सोमवार, 29 जुलाई 2013

आंख तो फूटी,अंजन काहे

कल श्री एन.रघुरामन जी के कार्यक्रम में एक अजीब किस्सा सामने आया। संस्क्रत विशारद महर्षि पाणिनी के नाम पर प्रारंभ किए गए विद्यालय के एक अध्यापक ने प्रश्नोत्तर कार्यक्रम के दौरान हिचकोलेदार अंग्रेजी में रघुरामन जी से एक प्रश्न किया। प्रश्न कितना सार्थक था ये एक अलग विषय है परन्तु उन महोदय ने वहां उपस्थित जनसमुदाय का;जो कि पूर्णरूपेण हिन्दीभाषी था,उसके समक्ष अंग्रेजी बोलकर जो अपमान किया उसे मैं सहन नहीं कर सका और अवसर की प्रतीक्षा करता रहा ताकि उन्हें इस मिथ्या अहम का बोध कराने वाली परम्परा का मर्म समझा सकूं,किंतु अवसर नहीं मिला। महदआश्चर्य की बात है कि वहां मुख्यवक्ता श्री रघुरामन जो कि मूलतः मद्रासी और अहिन्दी भाषी हैं वे स्तरीय हिन्दी बोल रहे थे और उन्होंने अपना संपूर्ण व्याख्यान भी सुस्पष्ट हिंदी में दिया,वहीं हमारे ये सज्जन उनसे अंग्रेजी में बात कर रहे थे। विशेष  बात तो यह कि रघुरामनजी ने इनके अंग्रेजी में पूछे गए प्रश्न का उत्तर भी हिन्दी में दिया। आखिर इस प्रकार अंग्रेजी भाषा का दिखावा करके हम क्या साबित करना चाहते हैं? यही कि हमें अपनी भाषा का गौरव नहीं है या हम भाषाई रूप से इतने दरिद्र हैं कि हमें वार्तालाप करने के लिए भी किसी पराई भाषा का अवलंबन लेना पड़ता है या फिर हमने अंग्रेजी को भद्र और विद्वान होने का स्थाई मानक मान रखा है जिसका प्रयोग करने वाला अन्य लोगों की अपेक्षा श्रेष्ठ समझा जाएगा? निश्चित ही हर भाषा का अपना महत्व है; इस रूप में अंग्रेजी भी महत्वपूर्ण है किंतु वहां जहां इसकी महती आवश्यकता हो। मेरे देखे अंग्रेजी संपर्क की भाषा तो हो किंतु दिखावे या फैशन का मानक ना बने परन्तु आज हमारे देश का यही दुर्भाग्य है कि यहां अंग्रेजी एक फैशन व भद्रता-मानक (स्टेट्स सिंबल) बनती जा रही है। मुझे यहां पूज्य संत श्री मोरारी बापू की एक बात स्मरण आ रही है उन्होंने एक बार कहा था "आंख तो फूटी, अंजन काहे" अर्थात जब आंख ही नहीं होगी तो अंजन का क्या करोगे। हिन्दी हमारा नेत्र है और अन्य समस्त भाषाएं उस नेत्र पर अल्प समय आंजने वाला अंजन। ये कहते हुए बड़ी लज्जा का अनुभव होता है कि आज हमारे अधिकांश युवा हिन्दी का सुस्पष्ट उच्चारण करने व लिखने में असमर्थ हैं और उन्हें इस बात की कोई पीड़ा नहीं क्योंकि वे अंग्रेजी भली-भांति जानते हैं। मेरा मेरे देशवासियों से इतना ही निवेदन है कि हमारे ह्रदय में सम्मान तो हर भाषा का;हर परम्परा का;हर धर्म का हो किंतु गौरव "निज" का हो;अपने का हो।

-हेमन्त रिछारिया

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