज उसे खोज नहीं पाया। मेरी आंखें हर तरफ उसे ही तलाशती रहीं। लगभग ५ वर्षों से मेरा एक ही सब्ज़ी वाला निर्धारित है मैं प्रतिदिन उससे ही सब्ज़ी लिया करता हूं। लगभग ६५ वर्षीय वृद्धा जिसे मैं “अम्मा” कहकर संबोधित करता हूं और उसका ४०-४२ वर्षीय बेटा यही मेरे सब्ज़ीवाले हैं। इतने वर्षों से निरंतर सब्ज़ी लेने के बहाने रोज़ उनसे मिलने की आदत पड़ गई है और आप तो जानते ही हैं कि आदतें यदि समय पर ना बदली जाएं तो ज़रूरतें बन जातीं हैं तो आज मेरी इस ज़रूरत के चलते मुझे सब्ज़ी खरीदने में मज़ा नहीं आया। ताज़ेपन का अहसास ही मानो खो सा गया। उस सब्ज़ीवाले से मेरे आत्मीय संबंध बन गए हैं। मैं आए दिन अम्मा से सब्ज़ी के बढ़ते दामों को लेकर मज़ाक किया करता था और वे लोग भी उतनी ही आत्मीयता से प्रत्युत्तर दिया करते थे। कभी सब्ज़ी खराब निकल जाती तो दूसरे दिन उलाहना देने पर वे लोग मुझे इस मंहगाई के ज़माने में उतनी ही सब्ज़ी मुफ़्त दिया करते थे। मैंने कभी भी उनसे दामों को लेकर कोई मोल-भाव नहीं किया और मैं दावे से कह सकता हूं कि मैं कभी ठगा नहीं गया, भला प्रेम में भी कभी कोई ठगाता है? मेरा वो सब्ज़ीवाला खो गया है इससे बहुत दुःखी हूं पता नहीं वह अब कब मुझे मिलेगा? लोग अक्सर रिश्तों में व्यापार कर लिया करते हैं किंतु मैं अक्सर व्यापार में रिश्ते बना लिया करता हूं। प्रभु से प्रार्थना है कि अगले रविवार जब मैं सब्ज़ी खरीदने जाऊं तो मुझे मेरा सब्ज़ीवाला मिल जाए। आप सब भी दुआ कीजिए।


मंगलवार, 15 अक्तूबर 2013

चुनावी माहौल

एक बार देखी हमने श्वानों की लडा़ई
हड्डी एक थी किंतु सबने उसपर नज़र गड़ाई
एक गुर्राया; दूजे ने पंजा बढ़ाया; तीसरा काटने को आतुर,
हड्डी ले भागा वही जो श्वान था सबसे चातुर।

फिर कुछ दिनों के बाद जब चुनाव है आया,
हमारी नज़रों के सामने वही दृश्य दोहराया।
हमने देखी फिर से वही श्वानों की लड़ाई,
हड्डी एक थी किंतु सबने उसपर नज़र गड़ाई।
सुना था कि अपने क्षेत्र में "श्वान" भी "सिंह" होता है,
ये कैसा माहौल है यारों जहां "सिंह" "श्वान" होता है।

-हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

“गांधीजी के बंदर”

चार बंदर आपस में बात कर रहे थे। एक बोला-"गांधी बापू ने कहा है बुरा मत देखो",  दूसरा बोला-"बुरा मत सुनो",  तीसरे ने कहा-बुरा मत कहो", तभी चौथे ने कहा- "यारों, लेकिन बुरा करने से मना थोड़े किया है।" चारों बंदर खिलखिला के हँस पड़े।”

-हेमन्त रिछारिया