शनिवार, 17 अगस्त 2013

पुस्तक समीक्षा-"फिर कुंडी खटकी है"


कुछ वर्ष पूर्व मुझे मेरे एक मित्र ने कवि प्रदीप दुबे "दीप" की "फिर कुंडी खटकी है" नामक पुस्तक पढ़ने को दी। मुझे इसकी रचनाएं बेहद पसंद आईं। अभी कुछ दिनों पहले प्रदीप जी ने यह पुस्तक मुझे भेंट कर इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने को कहा। मैंने इसकी रचनाओं को जब पुनः पढ़ना प्रारंभ किया तो पुराने भाव फिर से नवीन महसूस होने लगे। प्रदीप जी रचनाएं आम आदमी की बात करतीं हैं। इन रचनाओं के विषय भी आम आदमियों के अपने हैं। प्रदीप जी अपनी रचनाओं में कठोर धरातल का चित्रण करते हैं ना कि किसी स्वप्नलोक का, एक बानगी देखिए-
फिर कुंडी खटकी है शुभदे
देख नया दुख आया होगा।
खुद चलकर आया होगा या
अपनों ने पहुंचाया होगा॥

प्रेम और विरह का चित्रण करने का भी प्रदीप जी का अपना ख़ास अंदाज़ है अपनी एक रचना में विरहा को कुछ इस अंदाज़ में चित्रित करते हुए वे कहते हैं-
बहुत उदास रहा
घर तुम बिन
चीज़ें बिखरी मन बिखरा था
मौसम का चेहरा उतरा था
सुधियों का जमघट था फिर भी
निपट अकेलापन पसरा था

इसी मिज़ाज़ की एक और रचना देखिए-
खुद टूटे पर कभी न तोड़ी
प्रीत; प्रीत की रीत,
सच-सच कहना बालू भैया
हार हुई या जीत?

अपनी एक और सशक्त रचना में प्रदीप जी ग्रामीण परिवेश का चित्रण करते हुए कहते हैं-
क्या बतलाएं बंसी भैया
इन दिन क्या चल रहा गांव में,
और नये छाले उभरे हैं
पगडंडी के लटे पांव में।

मुझे जो बात प्रदीप जी की रचनाओं में सबसे अच्छी व भली लगती है वह है उनकी सरलता। वे बिना किसी भारी-भरकम शब्दों की जमावट किए बगैर बिल्कुल सीधी-सादी बोली में अपनी व गहरी बात संयुक्त रूप से कहने में सफल हुए हैं। लेकिन इस दृष्टि से उनकी रचनाओं में कोई हल्कापन आया हो ऐसा नहीं है वे अपनी रचनाओं में गहरी से गहरी बात व विषयों को बड़े ही सरल और सहज संप्रेषण के माध्यम से उठाने में कुशल हैं। ये पंक्तियां देखिए-
इस बस्ती में क्षेम-कुशल है, कैसे कह दूं?
आते दिखा रुपहला कल है, कैसे कह दूं?

बैठ ना पाखी ह्रदय हार के
लौटेंगे दिन हरसिंगार के

दीपक तुम बेकार आ गए
सूरज वालों की बस्ती में

वर्तमान जनजीवन का दर्द प्रदीप जी ने अपनी इस रचना में बखूबी उकेरा है-
निपट अकेले बंटे हुए हम
आधे घर आधे दफ़्तर में
कभी लदा घर दफ़्तर पहुंचा
कभी लाए दफ़्तर को घर में।

प्रदीप जी ने दोहों पर भी अधिकार पूर्वक अपनी लेखनी चलाई है। मुझे उनके दोहों में जो अधिकांश प्रीतिकर लगता है वह है-
कहां प्रीत की माधुरी कहां नेह की गंध
मुंह देखे की बतकही सुविधा के संबंध।

कुल मिलाकर किसी कवि की श्रेष्ठता का अनुमान इस बात से नहीं होता कि उनकी कृतियों को कितने प्रादेशिक व राष्ट्रीय सम्मान मिलें हैं या उस कृति को कितने नामचीन लोगों ने अपने हाथों में लेकर तस्वीर खिंचाई है बल्कि इस बात से होता है कि पाठक उसकी रचनाओं को कितना अपना समझते हैं। मेरे देखे किसी रचना की सार्थकता तभी होती है जब उसे पढ़ने वालों को लगे कि "अरे यह तो अपनी ही बात कह दी गई।" वैसे भी वर्तमान युग प्रमोशन व ब्रांडिंग का है। कई कवि अपनी पुस्तकों को लोकप्रिय बनाने के लिए क्या-क्या हथकंडे नहीं अपनाते किंतु पाठकों की पसंद की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाते वहीं प्रदीप जी जैसे कवि बिल्कुल सहज होते हुए भी अपनी सशक्त रचनाओं के माध्यम पाठकों के ह्रदय में स्थान प्राप्त करने में सफल हो जाते है। आप सभी से अनुरोध है एक बार "फिर कुंडी खटकी है" पढिएगा ज़रूर।
प्रदीप जी इसी प्रकार खूब लिखें और उन्हें यथोचित सम्मान प्राप्त हो मां शारदे से यही प्रार्थना है...!

समीक्षक-हेमन्त रिछारिया 

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