गुरुवार, 1 अगस्त 2013

हम दागी हैं तो क्या हुआ....

 अभी कुछ दिनों पहले देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए सजायाफ़्ता व्यक्तियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। यह पाबंदी जेल के अंदर से चुनाव लड़ने पर जारी रहेगी। इस फैसले का जहां देशवासियों ने दिल से स्वागत किया वहीं इसने राजनीतिक दलों व राजनेताओं की नींद उड़ा दी। खबर है कि जल्द ही सरकार इस फैसले के खिलाफ संसद में बिल पारित करने जा रही है। संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ की माने तो सभी दल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के विरूद्ध कानून में संशोधन करने के लिए एकजुट हैं। बड़े आश्चर्य की बात है कि गत वर्ष भ्रष्टाचार के विरूद्ध जब लोकपाल कानून के लिए आंदोलन हुआ था तो यही दल एक-दूसरे टांग खींचते नज़र आए थे। आज जब भ्रष्टाचार को रोकने की दिशा में कोई सार्थक कदम उठाया जा रहा तो यही दल अपना अंतर्विरोध भूलकर गलबहियां डाले एक साथ खड़े हैं। क्योंकि ये इनकी कुत्सित राजनीति का सवाल है;स्वार्थ का सवाल है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि ये राजनीतिक दल व राजनेता अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं इसके उदाहरण हमने समय-समय पर देखे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए और ना ही अपनी आने वाली पीढ़ियों को भूलने देना चाहिए कि यह आज़ादी हमें बिना खड्ग-बिना ढाल के प्राप्त नहीं हुई है इसके लिए हमें भारी कीमत चुकानी पड़ी है। इस आजादी को पाने के लिए जाने कितनी माताओं ने अपनी युवा संतानों को हंसते-हंसते देश पर न्यौछावर कर दिया है। कितनी बहनों ने अपना सुहाग खोया है। कितने युवक भर यौवन में काल के गाल में समा गए और आज भी जब देश पर संकट आता है तो ऐसा ही नज़र देखने को मिलता है। भला कारगिल को कौन भूल सकता है? इसलिए इस देश के लिए हमारा भी कुछ कर्तव्य है। जब ये दुष्चरित्र नेता अपने स्वार्थ के लिए देश को हानि पहुंचाने वाले कार्यों के लिए अपने अंतर्विरोध भूलकर एकजुट हो सकते हैं तो क्या हम देशवासी अपने देश के रक्षण के लिए अंतर्विरोध त्यागकर एक नहीं हो सकते। आज लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाली संसद में अपराधियों व दागीयों की बहुतायत है। सभी दल अपनी सीटें बढ़ाने के उद्देश्य से दागी व आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को चुनाव मैदान में उतारते हैं और फिर इन्हीं के दम पर समर्थन देते समय सौदेबाजी करते हैं। आखिर अयोग्य व आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को देश की नीति निर्धारण का कार्य कैसे सौंपा जा सकता है? इन राजनेताओं का यह कहना है कि संसद की सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर रहे हैं परन्तु ऐसा कहते समय वे यह भूल जाते हैं कि संसद से बढ़कर भी जन-संसद होती है जो देर-सबेर उनकी इस बुरी नीयत को समझ ही जाएगी। आज देशवासियों को यह संकल्प करना चाहिए कि भले ही संसद सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को अपनी निम्नस्तरीय चालबाजियों के चलते अमान्य कर दे परन्तु हम उसका अक्षरशः पालन करते हुए आपराधिक व दागी छवि वाले अयोग्य व्यक्तियों को संसद में नहीं भेजेंगे। यदि ऐसा हुआ तो यह लोकतंत्र एवं राष्ट्र-रक्षण की दिशा में एक अभूतपूर्व कदम होगा।

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