गुरुवार, 22 अगस्त 2013

पानी सर ऊपर है

कछु करो अब नाथ,
पानी सर ऊपर है।
छूटे हाथ से हाथ,
पानी सर ऊपर है॥

डूबी गाड़ी; डूबी गैल,
डूबा हमरा कबरा बैल।
कछु ना आयो हाथ,
पानी सर ऊपर है॥

बह गए सारे ढ़ोना-टापर,
तितर-बितर भई है बाखर।
भए बच्छा-बच्छी अनाथ,
पानी सर ऊपर है॥

घनन-घनन-घन गरजे बदरा,
उमड़-घुमड़ के बरसे बदरा।
बिजुरिया चमके साथ,
पानी सर ऊपर है॥

-हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 21 अगस्त 2013

मानस में नारी

 भ्राता,पिता,पुत्र उरगारी।
पुरूष मनोहर निरखत नारी॥

ढोर,गंवार,शूद्र,पशु,नारि।
सकल ताड़ना के अधिकारी।।

काम,क्रोध,लोभ आदि मद, प्रबल मोह कै धारि।
तिन्ह मह अति दारुन दुखद मायारूपि नारि॥

नारि सुभाऊ सत्य सब कहहीं, अवगुन आठ सदा उर रहहीं।
साहस,अनरत,चपलता,माया, भय अविवेक,असौच, अदाया॥
(रामचरितमानस)

रविवार, 18 अगस्त 2013

सुभाषित

यद्यपि शुद्धं;लोक विरूद्धं,
नाकरणीयं; नाचरणीयं।
(किरातार्जुने)
यद्यपि जो शुद्ध हो किंतु लोकरीति के विरूद्ध हो,ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए।

*****

हिमालयं समारभ्य यावदिन्दु सरोवरमं।
तं देवनिर्मितं देशं हिंदुस्थानं प्रचक्ष्यते॥
(बृहस्पति आगम)


*****

उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये
पयपानं भुजंगानां केवल विषवर्धनमं।


*****

न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला॥
(मनुस्मृति ५-५३)
अर्थ-मांसभक्षण,मद्यपान और मैथुन में दोष नहीं है। मनुष्यों में यह गुण प्रकृति प्रदत्त हैं, किन्तु इनसे निवृत्ति लेना अधिक श्रेष्ठ है।

शनिवार, 17 अगस्त 2013

पुस्तक समीक्षा-"फिर कुंडी खटकी है"


कुछ वर्ष पूर्व मुझे मेरे एक मित्र ने कवि प्रदीप दुबे "दीप" की "फिर कुंडी खटकी है" नामक पुस्तक पढ़ने को दी। मुझे इसकी रचनाएं बेहद पसंद आईं। अभी कुछ दिनों पहले प्रदीप जी ने यह पुस्तक मुझे भेंट कर इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने को कहा। मैंने इसकी रचनाओं को जब पुनः पढ़ना प्रारंभ किया तो पुराने भाव फिर से नवीन महसूस होने लगे। प्रदीप जी रचनाएं आम आदमी की बात करतीं हैं। इन रचनाओं के विषय भी आम आदमियों के अपने हैं। प्रदीप जी अपनी रचनाओं में कठोर धरातल का चित्रण करते हैं ना कि किसी स्वप्नलोक का, एक बानगी देखिए-
फिर कुंडी खटकी है शुभदे
देख नया दुख आया होगा।
खुद चलकर आया होगा या
अपनों ने पहुंचाया होगा॥

प्रेम और विरह का चित्रण करने का भी प्रदीप जी का अपना ख़ास अंदाज़ है अपनी एक रचना में विरहा को कुछ इस अंदाज़ में चित्रित करते हुए वे कहते हैं-
बहुत उदास रहा
घर तुम बिन
चीज़ें बिखरी मन बिखरा था
मौसम का चेहरा उतरा था
सुधियों का जमघट था फिर भी
निपट अकेलापन पसरा था

इसी मिज़ाज़ की एक और रचना देखिए-
खुद टूटे पर कभी न तोड़ी
प्रीत; प्रीत की रीत,
सच-सच कहना बालू भैया
हार हुई या जीत?

