बुधवार, 25 सितंबर 2013

क्योंकि मैं विशिष्ट हूं...

मैं नहीं लग सकता राशन की कतारों में,
ना ही पाओगे मुझे तुम टिकिट-खिड़की के आगे;
रेल्वे-स्टेशनों या थिएटरों में,
मिलूंगा नहीं मैं तुम्हें किसी बाज़ार में,
क्योंकि मैं विशिष्ट हूं।
                                                      
मैं सफ़र नहीं करता बसों में;जनरल बोगियों में,
घूमता नहीं पैदल बेफ़िक्र किसी नदी के किनारे,
ठठ्ठा मारकर हंसना नहीं तहज़ीब मेरी,
बुक्का फाड़कर रोते देखा है मुझे कभी?
अकेला तुम मुझे कभी ना पाओगे,
घिरा रहता हूं हमेशा मैं भीड़ से,
क्योंकि मैं विशिष्ट हूं।
                           

काश..! मैं भी अपने बच्चों को दुपहिया पर घुमा पाता,
कांधों पे बिठा अपने तितलियों की तरफ़ दौड़ पाता,
चौपाटी के वो गोल-गप्पे मेरा भी मन ललचाते हैं,
बारिश के सुहाने मौसम मुझे भी गुदगुदाते हैं,
लेकिन कुचलकर मैं सारे अरमानों को,
घुटता रहता हूं अपनी विशिष्टता की कैद में।
                    
हे विधाता! तू मुझे  अगला जन्म मत देना,
और यदि दे तो यह विशिष्टता मत देना।
क्योंकि मैं भी जीना चाहता हूं अपनी ज़िंदगी,
एक आम आदमी की तरह...।

-हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 21 सितंबर 2013

चारों धामों के चक्कर में

अपने धाम प्रसन्न सुखी थे, बारिश गर्मी ठण्ड में
चारों धामों के चक्कर में, मरे उत्तराखण्ड में।

महाप्रलय ने दी होगी जब दस्तक आकर द्वारे
ईश्वर शून्य लगे होंगे मंदिर,मस्ज़िद, गुरूद्वारे।
भूख-प्यास से, मृत्यु-त्रास से, जान गए तुम होंगे
कितनी निर्मम, कितनी अक्षम होती हैं सरकारें
अपने के कंधों पर जाते, चन्दन गंध चिता में पाते
जलने भर को मिली ना लकड़ी अनुकम्पा के फण्ड में॥

-डा.विनोद निगम


कार्टून


बुधवार, 18 सितंबर 2013

क्षमावाणी

आहत मन जो हुआ कभी हो,
दुखती रग को छुआ कभी हो।
पीड़ित हुई हो कोई भावना,
भूल गए हों प्रेम-साधना।
जाने-अनजाने सब कर्मों की,
आज तुमसे है क्षमा मांगना।

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

ग़ज़ल

फ़ज़ाओं से ये पयाम मिला है अभी
किस तरह मेरा गांव जला है अभी

कितने परिन्दे बेघर हो गए देखो
कोई दरख़्त जड़ों से हिला है अभी

इंसानियत कैसे ज़िंदा बच पाएगी
आदम शैतान से जा मिला है अभी

मुनासिब वक्त में हम भी बोलेंगे
जो सच होठों पे सिला है अभी

-हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 9 सितंबर 2013

क्यों हिन्दू-मुसलमान...

क्यों हिन्दू-मुसलमान हुआ जाए
लाज़िसी है अब इंसान हुआ जाए

बन सकते हैं जब दिलों का सुकूं
क्यों दर्द का सामान हुआ जाए

टकरा  रहीं  हैं आपस में सरहदें
चलों यारों आसमान हुआ जाए

आओ हकीकत की तस्दीक करें
कौन तीर;कौन कमान हुआ जाए

लहू से खेलना दरिन्दों का काम है
कभी आदम की पहचान हुआ जाए

मरासिमों की लाशें जलाए हरदम
मेरा ये दिल श्मशान हुआ जाए

खुदा के वास्ते चुप भी रहिए दानां
खूबसूरत शहर वीरान हुआ जाए

-हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 4 सितंबर 2013

धुंधला हुआ प्रकाश

 प्रकाश झा
आज "सत्याग्रह" देखी। अन्ना हजारे के आंदोलन को प्रत्यक्ष देखने के बाद उस जैसे आंदोलन का नाट्य रूपान्तरण बिल्कुल भी आकर्षक नहीं लगा। फिल्म की कहानी कमज़ोर है। "मल्टी स्टारर" करने के चक्कर में कुछ पात्र जबरन ठूंसे गए हैं जैसे करीना कपूर, अर्जुन रामपाल आदि। इस फिल्म ने पुराने ज़माने के बेहद मशहूर गीत "हमरी अटरिया पे आजा रे साँवरिया, देखा-देखी तनिक हुई जाए" की जिस तरह याद दिलाई उससे दुःख हुआ। सिर्फ एक गीत "रघुपति राघव राजा राम" को यदि छोड़ दिया जाए तो इस फिल्म में देखने लायक कुछ भी नहीं है। यदि आप इतने विशाल ह्रदय के मालिक हैं कि एक गीत के लिए पूरी फिल्म सहन कर सकते हैं तो बेशक आप यह फिल्म देख सकते हैं।
लगता है दामुल,मृत्युदण्ड,गंगाजल और अपहरण जैसी सार्थक फिल्में बनाने वाले प्रकाश झा की चमक अब फीकी पड़ गई है। राजनीति,चक्रव्यूह,आरक्षण और इसी कड़ी में अब सत्याग्रह इसका जीवंत उदाहरण हैं।"राजनीति" को झा साहब जिससे प्रेरित बताते हैं उस थीम की लाजवाब फिल्में "हम पाँच" व "आँधी" पहले ही मील का पत्थर साबित हो चुकी हैं। उन फिल्मों के आगे "राजनीति" बेहद हल्की साबित हुई। फिर आई "आरक्षण" जिसमें अति संवेदनशील आरक्षण को फिल्म का विषय बनाया गया किंतु यहाँ भी प्रकाश झा मुद्दे से भटक कर महज़ शिक्षा की व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को ही चित्रित कर सके। उसके बाद "चक्रव्यूह"में प्रकाश झा नक्सलवाद जैसे ज्वलंत मुद्दे को आधार बनाने की कोशिश में "नमक हराम" की नकल कर बैठे। ये फिल्में या तो असफल रहीं या साधारण सफल। समीक्षकों ने इनमें से किसी भी फिल्म को नहीं सराहा। कुल मिलाकर इन दिनों प्रकाश झा अपनी फीकी पड़ी चमक के साथ मुद्दों व फिल्मों की नकल की खिचड़ी बनाकर प्रस्तुत करने में लगे हुए हैं।

-हेमन्त रिछारिया