गुरुवार, 15 अगस्त 2013

स्तरहीन बौद्धिक


कल राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यक्रम "अखण्ड भारत संकल्प दिवस" में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वहां संघ के एक बड़े पदाधिकारी का बौद्धिक (भाषण) हुआ। उनका बौद्धिक वस्तुतः संघ के संस्थापक डा.हेडगेवार व संघ को संवर्धित करने वाले श्रीयुत गुरूजी एवं संघ की मूल विचारधारा के प्रतिकूल था। उनका  बौद्धिक स्तरहीन व नकारात्मक प्रभावोत्पादक था। यही वजह है कि आज आम जन संघ से संबद्ध होने में स्वंय को असहज पाता है। इसी प्रकार के तथाकथित स्वंयसेवकों व पदाधिकारियों की वजह से आज संघ की छवि धूमिल ना सही पर उज्जवल नहीं रही; जो कभी हुआ करती थी। आज इस प्रकार के पदाधिकारी व स्वंयसेवक एक वर्ग विशेष की आलोचना करना ही संघ की मूल विचारधारा मानते हैं जबकि संघ की मूल विचारधारा राष्ट्रनिष्ठा, सांस्कृतिक गौरव, धर्मनिष्ठा व हिंदू समाज को संगठित करना है। इस विचारधारा को संपुष्ट करने में यदि राष्ट्रविरोधी तत्वों की सहज निंदा करना पडे़ तो कोई हानि नहीं। ऐसे राष्ट्रविरोधी तत्व आज हर दल में, हर वर्ग में उपस्थित हैं। ऐसे में वक्ता को अपनी बुद्धिमत्ता से मूल विचारधारा के अनुरूप अपना वक्तव्य देना चाहिए। अच्छा होता यदि ये महाशय अखंड भारत की खंडता व राष्ट्रनिष्ठा पर अपना बौद्धिक केंद्रित करते तो वही होता जिसे हम कहते हैं कि "सांप भी मर जाता और लाठी भी नहीं टूटती"। मेरा देशवासियों से यही निवेदन है कि वे इस प्रकार के तथाकथित स्वंयसेवकों व पदाधिकारियों के बौद्धिकों से संघ के बारे में कोई धारणा ना बनाएं। संघ की मूल विचारधारा को समझने के लिए वे "डा.हेडगेवार चरित्र" व "गुरूजी समग्र" जैसी प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करें। मेरा विश्वास है कि वे इन ग्रंथों के अध्ययन के उपरांत संघ की विचारधारा से सहमत हुए बिना नहीं रह सकेंगे।

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