अपनी एक और सशक्त रचना में प्रदीप जी ग्रामीण परिवेश का चित्रण करते हुए कहते हैं-
क्या बतलाएं बंसी भैया
इन दिन क्या चल रहा गांव में,
और नये छाले उभरे हैं
पगडंडी के लटे पांव में।

मुझे जो बात प्रदीप जी की रचनाओं में सबसे अच्छी व भली लगती है वह है उनकी सरलता। वे बिना किसी भारी-भरकम शब्दों की जमावट किए बगैर बिल्कुल सीधी-सादी बोली में अपनी व गहरी बात संयुक्त रूप से कहने में सफल हुए हैं। लेकिन इस दृष्टि से उनकी रचनाओं में कोई हल्कापन आया हो ऐसा नहीं है वे अपनी रचनाओं में गहरी से गहरी बात व विषयों को बड़े ही सरल और सहज संप्रेषण के माध्यम से उठाने में कुशल हैं। ये पंक्तियां देखिए-
इस बस्ती में क्षेम-कुशल है, कैसे कह दूं?
आते दिखा रुपहला कल है, कैसे कह दूं?

बैठ ना पाखी ह्रदय हार के
लौटेंगे दिन हरसिंगार के

दीपक तुम बेकार आ गए
सूरज वालों की बस्ती में

वर्तमान जनजीवन का दर्द प्रदीप जी ने अपनी इस रचना में बखूबी उकेरा है-
निपट अकेले बंटे हुए हम
आधे घर आधे दफ़्तर में
कभी लदा घर दफ़्तर पहुंचा
कभी लाए दफ़्तर को घर में।

प्रदीप जी ने दोहों पर भी अधिकार पूर्वक अपनी लेखनी चलाई है। मुझे उनके दोहों में जो अधिकांश प्रीतिकर लगता है वह है-
कहां प्रीत की माधुरी कहां नेह की गंध
मुंह देखे की बतकही सुविधा के संबंध।

कुल मिलाकर किसी कवि की श्रेष्ठता का अनुमान इस बात से नहीं होता कि उनकी कृतियों को कितने प्रादेशिक व राष्ट्रीय सम्मान मिलें हैं या उस कृति को कितने नामचीन लोगों ने अपने हाथों में लेकर तस्वीर खिंचाई है बल्कि इस बात से होता है कि पाठक उसकी रचनाओं को कितना अपना समझते हैं। मेरे देखे किसी रचना की सार्थकता तभी होती है जब उसे पढ़ने वालों को लगे कि "अरे यह तो अपनी ही बात कह दी गई।" वैसे भी वर्तमान युग प्रमोशन व ब्रांडिंग का है। कई कवि अपनी पुस्तकों को लोकप्रिय बनाने के लिए क्या-क्या हथकंडे नहीं अपनाते किंतु पाठकों की पसंद की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाते वहीं प्रदीप जी जैसे कवि बिल्कुल सहज होते हुए भी अपनी सशक्त रचनाओं के माध्यम पाठकों के ह्रदय में स्थान प्राप्त करने में सफल हो जाते है। आप सभी से अनुरोध है एक बार "फिर कुंडी खटकी है" पढिएगा ज़रूर।
प्रदीप जी इसी प्रकार खूब लिखें और उन्हें यथोचित सम्मान प्राप्त हो मां शारदे से यही प्रार्थना है...!

समीक्षक-हेमन्त रिछारिया 

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

स्तरहीन बौद्धिक


कल राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यक्रम "अखण्ड भारत संकल्प दिवस" में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वहां संघ के एक बड़े पदाधिकारी का बौद्धिक (भाषण) हुआ। उनका बौद्धिक वस्तुतः संघ के संस्थापक डा.हेडगेवार व संघ को संवर्धित करने वाले श्रीयुत गुरूजी एवं संघ की मूल विचारधारा के प्रतिकूल था। उनका  बौद्धिक स्तरहीन व नकारात्मक प्रभावोत्पादक था। यही वजह है कि आज आम जन संघ से संबद्ध होने में स्वंय को असहज पाता है। इसी प्रकार के तथाकथित स्वंयसेवकों व पदाधिकारियों की वजह से आज संघ की छवि धूमिल ना सही पर उज्जवल नहीं रही; जो कभी हुआ करती थी। आज इस प्रकार के पदाधिकारी व स्वंयसेवक एक वर्ग विशेष की आलोचना करना ही संघ की मूल विचारधारा मानते हैं जबकि संघ की मूल विचारधारा राष्ट्रनिष्ठा, सांस्कृतिक गौरव, धर्मनिष्ठा व हिंदू समाज को संगठित करना है। इस विचारधारा को संपुष्ट करने में यदि राष्ट्रविरोधी तत्वों की सहज निंदा करना पडे़ तो कोई हानि नहीं। ऐसे राष्ट्रविरोधी तत्व आज हर दल में, हर वर्ग में उपस्थित हैं। ऐसे में वक्ता को अपनी बुद्धिमत्ता से मूल विचारधारा के अनुरूप अपना वक्तव्य देना चाहिए। अच्छा होता यदि ये महाशय अखंड भारत की खंडता व राष्ट्रनिष्ठा पर अपना बौद्धिक केंद्रित करते तो वही होता जिसे हम कहते हैं कि "सांप भी मर जाता और लाठी भी नहीं टूटती"। मेरा देशवासियों से यही निवेदन है कि वे इस प्रकार के तथाकथित स्वंयसेवकों व पदाधिकारियों के बौद्धिकों से संघ के बारे में कोई धारणा ना बनाएं। संघ की मूल विचारधारा को समझने के लिए वे "डा.हेडगेवार चरित्र" व "गुरूजी समग्र" जैसी प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करें। मेरा विश्वास है कि वे इन ग्रंथों के अध्ययन के उपरांत संघ की विचारधारा से सहमत हुए बिना नहीं रह सकेंगे।

बुधवार, 14 अगस्त 2013

यार, हम कहां आ गए

अखण्ड भारतवर्ष
बीते ६६ साल यार,
हम कहां आ गए।

होती बड़ी निराशा है,
ना ही कोई दिलासा है।
कैसे बचाएं वतन अपना
सियासी दीमक खा गए॥
बीते ६६ साल यार, हम कहां आ गए।

गहन तिमिर का घेरा है,
घोर निशा का डेरा है।
कैसे फैलेगी अरूणिमा
काले मेघ जो छा गए॥
बीते ६६ साल यार, हम कहां आ गए।

पतनोन्मुख हुई व्यवस्था है,
हालत हो रही खस्ता है।
लक्ष्य विकास के सारे
आंकड़ों ही से पा गए॥
बीते ६६ साल यार, हम कहां आ गए।

-हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 10 अगस्त 2013

"धर्म दण्डयोऽसि"

प्राचीनकाल में किसी राजा को चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए अश्वमेध यज्ञ करना आवश्यक होता था। यज्ञ संपन्न करने के पश्चात पूर्णाहुति के समय राजा तीन बार उच्चार करता था-"अदण्डोऽस्मि....अदण्डोऽस्मि...अदण्डोऽस्मि..!"
अर्थात अब मुझे कोई दण्ड नहीं दे सकता, राजा के प्रत्येक उच्चार के बाद राजपुरोहित अपने धर्मदण्ड को राजा के मस्तक से स्पर्श कराकर उच्चार करता था-"धर्म दण्डयोऽसि...धर्म दण्डयोऽसि...धर्म दण्डयोऽसि...!" जिसका अभिप्राय होता है-धर्म तुम्हें दण्ड दे सकता है।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

सहर

होने लगी है अब सहर देखिए
कहां तक होता है असर देखिए

पांवो के छाले क्यूं देखते हैं आप
जानिबे-मंज़िल मेरा सफ़र देखिए

जाने कितने अपनी जां से गए
दोशीजा शबाब का कहर देखिए

भीड़ ही भीड़ नज़र आती है हर सूं
तन्हा-तन्हा सा हर बशर देखिए

नूरे-खुदा नज़र आएगा तुम्हें
बच्चों की मासूम नज़र देखिए

किसकी नज़र लगी है इसे
सुलगता मेरा शहर देखिए

दैरो-हरम में महदूद रहेगा?
वो है नुमाया जिधर देखिए

-हेमन्त रिछारिया


अर्ज़ किया है-

"छत पे आजा कि तेरी दीद हो जाए
 हम दीवानों की भी ईद हो जाए"

-हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 7 अगस्त 2013

आप कैसा महसूस कर रहे हैं?

पाकिस्तानी घुसपैठियों द्वारा किए गए हमले में हमारे ५ जवान शहीद हो गए। इस तरह की खबरें मीडिया के लिए मानो संजीवनी का काम करतीं हैं। सारे राष्ट्रीय चैनल व पत्रकार इसका प्रभाव समझने के लिए निकल पड़े। होना भी यही चाहिए, देश की जनता को देश की सुरक्षा संबंधी घटनाओं से परिचित कराना हमारे इस चौथे स्तंभ का ही कार्य है। परन्तु जिस प्रकार की रिपोर्टिंग हमारे अधिकांश खबरनवीस कर रहे हैं उसे देखकर ऐसा लगता है कि इस प्रकार की सामरिक,संवेदनशील व राष्ट्रीय महत्व की घटनाओं को "कवर" करने की योग्यता का हमारे अधिकतर पत्रकारों व न्यूज़ चैनलों में अभाव है। कुछ पत्रकार बंधु शहीद हुए सैनिकों के गांव पहुंचकर उनके घर के हालात देशवासियों को दिखाकर इसलिए अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे क्योंकि वे वहां सबसे पहले पहुंचे हैं। घर में रोती-बिलखती;बेसुध पड़ी महिलाओं का चित्रण करना उन्हें शायद अपनी खबर में वज़न का अहसास कराता होगा। इतना नहीं कुछ पत्रकार शहीद हुए जवान के माता-पिता के गमगीन चेहरों के आगे माइक लगाकर "बाइट" लेने की कोशिश करते हुए पूछते हैं कि "आप कैसा महसूस कर रहे हैं?" महदआश्चर्य है! भला एक पिता जिसका जिसका पुत्र शहीद हो गया हो; एक पत्नी जिसका सुहाग उजड़ गया हो, कैसा महसूस करेगें? एक मीडिया समूह ने एसएमएम के जरिए सर्वे शुरू कर दिया कि क्या पाकिस्तान पर कार्रवाई की जानी चाहिए? जवाब में तकरीबन १ लाख लोगों के एसएमएस पहुचं गए कि "हां" कार्रवाई की जानी चाहिए। ये बात अलग है कि यदि इस बात का सर्वे किया जाए कि इन १ लाख लोगों में से कितनों के परिजन भारतीय सेना में हैं या आवश्यकता होने पर सेना में जा सकते हैं तो परिणाम अत्यंत निराशाजनक आएंगे। इस प्रकार की पत्रकारिता से आप क्या साबित करना चाहते हैं? मेरा यही निवेदन है इस प्रकार की घटनाओं को इस प्रकार "कवर" किया जाना चाहिए जिससे आम आदमी कुछ प्रेरणा ले सके व उसे देश के प्रति अपने कर्तव्य का बोध हो, ना कि इस देश की जनता दिखाई गई खबरों को नाटक का अंश समझकर मनोरंजन मात्र करे।

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

हम दागी हैं तो क्या हुआ....

 अभी कुछ दिनों पहले देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए सजायाफ़्ता व्यक्तियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। यह पाबंदी जेल के अंदर से चुनाव लड़ने पर जारी रहेगी। इस फैसले का जहां देशवासियों ने दिल से स्वागत किया वहीं इसने राजनीतिक दलों व राजनेताओं की नींद उड़ा दी। खबर है कि जल्द ही सरकार इस फैसले के खिलाफ संसद में बिल पारित करने जा रही है। संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ की माने तो सभी दल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के विरूद्ध कानून में संशोधन करने के लिए एकजुट हैं। बड़े आश्चर्य की बात है कि गत वर्ष भ्रष्टाचार के विरूद्ध जब लोकपाल कानून के लिए आंदोलन हुआ था तो यही दल एक-दूसरे टांग खींचते नज़र आए थे। आज जब भ्रष्टाचार को रोकने की दिशा में कोई सार्थक कदम उठाया जा रहा तो यही दल अपना अंतर्विरोध भूलकर गलबहियां डाले एक साथ खड़े हैं। क्योंकि ये इनकी कुत्सित राजनीति का सवाल है;स्वार्थ का सवाल है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि ये राजनीतिक दल व राजनेता अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं इसके उदाहरण हमने समय-समय पर देखे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए और ना ही अपनी आने वाली पीढ़ियों को भूलने देना चाहिए कि यह आज़ादी हमें बिना खड्ग-बिना ढाल के प्राप्त नहीं हुई है इसके लिए हमें भारी कीमत चुकानी पड़ी है। इस आजादी को पाने के लिए जाने कितनी माताओं ने अपनी युवा संतानों को हंसते-हंसते देश पर न्यौछावर कर दिया है। कितनी बहनों ने अपना सुहाग खोया है। कितने युवक भर यौवन में काल के गाल में समा गए और आज भी जब देश पर संकट आता है तो ऐसा ही नज़र देखने को मिलता है। भला कारगिल को कौन भूल सकता है? इसलिए इस देश के लिए हमारा भी कुछ कर्तव्य है। जब ये दुष्चरित्र नेता अपने स्वार्थ के लिए देश को हानि पहुंचाने वाले कार्यों के लिए अपने अंतर्विरोध भूलकर एकजुट हो सकते हैं तो क्या हम देशवासी अपने देश के रक्षण के लिए अंतर्विरोध त्यागकर एक नहीं हो सकते। आज लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाली संसद में अपराधियों व दागीयों की बहुतायत है। सभी दल अपनी सीटें बढ़ाने के उद्देश्य से दागी व आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को चुनाव मैदान में उतारते हैं और फिर इन्हीं के दम पर समर्थन देते समय सौदेबाजी करते हैं। आखिर अयोग्य व आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को देश की नीति निर्धारण का कार्य कैसे सौंपा जा सकता है? इन राजनेताओं का यह कहना है कि संसद की सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर रहे हैं परन्तु ऐसा कहते समय वे यह भूल जाते हैं कि संसद से बढ़कर भी जन-संसद होती है जो देर-सबेर उनकी इस बुरी नीयत को समझ ही जाएगी। आज देशवासियों को यह संकल्प करना चाहिए कि भले ही संसद सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को अपनी निम्नस्तरीय चालबाजियों के चलते अमान्य कर दे परन्तु हम उसका अक्षरशः पालन करते हुए आपराधिक व दागी छवि वाले अयोग्य व्यक्तियों को संसद में नहीं भेजेंगे। यदि ऐसा हुआ तो यह लोकतंत्र एवं राष्ट्र-रक्षण की दिशा में एक अभूतपूर्व कदम होगा।