शनिवार, 27 जुलाई 2013

ऐसा प्यार कहां...

तानसेन
 किसी संत ने कहा है कि-
                                                  "जे तेरे घट प्रेम है, ते कहि-कहि ना सुनाव।
                                                   अंर्तजानी जानिए, अंर्ततम का भाव॥"
ठीक भी है दो व्यक्तियों का प्रेम बिल्कुल निजी घटना है और उसके प्राकट्य के तरीके भी उतने ही निजी होते हैं। ऐसा ही एक प्रसंग सुप्रसिद्ध गायक तानसेन के जीवन में आता है जब अकबर रीवा नरेश राजा रामचंद्र को तानसेन को दिल्ली भेजने का आदेश देते हैं तो इससे रीवा नरेश अत्यंत दुखी हो जाते हैं पर विवश हो उन्हें तानसेन को दिल्ली भेजना ही पड़ता है। रास्ते में जब तानसेन पानी पीने के लिए एक कुंए पर रुकते हैं तो देखते हैं कि जिस चौडोल में वो बैठे थे उसे कहारों के साथ खुद रीवा नरेश ने अपने कांधों पे उठा रखा है। ये देखकर तानसेन अत्यंत भाव-विभोर हो जाते हैं और वे राजा रामचंद्र से कहते हैं कि "यद्यपि मैं आपको कुछ दे नहीं सकता पर आज एक वचन देता हूं कि जिस दाहिने हाथ से आज तक आपको "जुहार" (सलाम,नमस्कार) की है उस दाहिने हाथ से आज के बाद किसी और को जुहार नहीं करूंगा।"कहते हैं कि इसके बाद तानसेन हमेशा बाएं हाथ से सलाम करते थे।

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