शनिवार, 10 अगस्त 2013

"धर्म दण्डयोऽसि"

प्राचीनकाल में किसी राजा को चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए अश्वमेध यज्ञ करना आवश्यक होता था। यज्ञ संपन्न करने के पश्चात पूर्णाहुति के समय राजा तीन बार उच्चार करता था-"अदण्डोऽस्मि....अदण्डोऽस्मि...अदण्डोऽस्मि..!"
अर्थात अब मुझे कोई दण्ड नहीं दे सकता, राजा के प्रत्येक उच्चार के बाद राजपुरोहित अपने धर्मदण्ड को राजा के मस्तक से स्पर्श कराकर उच्चार करता था-"धर्म दण्डयोऽसि...धर्म दण्डयोऽसि...धर्म दण्डयोऽसि...!" जिसका अभिप्राय होता है-धर्म तुम्हें दण्ड दे सकता है।

कोई टिप्पणी नहीं: