बुधवार, 4 सितंबर 2013

धुंधला हुआ प्रकाश

 प्रकाश झा
आज "सत्याग्रह" देखी। अन्ना हजारे के आंदोलन को प्रत्यक्ष देखने के बाद उस जैसे आंदोलन का नाट्य रूपान्तरण बिल्कुल भी आकर्षक नहीं लगा। फिल्म की कहानी कमज़ोर है। "मल्टी स्टारर" करने के चक्कर में कुछ पात्र जबरन ठूंसे गए हैं जैसे करीना कपूर, अर्जुन रामपाल आदि। इस फिल्म ने पुराने ज़माने के बेहद मशहूर गीत "हमरी अटरिया पे आजा रे साँवरिया, देखा-देखी तनिक हुई जाए" की जिस तरह याद दिलाई उससे दुःख हुआ। सिर्फ एक गीत "रघुपति राघव राजा राम" को यदि छोड़ दिया जाए तो इस फिल्म में देखने लायक कुछ भी नहीं है। यदि आप इतने विशाल ह्रदय के मालिक हैं कि एक गीत के लिए पूरी फिल्म सहन कर सकते हैं तो बेशक आप यह फिल्म देख सकते हैं।
लगता है दामुल,मृत्युदण्ड,गंगाजल और अपहरण जैसी सार्थक फिल्में बनाने वाले प्रकाश झा की चमक अब फीकी पड़ गई है। राजनीति,चक्रव्यूह,आरक्षण और इसी कड़ी में अब सत्याग्रह इसका जीवंत उदाहरण हैं।"राजनीति" को झा साहब जिससे प्रेरित बताते हैं उस थीम की लाजवाब फिल्में "हम पाँच" व "आँधी" पहले ही मील का पत्थर साबित हो चुकी हैं। उन फिल्मों के आगे "राजनीति" बेहद हल्की साबित हुई। फिर आई "आरक्षण" जिसमें अति संवेदनशील आरक्षण को फिल्म का विषय बनाया गया किंतु यहाँ भी प्रकाश झा मुद्दे से भटक कर महज़ शिक्षा की व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को ही चित्रित कर सके। उसके बाद "चक्रव्यूह"में प्रकाश झा नक्सलवाद जैसे ज्वलंत मुद्दे को आधार बनाने की कोशिश में "नमक हराम" की नकल कर बैठे। ये फिल्में या तो असफल रहीं या साधारण सफल। समीक्षकों ने इनमें से किसी भी फिल्म को नहीं सराहा। कुल मिलाकर इन दिनों प्रकाश झा अपनी फीकी पड़ी चमक के साथ मुद्दों व फिल्मों की नकल की खिचड़ी बनाकर प्रस्तुत करने में लगे हुए हैं।

-हेमन्त रिछारिया

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