गुरुवार, 12 सितंबर 2013

ग़ज़ल

फ़ज़ाओं से ये पयाम मिला है अभी
किस तरह मेरा गांव जला है अभी

कितने परिन्दे बेघर हो गए देखो
कोई दरख़्त जड़ों से हिला है अभी

इंसानियत कैसे ज़िंदा बच पाएगी
आदम शैतान से जा मिला है अभी

मुनासिब वक्त में हम भी बोलेंगे
जो सच होठों पे सिला है अभी

-हेमन्त रिछारिया

कोई टिप्पणी नहीं: